जब बुलडोज़र घरों से आगे बढ़कर मस्जिदों तक पहुंच चुका है, तो यह समझ लेना चाहिए कि आग सिर्फ़ दूसरों के दरवाज़े तक नहीं रुकेगी। आज अगर किसी और की बारी है, तो कल किसी और की होगी। इसलिए जो लोग खुद को क़ौम का रहनुमा और ठेकेदार समझते हैं, उनके पास अभी भी मौका है कि वे मुसलमानों की आवाज़ बनें। अगर नहीं, तो अपने दड़बों में बैठे रहिए और अपने नंबर का इंतज़ार कीजिए।
पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों ने बहुत कुछ देखा है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुईं, बुलडोज़रों ने घरों और दुकानों को निशाना बनाया। फिर अचानक मस्जिदों और दरगाहों के नीचे मंदिर होने के दावों की बाढ़ आ गई। और अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बुलडोज़र सीधे मस्जिदों की तरफ़ मुड़ गया है।
दो साल के भीतर बुलडोज़र कार्रवाइयों ने देशभर में लाखों लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित किया है। रिपोर्टों के मुताबिक़ इस दौरान 1.5 लाख से ज़्यादा घर ढहा दिए गए, जिसके कारण लगभग 7.38 लाख लोग बेघर होने पर मजबूर हुए। मानवाधिकार संगठन HLRN के आंकड़े बताते हैं कि दंडात्मक विध्वंस से जुड़े मामलों में सबसे ज़्यादा असर मुसलमानों पर पड़ा, और करीब 44 प्रतिशत मामलों में वे सबसे अधिक प्रभावित समुदाय के रूप में सामने आए।
लगभग हर हफ्ते किसी न किसी शहर से खबर आती है कि चौड़ीकरण, सौंदर्यीकरण या अवैध कब्ज़े के नाम पर किसी मस्जिद को गिरा दिया गया, किसी इबादतगाह को मलबे में बदल दिया गया। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा।
जब बुलडोज़र कार्रवाई के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई शुरू हुई, तब कुछ संगठनों ने अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश भी जारी किए। लेकिन ज़मीनी स्तर पर आज भी ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जिनमें लोग खुद को असुरक्षित और बेबस महसूस कर रहे हैं।
सबसे अफ़सोसनाक बात यह है कि आम मुसलमान परेशान है, डरा हुआ है, अपने भविष्य को लेकर फिक्र में है। दूसरी तरफ़ राजनीतिक दलों की ख़ामोशी और सोशल मीडिया की बयानबाज़ी से आगे बहुत कम कुछ दिखाई देता है।
यह मसला सिर्फ़ राजनीति का नहीं रह गया है। बहुत से लोगों को यह डर सताने लगा है कि कहीं उनकी पहचान, उनकी विरासत और उनके वजूद पर ही सवाल खड़े न किए जा रहे हों।
ऐसे वक़्त में ज़रूरत सिर्फ़ शिकायत करने की नहीं, बल्कि जागने की है। ज़रूरत है कि मुसलमान अपने हक़ और अपने संविधानिक अधिकारों के लिए संगठित हों, कानूनी और लोकतांत्रिक रास्तों पर मज़बूती से खड़े हों, और उन लोगों से जवाब मांगें जो सालों से उनकी नुमाइंदगी का दावा करते आए हैं।

















