कल फ़्रांस के मशहूर वर्साय महल में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के साथ हुए समझौते के मसौदे पर दस्तख़त किए। वही वर्साय, जहाँ 1919 में एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर हुए थे जिसने पहले विश्व युद्ध का अंत तो कर दिया, लेकिन साथ ही आने वाले वर्षों में एक नई तबाही की नींव भी रख दी।
उस दौर में जर्मनी के बहुत से लोगों को लगा था कि उन पर एक ऐसी शर्त थोप दी गई है जिसने उनकी इज़्ज़त, ताक़त और आत्मविश्वास को बुरी तरह चोट पहुँचाई। उस अपमान और ग़ुस्से ने आगे चलकर दुनिया को दूसरी विश्व युद्ध की आग में झोंक दिया।
आज लोग कह रहे हैं कि वर्साय में हुई ताज़ा संधि का सबसे बड़ा झटका इज़रायल को लगा है।
जिस देश की राजनीति कई दशकों से ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा बताती रही, जहाँ नेतन्याहू सालों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने और उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव में लाने की मुहिम चलाते रहे, ईरान के ऊपर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगवाए गए, वहीं अब हालात ऐसे मोड़ पर पहुँच गए हैं कि विश्लेषक इसे इज़रायली नेतृत्व की बड़ी राजनीतिक हार ठहरा रहे हैं।
इज़रायल के भीतर भी बेचैनी बढ़ रही है। नेतन्याहू की मज़बूत छवि पर सवाल उठ रहे हैं। जो नेता खुद को हर मोर्चे पर विजेता साबित करना चाहते थे, उनके आलोचक अब उनकी नीतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में नए दावेदार सक्रिय हैं और राजनीतिक संघर्ष पहले से ज़्यादा तेज़ दिखाई दे रहा है।
इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि जब किसी समाज की उम्मीदें टूटती हैं, तब अक्सर लोग अपने नेताओं, संस्थाओं और फैसलों पर सवाल उठाने लगते हैं। 1919 के जर्मनी में भी बहुत से लोगों को लगा था कि उनकी जीत उनसे छीन ली गई, कि कहीं न कहीं उनके साथ धोखा हुआ है। ऐसे ही जज़्बात बाद में बड़े राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बने।
क्या वर्साय का यह नया समझौता भी आने वाले वर्षों की राजनीति को बदल देगा? क्या यह मध्य पूर्व में एक नए दौर की शुरुआत है या किसी नए टकराव की भूमिका?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना ज़रूर है कि वर्साय का महल एक बार फिर दुनिया की राजनीति के एक ऐसे मोड़ का गवाह बना है, जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई दे सकती है।


0 comments:
Post a Comment