एक सीट की लड़ाई… और एक इंसान की जान चली गई!

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  • Shah Nawaz
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  • दिल्ली के शाहदरा रेलवे स्टेशन पर शनिवार सुबह जो हुआ, उसने सिर्फ एक परिवार का चिराग नहीं बुझाया, बल्कि हमारी पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खबरों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बागपत निवासी 32 वर्षीय पंकज धामा योगा एक्सप्रेस की जनरल बोगी में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। भीड़ थी, धक्का-मुक्की थी, बहस हुई और देखते ही देखते कुछ लोगों ने उन्हें इतनी बेरहमी से पीटा कि उनकी जान चली गई।


    सोचिए, एक आदमी सुबह घर से सफर के लिए निकला था। शायद परिवार से मिलने जा रहा था, शायद किसी ज़रूरी काम से। लेकिन उसे क्या पता था कि ट्रेन की जनरल बोगी में जगह बनाने की कोशिश उसकी आख़िरी कोशिश साबित होगी। लात-घूंसों से पीटा गया, ज़मीन पर गिरा दिया गया और फिर अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी ज़िंदगी खत्म हो गई।


    अब सवाल सिर्फ उन लोगों से नहीं है जिन्होंने पंकज धामा को पीटा।


    सवाल सरकार और रेलवे प्रशासन से भी है।


    * आखिर हर साल किराए बढ़ाने और नई योजनाओं के दावों के बावजूद जनरल डिब्बों में इंसानों को जानवरों की तरह क्यों ठूंसा जाता है?

    * रेलवे स्टेशन और प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा बल मौजूद होने के बावजूद एक व्यक्ति को भीड़ पीट-पीटकर मार देती है, यह कैसी सुरक्षा है?

    * अगर मौके पर हालात इतने बिगड़ गए थे तो तत्काल मेडिकल सहायता क्यों नहीं मिली?

    * क्या सरकार तब तक नहीं जागेगी जब तक किसी वीआईपी का बेटा या किसी बड़े अधिकारी का रिश्तेदार ऐसी भीड़ का शिकार नहीं बन जाता?


    वीडियो में कथित तौर पर दिखाई देता है कि बीच-बचाव की कोशिश हुई, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह पर्याप्त थी? क्या एक घायल व्यक्ति को तुरंत चिकित्सा सहायता दिलाने के लिए पूरी मशीनरी सक्रिय हुई? अगर हुई, तो फिर एक जान क्यों चली गई?


    सबसे दुखद बात यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। भीड़, अव्यवस्था और सुरक्षा की कमी को लेकर रेलवे बार-बार सवालों के घेरे में रहा है। लेकिन हर हादसे के बाद कुछ दिनों का शोर होता है, जांच बैठती है, और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।


    पंकज धामा अब वापस नहीं आएंगे। लेकिन उनका जाना हम सबके लिए एक सवाल छोड़ गया है—


    क्या भारत में एक आम आदमी के लिए ट्रेन का सफर इतना असुरक्षित हो चुका है कि सीट के लिए हुई बहस उसकी मौत का कारण बन जाए?


    पंकज धामा के परिवार के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, पूरी जिंदगी का दर्द है। और इस दर्द का जवाब सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही भी है जिसने ऐसी स्थिति पैदा होने दी।

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