Showing posts with label Dharm. Show all posts
Showing posts with label Dharm. Show all posts

कर्बला: जब एक इंसान हक़ के लिए पूरी दुनिया के सामने खड़ा हो गया

ज़ुल्म कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, सच की एक आवाज़ उसे हमेशा चुनौती देती है।


इस्लाम की तारीख़ में बहुत सी घटनाएँ हुई हैं, लेकिन कर्बला का वाक़िआ सिर्फ़ एक जंग की कहानी नहीं है। यह हक़ और बातिल, इंसाफ़ और ज़ुल्म, किरदार और सत्ता की लड़ाई की ऐसी मिसाल है जो आज भी इंसानों को हिम्मत देती है।


हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) और यज़ीद के बीच का मामला सिर्फ़ दो लोगों का झगड़ा नहीं था। यह उसूलों और ताक़त के बीच का मुकाबला था।


जब यज़ीद ने अपनी हुकूमत को मज़बूत करने के लिए लोगों से बैअत माँगी, तो बहुत से लोगों ने दबाव या हालात की वजह से उसे स्वीकार कर लिया। लेकिन इमाम हुसैन ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने साफ़ कहा कि अगर हुकूमत इंसाफ़, सच्चाई और दीन की बुनियादी तालीमात से दूर हो जाए, तो उस पर सवाल उठाना ज़रूरी है।


इमाम हुसैन जानते थे कि यह रास्ता आसान नहीं है। उन्हें पता था कि इसके नतीजे बहुत दर्दनाक हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने अपने ज़मीर का सौदा नहीं किया।


कर्बला के मैदान में उनके साथ सिर्फ़ कुछ दर्जन साथी थे, जबकि सामने हज़ारों का लश्कर था। पानी बंद कर दिया गया। बच्चे प्यासे थे। औरतें परेशान थीं। हालात इतने कठिन थे कि इंसान का दिल काँप जाए।


लेकिन इमाम हुसैन ने हार नहीं मानी।


उन्होंने दुनिया को सिखाया कि कामयाबी सिर्फ़ जीत जाने का नाम नहीं है। कभी-कभी कामयाबी अपने उसूलों पर आख़िरी सांस तक डटे रहने का नाम भी होती है।


10 मुहर्रम 61 हिजरी को कर्बला की रेत पर इमाम हुसैन और उनके साथियों ने शहादत पाई। देखने वालों को लगा होगा कि ताक़त जीत गई और कमज़ोर हार गए।


लेकिन इतिहास ने कुछ और फैसला सुनाया।


आज दुनिया भर में करोड़ों लोग इमाम हुसैन का नाम इज़्ज़त और मोहब्बत से लेते हैं, जबकि कर्बला का ज़िक्र आते ही ज़ुल्म और जब्र के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद होती है।


कर्बला हमें यह सबक देती है कि:


* अगर पूरी दुनिया एक तरफ़ खड़ी हो और सच दूसरी तरफ़, तो सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

* हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, इंसान को अपने ज़मीर के खिलाफ़ नहीं जाना चाहिए।

* ताक़त हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती, किरदार और सच्चाई भी इतिहास बदल देते हैं।

* कभी-कभी एक छोटी सी कुर्बानी आने वाली नस्लों के लिए रोशनी का रास्ता बन जाती है।


आज जब हम अपने आसपास नाइंसाफ़ी, झूठ और ज़ुल्म देखते हैं, तो कर्बला की याद हमें हिम्मत देती है। यह बताती है कि इंसान की असली पहचान उसकी दौलत, ताक़त या ओहदे से नहीं, बल्कि उसके उसूलों से होती है।


कर्बला की सबसे बड़ी सीख यही है कि इंसान हार कर भी जीत सकता है, अगर वह अपने उसूलों और सच का दामन न छोड़े।


“सर कटा सकते हैं, लेकिन हक़ के सामने सिर झुका नहीं सकते। यही कर्बला है, यही हुसैनियत है।”


इमाम हुसैन का पैग़ाम सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए है जो सच, इंसाफ़ और इंसानियत पर यक़ीन रखता है। खासतौर पर आज के हालत पर तो यह पैग़ाम एकदम सटीक बैठता है, कुछ लोग कहते हुए घूम रहे हैं कि हक़ का साथ देने की जगह ग़द्दारी करने वालों ने एकदम सही किया, सारा ठेका हमने नहीं लिया है। तो उन्हें इमाम हुसैन का पैग़ाम ऐसे लोगों की असलियत खोलकर उनका असल चेहरा सबके सामने रख देता है कि कौन हुसैनियत की तरफ़ है और कौन यज़ीदियत की तरफ़…

Read More...

पैगंबर मोहम्मद हमेशा शांति के लिए खड़े रहे शांति दूत थे - स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य

स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य पहले लंबे समय तक इस्लाम को आतंकवाद से जोड़कर देखते थे। दरअसल उन्होंने 'हिस्ट्री ऑफ इस्लामिक टेररिज्म' नाम की किताब भी लिखी थी जिसमें उन्होंने क़ुरआन की कुछ आयतों को हिंसा से जोड़ा था। परन्तु जब वह 'इस्लाम के कारण खतरे में अमेरिका' नामक किताब पर काम कर रहे थे, तब इस्लाम के बारे में उनकी धारणा में बुनियादी परिवर्तन आया। 

वह कहते हैं कि उन्होंने कुरआन को एक बार फिर पढ़ा और पाया कि जिन आयतों को मैं हिंसा से जोड़ रहा था, उनका आतंक से कोई लेना-देना नहीं था। यही नहीं स्वामी कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने पैगंबर मोहम्मद साहब के बारे में बारीकियों से पढ़ा और पाया कि वह तो हमेशा शांति के लिए खड़े रहे शांति दूत थे।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 'इस्लाम' पर एक सेमिनार के दौरान उन्होंने यह बातें कहीं





पैगंबर मोहम्मद हमेशा शांति के लिए खड़े रहे शांति दूत थे - स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्यस्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य पहले लंबे...
Posted by Shah Nawaz on Tuesday, April 7, 2015

Read More...

नफ़रत हमारा रास्ता नहीं है

आज कल चारो ओर नफ़रत की खेती हो रही है और लोग मुहब्बत के फूल खिलने के इंतज़ार में हैं... जब से होश संभाला है तब से मेरा पाला अक्सर इन दो सोच वालों से पड़ता है, आपका भी पड़ता होगा... एक यह कि भाजपा आएगी तो मुसलमान बर्बाद हो जाएँगे और दूसरी यह कि कांग्रेस हमारी छुपी दुश्मन है, इसने कभी हमारा भला नहीं किया। और मुझे शुरू से चिढ़ होती है इस तरह की सोच से। इस बात से डरना छोड़ दो कि कोई आएगा तो हम ख़त्म हो जाएँगे...

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरें-जहाँ हमारा।।

हमें अपने दिल में यह गाँठ बांधनी होगी कि हम कोई स्पेशल नहीं हैं, कोई मोदी/राहुल/मुलायम/माया हमारी मदद करने नहीं आएगा, बल्कि अपनी मदद हमें खुद ही करनी होगी। 

मुसल्मानों को सबसे ज़्यदा नुक्सान जिस सोच ने किया है, मानता हूँ कि उसे भाजपा की नीतियों ने बढने में मदद की और कांग्रेस जैसी पार्टियों ने बढ़ने दिया है, लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार हम ही हैं। नफरत की शुरुआत तो एकतरफ़ा हो सकती है, लेकिन नफ़रत कभी भी एकतरफा नहीं फ़ैल सकती।

हम अपने दिल पर हाथ रख कर विचार करें कि इन नफरतों / अविश्वास को ख़त्म करने की कितनी ईमानदार कोशिश हमने की। दोस्तों मेरे नबी ने बुराई का विरोध करना सिखाया है, बुरों से नफ़रत करना हरगिज़-हरगिज़ नहीं सिखाया। 

मक्का वालों ने आप (सल.), आपके घरवालों और साथियों को बेईज्ज़त करने और जान से मारने की हर संभव कोशिश की। जब आप नमाज़ के लिए खड़े होते थे तो ऊंट की आंतडियाँ आपके ऊपर डाल दी जाती थीं, रास्ते से गुज़रते थे तो कूड़ा डाला जाता था। यहाँ तक कि आपको खुद अपने ही शहर को छोड़कर मदीना जाना पड़ा। याद नहीं है कि आप (सल.) के चाचा हमज़ा (रज़ी) की हत्या करने के बाद उनका सीना चीर कर दिल और जिगर को निकाला गया था? मगर मक्का फतह पर जानते हो मुहम्मद (सल.) ने क्या किया? क्या उन्होंने उन ज़ालिमों से बदला लिया? नहीं... बल्कि हर एक ज़ुल्म की आम माफ़ी दे दी।

कसम से यह सारी नफ़रतें मठाधीशों ने फ़ैला रखी हैं, सिर्फ अपनी-अपनी दूकानदारियाँ चलाने के लिए। मज़हब तो नफ़रतें फैला ही नहीं सकते। इसलिए अगर जिंदगी से नफ़रतें ख़त्म करना चाहते हो तो इनकी ग़ुलामी से आज़ाद हो जाओ और जुट जाओ समाज से नफ़रत के खात्में में।





Read More...

'नमाज़' अर्थात वास्तविक जीवनशैली का तरीका


क्या तुम उसे जानते हो जो दीन को झुठलाता है? वही तो है जो (खुद) अनाथ को धक्का देता है और (दूसरों को) मोहताज के खिलाने पर उकसाता भी नहीं है।


अत: तबाही है उन नमाज़ियों के लिए जो अपनी नमाज़ अर्थात वास्तविक जीवनशैली (Life Style) भूले हुए हैं। जो दिखावे के लिए काम करते हैं और मामूली सी बरतने की चीज़ भी किसी (ज़रूरतमंद) को नहीं देते। [क़ुरआन 107:1-7]

क़ुरआन की उपरोक्त आयत में हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी जीने के तरीके को 'नमाज़' (पूजा पद्धती) बताया है, और यह कि इसमें दो बातें सामने आती हैं... सबसे पहले तो यह कि खुद अनाथों / मोहताजों से मुहब्बत करनी है, उनकी मदद करनी है और केवल इतना ही नहीं बल्कि दूसरों को समझा-बुझा कर इसके लिए राज़ी करना भी हमारी ज़िम्मेदारी है...

और दूसरी बात यह है कि दिखावे के लिए किया गया काम धार्मिक नहीं हो सकता... मतलब यह कि अपने 'नाम' के लिए उपरोक्त कार्य नहीं करना है, अगर किसी की मदद करें तो एकदम चुपचाप हो कर, जैसा कि कहावत है कि दाएं हाथ से दें तो बाएं को पता भी नहीं चले।





Keywords: orphan, penurious, glossiness, pretense, show, sham, quran, quraan, islam

Read More...

शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम


यजीद अपनी बदबख्तियों पर दीन की मुहर लगाना चाहता था और इसीलिए वोह चाहता था कि हज़रत मुहम्मद मुस्तफा के प्यारे नवासे हुसैन (र.) उसकी बातों पर मुहर लगाएं, मतलब कि उसके हाथ पर बै'त करें। मगर हुसैन (र.) ने खुद अपने आप और अहल-ओ-अयाल का शहीद हो जाना पसंद किया लेकिन दीन को मिटते देखना गंवारा नहीं किया।

जिन लोगो ने मुहर्रम की दसवीं तारीख मतलब आज ही के दिन हज़रत हुसैन (रज़ी.) और उनके साथियों को इस कदर वहशियाना तरीके से शहीद किया वोह लोग यजीद और यजीदी सोच के पेरुकार थे... और उनका मक़सद किसी भी क़ीमत पर सत्ता पर कब्ज़ा था...

और यह सोच आज भी जिंदा है, चाहे वोह सत्ता मुल्कों की हो या समूहों की... और ऐसी सोच के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना और मज़हब के नाम पर हो रही बदबख्तियों के खिलाफ आवाज़ उठाना ही शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम है।

Read More...

कब बनेंगे इंसान?

बटला हाउस इनकाउंटर हो या मालेगाँव ब्लास्ट, मामला चाहे इशरत जहाँ का हो या फिर साध्वी प्रज्ञा का, सबको अपने-अपने धर्म के चश्मे से देखा जाता है। मीडिया जिसके सपोर्ट में रिपोर्ट दिखाए वोह खुश दूसरों के लिए बिकाऊ मिडिया बन जाता है... कितने ही इन्सान मर गए या मार दिए गए, मगर किसी को गोधरा का ग़म है तो किसी को गुजरात दंगो का...

कब हर मामले को सभी चश्मे हटाकर इंसानियत की निगाह से देखा जाएगा? धर्मनिरपेक्षता पर लफ्फाजी और राजनीति की जगह इसकी रूह को समझने और अपनाने की ज़रुरत है... यक़ीन मानिये जब तक हम सब इसपर नही चलेंगे, देश में शांति, खुशहाली और तरक्की आ ही नहीं सकती है..

Read More...

आस्था या अंध-भक्ति

मुझे नहीं लगता कि कोई भी धार्मिक व्यक्ति कभी भी किसी बाबा या तांत्रिक के चक्कर में पड़ कर अपनी इज्ज़त-आबरू या पैसा बर्बाद कर सकता है... हाँ अंध-भक्त हमेशा ऐसा ही करते हैं। कितना सरल है ऐसे बाबाओं को पहचानना... अनैतिकता, पैसों के लालच का धर्म से कोई सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है।

हमें यह समझना होगा कि यह सारी खराबी धर्म के साथ पैसे के घाल-मेल से ही शुरू होती हैं। अगर आप कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो सबसे अच्छा है कि ज़रुरतमंदों की मदद की जाए।

सबसे बड़ी कमी हमारी इस सोच में है कि जो धार्मिक है वह कभी गलत हो ही नहीं सकता है। और इसीलिए हम खोजबीन अथवा अपनी अक्ल लगाने की जगह उस पर आंख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं। हम जिसे बड़ा मानते हैं कभी तहकीक ही नहीं करते कि वह जो कह रहा है वह धर्म सम्मत है भी या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह फ़कीर के भेस में शैतान हो।

किसी बाबा या धार्मिक स्थल पर दान देने से समाज का भला होने वाला नहीं है बल्कि इससे ही हज़ारों-लाखों धर्म की दुकाने चल निकली हैं। अगर धार्मिक स्थलों अथवा बाबाओं को दान देने पर रोक लगा दी जाए और हर एक धार्मिक नेता की बातों को आंखे बंद करके विश्वास कर लेने की जगह उसकी सच्चाई पर खोजबीन शुरू कर दी जाए तो धार्मिक दुकानदारी की समस्या जड़ से ही समाप्त हो जाएगी।

अभी पिछले दिनों कश्मीर में एक ढोंगी बाबा (गुलजार अहमद बट) युवतियों को पवित्र करने के नाम पर उनका दैहिक शोषण करता रहा और बेवक़ूफ़ अंध-भक्त उसके जाल में फंसते रहे। उसका कहना था कि जन्नत का रास्ता उसके साथ सेक्स करने से खुलता है... हद है बेवकूफी की भी। आखिर किसी अनैतिक कार्य का धर्म से सम्बन्ध कैसे हो सकता है?

धर्म सजगता सिखाता हैं अंध-भक्ति नहीं, ना तो किसी को धौखा दिया जाए और इतनी सजगता कि कोई हमें धौखा दे भी ना पाए।




इस विषय पर यह भी पढ़ें:






Keywords: relegion, baba, tantrik, fakeer, faqeer, faqir, fraud, cheat, deception, spoof, bluff, gag, rape, sexual relation, deceit, trickery

Read More...

इश्क-ए-हक़ीकी और उसकी नाराजगी


गुनाहों में मुब्तला रहने का मतलब है कि रब की नाराज़गी का खौफ दिल में नहीं है... और यह इसलिए है क्योंकि उससे इश्क़ का सुरूर अभी दिल पर छाया ही नहीं... महबूब से इश्क़ का अभी बस दावा है, दर-हकीक़त दावे से कोसो दूरी है!

उससे मिलन की चाहते तो हैं, लेकिन अपने फे`ल से लगता ही नहीं कि उसे भी अपने इश्क में मुब्तला करना चाहते हैं! वर्ना उसकी नाराजगी की ता`ब दिल में लाना मुमकिन हो सकता था क्या?


महबूब की नाराज़गी भी कोई दीवाना कभी सहन कर सकता है भला!!!

बल्कि "इश्क़" वोह शय है कि जिससे होता है, आशिक तो उसे सोते-जागते याद करने में ही लुत्फ़-अन्दोज़ होता रहता है। और जिसे मुझसे इश्क हो, फिर अगर मैं उससे मिलन की आस के आनंद में वशीभूत होता हूँ तो क्या वह मुझसे राज़ी नहीं होगा?






Keywords: ishqe-haqiqi, ishq-ai-haqiki, inner-love, , अध्यात्म

Read More...

उनका अहसान फ़र्ज़, हमारा फ़र्ज़ अहसान

समाज में महिलाओं के पुरुषों पर अहसान को उनका फ़र्ज़ (ड्यूटी) और अपने फ़र्ज़ पूरे करने को उनपर एहसान बताया जाता है।

पत्नी का पति के लिए खाना बनाना, घर का ख्याल रखना, बच्चों की परवरिश करना इस्लाम में फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि पति पर एहसान है (अगर वोह करना चाहे तो) । अगर पत्नी बच्चे को दूध ना पिलाना चाहे तो दूध पिलाने वाली का इंतजाम करना पति के ऊपर फ़र्ज़ है। और एहसान का बदला एहसान से या फिर कम-अज़-कम हुस्न-सलूक होना चाहिए। लेकिन इसको पत्नी की ड्यूटी बना दिया गया, जिससे कि वोह घर की चार-दिवारी में टिकी रहे।

यहाँ तक कि माता-पिता की देखभाल करना, उनके खाने-पीने का इंतजाम करना पति पर  फ़र्ज़ बनाया गया है, लेकिन आज उसे पत्नी का फ़र्ज़ बना दिया गया है। ऊपर से किसी भी महिला के अपने माता-पिता के लिए जो फ़र्ज़ हैं उन्हें गुनाह समझा जाने लगा है। कोई महिला अगर अपने माता-पिता की देखभाल करती है, आर्थिक मदद करती है तो उसे बुरा समझा जाता है। अपनी मर्जी चलाई जा सकें, इसलिए  अधर्म को धर्म का जामा पहनाने की कोशिश की जाती है।

अगर समाज में सभी रिश्ते एक-दूसरे के हक को समझे, दूसरों के अहसान को अहमियत दें रिश्तों में कडवाहट नहीं बल्कि मिठास जागेगी। बहु को अहसास होना चाहिए की उसके सास-ससुर के उस पर कितने अहसान हैं, वहीँ सास-ससुर को अपनी बहु के एहसानों पर मुहब्बत की नज़र रखनी चहिये।  जैसे पत्नी पति के रिश्तों को अहमियत देती है, ठीक उसी तरह पति को भी अपनी पत्नी के रिश्तों को उतनी ही अहमियत देनी चहिये।

एक दूसरे पर अहसान दर-असल एक दूसरे से मुहब्बत की अलामत है।

(मेरे द्वारा की गई टिपण्णी का सार)





Read More...

धर्म के नाम पर अधर्म कब तक?

धर्म का मकसद इंसान का ताल्लुक पालनहार से जोड़ना है और धर्म इंसानों से मुहब्बत सिखाता है। लेकिन धर्म की सही जानकारी नहीं रखने वाले लोग दुनिया के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। उन्हें कोई परवाह नहीं होती कि  उनके कारण चाहे किसी को कितनी भी परेशानी होती रहे।

मुहर्रम के नाम पर कल रात साड़े ग्याराह बजे (11.30 p.m.) तक लोग हमारे घर के सामने कान-फोडू ढोल के साथ हुडदंग मचाते रहे, और उसके बाद आगे निकल गए और लोगो को परेशान करने के लिए। उनके चेहरों की मस्ती बता रही थी कि उन्हें शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन (रज़ी.) की शहादत के वाकिये से कोई वास्ता नहीं था।  उनका वास्ता था, तो केवल और केवल अपने हुडदंग और मस्ती से, जिसे धर्म के नाम पर ज़बरदस्ती बाकी लोगो पर थोपा जा रहा था। 

अजीब बात है कि आम मुसलमानों को यह दिखाई  नहीं देता कि यह लोग शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन को अपनी श्रद्घांजलि देने की जगह उनके नाम पर मस्ती और हुडदंग मचाते है। और ऐसा किसी खास धर्म या समुदाय के लोग ही नहीं करते, बल्कि हर धर्म में ऐसे लोग मौजूद हैं।

सुबह सही से होने भी नहीं पाई थी, तड़के 5 बजे प्रभातफेरी के नाम पर लाउडस्पीकर के साथ शोर मचाना शुरू कर दिया गया। धार्मिक स्थलों पर रोजाना सुबह-सुबह इसी तरह लोगो को परेशान किया जाता है। पूजा-अर्चना / इबादत का ताल्लुक स्वयं से होता है, मगर अपनी इबादत में ज़बरदस्ती दूसरों को शामिल क्यों किया जता है? मेरा घर तो फिर भी थोडा दूर है, सोचता हूँ कि जिनका घर बिलकुल करीब है वह कैसे प्रतिदिन इस कडवे घूँट को पीते होंगे। हिंदुस्तान जैसे धर्म प्रधान देश में इस तरह कडवे घूँट पीना मज़बूरी है, क्योंकि जो विरोध करता है उसे धर्म विरोधी ठहरा दिया जाता है। 

एक दूसरों के धार्मिक स्थल के करीब पहुँच कर तो इस तरह की हुडदंग और भी बढ़ जाती है, देश में सबसे अधिक दंगे इस तरह की प्रवित्तियों के कारण ही होते हैं।

शहर में अक्सर लोग रात की ड्यूटी करके आते हैं, लेकिन इन लोगो को कोई फर्क नहीं पड़ता है, चाहे कोई बीमार हो, किसी की नींद खराब हो या फिर किसी की पढ़ाई को नुक्सान हो रहा हो। आखिर यह धर्म के नाम पर अधर्म हम पर कब तक थोपा जाएगा? 

परेशानी का सबब तो यह है कि इस दिखावे नामक अधर्म को धर्म के नाम पर परोसा जा रहा है,  हमारे देश में इन तथाकथित धार्मिक लोगो पर कानून का कोई डर नहीं होता। और सरकार से तो कोई उम्मीद करना ही बेमानी है।




यह भी पढ़ें:






Read More...

धौखा है हज सब्सिडी

हज सब्सिडी के नाम पर मुसलमानो को धोखा दिया जा रहा है। हमारे देश से हज यात्रा के लिए डेढ़ लाख से अधिक लोग हर वर्ष साउदी अरब की यात्रा पर जाते हैं। जिसमें से सवा लाख लोग हज कमेटी से तथा बाकी अलग-अलग प्राइवेट टूर्स ऑपरेटर्स के ज़रिये जाते हैं।

हमारे देश की सरकार इस यात्रा पर किराए में सब्सिडी देने की बात करती है, जो कि पूरी तरह धौखा है। हज के लिए जेद्दाह जाने का जो किराया आम दिनों में 16-17 हज़ार होता है, इंडियन एयर लाइन्स के द्वारा सरकार वही किराया हज के दिनों के करीब आते-आते कई गुना बढ़ा देती है। पिछले वर्ष यह किराया तकरीबन 52 हज़ार था, इस साल यह करीब 55 हज़ार तक पहुँचने की उम्मीद है।

आम दिनों में पवित्र शहर मक्का में "उमरा" के लिए 20 दिन की यात्रा का खर्च तकरीबन 33-35 हज़ार रूपये ही आता है लेकिन हज के दिनों में यही खर्च बढ़कर दुगने से भी अधिक हो जाता है। हज यात्रा आम तौर पर 40 दिन तक चलती है और इसमें खर्च सवा लाख रूपये के आस-पास होता है। ऐसा केवल इसलिए है क्योंकि हज पर जाने के लिए केवल एयर इंडिया तथा सउदी एयरवेज़ को ही इजाज़त है। सरकार सउदी अरब सरकार के साथ मिलकर यह गोरखधंधा चला रही है, इसी मोनोपोली का फायदा उठाकर हर साल किराया इतना बढ़ा दिया जाता है जिससे कि मुसलमानों को सब्सिडी के नाम पर ठगा जा सके।

यह खुली लूट नहीं है तो और क्या है? अगर डेढ़-दो लाख लोग एक साथ मिलकर किसी भी एयर लाइन्स से टिकट लें तो क्या वहां किराए में छूट नहीं मिलेगी? लेकिन सरकार द्वारा नियुक्त हज कमिटी इस मसले पर चुप है, आखिर क्यों? उन्हें साफ़ करना चाहिए कि वह हाजियों की नुमाइंदगी करती हैं या सरकार की।

इस कदम से सरकार की नियत का अंदाजा लग जाता है, कि वह केवल मुसलमानों की मदद करने का ढोंग करती है, अगर सरकार वाकई मुसलमानों का की मदद करना चाहती तो इस गलत रास्ते को क्यों चुनती है?

जिस छूट पर हज यात्रियों का हक़ है, सरकार उसी हक को सब्सिडी नामक भीख के तौर पर देती है। कम से कम हज यात्रियों का पैसा ही उन्हें छूट नामक झूट के नाम से देती तो भी चलता लेकिन सब्सिडी के नाम से तो यह सरकार की खुली लूट है।

आज ज़रूरत है कि यह आवाज़ उठाई जाए कि या तो हमारा हक दो नहीं तो कम से कम इस सब्सिडी नाम की भीख को समाप्त करो। वैसे भी हज जैसी पवित्र यात्रा के किराए पर सरकार की (झूठी) मदद जायज़ ही नहीं है, हज के लिए जाने वाले जहाँ डेढ़-दो लाख रूपये प्रति व्यक्ति खर्च करते हैं, क्या वह थोडा और पैसा खर्च नहीं कर सकते हैं?



Hajj pilgrim, subsidy, cheating of government, fraud, islam, muslim, mecca, makkah, journey of kaba sharif

Read More...

क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?

योजना बनकर 'हलाला' करना शरीयत का हिस्सा नहीं है बल्कि इस्लाम के खिलाफ है। मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि इस्लाम के अनुसार तलाक़ क्या होती है और एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी महिला की या उसके पति की उससे नहीं बनती और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है। 


क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?


तलाक़ को इसलिए सख्त बनाया गया है कि पुरुष महिलाओं पर ज्यादतियां करने की नियत से इसका मज़ाक ना बना लें, जब चाहे तलाक़ दिया और फिर जब चाहे दुबारा विवाह कर लिया। इसीलिए तलाक़ के बाद वापिस दुबारा शादी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। यहाँ यह भी बताता चलूँ कि इस्लाम में तलाक़ को सबसे ज्यादा नापसंदीदा काम माना गया है और केवल विशेष परिस्थितियों के लिए ही इसका प्रावधान है।

एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी तलाकशुदा महिला का अपने पति या उसके पति का उसके साथ तालमेल नहीं बैठता और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है, जिसे 'हलाला' कहा जाता है। अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया अर्थात 'हलाला' को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो इस्लामिक कानून के मुताबिक उनके लिए बेहद सख्त सज़ाओं का प्रावधान है। सन्दर्भ के लिए यह लिंक देखा जा सकता हैं.

http://www.islamawareness.net/Talaq/talaq_fatwa0008.html




निकाह की हर एक सूरत में महिला और पुरुष दोनों की 'मर्ज़ी' आवश्यक है

इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला अथवा पुरुष की मर्ज़ी के शादी हो ही नहीं सकती है। अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती 'हाँ' कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं तो इस सूरत में विवाह नहीं होता है। और क्योंकि ऐसी स्थिति में क्योंकि विवाह वैध नहीं होता है इसलिए अलग होने के लिए तलाक़ की आवश्यकता भी नहीं होती है। उपरोक्त संदर्भो से यह साफ़ हो जाता है कि योजनाबद्ध तरीके से किये गए हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है।

मैंने तीन बार तलाक़ हो जाने पर दुबारा विवाह को लगभग नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला 'योजना बनाकर हलाला करने' जैसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी। अगर किसी महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विश्वास है तब तो वह ऐसा गुनाह बिलकुल भी नहीं करेंगे और अगर विश्वास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है, वह देश के सामान्य कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं।


इस विषय के सन्दर्भ को समझने तथा टिप्पणियों के माध्यम से विचारों के आदान-प्रदान के लिए मेरी पिछली पोस्ट पढ़ें.

तलाक़ पर लेख और मेरी प्रतिक्रिया





Read More...

मुस्लिम समाज में तलाक़ का प्रावधान

सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि इस्लाम में विवाह एक कोंट्रेक्ट मैरिज होती है जिसमें क़ाज़ी, वकील तथा 2 गवाहों के सामने कुबूल कर लेने से निकाह हो जाता है तथा विशेष परिस्थितिओं में विवाह को 'तलाक' अथवा 'खुला' के द्वारा विच्छेद किया जा सकता है। मुस्लिम विवाह में गवाह, वकील तथा क़ाज़ी केवल इसलिए होते हैं जिससे कि कोई भी पक्ष विवाह से मुकर ना जाए।

ठीक इसी तरह जब यह एहसास हो जाए कि अब साथ रहना नामुमकिन है और ज़िन्दगी की गाडी को आगे बढाने के लिए अलग होना ही एकमात्र तरीका बचा है, तब ऐसे हालात के लिए तलाक़ का प्रावधान है।

तलाक़ का इस्लामिक तरीका यह है कि जब यह अहसास हो कि जीवन की गाडी को साथ-साथ चलाया नहीं जा सकता है, तब क़ाज़ी मामले की जाँच करके दोनों पक्षों को कुछ दिन और साथ गुज़ारने की सलाह दे सकता है अथवा गवाहों के सामने पहली तलाक़ दे दी जाती है, उसके बाद दोनों को 30 दिन (माहवारी की समयसीमा) तक अच्छी तरह से साथ रहने के लिए कहा जाता है। अब अगर उसके बाद भी उन्हें लगता है कि साथ रहना मुश्किल है तो फिर दूसरी बार गवाहों के सामने "तलाक़" कहा जाता है, इस तरह दो "तलाक" हो जाती हैं और फिर से 30 दिन तक साथ रहा जाता है। अगर फिर भी लगता है कि साथ नहीं रहा जा सकता है तब जाकर तीसरी बार तलाक़ दी जाती है और इस तरह तलाक़ मुक़म्मल होती है।

इसके अलावा 1 तलाक़ देने के बाद तीन महीने तक भी इंतज़ार किया जा सकता है और तीन महीने पूरे होने से पहले साथ रहने या नहीं रहने का फैसला किया जाता है, अगर साथ नहीं रहना है तो तलाक़ हो जाती है। इस हालत में अगर कुछ दिनों या महीनों के बाद दोनों को अगर लगता है कि तलाक़ देकर गलती की है तो दुबारा निकाह किया जा सकता है, पर इस तरीके से भी अलग-अलग बार तीन बार तलाक़ देने के बाद फिर से शादी का हक़ ख़त्म हो जाता है।

इसमें सुन्नी मुस्लिम समाज का 'हनफी', 'शाफ़ई' तथा 'मालिकी' मसलक में एक ही समय में "तीन तलाक़" को भी सही माना जाता हैं, हालाँकि वह भी इस तरीके को अच्छा तरीका नहीं मानते। अन्य मुस्लिम उलेमा एक समय में तीन तलाक़ दिए जाने को "तलाक़" नहीं मानते हैं और कई मुस्लिम देशों में इस तरह से तलाक देने पर व्यक्ति के विरुद्ध सज़ा का प्रावधान है।



महिलाओं को तलाक़ का हक

यह कहना गलत है कि महिलाओं को तलाक़ का हक नहीं है। अगर किसी महिला को पति पसंद नहीं है या फिर वह शराबी, जुआरी, नामर्द, मार-पीट करने वाला, बुरी आदतों या स्वाभाव वाला या किसी ऐसी सामाजिक बुराई में लिप्त है जो कि समाज में लज्जा का कारण हो तो उसे सम्बन्ध विच्छेद का हक है। इसके लिए उसे भी क़ाज़ी के पास जाना होता है। महिला के आरोप सही पाए जाने की स्थिति में विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाता है, जिसको 'खुला' कहा जाता है।

इस विषय में कुछ लोगो का यह कहना है कि जब विवाह पति-पत्नी की मर्ज़ी से होता है तो तलाक़ किसी एक की मर्ज़ी से कैसे हो सकता है। मेरे विचार से ऐसा कहना व्यवहारिक नहीं है, सम्बन्ध हमेशा दो लोगो की मर्ज़ी से ही बनते हैं परन्तु किसी एक की भी मर्ज़ी ना होने से सम्बन्ध समाप्त हो सकते हैं। ज़रा सोचिये अगर किसी महिला का पति उस पर ज्यादतियां करता है, यातनाएं देता है और तलाक़ देने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है तो क्या ऐसे में बिना उसकी मर्जी के तलाक़ के प्रावधान का ना होना जायज़ कहलाया जा सकता है?

एक पुरुष और महिला के दिलों का मिलना और साथ-साथ सामाजिक बंधन में बंध कर रहना विवाह है तो रिश्तों में तनाव या अन्य किसी कारण से साथ-साथ ना रह पाने की स्थिति का नाम 'तलाक़' है।



[इस लेख की अगली कड़ी "हलाला" के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें]

क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?






keyword: talaq, talak, talaaq, talaak, divorce in muslims

Read More...

जानवरों की कुर्बानी क्या है?

जैसा कि मैं पहले भी अपनी पोस्ट में बता चूका हूँ कि इस्लाम के अनुसार अन्य जानवरों के साथ-साथ पेड़-पौधों में भी जीवन होता है , चाहे जानवर हो या पेड़-पौधे, दोनों को ही दुःख का अहसास होता है, यह अलग बात है की वह अपने दुःख का प्रदर्शन करने में असमर्थ हैं। अन्य जानवरों की ही तरह पेड़-पौधों का साँस लेना, खाना-पीना,  प्रकृति को आगे बढाने के लिए अंडे देना बिलकुल अन्य जीवों की ही तरह होता है और यह केवल इस्लाम ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म तथा विज्ञान का भी मत है। लेकिन हर एक जीव को जीवित रहने के लिए दूसरे को भोजन बनाना प्रकृति का नियम है। ठीक इसी तरह मरने के बाद दफ़नाने के विधि में शरीर ज़मीन के अन्दर रहने वाले दूसरे जीवों के भोजन के काम में आता है।

अगर बात कुर्बानी की करें तो इसमें एक बात तो यह है कि मुसलमान कुर्बानी केवल ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर ही नहीं बल्कि आम जीवन में अक्सर करते रहते हैं। जो कि कई तरह की होती है जैसे इमदाद के लिए जानवर की कुर्बानी, सदके के लिए कुर्बानी और ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर कुर्बानी इत्यादि।
  • इसमें से इमदाद अर्थात मदद करने की नियत से की गई कुर्बानी के द्वारा अपने घर वालों, रिश्तेदारों, पडौसियों और अन्य गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है और इस तरह के भोजन को केवल घरवालो को ही नहीं खिलाया जाता बल्कि गरीब रिश्तेदारों, पडौसियों और अन्य गरीबों को भी भोजन कराया जाता है।
  • दूसरी तरह की कुर्बानी अर्थात सदके के लिए की गई कुर्बानी से बनने वाले भोजन को केवल और केवल गरीब लोगों को खिलाया जाता है, इसमें घरवालों का हिस्सा नहीं होता।
  •  तथा तीसरी तरह की कुर्बानी अर्थात ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) वाली कुर्बानी के लिए अच्छा तरीका यही है कि मांस अथवा पके हुए भोजन के तीन हिस्से किये जाए और उसमें से एक हिस्सा अपने घर वालों के लिए, दूसरा हिस्सा गरीब रिश्तेदारों के लिए तथा तीसरा हिस्सा अन्य गरीब लोगों के लिए निकाला जाए। हालाँकि इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं है, बल्कि जिसकी जैसी आस्था है वह उस हिसाब से भी बंटवारा कर सकता है।

कुर्बानी क्या है?
इसमें बहुत सी अन्य दलीलों के अलावा एक बात यह भी है कि इन तीनो ही तरीकों में कोई भी मर्द / औरत चाहता / चाहती तो उसके द्वारा अपने जानवर अथवा पैसे को खुद अपने काम में प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन उसने अपने अन्दर के लालच को कुर्बान करके अपने घरवालो, गरीब रिश्तेदारों तथा अन्य गरीबों को लिए भोजन की व्यवस्था की।

अगर बात कुर्बानी के तरीके की जाए तो यह जान लेना आवश्यक है कि मुसलमान हर एक धार्मिक कार्य पैगम्बर मुहम्मद (स.) के तरीके पर करते है, जिसे कि सुन्नत अथवा सुन्नाह कहा जाता है। सुन्नत के अनुसार ऊपर के दोनों तरीकों में भोजन के लिए मांसाहार अथवा शाकाहार दोनों में से किसी भी तरीके को अपनाया जा सकता है, लेकिन ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) के मौके पर केवल कुछ जानवरों को ही भोजन के तौर पर प्रयोग करने की इजाज़त है और वह भी कुछ शर्तों के साथ।

साथ ही यह बात भी जान लेना आवश्यक है कि इस्लाम में जानवरों और पेड़-पौधों पर खासतौर पर रहम और मुहब्बत का हुक्म है और भोजन जैसी आवश्यकता को छोड़कर उनका वध करना वर्जित है। यहाँ तक कि इसको बहुत बड़ा गुनाह और नरक में पहुंचाने वाला बताया गया है। बल्कि पेड़ों को पानी डालना तथा प्यासे जानवर को पानी पिलाने जैसे कामों के बदले में बड़े-बड़े गुनाहों को माफ़ करने जैसे ईनाम है।

Read More...

ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर ऐतराज़

ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) का मौका आते ही मांसाहार के खिलाफ विवादित लेख लिखे जाने शुरू हो जाते हैं और ऐसा साल-दर-साल चलता आ रहा है। हालाँकि बात अगर तार्किक लिखी गयी हो तो किसी भी तरह के लेख से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हर किसी को शाकाहारी अथवा मांसाहारी होने का हक है और इसी तरह अपने-अपने तर्क रखने का भी हक है। लेकिन किसी भी सभ्य समाज में इसकी आड़ में किसी धर्म को निशाना बनाए जाने का हक किसी को भी नहीं होना चाहिए। जब मैं नया-नया हिंदी ब्लॉग जगत में आया था, तब किसी ना किसी विषय हिन्दू-मुस्लिम वाक्-युद्ध आम बात थी, जिसके कारण दिन-प्रति दिन कडुवाहट बढती जा रही थी। लेकिन कुछ अमन पसंद ब्लॉगर्स के प्रयास से धीरे-धीरे लोग दोनों तरफ से लिखे जाने वाले विवादित लेखों से दूर हटने लगे। हालाँकि इस बीच लगातार इस तरह के लेख लिखकर आग भड़काने की कोशिश की जाती रही। बकराईद के विरोध में लिखे लेखों को भी मैं इसी कड़ी में देखता हूँ।

हर एक धर्म को मानने वाला अलग-अलग परिवेश में बड़ा होता है, उनके खान-पान, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास में भिन्नता होती है, लेकिन हम अक्सर दूसरे धर्म की बातों को अपनी मान्यताओं  और अपनी सोच के पैमाने पर तोलते हैं। और किसी भी बात को गलत पैमाने से जांचे जाने की सोच के साथ हर एक धर्म की हर एक बात पर ऊँगली उठाई जा सकती है और अगर ऐसा होने लगा तो यह समाज के लिए बहुत ही दुखद स्थिति होगी।

जहाँ तक बात ईद-उल-ज़ुहा अर्थात बकराईद पर ऐतराज़ की है, तो सभी तरह के एतराज़ का जवाब पहले ही दिया जा चूका है। ईद-उल-ज़ुहा कुर्बानी का त्यौहार है, क्योंकि मांस अक्सर मुसलमानों के द्वारा भोजन के तौर पर प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस दिन बकरा, भेड़, ऊंट इत्यादि जानवरों का मांस अपने घरवालों, गरीब रिश्तेदारों  तथा अन्य गरीबों में बांटा जाता है। हालाँकि गाय की कुर्बानी की इस्लाम में इजाज़त है, लेकिन भारत में हिन्दू धर्म के अनुयाइयों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मुग़ल साम्राज्य के दिनों से ही गाय की कुर्बानी की मनाही है, दारुल-उलूम-देवबंद जैसे इस्लामिक संगठन भी इसी कारण हर वर्ष मुसलमानों से गाय की कुर्बानी ना करने की अपील करते हैं।

अगर जानवरों की कुर्बानी पर एतराज़ की बात की जाए तो इसमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि इस्लामी मान्यता के अनुसार (बल्कि हिन्दू धर्म की मान्यता और विज्ञान के अनुसार भी) केवल जानवरों में ही नहीं बल्कि हर एक पेड़-पौधे में भी जीवन होता है, वह भी साँस लेते हैं, भोजन करते हैं, बातें करते हैं, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में अहसास भी होता है, वह भी अन्य जीवों की तरह मसहूस कर सकते हैं।  अर्थात किसी पेड़-पौधे और अन्य जीव में अंतर नहीं होता और वह भी जीव ही की श्रेणी में आते हैं। जैसे जानवर अंडे / दूध  देते हैं उसी तरह पेड़-पौधे फल / दलहन / बीज देते हैं, जिससे की उनकी नस्ल आगे बढती रहे।

लेकिन यह सब जानने के बावजूद पढ़े-लिखे, यहाँ तक कि चिकित्सा और अध्यापन जैसे पेशे से जुड़े लोग भी जान-बूझकर ऐसे एतराज़ उठाते हैं जो कि लोगो की भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। बल्कि दिव्या जी तो इससे भी आगे बढ़कर मांसाहार करने वालों को दरिन्दे और आतंकवादियों की श्रेणी में रखती हैं, क्या यह कहीं से भी तर्कसंगत है?

हालाँकि ऐसे भड़काऊ लेख दोनों ही तरफ से लिखे जाते हैं और ज़रूरत ऐसे लेख लिखने वालो को हतोस्ताहित करने की है, लेकिन अक्सर ऐसे लेखों को पढने वालों एवं टिपण्णी करने वालों की संख्या दूसरे लेखों के मुकाबले कहीं अधिक होती है, जो कि लेखक के लिए उर्जा का कार्य करती है।

Read More...

दीपावली का आया है त्यौहार शब-ओ-रोज़


दीपों के त्यौहार दीपावली पर हमारा पूरा शहर कई दिन पहले से फिजा में खुशियों के रंग बिखेरने शुरू कर देता है, हफ़्तों पहले से शहर की रातें जगमगाना शुरू कर देती हैं और खुशियों का माहौल दीपावली के कई दिन बाद तक चलता रहता है, खुदा से दुआ है कि मेरे मुल्क में इसी तरह खुशियाँ और भाई चारा फलता फूलता रहे... अमीन!

इसी दुआ के साथ आप सभी को दीपवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ!


अमनों-ख़ुशी का छाया है ख़ुमार शब-ओ-रोज
दीपावली का आया है त्यौहार शब-ओ-रोज़ 

कंदीलों की झुमकियाँ भी झूमती है बार-बार
हर एक शय पे आया है निखार शब-ओ-रोज़

हर कूचा-ए-गली में रौनकों की है बहार
हर दिल को आज आया है करार शब-ओ-रोज़

मस्ती की रवानी है शब-ओ-रोज़ मुल्क में
खुशियों का ऐसे आया है बुखार शब-ओ-रोज

- शाहनवाज़ 'साहिल'





Keywords: diwali, dipawali, happy, happiness, indian festival

Read More...

धार्मिक ठेकेदारो की दादागीरी

आजकल समाज में धर्म के कुछ ऐसे ठेकेदार घूम रहें हैं जिनका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह लोग समाज पर अपनी दादागिरी दिखाने के लिए ना केवल धर्म का सहारा लेते हैं, बल्कि अपने अनैतिक कार्यों से धर्म को भी बदनाम करते हैं। अभी कुछ दिन पहले शबे-बारात नामक त्यौहार पर कुछ ऐसे ही हुड़दंगियों ने दिल्ली जैसे कई शहरों में कानून को अपनी बपौती समझते हुए रात भर सड़कों पर हंगामा किया। हज़ारों की तादाद में निकले इन युवकों को दंभ था कि पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है, क्योंकि वह यह सब धर्म के नाम पर कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ हो, बल्कि यह सिलसिला साल दर साल चलता आ रहा है।

अक्सर धर्मस्थलों में पूजा-अर्चना के नाम पर सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। बात चाहे मंदिर के बाहर लगने वाली श्रद्धालुओं की लम्बी-लम्बी कतारों की हो या फिर मस्जिदों के बाहर नमाज़ अता करने वालों की, इस कार्य में सभी धर्मों के मानने वाले बराबर के शरीक हैं। कहीं आम जनता को यात्राओं, रैलियों अथवा झांकियों के नाम पर परेशान किया जाता है तो कभी बंद अथवा अनशन के नाम पर पुरे शहर को बंधक बना लिया जाता है। उनको इस बात से कुछ भी परवाह नहीं होती की सड़क पर चलने वाले सामान्य नागरिकों का भी उस सड़क पर उतना ही हक़ है!


अभी कुछ दिन पहले कांवड़ यात्रा के नाम पर दिल्ली और आसपास के इलाके में जमकर हुड़दंग मचाया गया। जहां से यह लोग निकल रहे थे वहां पड़ने वाली सिग्नल लाईट को बंद कर दिया जाता था, अगर कोई राहगीर बीच में आ जाता है तो उसको डंडे से मारकर सड़क से ज़बरदस्ती हटाया जाता है। एक जगह तो एक पुलिस अफसर के उपर डाक कांवड़ के नाम से चल रहे ट्रक पर बैठे हुड़दंगी युवकों ने दिनदहाड़े केवल इसलिए पानी डाल दिया गया क्योंकि वह उनके ट्रक के आने पर चैक से भीड़ को नहीं हटा पाया! जगह-जगह लगने वाले पंडाल के कारण रास्तों के बंद होने से जिन लोगो को ज़बरदस्त परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, क्या वह इस देश के नागरिक नहीं है? क्या उनका इन सड़कों पर चलने और चैराहों पर अपनी बत्ती होने पर पार करने को कोई हक़ नहीं हैं? यहां तक कि हरिद्वार-दिल्ली राजमार्ग को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। हज़ारों-लाखों की तादाद में लोग नौकरी के लिए सहारनपुर, मुज़फ्फर नगर, मेरठ और मोदी नगर जैसी जगहों से गाज़ियाबाद, फरीदाबाद, दिल्ली और गुडगांव जैसे शहरों में आते हैं। क्या इन तथाकथित श्रद्धालुओं और सरकार ने कभी सोचा होगा कि रात को थकहार कर नौकरी से लौट रहे लोगों को घर पहुंचने में किस तरह भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा? आखिर यह कैसा धर्म और हम कैसे धार्मिक हैं जहां नैतिकता का कोई स्थान नहीं है?

किसी भी धर्म का कोई भी अनुष्ठान अनैतिकता को बढ़ावा दे ही नहीं सकता है। ऐसी इबादत / पूजा का कोई अर्थ ही नहीं है जिस के कारण आम जनों को असुविधा हो, उनका हक छीना जाए। धर्म तो हमें समाज में जीने का तरीका बताता है, फिर यह समाज से जीने के हक छीनने का कारण कैसे बन सकता है? आज के युग में लोगों ने धर्म को केवल अपनी महत्त्वकांशाओं को पूरा करने का साधन बना लिया है, आज ऐसे लोगों और उनके कार्यों को पहचानने की आवश्यकत है।


यह भी पढ़ें:


.
यह मूल लेख त्रुटिवश डिलीट हो गया था,  जबकि इसके विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ था. गूगल से प्राप्त  टिप्पणियों को नीचे लिखा जा रहा है:

14 comments:

नीरज जाट said...
शाह नवाज भाई, आपकी बातें जायज हैं। मैं खुद पांच बार कांवड ला चुका हूं। अब या तो इस देश के पढे लिखे लोग या सरकार यह कहे कि कांवड लाना ही बन्द कर दो। कोई क्यों नहीं कहता कि कांवड लाना धर्म विरुद्ध है, इससे कांवड ना लाने वाले अन्य लोगों को परेशानी होती है, इसलिये सडक बन्द करने की बजाय इस यात्रा को ही बन्द कर देना चाहिये। ऐसा करने से एक बार दंगा फसाद तो जरूर होगा लेकिन उसके बाद सदा के लिये शान्ति कायम हो जायेगी और सडकें भी बन्द करने की नौबत नहीं आयेगी। अब जब कांवड यात्रा बन्द करने की कोई नहीं कहता तो भईया, सडकें बन्द होनी तय हैं। गिने चुने दोपहिया वाहन या तथाकथित डाक कांवड वाहन भी अत्यधिक भीड के कारण ढंग से नहीं चल पाते तो बसें और ट्रक क्या चलेंगे। कभी कांवडिये यह फरमाइश नहीं रखते कि इस तारीख से इस तारीख तक सडक बन्द होनी चाहिये। वो तो सरकार ही इसे बन्द करती है। हां, मैं बता रहा था कि मैं पांच बार कांवड ला चुका हूं। जहां दस आदमी इकट्ठे होंगे तो उनमें हर तरह के आदमी होंगे फिर यहां तो संख्या लाखों में होती है। इनमें भी हर तरह के आदमी होते हैं। जहां कानून हाथ में लेने वाले लोग होते हैं तो कानून व्यवस्था बनाने वाले लोग भी होते हैं। अब हमें आवाज उठानी चाहिये कि यह यात्रा ही बन्द होनी चाहिये। इस यात्रा का प्रबल हिमायती होने के बावजूद भी मैं यह बात सच्चे मन से कह रहा हूं। तभी यात्रा के कारण होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है। है कोई इस यात्रा को बन्द करने के लिये मेरे साथ आवाज उठाने वाला????
AlbelaKhatri.com said...
सचमुच यह चिन्ता का विषय है और इसका हल निकलना ही चाहिए.......... एक उम्दा पोस्ट और उतनी ही उम्दा नीरज जाट की टिप्पणी........मैं सहमत हूँ आप दोनों से जय हिन्द !
एस.एम.मासूम said...
शाहनवाज़ भाई आपने इस लेख़ को अच्छे मकसद से लिखा है यह मैं जानता हूँ. लेकिन पूर्णतया सहमत नहीं. क्या नेताओं कि यात्राएं इस श्रेणी मैं नहीं आती? ऐसी यात्राओं और सभाओं के लिए नियम है कि पहले से पुलिस स्टेशन मैं खबर करनी होती है और इजाज़त मिलने पे ही निकाली जाती है. यदि कोई सभा या यात्रा सरकारी इजाज़त ले के निकाली जा रही है तो इसमें अनैतिक क्या है? नमाज़ तो वैसे भी बिना इजाज़त किसी कि भी ज़मीन पे पढना चाहे वो सरकारी ही क्यों ना हो मना है.हाँ बिना इजाज़त सड़कों पे कि गयी नमाज़ या किसी भी धर्म का जुलूस सही नहीं और ऐसे जुलूसों मैं ज़रुरत से ज्यादा शोर मचाना, शराब पी के नाचना सही नहीं और इसको सरकार संभाल सकती है .जब बेशर्मी मोर्चे को ४०० पुलिस का प्रोटेक्शन मिल सकता है तो इन यात्राओं और सभाओं को क्यों नहीं? शाहनवाज़ भाई श्रधा के साथ निकले गए किसी भी जुलूस को ,यात्रा को ,जो सरकारी इजाज़त के बाद निकला हो हुडदंगियों का जुलूस कहना सही नहीं.
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
कमजोरी हमारे समाज और राजनैतिक व्यवस्था में है। इस देश में धर्म के नाम पर कोई भी ब्लेकमेल कर सकता है। निश्चित रूप से धर्म का दायरा व्यक्तिगत होना चाहिए। उस के सभी सार्वजनिक प्रदर्शन प्रतिबंधित होना चाहिए।
डॉ टी एस दराल said...
हमारा समाज धर्मभीरु लोगों से भरा पड़ा है भाई । और सबसे आगे होते हैं नेता । अब कौन किसको रोकेगा ?
सतीश सक्सेना said...
अफ़सोसजनक है यह, धर्म के नाम पर नंगा नाच और हम सब बुजदिलों की तरह देखते रह जाते हैं ! प्रशासन और आम पब्लिक किसी को भी इस भीड़चाल में, बोलने की परमीशन नहीं है ! मीडिया चटपटी ख़बरों को और तेज बना कर केवल हाथ सेंकती है ! इस बुजदिल और मूर्खता पूर्ण माहौल में एक ही रास्ता नज़र आता है कि हम लोग भी इस हुडदंग में शामिल हो जाएँ और तालियाँ बजाएं ! बेहद खेदजनक माहौल है ....लोकतंत्र खलने लगा है ! शुभकामनायें आपको !
DR. ANWER JAMAL said...
सदाचार का विपरीत है भ्रष्टाचार। सदाचार होता है धार्मिक और भ्रष्टाचार होता है अधार्मिक। यह एक बारीक अंतर है जिसे धर्म को जानने वाला ही समझ सकता है। धर्म के नाम पर अधर्म करने से वह अधर्म धार्मिक कार्य नहीं हो जाता चाहे दुनिया उसे धार्मिक कार्य मानने लगे। कई बार लोग घबराते हैं अधर्म के कार्यों से और छोड़ बैठते हैं धर्म को। अधर्म प्रायः स्वभाव से ही अप्रिय लगता है जबकि धर्म प्रिय । इस लफ़्ज़ को तत्काल सुधार लिया जाय !
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...
best
Kajal Kumar said...
धर्म एक धंधा हो गया है...
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...
आज धार्मिक आयोजनों में भक्ति कम और दिखावा ज्‍यादा होता है। इनके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए। ------ कम्‍प्‍यूटर से तेज़! इस दर्द की दवा क्‍या है....
Khushdeep Sehgal said...
देखो ओ दीवानों तुम ये काम न करो. धर्म का नाम बदनाम न करो... धर्म कोई भी हो ये इजाज़त कभी नहीं देता कि दूसरों को परेशान किया जाए...सियासत ने इसे ज़रूर अफ़ीम की गोली बनाकर बंटाधार कर दिया... जय हिंद...
Tarkeshwar Giri said...
बहुत ही सुन्दर लेख, और उससे भी सुन्दर टिप्पड़ियाँ. मेरे हिसाब से कुछ हद तक में भईया जाट महोदय से सहमत हूँ. पूरी तरह से ना सही लेकिन डाक कांवड़ और बाइक से कांवड़ लाने वालो को तो जरुर. रोक देना चाहिए. जंहा डाक कांवड़ लाने वाले अपनी दादागिरी दिखाने से पीछे नहीं हट ते वोंही बाइक सवार ईस तरह से बाइक चलाते हैं जैसे वो किसी रेस में भाग ले रहे हों. हरिद्वार प्रशासन पूरी तरह से डाक और बाइक कांवड़ को सम्भालने में लग जाता हैं और जब मौका मिलता हैं तो डाक कांवड़ लाने वालो को दौड़ा- दौड़ा के पीटता भी हैं डाक कांवड़ में इस्तेमाल किये जाने वाले टेम्पो चालक ईस कदर से गाड़ी भागते हैं मानो वो मायावती के काफिले के मंझे हुए चालक हो. .
anshumala said...
राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है वरना इन सब चीजो पर नियंत्रण करना इतने भी मुश्किल नहीं है और राजनीतिक इच्छा शक्ति इसलिए कम है क्योकि यहाँ हर चीज को वोट बैंक के तराजू में तौल कर देखा जाता है धर्म तो सबसे ऊपर है | हा जब सरकार पर आती है तब वो किसी चीज को नहीं देखती है |
चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...
यह दादागिरी त्योहारों के समय अधिक मुखर हो जाती है, शायद सड़क चलने में भी बाधा बने :(

Read More...

माता-पिता हमारी सामाजिक व्यवस्था के स्तंभ हैं

माता-पिता दुनिया की सबसे बड़ी नेमतों में से एक हैं, बहुत खुशनसीब हैं वह जिनकों यह दोनों अथवा इनमें से किसी एक का भी सानिध्य प्राप्त है। हमारे माता-पिता हमारी सामाजिक व्यवस्था के स्तंभ हैं, पर अफ़सोस आज यह स्तंभ गिरते जा रहे हैं।

वह उस समय हमारी हर ज़रूरत का ध्यान रखते हैं, जबकि हमें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, लेकिन जब उनको उसी स्नेह की आवश्यकता होती है तो हमारे हाथ पीछे हट जाते हैं। कहावत है कि दो माता-पिता मिलकर दस बच्चों को भी पाल सकते हैं, लेकिन दस बच्चे मिलकर भी दो माता-पिता को नहीं पाल सकते।

मेरे घर में जब मेरी बिटिया 'ऐना' आई तब मैंने अपनी पत्नी के द्वारा रातों को उसकी देखभाल करते हुए देखकर याद किया कि मेरी माँ ने भी इसी तरह मेरी देखभाल की होगी, वोह भी उस ज़माने में जबकि आज की आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थी। किस तरह जद्दो-जहद करके दिल्ली जैसे शहर में उन्होंने हमारे लिए ना केवल आशियाना बल्कि हर एक सुविधा का इंतजाम किया था, मेरे द्वारा फ़्लैट खरीदने पर माता-पिता की आँखों की ख़ुशी को याद करके आज भी खुश होता हूँ।

लेकिन अफ़सोस आज दिन-प्रतिदिन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढती जा रही है, उनमें भी अधिकतर वही लोग होतें हैं जिनके बेटे-बेटियां जिंदा और अच्छी-खासी माली हालत में होते हैं। अक्सर उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच कर घर के बुज़ुर्ग अपने आप को अलग-थलग महसूस करने लगते हैं। संवेदनहीनता के इस दौर में अपने ही इनकी भावनाओं को समझने में नाकाम होने लगते हैं। मुझे आज भी याद है किस तरह मेरे नाना-नानी का रुआब घर पर था, उनकी हर बात को पूर्णत: महत्त्व मिलता था, लेकिन इस तरह का माहौल आज के दौर में विरले ही देखने को मिलता है। आज बुजुर्गों की बातों को अनुभव भरी सलाह नहीं बल्कि दकियानूसी समझा जाता है। उनकी सलाहों पर उनके साथ सलाह-मशविरे की जगह सिरे से ही नकार दिया जाता है।

एक घटना याद आ गई, बात उस समय की है जब में दक्षिण कोरिया में था, हमें एक शिपमेंट भेजनी थी। उसके लिए जो कंटेनर बुलाया गया था, उसका ड्राइवर काफी उम्र का था। रास्ते में हमने उससे मालूम किया कि क्या आपके पुत्र-पुत्रियाँ नहीं हैं? उसने कहा कि उसके दो बेटे और एक बेटी है। तब मैंने मालूम किया कि फिर आप इस उम्र में इतनी मेहनत का काम क्यों करते हैं? आपके बच्चे आपको रोकते नहीं? तो उसने बताया कि उसके बेटे-बेटी अपने-अपने घर में रहते हैं और वह और उसकी पत्नी अपने घर का खर्च चलाने के लिए काम करते हैं। जब हमने उसे अपने वतन हिन्दुस्तान के बारे में बताया कि वहां पर आज भी बुज़ुर्ग मजबूरी में मेहनत नहीं करते हैं, तो उस बुज़ुर्ग की आँखों में आंसू भर गए। उसने कहा कि आपका समाज कितना अच्छा है, जहाँ बुजुर्गों का ध्यान रखने वाले घर पर मौजूद होते हैं।

लेकिन आज के माहौल और दिन-प्रतिदिन गिरती मानवीय संवेदना को देखकर लगता है कि हमारे वतन में भी वोह दिन दूर नहीं जब बुजुर्गों की सुध लेने वाला कोई नहीं होगा! जबकि हर एक धर्म में बुजुर्गों से मुहब्बत और उनका ध्यान रखने की शिक्षाएं हैं, लेकिन बड़े-बड़े धार्मिक व्यक्ति भी इस ओर अक्सर बेरुखें ही हैं। क्योंकि उन्होंने धर्म को आत्मसात नहीं किया बल्कि केवल दिखावे के लिए ही उसका प्रयोग किया।

धार्मिक बातें चाहे लोगो को उपदेश लगे या किसी की समझ में ना आएं, लेकिन मैं हमेशा उनको दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। क्योंकि मानता हूँ कि अगर इसी तरह बताता रहा तो कम से कम मैं तो अवश्य ही उनपर अमल करने वाला बन जाऊंगा।
एक बार एक शख्स ने मुहम्मद (स.) से कहा कि मैं मैं हज करने के लिए जाना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास इतना सामर्थ्य नहीं है। आप (स.) ने मालूम किया कि क्या तुम्हारे घर में तुम्हारे माता-पिता दोनों अथवा उनमें से कोई एक जिंदा है, उस शख्स ने कहा कि माँ बाहयात हैं। आप (स.) ने फ़रमाया कि उनकी सेवा करो।

वहीँ एक बार फ़रमाया कि अपनी माता अथवा पिता को मुहब्बत की नज़र से देखना ऐसे 'हज' के पुन्य जैसा है जो कि कुबूल हो गया हो।
एक शख्स ने मालूम किया कि किसी के जीवन पर सबसे ज़्यादा मुहब्बत का अधिकार किसका है? आप (स.) ने फ़रमाया कि माँ का, उसने मालूम किया कि उसके बाद, तब आप (स.) ने फिर से फ़रमाया कि उसकी माँ का। उस शख्स ने तीसरी बार मालूम किया तब भी आप (स.) ने फ़रमाया कि उसकी माँ का और बताया कि चौथा नंबर पिता का है तथा उसके बाद अन्य लोगों का नंबर आता है।

वहीँ एक बार फ़रमाया कि अपने माता-पिता के इस दुनिया से जाने के बाद उनसे मुहब्बत यह है कि उनके रिश्तेदार और दोस्तों के साथ भी वैसा ही सुलूक किया जाए जैसी मुहब्बत माता-पिता के साथ है। एक बहुत ही मशहूर वाकिये में आप (स.) ने फ़रमाया था कि माँ के क़दमों तले जन्नत है

इसी प्रण के साथ बात को समाप्त करता हूँ, कि आजतक जितनी भी गलतियाँ, ज्यादतियां माँ-बाप के साथ की, भविष्य में उन गलतियों से दूरियां बनाने की पुरज़ोर कोशिश करूँगा। अगर इस प्रयास में सफल रहा तो अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली समझूंगा, वर्ना दिन तो गुज़र ही जाएँगे और मेरे बच्चे भी बड़े होंगे।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

Read More...

देश की चूलें हिला रहा है धार्मिक भ्रष्टाचार

आज जहाँ सामाजिक भ्रष्टाचार देश को ज़हरीले सांप की तरह डस रहा है वहीँ धार्मिक भ्रष्टाचार भी देश की बुनियाद की चूलें हिलाने का काम कर रहा है। मैं हमेशा से ही मानता रहा हूँ कि भ्रष्टाचार हमारे अन्दर से शुरू होता है. इसके फलने-फूलने में सबसे अधिक सहायक हम स्वयं ही होते हैं बल्कि कहीं ना कहीं हम स्वयं इसका हिस्सा होते हैं। आज सभी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाए, लेकिन कोई भी यह नहीं चाहता कि उसके अन्दर का भ्रष्टाचार समाप्त हो जाए।

धार्मिक भ्रष्टाचार भी आम जनता के कारण ही फलता-फूलता है। आज इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के ज़माने में हर इंसान पैसा कमाने के लिए रात-दिन एक कर देता है, हर इक दूसरों से आगे निकल जाना चाहता है। परन्तु ऐसे समय में भी अपने खून-पसीने से कमाए पैसों को मंदिर, मस्जिद, आश्रमों और दरगाहों में बर्बाद कर देता है। बर्बाद इसलिए कह रहा हूँ, कि ऐसे संस्थानों के कर्ता-धर्ता अधिकतर मामलों में उन पैसों का प्रयोग समाज के उद्धार की जगह स्वयं का उद्धार करने में करते हैं। आज के दौर में धर्म भी एक तरह का नशा हो गया है, या यह कहें कि बना दिया गया है। इस युग में भी लोग बिना सोचे-समझे धार्मिक गुरुओं पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं, जबकि उनके अनैतिक कृत्य खुले-आम नज़र आते हैं। जनता-दिन प्रतिदिन गरीब होती जा रही है और धर्म के यह तथा-कथित सेवक दिन-प्रतिदिन अमीर होते जा रहे हैं। रोजाना धार्मिक स्थलों पर करोडो का चढ़ावा  चढ़ाया जाता है और बेशर्मी की हद यह है कि इन धार्मिक स्थलों द्वारा जोर-शोर से चढ़ावे में मिलने वाली अकूत दौलत का गुडगान कर-करके दुनिया को बताया जाता है। गौर करने की बात है कि अगर दान अथवा चढावे का यह पैसा गरीबों के उत्थान, बीमारों के इलाज अथवा अनाथ बच्चों के पोषण तथा शिक्षा जैसी जगह में खर्च हो तो देश और समाज का कितना उद्धार हो सकता है। बल्कि सही मायनों में यही पुन्य की प्राप्ति और पैसे का सदुपयोग है, अन्यथा इस तरह पैसों को बर्बाद करके पुन्य की खुशफहमी में जीने के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होगा।

धर्म की आड़ में एक और धंधा जोरो पर है, आप इन संस्थानों को  कितना भी दान दीजिए और उसके बदले तीन-चार गुना अधिक की रसीद आपको मिल जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे संस्थानों से कोई कर वसूला नहीं जाता, बल्कि दान देने वालों को भी आयकर में छूट दी जाती है। डेढ़ लाख रूपये तक सालाना कमाने वाले आम नागरिकों पर तो सरकार टेक्स की भरमार कर देती है परन्तु करोड़ों कमाने वाले इन संस्थानों पर कोई टेक्स नहीं?

गरीब जनता को बीच मंझदार में छोड़ देने वाली सरकार इनके आगे-पीछे घूमती दिखाई देती है। करोड़ों की सरकारी ज़मीन ऐसे संस्थानों को कोडियों के दामों दे दी जाती है, जबकि अनाथालयों के लिए जगह मांगने वाले संस्थान, सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं। बल्कि कई राज्यों की सरकारों ने अनाथालयों की ज़मीन ऐसे संस्थानों को बाँट रखी है।

आज देश में गरीब के लिए स्कूल तथा अस्पतालों की संख्या गिनी जा सकती है जबकि धर्मस्थलों की संख्या अनगिनत है। नैतिकता का ढोल पीटने वाले धार्मिक संस्थान को जगह-जगह सार्वजानिक ज़मीन पर कब्ज़ा जमाए हुए देखा जा सकता है। कोई सरकार इन तथाकथित धार्मिक स्थलों के खिलाफ कुछ नहीं करती। हद तो तब होती है कि अगर सरकार ऐसी अवैध जगहों को ढहाने का काम करती भी है तो आम जनता ही सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करने लगती है और सरकार भी वोट बैंक के लालच में इनके आगे झुक जाती है। यह कैसे धर्म हैं, जहाँ ईश्वर अवैध कब्ज़ा करके बनाए गए धार्मिक स्थल पर पूजा करने वालों से खुश होता है? क्या धर्म अनैतिक हो सकता है? आखिर इस दिखावे के साथ कब तक जीते रहेंगे?



यह भी पढ़ें:

Read More...

मंदिर-मस्जिद बहुत बनाया


मंदिर-मस्जिद बहुत बनाया, आओ मिलकर देश बनाएँ
हर मज़हब को बहुत सजाया, आओ मिलकर देश 
सजाएँ


मंदिर-मस्जिद के झगड़ों ने लाखों दिल घायल कर डाले
अपने ख़ुद को बहुत हंसाया, आओ मिलकर देश हसाएँ

मालिक, खालिक, दाता है वो, सदा रहे मन-मंदिर में
उसका घर है बसा बसाया, आओ मिलकर देश बसाएँ

गाँव, खेत, खलिहान उजड़ते, आँखे पर किसकी नम है
इतना प्यारा देश हमारा, आओ मिलकर देश चलाएँ

अपने घर का शोर मचाया, दुनिया के दिखलाने को
अपने घर को बहुत दिखाया, आओ मिलकर देश दिखाएँ

नफरत के तूफ़ान उड़ा कर, देख चुके हैं जग वाले
प्रेम से कोई पार न पाया, आओ मिलकर प्रेम बढाएँ

मंदिर-मस्जिद पर मत बाँटो, हर इसाँ को जीने दो
भारत की गलियों में 'साहिल', चलो ख़ुशी के दीप जलाएँ

- शाहनवाज़ 'साहिल'



Keyword: bharat, india, mandir, masjid, friendship, love, war

Read More...
 
Copyright (c) 2010. प्रेमरस All Rights Reserved.