Showing posts with label Ghazal. Show all posts
Showing posts with label Ghazal. Show all posts

Ghazal: जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी

वो जिसकी याद में कटती है ज़िन्दगी अपनी उसी के साथ में शामिल है हर खुशी अपनी वो लिखना चाहें तो लिक्खे तेरी अदाओं पे जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी नया है दौर ये ज़ालिम बड़ा ज़माना है ज़रा जतन से छुपाना तू मुफलिसी अपनी मिरे कदम से मिलाया है हर कदम उसने हर इक सफर में हुई है यूँ रहबरी अपनी

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'

Read More...

ग़ज़ल: प्यार की है फिर ज़रूरत दरमियाँ

प्यार की है फिर ज़रूरत दरमियाँ 
हर तरफ हैं नफरतों की आँधियाँ 

नफरतों में बांटकर हमको यहाँ 
ख़ुद वो पाते जा रहे हैं कुर्सियाँ 

खुलके वो तो जी रहे हैं ज़िन्दगी 
नफ़रतें हैं बस हमारे दरमियाँ 

जबसे देखा है उन्हें सजते हुए 
गिर रहीं हैं दिल पे मेरे बिजलियाँ 

और मैं किसको बताओ क्या कहूँ 
सबसे ज़्यादा हैं मुझी में खामियाँ 

आंखें, चेहरा सब बयाँ कर देते हैं 
इश्क़ को समझों नहीं तुम बेजुबाँ 

जब मुहब्बत का तेरा दावा है तो 
घूमता है होके फिर क्यों बदगुमाँ 

जो मेरा है वो ही तेरा है अगर 
किसको देता है बता फिर धमकियाँ 

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल' 

बहर: बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़ 
अरकान: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन 
वज़्न: 2122 - 2122 - 212 

Read More...

ग़ज़ल: जिनके लिए लड़ती है उनकी माँ की दुआएँ

उल्फत में इस तरह से निखर जाएंगे एक दिन
हम तेरी मौहब्बत में संवर जाएंगे एक दिन
एक तेरा सहारा ही बहुत है मेरे लिए
वर्ना तो मोतियों से बिखर जाएंगे एक दिन
हमने बना लिया है मुश्किलों को ही मंज़िल
यूँ ग़म की हर गली से गुज़र जाएंगे एक दिन
जिनके लिए लड़ती है उनकी माँ की दुआएँ
दुनिया भी डुबोये तो उभर जाएंगे एक दिन
यह दिल रहेगा आशना तब तक ही बसर है
वर्ना तेरे शहर से निकल जाएंगे एक दिन
- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'

(बहर: हज़ज मुसम्मिन अख़रब मक़फूफ महज़ूफ)

Read More...

यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं : ग़ज़ल

यह तो है कि मैं यहाँ तन्हा नहीं
तुझसे भी तो पर कोई रिश्ता नहीं

तिश्नगी तो है मयस्सर आपकी
जुस्तजू दिल में मगर रखता नहीं

साज़िशों से जिसकी हों ना यारियां
आज कोई भी बशर मिलता नहीं

नफरतें इस दौर का तोहफा हुईं
दिल किसी का भी यहाँ दुखता नहीं

बन गया है मुल्क का जो हुक्मरां 
ज़ालिमों के साथ वो लड़ता नहीं

इश्क़ जिससे हो गया इक बार जो
रिश्ता दिल में फिर कभी मरता नहीं

फूल के जैसा ही है मासूम यह 
टूटा दिल भी फिर कभी जुड़ता नहीं

खुद को हल्का रख गुनाहों से ज़रा
तूफाँ में घर एक भी बचता नहीं

- शाहनवाज़ 'साहिल'




फ़िलबदीह-185(25-06-2016) साहित्य संगम में लिखी ग़ज़ल

मात्रा:- 2122 2122 212
बह्र :- बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
अरकान :- फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
काफ़िया :- बसता(आ स्वर)
रदीफ़ :- नही
क्वाफी (काफ़िया) के उदआहरण
तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जँचता बेचा चलता जुड़ता रहता बचता भरता बहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।
इसी बह्र पर गीत गुनगुना कर देखें⬇
➡ आप के पहलू मे आकर रो दिए
➡ दिल के अरमा आंसुओं मे बह गए

Read More...

ग़ज़ल: फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे

मेरी यादों में आके क्या करोगे आस दिल में जगा के क्या करोगे ज़माने का बड़ा छोटा सा दिल है सबसे मिल के मिला के क्या करोगे अगर राहों में ही वीरानियाँ हों इतनी बातें बना के क्या करोगे नफरतें और बढ़ जाएंगी दिल में ऐसी बातों में आ के क्या करोगे जो दिल नाआशना ही हो चुके हों फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे - शाहनवाज़ 'साहिल'


मात्रा:- 1222 1222 122
बह्र :- बहरे हजज  मुसद्दस महजूफ
अरकान :- मुफाईलुन मुफाइलुन फ़ऊलुन
काफ़िया :- क्या(आ स्वर)
रदीफ़ :- करोगे

क्वाफी (काफ़िया) के उदाहरण :-
जागा ऐसा तन्हा खिलता मिलता जलता सहता सस्ता मरता रिश्ता दिखता सकता चुभता मुड़ता कहता सस्ता रखता जचता बेचा चलता जुड़ता जचता रहता बचता भरता बहता कहता लड़ता प्यारा धागा ज्यादा ताना साया भाया दाना वादा आदि । इसी प्रकार के अन्य शब्द जिनके अंत में " आ "स्वर आये।

इसी बह्र पर कुछ गीत:
➡अकेले हैं चले आओ जहां हो
➡ मैं तन्हा था मगर इतना नही था

Read More...

ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए - अदम गोंडवी

आज के मौजूं पर अदम गोंडवी साहब की कुछ मेरी पसंदीदा ग़ज़लें:

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

- अदम गोंडवी


हिन्‍दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए

- अदम गोंडवी


काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

- अदम गोंडवी

Read More...

मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

उधर से चिलमन सरकता दिखाई देता है
इधर नशेमन फिसलता दिखाई देता है

तुझे पता क्या तेरे फैसले की कीमत है
मेरा वजूद बदलता दिखाई देता है

उमड़-उमड़ के जो आते हैं मेघ आँगन में
फटा सा आँचल तरसता दिखाई देता है

कई रातों से भूखा सो रहा था जो बच्चा
आज फिर माँ से उलझता दिखाई देता है

झूठे वादों की लोरियों से परेशां है जो
वही हाकिम से झगड़ता दिखाई देता है

अरे पैसों के गुलामों कभी तो यह देखो
क़ैद में पंछी तड़पता दिखाई देता है

- शाहनवाज़ 'साहिल'

Read More...

कहो कब तलक यूँ सताते रहोगे


कहो कब तलक यूँ सताते रहोगे  
कहाँ तक हमें आज़माते रहोगे  

सवालों पे मेरे बताओ ज़रा तुम  
यूँ कब तक निगाहें झुकाते रहोगे  

हमें यूँ सताने को आख़ीर कब तक  
रक़ीबों से रिश्ते निभाते रहोगे  

वो ग़म जो उठाएँ हैं सीने पे तुमने  
बताओ कहाँ तक छुपाते रहोगे 

- शाहनवाज़ 'साहिल' 

Read More...

पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

हज़ारों साज़िशें कम हैं सियासत की अदावत की
हर इक चेहरे के ऊपर से नकाबों को हटाता चल

कभी सच को हरा पाई हैं क्या शैतान की चालें?
पकड़ ले आइना हाथों में बस उनको दिखाता चल

करो कुछ काम ऐसे भी अदावत 'इश्क़' हो जाएं
रहे इंसानियत ज़िंदा, मुहब्बत को निभाता चल

भले कैसा समाँ हो यह, बदल के रहने वाला है
कभी मायूस मत होना, यूँही खुशियाँ लुटाता चल

- शाहनवाज़ 'साहिल' 

Read More...

मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए...

यह हमारा हिन्दोस्तां है, जहाँ मज़हब दोस्ती का सबब है, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग साथ रहते हैं, खाते हैं, पढ़ते हैं और साथ ही अपनी-अपनी पूजा भी कर लेते हैं....

हज़ारों साज़िशें कमतर हैं दुश्मनी के लिए
मेरे वतन में तो 'मज़हब' हैं दोस्ती के लिए
- शाहनवाज़ 'साहिल'


Read More...

उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?

सियाचिन ग्लैशियर में हिमस्खलन से हुई हमारे जवानों शहादत की खबर ग़मगीन कर गई! देश की हिफाज़त की ख़ातिर सरहदों पर लड़ने वाले हमारे जवानों की जज़्बे और शहादत को सलाम...


हम यूँ आज़ादियों की हर इक जद में हैं
क्योंकि क़ुर्बानियाँ उनके मक़सद में है

उन जवानों का कर्ज़ा चुकाएंगे कब?
जो हमारी हिफाज़त को सरहद पे हैं

- शाहनवाज़ 'साहिल'

Read More...

ग़ज़ल: सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा

यूँ ना देखो दुनियाभर में तब्सिरा हो जाएगा 
फ़क़्त बस बैठे-बिठाए मसअला हो जाएगा 

होंट हिलते ही नहीं हैं आप हो जब सामने
आप ही कोशिश करो तो हौसला हो जाएगा 

रेत पर बच्चे की मेहनत लहरों से टकरा गई
पर 'घरौंदा' टुटा तो वो ग़मज़दा हो जाएगा 

दिल अभी महफूज़ है महफ़िल के कारोबार से
आप गर चाहेंगे तो यह मुब्तिला हो जाएगा 

आ करूँ में आज तुझसे दिलरुबा यह फैसला
और भी कुछ ना हुआ तो तजरुबा हो जाएगा 

ग़ैर के तो ऐब हमने रात-दिन देखा किये
अपने देखेंगे तो यह दिल आईना हो जाएगा 

चापलूसी पर टिकें हैं 'साहिल' रिश्ते आज के
सच अगर आया ज़ुबाँ पर फासला हो जाएगा 

- शाहनवाज़ 'साहिल'

Read More...

हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा


हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा
हर शय से दिलनशी है, यह बागबाँ हमारा

हर रंग-ओ-खुशबुओं से हर सूं सजा हुआ है
गुलशन सा खिल रहा है, हिन्दोस्ताँ हमारा

हो ताज-क़ुतुब-साँची, गांधी-अशोक-बुद्धा
सारे जहाँ में रौशन हर इक निशाँ हमारा

हिंदू हो या मुसलमाँ, सिख-पारसी-ईसाई
यह रिश्ता-ए-मुहब्बत, है दरमियाँ हमारा

सारे जहाँ में छाया जलवा मेरे वतन का
हर दौर में रहा है, भारत जवाँ हमारा

हमने सदा उठाया इंसानियत का परचम
हरदम ऋणी रहा है, सारा जहाँ हमारा

- शाहनवाज़ 'साहिल'

Read More...
 
Copyright (c) 2010. प्रेमरस All Rights Reserved.