औरंगज़ेब सिर्फ एक शासक था

औरंगज़ेब भी दूसरे राजाओं की तरह एक शासक ही था, जिसके अंदर बहुत सारी खूबियाँ थीं और ऐसे ही बहुत सारी कमियाँ भी थीं, पर उन खूबियों और कमियों का देश के मुसलमानों से कोई ताल्लुक़ नहीं है। भले ही उसने किताबें लिखकर और रस्सियां बुनकर अपना खर्च चलाने जैसा बेहतरीन काम होगा, पर सत्ता की लड़ाई में अपने सगे भाइयों की हत्या करने वाला, अपने भाई दारा शिकोह की हत्या के बाद उसके पार्थिव शरीर को शहर में घुमाकर नुमाइश करने वाला और उसके सिर को तश्तरी में सजाकर अपने पिता के सामने पेश करने वाले से हमारा सम्बन्ध तो हरगिज़ नहीं हो सकता है। 


कुछ कट्टरपंथी जरूर उसका महिमामंडन करते हो, पर आम मुसलमान उसे अपना आदर्श नहीं मानते हैं, किसी भी बच्चों का नाम औरंगज़ेब नहीं रखा जाता है। उसे सिर्फ एक ऐसे शासक के तौर पर याद किया जाता है, जो कि शासन में क्रूर होने के बावजूद जनता के पैसे की बर्बादी नहीं करता था। अपना खर्च अपनी मेहनत कमाई से चलाता था, जबकि नार्मल परसेप्शन है कि शासक वर्ग जनता को शोषित करके सत्ता सुख भोगते हैं। 

हालाँकि राजनैतिक फ़ायदे के लिये अगर कोई नफ़रत फैलाने के मक़सद से झूठ गढ़ता है तो उसका विरोध करना और सही फैक्ट्स सामने रखना भी बिलकुल सही और ज़रूरी है। जैसे कि कहा जाता है कि "औरंगज़ेब रोज़ 40 मन जनेऊ जलाता था"। जबकि एक जनेऊ लगभग 50 ग्राम का होता है, तो 40 मन जनेऊ जलाने का मतलब हुआ प्रतिदिन 1600 किलो, अर्थात 32000 ब्राह्मणों की हत्या होना। और इस हिसाब से एक साल में मारे गए ब्राह्मणों की संख्या 1,16,48,000 हुई, मतलब पूरे शासन काल में 5,82,40,000 यानी लगभग 58 करोड़ ब्राह्मण मारे गए, जो कि असंभव फिगर है। हक़ीक़त यह है कि औरंगज़ेब के समय देश की जनसंख्या सिर्फ 15 करोड़ थी, इसमें वयस्क लगभग 8 करोड़ ही रहे होंगे जिसमें ब्राह्मण समुदाय की जनसँख्या लगभग 1 करोड़ ही होगी और उसमें से भी पुरुष 50-60 लाख ही रहे होंगे। यह बात ऐतिहासिक साक्ष्यों के तो विरुद्ध है ही, तर्क के भी पैमानों पर झूठी साबित होती है! 

हालाँकि ऐतेहासिक साक्ष्यों के हिसाब से किसी भी शासक ने जो ग़लतियाँ की उन ग़लतियों की बुराई करना और जो अच्छे कदम उठाए उन कदमों की सराहना करने का भी सभी को अधिकार है। हर दौर के शासकों ने अपने राज्य को बढ़ाने के लिए आज के दौर के पैमाने के एतबार से अच्छे और बुरे काम किये हैं, ऐसे ही औरंगज़ेब ने भी कुछ क्रूर कदम भी उठाए और कुछ जनहितकारी और दूरदर्शिता वाले काम भी किये। औरंगज़ेब ने कुछ हिन्दू समुदाय के हित में तो कुछ विरोध में काम किये, ऐसे ही मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए, तो कुछ विरोध में काम किये। विभिन्न शासकों के इतिहास में दर्ज अच्छे और बुरे कामों का मक़सद अपने शासन को मज़बूत और बड़ा बनाने के सिवा मुझे कुछ और नज़र नहीं आता है। 

हालाँकि मैं शासकों को कभी कोई ख़ास विरोध नहीं करता हूँ और ना ही उन्हें रोल मॉडल या हीरो समझता हूँ। यक़ीन कीजिए कि जिस चंगेज़ ख़ान को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है, जिसने करोड़ों मुसलमानों का क़त्ल किया, मैं उससे भी कभी नफ़रत नहीं करता हूँ। 

इसकी एक वजह यह भी है कि शासकों के बारे में इतिहास में जो लिखा है वो भी ज़रूरी नहीं है कि शब्द दर शब्द सच ही हो। उस वक़्त की परिस्थितियों को आज के वक़्त समझना वैसे भी बेहद मुश्किल काम है और जो लिखा गया है उनकी सच्चाई को परखना मेरे जैसों के लिए असंभव सा है। जैसे कि आज गोदी मीडिया है वैसे भी तब भी किताबें चाटुकारों अथवा विरोधियों ने लिखी होंगी। जिसमें सच का कितना अंश होगा यह पता लगाना नामुमकिन जैसा ही है। हालाँकि हमारे पास उस समय को जानने के एकमात्र साधन ऐतिहासिक साक्ष्य ही हैं, इसलिए हम उनके ऊपर विश्वास करके चलते हैं। पर हमें इतिहास को इतिहास ही समझना चाहिए, उसे किसी धर्मग्रन्थ की तरह 100% सही समझ कर नहीं चलना चाहिए। 

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साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और इसका नुक़सान


मैं अपने बचपन से चुनावों में सांप्रदायिक नफरत का चक्रव्यूह देखता आ रहा हूं। चुनाव करीब आते ही बीजेपी तुरंत हिन्दू मुस्लिम पर और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां जनता के कामों पर सवाल करने या हिसाब-किताब देने की जगह बीजेपी के चक्रव्यूह में फंसकर उसके एजेंडे पर बात करती नज़र आती हैं। 

यह दोनों तरफ़ की पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता पर लड़ा जाए। क्योंकि इससे दोनों तरफ के लोगों को किसी एक पार्टी को वोट देना मजबूरी बन जाता है। फिर चुनाव में लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके काम हुए या नहीं हुए, देश या राज्य तरक़्क़ी की राह पर जा रहा है या नहीं।

हालांकि कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जब नफरतें चरम पर होती हैं, तो फिर चाहे सेकुलर माइंडसेट वाले हिंदू हों या फिर मुसलमान, दोनों ही कम्युनल एजेंडे पर वोट देने को मजबूर हो जाते हैं और इनकी हार की यही वजह है!

देश के लोगों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि चुनाव इमोशनल इशुज़ की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता के कामों पर होने चाहिए। मतलब क्या काम किए, क्या नाकामी रही और आगे का क्या एजेंडा है, लोकतंत्र इसी का नाम है कि चुनाव के वक्त जनता अपने कामों के हिसाब से वोट दे! 

साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के नाम से होने वाली राजनीति को हाशिए पर लाने का मेरी नज़र में सिर्फ यही एक हल है।

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मेरी कोच्चि और कुमारकोम यात्रा


किस की तलाश है हमें, किस के असर में हैं।
जब से चले हैं घर से, मुसलसल सफ़र में हैं।

तो दोस्तों, आज हम निकल पड़े हैं एक नए सफ़र पर। मंज़िल है केरल का खूबसूरत शहर कोच्चि, जिसे बहुत से लोग कोचीन के नाम से भी जानते हैं। इस सफ़र में हम आपको दिखाएंगे कोच्चि की कुछ बेहतरीन जगहें, वहां तक पहुंचने के तरीके और उन नज़ारों की झलक, जिनकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां खिंचे चले आते हैं।

सुबह के तीन बजे हैं। बैग पैक हो चुका है, कैमरा तैयार है और दिल में एक नई मंज़िल को देखने का उत्साह। चलिए फिर, शुरू करते हैं यह खूबसूरत सफ़र।

मैंने इंडिगो की फ्लाइट ली, हवाई सफर में टेक ऑफ और लैंडिंग का नज़ारा मुझे हमेशा रोमांचित करता आया है और इसीलिए मैं हमेशा विंडो सीट लेता हूं। हालांकि Aisle Seat लेने पर फ्लाइट में टहलने और वाशरूम वगैरह जाने में आसानी रहती है, पर विंडो सीट का अपना ही मज़ा है। सफर अगर लंबा है तो मैं विंडो पर सर टिका कर सो भी जाता हूं।


सुबह एकदम निकलने को है, IGI एयरपोर्ट के ऊपर से आगे जाते हुए नज़ारा बहुत ही दिलकश है। मैने 10 दिन पहले ही टिकट बुक करा लिया था इसलिए मुझे नई दिल्ली से कोचीन के लिए इकोनॉमी क्लास का एयर टिकट लगभग 8 हज़ार का पड़ा है, बिजनेस क्लास में 16 के करीब का ऑप्शन था। बाई एयर दिल्ली से कोच्चि लगभग 3 घंटे का सफर है।


अगर आप ट्रेन से जाना चाहते हैं तो नई दिल्ली से केरल एक्सप्रेस से सफर कर सकते हैं जो कि एर्नाकुलम टाउन तक की सबसे तेज़ ट्रेन है और लगभग 44 घंटे 45 मिनट में 2811 किलोमीटर की दूरी तय करती है। जिसमें सेकंड एसी का किराया लगभग 3500 और थर्ड AC का किराया 2500 रुपए के करीब आता है।


कोच्चि लक्षद्वीप सागर के तट पर बसा हुआ एक बड़ा बंदरगाह शहर है। कोच्चि को एर्नाकुलम भी कहा जाता है, जिसका मतलब शहर का मुख्यभूमि भाग यानी Main land part है। कोच्चि नगर निगम तकरीबन 95 स्क्वायर किलोमीटर के एरिया में फैला हुआ है। कोच्चि केरला स्टेट का दूसरा सबसे ज्यादा पॉपुलेशन वाला शहर है, हालांकि शहरी आबादी के हिसाब से यह केरल का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। साल 2024 के अंत तक यहां के मेट्रो क्षेत्र की आबादी 35 लाख होने का अनुमान है।


कोच्चि 14वीं शताब्दी से ही भारत की पश्चिमी तटरेखा का मसालों के व्यापार का सेंटर रहा है, अरब सागर की रानी' के नाम से मशहूर कोच्चि टॉप रेटेड इंटरनेशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशंस में से एक है जहाँ छुट्टियां मनाने आने वालों को प्री हिस्टोरिक, ऐतिहासिक और आधुनिक युग की झलक बेहद करीब से देखने के लिए मिलती है। 


कोच्चि असल में केरल का दिल है। यह शहर की फाइनेंशियल कैपिटल है जहाँ आईटी सहित कई अन्य कारोबार फल-फूल रहे हैं क्योंकि यह देश के प्रमुख बंदरगाह शहरों में से एक है। इस Metropolitan City में वह सब कुछ है जो किसी भी मौसम में आपंका मन लुभा सकता है जैसे कि मेट्रो शहर की सुविधाएँ, कुदरत की खूबसूरती और यहां का अमेजिंग कल्चर। अगर आप रोमांचक यात्रा करना चाहते हैं या फिर सुकून भरी छुट्टी का लुत्फ उठाना चाहते हैं, यकीन मानिए यहां आपको निराश हाथ नहीं लगेगी।


कोची इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिलकश सी जगह है, जो कि अपने रख रखाव में किसी भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से मुकाबला कर सकता है। बेहद खूबसूरत कोच्चि एयरपोर्ट से चेराई बीच की दूरी 27 किलोमीटर है, अगर आप टैक्सी से जाते हैं तो तकरीबन एक घंटा वहां पहुंचने में लगेगा। चेराई बीच कोच्चि में सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली जगहों में से एक है। चेराई बीच कोच्चि लोगों को शहर की भीड़-भाड़ से दूर आराम करने का मौक़ा देता है । शाम के समय चेराई बीच पर जाने का सबसे अच्छा वक्त होता है, जहां आप खूबसूरत सूर्यास्त यानी सन सेट देख सकते हैं।

आप यहां से वाइपिन द्वीप भी जा सकते हैं, वाइपिन द्वीप कोच्चि का बहुत मशहूर पर्यटन स्थल है. यह एक अवरोधक द्वीप यानी barrier islands बनाता है जो पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में पेरियार नदी की सहायक नदियों से घिरा हुआ है. यह आइलैंड लगभग 27 किलोमीटर लंबा है और अपनी कुदरती खूबसूरती, प्राचीन समुद्र तटों और मछली पकड़ने वाले गांवों के लिए मशहूर है. वाइपिन द्वीप पर कई पर्यटन स्थल हैं, जैसे कि चेराई बीच भी यहीं पड़ता है, जिसके बारे में मैने ऊपर बताया।


यहां आप Munambam Fishing Harbour भी घूम सकते हैं जो कि कोच्चि का सबसे बड़ा मछली पकड़ने वाला बंदरगाह है। इसके अलावा आप यहां एलमकुन्नापुझा सुब्रह्मण्य मंदिर, चेराई मंदिर, पालथनकुलंगरा देवी मंदिर, अजीकल वराहमूर्ति मंदिर, पुथुवाइप स्थित लाइटहाउस, सहोदरन अय्यप्पन स्मारकम, क्रूज़ मिलग्रेस चर्च, कुझुप्पिली बीच और पल्लीपुरम किला घूम सकते हैं।


इसके अलावा डच पैलेस और बोलघट्टी द्वीप भी घूमने के लिए बेहतरीन जगह हैं। इनके साथ साथ शानदार बैकवाटर से घिरा तथा मानव निर्मित विलिंगडन द्वीप भी बेहद खूबसूरत है। इस द्वीप का नाम भारत के भूतपूर्व ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड वेलिंगडन के नाम पर रखा गया था। यहाँ फोर्ट कोच्चि बीच भी बहुत मशहूर है, साथ ही साथ आप कोडानाड एलिफेंट ट्रेनिंग सेंटर भी जा सकते हैं। केरल कुदरती खूबसूरती के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है, अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं तो कोच्चि मंगलवनम बर्ड सेंचुरी ज़रूर जाइए। और अगर आप कोच्चि आए और मरीन ड्राइव नहीं गए तो फिर क्या ही किया… जल्दी हीं सभी पर्यटन स्थलों पर अलग अलग डीटेल वीडियो बनकर आपके साथ शेयर करूंगा।


कोची इंटरनेशन एयरपोर्ट से हमारे डेस्टिनेशन द जूरी कुमारकोम केरला स्पा एंड रिजॉर्ट की दूरी लगभग 73 किलोमीटर दूर है। अगर आप रेलमार्ग या फिर बस से सफर करना चाहते हैं निकटतम टर्मिनल कोट्टायम में है। 


The Zuri Kumarakom Kerala Spa & Resort पहुंचने पर हमारा स्वागत पारंपरिक नगाड़ों के साथ हुआ। माथे पर तिलक लगाया गया और बेहद लजीज़ नारियल पानी सर्व किया गया। वेम्बनाड झील के शानदार तट पर बसा यह 5-सितारा लग्जरी हेरिटेज रिसॉर्ट केरल में भारत के सबसे शानदार हॉलिडे डेस्टिनेशन में से एक है। यहां का शांत बैकवाटर और हरियाली से भरे नज़ारे आँखों को सुकून देते हैं। यहां खूबसूरती से सजे और करीने से डिज़ाइन किए गएआलीशान कमरे, विला और कॉटेजेस का कलेक्शन है। 


यहां हमारे बजट के एतबार से शानदार लैगून के सामने वाले कमरे या फिर निजी पूल वाले आलीशान विला के ऑप्शन मौजूद हैं। बात करने पर पता चला कि यहां 18 जूरी रूम्स, 16 डीलक्स रूम्स, 28 कॉटेज और 10 प्रेसिडेंशियल पूल विला हैं, यानी कुल मिलाकर 72 रूम्स हैं।


मैंने जूरी रूम लिया था, जिसमें कमरे के साथ आने वाले खूबसूरत निजी बरामदे से ब्लू लैगून के शांत पानी में सुनहरे सूर्योदय को देखते हुए सुगंधित चाय के कप का मज़ा लेना ऐसे यादगार पल में से एक हैं जो कि हमेशा ज़हन में रहने वाले हैं। रिसोर्ट में स्थित माया स्पा में अपने मन, शरीर और आत्मा को तरोताज़ा किया जा सकता है! मानसिक स्वास्थ्य से लेकर एंटी-एजिंग और रेजूवेनेशन तक के लिए आयुर्वेद ट्रीटमेंट का फायदा उठा सकते हैं।


यहां ऐसी कुदरती खूबसूरती बिखरी पड़ी है जो आपका मन मोह लेगी। ऐसे नज़ारों के लिए शारिक़ बल्यावी कहते हैं कि 

हर तरफ़ दावत-ए-नज़ारा है
चश्म-ए-हैरां किधर-किधर देखे


और शकील बदायूंनी कहते हैं कि 

कोई दिलकश नज़ारा हो, कोई दिलचस्प मंज़र हो
तबीअत ख़ुद बहल जाती है, बहलाई नहीं जाती


ब्लू लगून के शांत पानी और कुदरती हरियाली का मिलन ही वो करिश्मा पैदा करता है कि पूरी दुनिया से लोग यहां खींचे चले आते हैं। इस कुदरती खूबसूरती पर दा जूरी के लगजुरियस इंतजाम चार चांद लगा देते हैं। आपको अहसास ही नहीं होता है कि आप वाकई अपनी आंखों से यह चमत्कार देख रहे हैं या फिर कोई ख्वाब देख रहे हैं।


शाम को यहां क्लासिकल प्रोग्राम्स का भी इंतजाम रहता है। यकीन मानिए, इसकी भव्यता और लाइटिंग का कॉम्बिनेशन आपको एक अलग ही अहसास कराएगा। हालांकि हमने अपने ग्रुप के साथ डिनर से पहले चल करने के लिए ऑर्केस्ट्रा के साथ डांस का इंतजाम करवाया था। 


रात के अंधेरे में झील के किनारे की गई लाइटिंग को निहारते हुए इवनिंग वॉक करना भी बेहद अद्भुत है। यहां आए हैं तो हर पल को जीना है, हर मौके का लुत्फ उठाना है, यह सबक अगर सीख लिया तभी आप अपने सफर को कामयाब कर पाएंगे। क्योंकि पता नहीं प्रकृति से यह सीधा साक्षात्कार यानी नेचर से यूं रूबरू होना फिर दुबारा कब मयस्सर हो, इसलिए किसी भी पल को गंवाना नहीं है, हर एक मौके को अपने स्मृति पटल यानि मेमोरी बोर्ड पर कैद करते रहिए। 


सुबह उठने पर देखा कि तो बाहर हल्की हल्की बारिश हो रही है, मैने थोड़ी देर अपने कमरे से बाहर के नज़ारों का लुत्फ उठाया और फिर दरवाज़ा खोलकर बाहर आकर बैठ गया। यहां की शाम जितनी रंगीन थी, सुबह भी उतनी ही दिलकश है। सामने ब्लू लगून वेम्बनाड झील को निहारना बेहद सुकून देता है, यहां पर घंटों बैठा जा सकता है। पर हमने बोटिंग के लिए जाना था, जिसके लिए रिसेप्शन से फोन आ गया। हम रिसेप्शन पर पहुंचे हैं तो फिर से हमारा स्वागत केरल के ट्रेडिशनल ड्रम के साथ किया गया, हमारी टीम के साथी भी उसकी धुनों पर नाचने लगे।


यहां हाउस बोट का भी इंतजाम है, पर हमने रोमांचक स्पीड बोट को चुना है। सबसे पहले हम फिशिंग पॉइंट पर गए और उसके बाद कोकोनट ट्री से तोड़ी तोड़ते हुए देखने का प्लान बनाया गया। यहां स्थानीय मछुआरे फिशिंग के लिए नीचे झील के पानी के अंदर जाते हैं, यह मछली पकड़ने का यहां का ट्रेडिशनल तरीका है।


राइस फील्ड: इस मैन मेड झील के बीच में बचे हिस्से पर चावल की खेती की जाती है, इस हिस्से के दोनों तरफ झील का पानी भरा पड़ा है, इसलिए यहां राइस फार्मिंग बेहद फायदे का सौदा है।


तोड़ी: फिर हम तोड़ी के प्रोसेस को देखने के लिए गए, नारियल के गुच्छों को काटकर निकाले गए तोड़ी के रस को दो तरह से यूज़ किया जा सकता है। तोड़ी के नाम से मशहूर इसका अल्कोहलिक वर्जन हल्का नशीला होता है। जबकि नॉन अल्कोहलिक वर्जन को नीरा कहते हैं, जो कि नारियल से निकलने वाला अन फर्मेंटेड रस है जिसे अक्सर स्वीट तोड़ी भी कहा जाता है। यह नारियल के एमेच्योर इन-फ्लो-रेसेंस से मिलता है। हालांकि इसकी शेल्फ लाइफ 4 या 5 घंटा ही होती है। इसके बाद यह फर्मेंटेड होना शुरू हो जाता है।


तोड़ी निकालने वाले नारियल के पेड़ पर रस्सी बांधकर उसे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। तोड़ी के फूल की बंद कलियों को हल्का सा काटा जाता है, मतलब 95% को पेड़ पर ही छोड़ दिया जाता है। इसके बाद कली को फूलने के लिए हथौड़े से पीटा जाता है और रस को इकट्ठा करने के लिए मिट्टी के बर्तन लगाए जाते हैं, जिसमें यह दूधिया रस इकट्ठा होता रहता है। जिसे बाद में नीचे उतार लिया जाता है। जिस रस से तोड़ी बनानी है उसे हल्का सा Fermented होने के लिए छोड़ दिया जाता है। जितना ज़्यादा देर तक यह Fermented होता है, उतनी ही ज्यादा उसमें अल्कोहल बनती जाती है। इसके बाद तोड़ी को कांच की बोतलों में पैक करके लाइसेंस वाली दुकानों में बेचा जाता है। तोड़ी में लगभग 8% अल्कोहल होती है और इसे केरल में प्राकृतिक शराब और हेल्थी ड्रिंक माना जाता है।


यहां से हम वापिस जा जाते हुए रास्ते में एक जगह रुककर हमने लंच किया और फिर वहां से वापिस रिजॉर्ट के लिए निकल गए। बोट से उतरने पर ट्रेडिशनल ड्रम के साथ टीम तैयार थी, पर इस बार हमारे ग्रुप ने जिनसे ड्रम लेकर अपने हाथ अज़माना शुरू कर दिया। काफी थक गए थे, इसलिए रूम पर जाकर आराम करने का प्लान बनाया गया, शाम का प्लान स्नेक बोट में जाने का था, पर अब वो कल सुबह घर वापिसी से पहले का प्लान बनाया गया है।


स्नेक बोट: ओणम फेस्टिवल पर होने वाली स्नेक बोट रेस के बारे में आपने ज़रूर सुना होगा, सुबह-सुबह  सेंक बोट रेस में हिस्सा लिया और उसके बाद फिर वापिस दिल्ली के निकल गए।

केरल अपने मसालों के लिए बहुत मशहूर है, अगर आप केरल घूमने आए हैं तो वापसी में यहां के शुद्ध और ताज़ा मसाले साथ के जाना नहीं भूलें और यह भी याद रखना है कि मसालों के चेक इन बैगेज में ही पैक करें, बहुत से मसालों को हैंड केरी में ले जाना अलाउड नहीं होता है।

तो आज के लिए इतना ही, एक नए सफर के साथ जल्द ही मिलते हैं!



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आप कारोबार में जितना ज़्यादा मेहनत करते हैं उतना ही कम कमाते हैं

जब आप अपने कारोबार में ज़्यादा मेहनत करते हैं तो उसके दो नुकसान होते हैं, एक तो कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी नेटवर्क को बनाने के साथ-साथ बाकी कारोबार में इन्वेस्ट करने का टाइम नहीं निकल पाते हैं और दूसरा ख़ुद को और परिवार को टाइम कम देने की वजह से क्वालिटी ऑफ लाइफ नहीं जी पाते हैं। अगर जिंदगी में लुत्फ नहीं है तो इसका मतलब अपने रब (बनाने वाले) के शुक्रगुजार नहीं हैं, जिसका असर मेंटल लेवल पर पड़ता है और फिर इसकी वजह से आपकी प्रोफेशनल लाइफ की ग्रोथ  इस स्पीड से नहीं हो पाती है, जितनी ज़रूरत होती है।

इसलिए वक्त के साथ साथ बैलेंस बनाते हुए कारोबार में ख़ुद की मेहनत को कम करते जाइए और कारोबार चलाने और बढ़ाने के लिए ज़रूरी नेटवर्क को मज़बूत करते जाइए... 

खुद अधिक मेहनत करने की जगह टीम बनाने उसे मैनेज करना सीखिए। मेरे एक मित्र का पारिवारिक कारोबार अच्छा चलता था, मैंने उसे समझाया कि आप लोग स्वयं मेहनत में लगे रहते हैं, इसकी जगह आपको काम करने वाले कारीगर लगाने चाहिए। इससे जो समय बचेगा उसे आप व्यसाय बढ़ाने में लगा सकते हैं। पर उसके पिता को यह बात समझ नहीं आई, उन्होंने कहा कि हम हाथ के कारीगर है फिर हम खुद काम करना छोड़कर दूसरों को इस काम पर क्यों लगाए? पर कुछ साल बाद उनका व्यवासय पिछड़ने लगा, क्योंकि उसके क्षेत्र में नए व्यवसायी आने लगे थे, जिन्होंने इन्वेस्टमेंट करके बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं। काम बढ़ने के साथ-साथ उन्होंने ज़्यादा कारीगरों को हायर किया। जिससे वो कम्पटीशन में उनसे कम कीमत पर अच्छी क्वालिटी उपलब्ध कराने लगे। और इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे धीरे उनका कारोबार ठप्प हो गया।   

वैसे भी उसूल यह कहता है कि किसी कारोबार में रात-दिन मेहनत करके आप ज़िंदगी अच्छी तरह से चलाने का इंतजाम तो कर सकते हैं पर अमीर नहीं बन सकते हैं!

अमीर हालांकि अरबी का लफ्ज़ है, जिसका मतलब लीडर होता है, पर अगर पैसे वाले अमीर की बात की जाए तो वो वही व्यक्ति बनता है जो कारोबार को कम से कम मेहनत से मैनेज करना सीख लेता है। जब एक कारोबार कुछ चल जाए तो खर्च निकालने के बाद बचे मुनाफे से बाकी के कारोबारों की तरफ रुख करना ही अमीर बनने का सीधा रास्ता है। एक कमाई से कभी कोई अमीर नहीं बनता है!

और जो यह कहते कि अमीर गलत धंधे करके ही बनते हैं, वो आपको सिर्फ झूठ का सहारा लेकर बेवकूफ ही नहीं बना रहा होता है, बल्कि आपको डिमोटिवेट करके बहुत बड़ा गुनाह भी कर रहे होते हैं। याद रखिए कि पैसे कमाना शैतानी काम नहीं है बल्कि यह एक धार्मिक और समाज का भला करने वाला काम है, बशर्ते सही उसूलों से किया जाए!

इसलिए अमीर या फिर बिलिनियर बनने का लक्ष्य रखिए, खूब सारा पैसा कमाना बेहद ज़रूरी है और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि ईश्वर जो हमें सामाजिक नेटवर्क के ज़रिए दे रहा है उसे समाज को वापिस भी किया जाए। यानी कौम, समाज, देश और इंसानियत के फायदे के लिए अपनी कमाई में से परिवार पर खर्च करने के बाद बचे पैसे का आधा हिस्सा खर्च किया जाए। यह पैसा आप शिक्षा, रिसर्च, भोजन, इलाज और लोगों को कारोबार कराने की व्यवस्था के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

विश्वास कीजिए, आप जितना इंसानियत को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च करेंगे आपका रब उसका कई गुना आपको वापिस करेगा। मतलब यह भी एक तरह से ईश्वर के साथ कारोबार हो गया... 😊

और वो बेहतरीन नफा देने वाला है!

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मुस्लिम प्रजनन दर और उसकी आड़ में जनसंख्या वृद्धि के हौव्वे की राजनीति

भारत में मुस्लिम प्रजनन दर 1992 में 4.4 थी जो कि 2019 में गिरकर 2.4 हो गई। वहीं हिन्दू प्रजनन दर जो कि 1992 में 3.3 थी वो 2019 में गिरकर 1.9 हो गई है। अगर सरकार के इस आंकड़ें को देंखेंगे तो मुस्लिम प्रजनन दर में जितनी तेज़ी से गिरावट आई है, उतनी किसी और समाज में नहीं आई है।

अभी सभी समुदायों की प्रजनन दर तक़रीबन 2 के आसपास है। जिसका अर्थ है 2 लोगों (पति-पत्नि) के द्वारा जन्म दिए बच्चों की संख्या 2 के आसपास है और इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्दी ही ऐसा समय आने वाला जबकि देश की जनसख्या बढ़ने की जगह घटने लग जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर समुदाय में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। आप शिक्षा के असर का इससे अंदाज़ा लगाइये कि शहरों में प्रजनन दर 1.6 रह गई है, जबकि गांवों में यह 2.1 प्रतिशत है। अगर राज्यों की बात करें तो बिहार 3, मेघालय में 2.9, यूपी में 2.4, झारखंड 2.3 और मणिपुर में 2.2 है।

और अगर देखा जाए तो हिन्दू समुदाय की प्रजनन दर (1.9), बौद्ध (1.4), जैन (1.6) और सिख (1.6) समुदाय से ज़्यादा है तो क्या इन समुदायों को हिन्दू समुदाय के विरुद्ध झंडा उठाना चाहिए? 
जन्मदर का ताल्लुक शिक्षा के स्तर से होता है, पर बेशर्मी यह है कि भाजपा इसके हल अर्थात शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर मंथन करने की जगह इसे भी नफरत का हथियार बनाती है।

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Ghazal: जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी

वो जिसकी याद में कटती है ज़िन्दगी अपनी उसी के साथ में शामिल है हर खुशी अपनी वो लिखना चाहें तो लिक्खे तेरी अदाओं पे जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी नया है दौर ये ज़ालिम बड़ा ज़माना है ज़रा जतन से छुपाना तू मुफलिसी अपनी मिरे कदम से मिलाया है हर कदम उसने हर इक सफर में हुई है यूँ रहबरी अपनी

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'

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कोरोना मामलों में मीडिया का धार्मिक दुष्प्रचार

24 मार्च तक बहुत सारे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में लोग सरकारी प्रतिबंधों के बावजूद आ-जा रहे थे और इस कारण लॉक डाउन होने पर फंस गए। क्योंकि तब तक सरकार ही गंभीर नहीं थी, प्रदर्शन चल रहे थे, सामाजिक-राजनैतिक समारोह / पार्टियाँ आयोजित हो रही थीं, सरकारें गिर रही, बन रही थीं, संसद सत्र चल रहा था। सरकारी गंभीरता अचानक 20-21 मार्च से नज़र आनी शुरू हुई।

हजूर साहिब, महाराष्ट्र में फंसे ऐसे ही तीर्थयात्री जब पिछले हफ्ते पंजाब वापिस लौटे तो 148 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। ऐसे ही कई और धार्मिक स्थलों में भी फंसे लोगों को निकालकर उनके शहरों में पहुंचाया गया है। कई धार्मिक/सामाजिक अनुष्ठानों में हज़ारों लोग इकट्ठा हुए। मध्य प्रदेश में अंतिम संस्कार में 1500 से ज़्यादा लोग जुटे, ऐसे ही महाराष्ट्र के एक मंदिर के कार्यक्रम में भी 1500 के करीब लोग इकट्ठे हुए, इन मामलों के कारण सैंकड़ों कोरोना पॉज़िटिव केस सामने आए।

हालाँकि ऐसे मामलों में लापरवाही की जाँच की जाती है और जो ज़िम्मेदार निकलेगा उन्हें सज़ा भी मिलनी चाहिए। पर मरकज़ निज़ामुद्दीन के बहुचर्चित मामले में मीडिया के दुष्प्रचार ने जिन मरीज़ों से सहानुभति होनी चाहिए थी, उन्हें अपराधी ठहरा दिया और मीडिया के इस घृणित व्यवहार पर देश में कहीं कोई चर्चा नहीं हुई!

जबकि मीडिया ने सरकार से कभीं सवाल नहीं किया कि जो लाखों लोग विदेशों से वापिस आए, उन्हें कोरोना टेस्ट किये बिना या फिर सरकारी क़वारन्टीन सेंटर्स में भेजने की जगह सीधे उनके घर क्यों जाने दिया गया? या फिर उनके घर को उसी समय रेड ज़ोन घोषित किया जाना चाहिए था। इस लापरवाही ने पूरे देश को लॉक डाउन की त्रासदी में धकेल दिया, तो फिर इसका ज़िम्मेदार कौन है? इसमें किसके खिलाफ केस होगा और किसे सज़ा मिलेगी?

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मज़बूत लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति का संगम विश्व को नई राह दिखा सकता है

यह बेहद फख्र की बात है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। मतलब देश के हर हिस्से में किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती की नहीं बल्कि जनता की मर्ज़ी से चुनी हुई सरकार प्रशासक का काम करती है। देश के किसी भी हिस्से में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, वो उस हिस्से के हर नागरिक की सरकार होती है। और हर नागरिक का यह फ़र्ज़ है कि नीचा दिखाने की नीयत की जगह सुधार की नीयत से कमियों को सामने लाए। जो कि किसी भी सरकार के पक्ष की ही बात है, क्योंकि जब तक कमिंयाँ सामने नहीं आएंगी, तब तक सुधार कैसे होगा? ऐसे ही देश की हर सरकार को जनता के हर सवाल का जवाब देना चाहिए, जहाँ सरकार की गलती है उसे ठीक करने की कोशिश होनी चाहिए और जहाँ जनता के तथ्य गलत हैं, वहाँ असली तस्वीर सामने रखनी चाहिए।

लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि अगर सरकार जनता के हित में सुधार करती है तो ठीक है, वरना अगले चुनाव में हिसाब कर लिया जाता है। हालांकि लोकतंत्र का असल मक़सद तभी कामयाब होगा जबकि देश में पूर्णत: साक्षरता होगी। तभी देश का हर नागरिक अपने वोट की कीमत समझ पाएगा, धार्मिक, जातीय, आर्थिक प्रलोभनों या फिर भावनाएँ भड़काने वालो के बहकावे में आए बिना अपने भविष्य के लिए वोट करके सक्षम सरकार बनाने में योगदान दे पाएगा।

देश को वापिस विश्वगुरु बनाना है तो देश की जनता में इतनी जागरूकता होना ज़रूरी है। विश्व ने पूंजीवादी और साम्यवादी दोनो तरह के मॉडल फेल हो चुके हैं। विश्व अब किसी नई व्यवस्था की तलाश में है और आज पूरा विश्व हमारी ओर देख रहा है। देश मे विश्व को नई व्यवस्था देने की पूरी काबिलियत मौजूद है। माँ भारती के बेटे-बेटीयाँ मिलकर विश्व को एक ऐसी व्यवस्था दे सकते हैं जो मनुष्य को विकास की एक अलग परिभाषा सीखा सकती है। जिसमें विश्व के हर जीव ही नहीं बल्कि प्रकृति के भी उद्धार की संभावनाएं हों। जो अमीर-गरीब, काले-गोरे, धर्म-जाती के भेदभाव को समाप्त करके सारी मनुष्य जाति को समकक्ष ला सकती है। और ऐसी व्यवस्था बनाने में लोकतंत्र का हमारा मॉडल कामयाब भूमिका बना सकता है, बशर्ते कि हम इसे सही तरह से लागू कर पाएं, अर्थात लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका के प्रति जागरूकता ला पाएं।

विश्व की व्यवस्थाओं के ध्वस्त होने का कारण उनके अंदर का कट्टरपन है। हर व्यवस्था सिर्फ अपने को ही सर्वोपरि समझती और दूसरे को कुचलती आई है। जबकि छोटी-मोटी कमियों के बावजूद भी भारतीय संस्कृति में कट्टरता का स्थान कभी नहीं रहा, हम हमेशा ही दूसरे विचारों को सम्मान देते और अपनाते आए हैं, और कारण रहा कि यहाँ कट्टरता की हर कोशिश समय-समय पर हारती आई है। हम कट्टरता की जगह सबको साथ लेकर चलने वाले अर्थात वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले लोग हैं, यही हमारी संस्कृति की सच्चाई है।

एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण होगा जहाँ अमीर-गरीब का भेद इतना ज़्यादा ना हो कि अमीर बेहद अमीर हों और गरीब को जीना दूभर हो जाए। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि धरती पर जो भी बच्चा पैदा हुआ है उसे दूसरे बच्चों के बराबर ही आगे बढ़ने का मौक़ा मिले। हमारे देश में प्राकृतिक संसाधन पुरे विश्व से ज़्यादा हैं और इसीलिए हमें ऐसी व्यवस्था बनाई होगी जो प्रकृति की रक्षा करती हो और प्रकृति का फायदा बिना अमीरी-गरीबी के भेदभाव के हर उस बच्चे को मिल सके जो आगे बढ़ने की योग्यता रखता हो।

पूरे विश्व को इस तरह की एक नई व्यवस्था देने के सारे गुण हमारे देश की संस्कृति और आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के समागम में मौजूद है, आवश्यकता उनमें आई कमियों को दूर करने भर की हैं। जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि लोकतंत्र के मॉडल में आई कमियों को दूर करने के लिए और साथ ही साथ समाज में फैलने शुरू हुए कट्टरपंथ के वायरस को दूर करने के लिए जागरूकता की आवश्यकता है। अगर हम इसमें कामयाबी पा लेते हैं तो नई राह बनाई जा सकती है और विश्व पटल पर एक नया मॉडल पेश किया जा सकता है। कामयाबी अवश्य प्राप्त होगी, पर सामूहिक प्रयास करना होगा, ऐसी कोशिशें अब देश के हर समाज और हर वर्ग को मिलकर करनी होगी।

जय हिंद

We can show a new path to the world through the combination of our rich Indian culture and strong democracy.

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गुजरात से आए कोरोना आंकड़ों ने चिंता बढ़ाई, कहीं दूसरे राज्यों में भी यही हाल ना हो!

गुजरात में कोरोना का कहर अचानक से बहुत तेज़ी से नज़र आ रहा है, 5 दिन पहले तक देश में छठे नंबर पर चल रहा गुजरात 2400 से ज़्यादा केसेस के साथ दिल्ली को पीछे करते हुए दूसरे नंबर पर आ गया है। हालांकि दिल्ली में कोरोना केसेस की संख्या इसलिए भी अधिक नज़र आती है, क्योंकि यहाँ दिल्ली से बाहर के केसेस ही अधिक हैं, दिल्ली के केसेस बहुत ही कम हैं।

चिंता की बात यह है कि गुजरात में रिकवरी रेट मात्र 6% के आसपास है, जबकि देश का औसत 19% है। गुजरात में 66% लोगों की मृत्यु पॉज़िटिव रिपोर्ट आने के 1 या 2 दिन के अंदर ही हो रही है।

मुझे लगता है कि इसके पीछे का मुख्य कारण कोरोना जाँच का बेहद कम होना है। मतलब कोरोना संक्रमण की जाँच मरीज़ के अंतिम स्टेज पर पहुंचकर ही हो पा रही है। मुझे आशंका है कि यह स्थिति कई और राज्यों में भी दिखाई दे सकती है। केंद्र सरकार को अभी से इसके लिए चेतना होगा और राज्यों को अधिक से अधिक टेस्टिंग किट उपलब्ध करानी पड़ेगी, वर्ना हालात बेकाबू होते देर नहीं लगेगी। हालांकि केंद्र सरकार यह दावा कर रही है कि अब बहुत ज़्यादा टेस्टिंग किट राज्यों को उपलब्ध करा रही है। दुआ करता हूँ कि यह दावा सही हो और लोगों की अधिक से अधिक जान बचाई जा सके।

हम सभी लोगों को सरकारों का साथ देना चाहिए, हमें लॉक डाउन का पालन सख्ती से करना पड़ेगा। एक बार में अगले 1-2 महीने का राशन लेकर रख लीजिए और उनका इस्तेमाल बेहद सावधानी से कीजिये। रोज़मर्रा की चीज़ें बाहर से लेना तुरंत बंद कर दीजिए, या फिर बहुत ज़्यादा एहतियात बरतिए।

जैसे कि दूध के पैकेट्स से दूध बर्तन में निकालकर फौरन ही पैकेट को सेफ जगह पर फेंककर तुरंत ही हाथों को अच्छी तरह से धोइये और उसके बाद ही किसी चीज़ को टच कीजिये। बाहर से रोज़-रोज़ ऐसी चीज़ों को लेना बंद कर दीजिये जिनके बिना काम चल सकता है।

जब तक यह बीमारी समाप्त नहीं हो जाती है, इलाज की व्यवस्था नहीं हो जाती है, तब तक बाहर निकलना बीमारी को दावत देना है। इसलिए लॉक डाउन का सख्ती से पालन कीजिये।

- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी

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अपने-पराए हर गलत को गलत कहिए

ना तो सारे मुसलमान जमाती होते हैं और ना ही हर जमाती को कोरोना हुआ है और ना ही जमाती जानबूझकर बीमार हुए हैं। जो गलती मैजमेंट से हुई हो उसकी सज़ा भी उनकी जगह बीमारों को नहीं दी जा सकती है, बल्कि बीमारों के साथ सहानुभूति होनी चाहिये। हालांकि जैसी गलती मरकज़ मैनजेमेंट से हुई, वैसी गलती कम हो या फिर ज़्यादा परंतु उस समय हर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में हो रही थी। लॉक डाउन होने तक हर जगह भीड़ जमा हो रही थी, धार्मिक ही नहीं सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रमों में भी...

मरकज़ मैनेजमेंट की बड़ी गलती थी कि एडवाइज़री के बावजूद हज़ारों लोग जुटते रहे। हालांकि लॉक डाउन के बाद जो लोग फंस गए थे, उसमें भी और उससे पहले भी प्रशासन को लिखित जानकारी के बावजूद, रोज़ाना रिपोर्ट लेने के बावजूद अगर लोग आना-जाना कर रहे थे, तो इसमें प्रशासन की भी उतनी ही गलती थी। दरअसल लॉक डाउन से पहले तक प्रशासन स्वयं इतना गंभीर नहीं था।

22 तारीख तक शाहीन बाग जैसे धरने चलते रहे, मध्य प्रदेश में सरकार गिरती-बनती रही, संसद का सत्र चलता रहा, बड़े-बड़े लोगों की शादियों होती रही, अंतिम संस्कार जैसे कार्यक्रमों में हज़ारों लोग जुटते रहे। सभी बड़े मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में भीड़ जुटती रही, कई जगह तो अभी भी भीड़ जुट रही है।

यह अवश्य है कि जमात से जुड़ा हर वह व्यक्ति व्यक्ति गुनहगार है, जिसने मेडिकल स्टॉफ अथवा प्रशासन के साथ दुर्व्यहार किया,  जबकि मेडिकल स्टाफ और प्रशासन इस समय अपनी जान की परवाह किये बिना कोरोना को हारने की लड़ाई में लगे हुए हैं। हालाँकि उनके साथ प्रशासन के वो लोग भी ज़िम्मेदार हैं जो जमात से जुड़े बाकी लोगों से क़्वारन्टाइन में गुनहगारों जैसा व्यवहार कर रहे हैं, जिसके चलते दिल्ली के सुल्तान पूरी में बने क़्वारन्टाइन सेंटर में टाइम से दवाई और खाना नहीं मिलने के कारण शुगर पेशेंट 2 लोगों की मौत तक हो गई।

सलेक्टिव होकर दूसरों के किसी एक को या एक की वजह से हर एक जो दोष देने की जगह हर गलती को गलत कहिए और अगर अपनों को गलत नहीं कह सकते हैं तो आपको दूसरों पर बोलने का भी कोई अधिकार नहीं है।

मरकज़ भी एक मस्जिद ही है तो अगर मरकज़ में भीड़ जुटने को मैं गलत कह रहा हूँ तो आप बड़े-बड़े मंदिरों और गुरुद्वारों इत्यादि धार्मिक स्थलों में भीड़ जुटने का विरोध कीजिये और हम सब को मिलकर इन सभी धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम आयोजित करने वालों पर सख्त कार्यवाही की मांग करनी चाहिए, इनकी हठधर्मिता और स्वयं को सर्वोच्च समझने की सोच इंसानियत के लिए नुकसानदेह है।

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