कहते हैं ना… अगर आप दुनिया में कुछ बदलना चाहते हैं, तो किसी और के इंतज़ार में मत बैठिए… ख़ुद पहल कीजिए। फिर एक दिन दुनिया आपको सलाम करने के लिए मजबूर हो जाएगी। ❤️
मध्य प्रदेश के ब्यावरा के 20 वर्षीय सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही’ के नाम से जाना जाता है, ने शायद इसी बात को सच कर दिखाया है।
अजनार नदी प्लास्टिक, कचरे और गंदगी से बुरी तरह जूझ रही थी। बिट्टू ने शिकायत करने के बजाय ख़ुद नदी में उतरकर सफाई शुरू कर दी। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने जनवरी 2026 से यह अभियान शुरू किया और कई महीनों तक अपने स्तर पर नदी से कचरा निकालते रहे।
पहले लोगों ने उनके काम को सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए आलोचना भी की… लेकिन शायद उन्हें फर्क नहीं पड़ा।
और फिर वही सोशल मीडिया उनके काम को दुनिया तक ले गया।
मार्च में उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी बिट्टू के काम की तारीफ़ की थी।
लेकिन अब जो हुआ, वो वाकई कमाल है…
‘द ओशन क्लीनअप’ के संस्थापक और CEO बोयान स्लैट ने बिट्टू के काम पर प्रतिक्रिया देते हुए सीधे लिखा— “Come work for us.”
यानी जिस लड़के ने अपने शहर की नदी साफ करने से शुरुआत की, उसे अब दुनिया की सबसे चर्चित समुद्री प्लास्टिक सफाई मुहिम में काम करने का मौका मिल सकता है।
सोचिए…
एक तरफ़ हम अक्सर कहते हैं कि सरकार कुछ नहीं करती, सिस्टम कुछ नहीं करता…
और दूसरी तरफ़ एक 20 साल का लड़का बिना इंतज़ार किए नदी में उतर जाता है।
हाँ, नदी की सफाई की पूरी ज़िम्मेदारी किसी एक युवक के कंधों पर नहीं होनी चाहिए। इसके लिए प्रशासन और सिस्टम की भी ज़िम्मेदारी है।
लेकिन बिट्टू तबाही की कहानी एक बात ज़रूर सिखाती है—
बदलाव के लिए हमेशा भीड़ की ज़रूरत नहीं होती… कभी-कभी एक इंसान की नीयत ही काफी होती है। ❤️
अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर ने हाल ही में कहा कि भारत के मुसलमान जेनोसाइड की आठवीं स्टेज पर पहुंच चुके हैं। अगर हालात सचमुच इतने गंभीर हैं, तो सवाल यह है कि हमारी बड़ी-बड़ी क़ौमी तंज़ीमें आखिर किस दिन के इंतज़ार में हैं?
जब बुलडोज़र घरों से आगे बढ़कर मस्जिदों तक पहुंच चुका है, तो यह समझ लेना चाहिए कि आग सिर्फ़ दूसरों के दरवाज़े तक नहीं रुकेगी। आज अगर किसी और की बारी है, तो कल किसी और की होगी। इसलिए जो लोग खुद को क़ौम का रहनुमा और ठेकेदार समझते हैं, उनके पास अभी भी मौका है कि वे मुसलमानों की आवाज़ बनें। अगर नहीं, तो अपने दड़बों में बैठे रहिए और अपने नंबर का इंतज़ार कीजिए।
पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों ने बहुत कुछ देखा है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुईं, बुलडोज़रों ने घरों और दुकानों को निशाना बनाया। फिर अचानक मस्जिदों और दरगाहों के नीचे मंदिर होने के दावों की बाढ़ आ गई। और अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बुलडोज़र सीधे मस्जिदों की तरफ़ मुड़ गया है।
दो साल के भीतर बुलडोज़र कार्रवाइयों ने देशभर में लाखों लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित किया है। रिपोर्टों के मुताबिक़ इस दौरान 1.5 लाख से ज़्यादा घर ढहा दिए गए, जिसके कारण लगभग 7.38 लाख लोग बेघर होने पर मजबूर हुए। मानवाधिकार संगठन HLRN के आंकड़े बताते हैं कि दंडात्मक विध्वंस से जुड़े मामलों में सबसे ज़्यादा असर मुसलमानों पर पड़ा, और करीब 44 प्रतिशत मामलों में वे सबसे अधिक प्रभावित समुदाय के रूप में सामने आए।
लगभग हर हफ्ते किसी न किसी शहर से खबर आती है कि चौड़ीकरण, सौंदर्यीकरण या अवैध कब्ज़े के नाम पर किसी मस्जिद को गिरा दिया गया, किसी इबादतगाह को मलबे में बदल दिया गया। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा।
जब बुलडोज़र कार्रवाई के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई शुरू हुई, तब कुछ संगठनों ने अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश भी जारी किए। लेकिन ज़मीनी स्तर पर आज भी ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जिनमें लोग खुद को असुरक्षित और बेबस महसूस कर रहे हैं।
सबसे अफ़सोसनाक बात यह है कि आम मुसलमान परेशान है, डरा हुआ है, अपने भविष्य को लेकर फिक्र में है। दूसरी तरफ़ राजनीतिक दलों की ख़ामोशी और सोशल मीडिया की बयानबाज़ी से आगे बहुत कम कुछ दिखाई देता है।
यह मसला सिर्फ़ राजनीति का नहीं रह गया है। बहुत से लोगों को यह डर सताने लगा है कि कहीं उनकी पहचान, उनकी विरासत और उनके वजूद पर ही सवाल खड़े न किए जा रहे हों।
ऐसे वक़्त में ज़रूरत सिर्फ़ शिकायत करने की नहीं, बल्कि जागने की है। ज़रूरत है कि मुसलमान अपने हक़ और अपने संविधानिक अधिकारों के लिए संगठित हों, कानूनी और लोकतांत्रिक रास्तों पर मज़बूती से खड़े हों, और उन लोगों से जवाब मांगें जो सालों से उनकी नुमाइंदगी का दावा करते आए हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज निवासी मंसूर अहमद को कथित तौर पर 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने माना कि किसी नागरिक की व्यक्तिगत आज़ादी के साथ इस तरह का व्यवहार संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि मंसूर अहमद को 2 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए। साथ ही अदालत ने कहा कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद यह रकम प्रयागराज के तत्कालीन एसीपी (बारा) से वसूली जा सकती है। अदालत ने पुलिस कमिश्नर, प्रयागराज को आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी दाखिल करने को कहा है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कानून का मकसद लोगों की आज़ादी की रक्षा करना है, न कि उन्हें बिना पर्याप्त कानूनी आधार के हिरासत में रखना। अदालत ने पुलिस के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें हिरासत को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी।
कभी-कभी एक फैसला सिर्फ एक शख्स को इंसाफ़ नहीं देता, बल्कि पूरे सिस्टम को आईना दिखा देता है। प्रयागराज के मंसूर अहमद का मामला भी कुछ ऐसा ही है।
आठ दिन… पूरे आठ दिन एक इंसान अपनी आज़ादी से महरूम रहा। अगर किसी की गलती साबित नहीं हुई, अगर कानून के मुताबिक उसकी हिरासत जायज़ नहीं थी, तो फिर उसकी ज़िंदगी के वो आठ दिन कौन लौटाएगा? उन्होंने और उनके परिवार ने जो झेला, समाज में जो तिरस्कार हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी दर्द को महसूस करते हुए यूपी सरकार को मंसूर अहमद को 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया। अदालत ने साफ संदेश दिया कि अगर किसी अफसर की लापरवाही या गलत कार्रवाई से किसी नागरिक की आज़ादी छीनी जाती है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होगी।
यह फैसला सिर्फ मंसूर अहमद की जीत नहीं, बल्कि उस उसूल की जीत है जो कहता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। चाहे आम आदमी हो या सरकारी अफसर, हर किसी को संविधान और कानून की हदों में रहकर काम करना होगा। इंसाफ़ देर से मिला, लेकिन अदालत ने यह बता दिया कि किसी बेगुनाह की आज़ादी की कीमत शून्य नहीं होती।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ पर आखिरकार गाज गिर ही गई… सोचिए मोदी सरकार कितना डरती है अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों से, ख़ासतौर पर GenZ यानी युवाओं से…
CJP का X (ट्विटर) अकाउंट भारत में सस्पेंड कर दिया गया है। कहीं डर ये तो नहीं कि मज़ाक-मज़ाक में शुरू हुई ये आवाज़, GenZ का बड़ा आंदोलन न बन जाए…?
सोशल मीडिया पर तूफान की तरह वायरल हुई इस सैटायरिकल ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP का अकाउंट भारत में “Withheld” कर दिया गया।
पार्टी से जुड़े अभिजीत दीप्के ने खुद इसका स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें लिखा था कि @CJP2029 अकाउंट को “in response to a legal demand” कहकर भारत में रोक दिया गया है।
अभिजीत ने पोस्ट करते हुए लिखा —
“जैसा उम्मीद था, Cockroach Janta Party का अकाउंट इंडिया में withheld कर दिया गया…”
बस फिर क्या था…
कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई।
लोग पूछने लगे —
क्या अब व्यंग्य से भी डर लगने लगा है?
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शुरुआत में सिर्फ एक मज़ाक थी, लेकिन देखते ही देखते ये इंटरनेट की सबसे दिलचस्प आवाज़ बन गई।
सिर्फ 6 दिनों में इसके इंस्टाग्राम पर 11.3 मिलियन फॉलोअर्स हो गए।
महुआ मोइत्रा, कीर्ति आज़ाद से लेकर दिया मिर्जा, अनुराग कश्यप, कोंकणा सेन शर्मा, उर्फी जावेद, कुणाल कामरा, हिमांशी खुराना जैसे कई बड़े नाम इस ट्रेंड से जुड़ गए।
असल में ये पूरा आंदोलन उस बयान के बाद शुरू हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत द्वारा कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने की बात वायरल हुई।
जिस शब्द को ताने की तरह इस्तेमाल किया गया… उसी को GenZ ने अपनी पहचान बना लिया।
अब इंस्टाग्राम रील्स और मीम पेजों पर युवा मज़ाक में कह रहे हैं —
“हाँ, मैं कॉकरोच हूँ…”
और फिर अपनी बेरोजगारी, आलस, ओवरथिंकिंग और हमेशा ऑनलाइन रहने वाली जिंदगी को हँसते-हँसते बयान कर रहे हैं।
लेकिन इस हँसी के पीछे एक चुभन भी है।
सिस्टम से नाराज़गी…
भविष्य को लेकर डर…
और अनसुना कर दिए जाने का दर्द…
CJP के मेनिफेस्टो में भी सिर्फ मीम नहीं, कई गंभीर मांगें हैं —
रिटायर जजों को राज्यसभा सीट जैसा कोई लाभ नहीं मिले,
महिलाओं को 50% आरक्षण मिले,
दल-बदल करने वाले नेताओं पर 20 साल का बैन लगे,
और छात्रों से री-चेकिंग के नाम पर फीस न वसूली जाए।
इस पार्टी की “मेंबरशिप” भी अपने आप में एक तंज है —
अगर आप बेरोजगार हैं, आलसी हैं, और ज़रूरत से ज़्यादा ऑनलाइन रहते हैं… तो आप इसके “योग्य सदस्य” हैं।
कॉकरोच इसके लिए सिर्फ एक कीड़ा नहीं, बल्कि एक प्रतीक है।
एक ऐसे सिस्टम का प्रतीक…
जो लोगों के मुताबिक इतना सड़ चुका है कि अब युवा सड़कों और सोशल मीडिया पर उतरकर व्यंग्य में अपनी बात कह रहे हैं।
अब X अकाउंट पर रोक लगने के बाद सोशल मीडिया पर सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
हालांकि अब तक सरकार या X की तरफ से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है।
लेकिन एक बात साफ है —
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ सिर्फ एक मीम नहीं रही… ये उस पीढ़ी की आवाज़ बनती जा रही है,
ये हैं विनोद और उनकी पत्नी निधि। कॉलोनी में लोग इन दोनों को एक आदर्श couple माना करते थे। औरतें अक्सर कहती थीं, “पति हो तो विनोद जैसा…” और मर्द कहते थे, “बीवी हो तो निधि जैसी…” 💖
विनोद अपनी पत्नी को सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि अपना सुकून मानते थे। उनके लिए निधि ही उनकी पूरी दुनिया थी। वहीं निधि भी एक जिम्मेदार पत्नी, मां और बहू थी। घर हमेशा खुशियों से भरा रहता था और देखने वालों को लगता था कि इस परिवार के पास हर खुशी मौजूद है। लेकिन कहते हैं ना… कई बार सबसे खूबसूरत दिखने वाले रिश्तों के पीछे सबसे खतरनाक राज छुपे होते हैं ⚠️
हरियाणा के Panipat में रहने वाले विनोद बराड़ा एक computer training center चलाते थे। वो सिर्फ पैसे कमाने वाले इंसान नहीं थे, बल्कि गरीब बच्चों को free में training भी देते थे और जरूरतमंदों के लिए भंडारे भी करवाते थे, इसी वजह से इलाके में उनकी बहुत इज्जत थी। लोग उन्हें नेक दिल इंसान मानते थे।
लेकिन 21 October 2021 का दिन उनकी जिंदगी में ऐसा तूफान लेकर आया जिसने सब कुछ बदल दिया। विनोद अपने center के बाहर बैठे थे, तभी एक तेज रफ्तार truck ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी! 😨
हादसा इतना भयानक था कि लोगों को लगा शायद वो बच नहीं पाएंगे। घंटों operation चला, दोनों पैरों की हड्डियाँ टूट चुकी थीं। कुछ दिनों बाद doctors ने उन्हें discharge तो कर दिया, लेकिन महीनों तक bed rest बताया गया।
घर आने के बाद निधि उनका खूब ख्याल रखती थी। पूरा परिवार यही उम्मीद कर रहा था कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। उधर truck driver दीपक उर्फ Dev बार-बार यही कह रहा था कि ये accident जानबूझकर नहीं हुआ, truck का brake fail हो गया था। Police ने उसे arrest किया, लेकिन कुछ ही समय में उसे bail मिल गई। फिर आया 15 December 2021… वो दिन जिसने बराड़ा परिवार को पूरी तरह बर्बाद कर दिया! 😢
उस दिन निधि kitchen में खाना बना रही थी और विनोद अपने कमरे में आराम कर रहे थे। तभी main gate खुला होने का फायदा उठाकर एक आदमी हाथ में gun लेकर घर के अंदर घुस गया। वो सीधे विनोद के कमरे में गया, अंदर से दरवाजा बंद किया और ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं।
गोलियों की आवाज सुनकर निधि भागती हुई दरवाजे तक पहुँची, लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था। वो घबराकर बाहर मोहल्ले वालों को बुलाने लगी। लोग दौड़कर अंदर आए और दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने लगे। तभी वो आदमी gun लहराते हुए बाहर निकला, लेकिन गुस्साए लोगों ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया। Police तुरंत पहुँची और विनोद को hospital ले जाया गया, लेकिन doctors ने उन्हें मृत घोषित कर दिया! 💔
Police investigation में पता चला कि गोली चलाने वाला truck driver दीपक ही था।
पूछताछ में उसने कहा कि विनोद केस वापस नहीं ले रहे थे, इसलिए गुस्से में उसने ये सब कर दिया। लेकिन विनोद के माता-पिता को उसकी बात पर भरोसा नहीं हुआ। उन्हें लग रहा था कि इस कहानी में कुछ छुपा हुआ है। फिर साल 2024 में इस case की जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारी Ajit Singh Shekhawat के हाथ में आई। तभी विनोद के छोटे भाई प्रमोद का Australia से message आया — “मुझे लगता है दीपक अकेला नहीं है… घर का कोई अपना भी इसमें शामिल है।”
इसके बाद Police ने secret investigation शुरू की। Deepak की call details और bank accounts खंगाले गए तो बार-बार एक ही नाम सामने आने लगा — Sumit।
लगातार calls, पैसों का लेन-देन… सब कुछ उसी तक जाकर रुक रहा था। फिर police ने Sumit की पूरी details निकालीं और उसके बाद जो नाम सामने आया, उसे सुनकर पुलिस भी हैरान रह गई, वो नाम था — निधि बराड़ा… यानी विनोद की अपनी पत्नी।
जब police ने निधि को बुलाकर CCTV footage, call records और bank details सामने रखीं, तो आखिरकार वो टूट गई और उसने सारा सच कबूल कर लिया।
निधि ने बताया कि 2021 में उसने gym join किया था, जहाँ उसकी मुलाकात trainer Sumit से हुई। धीरे-धीरे दोनों करीब आए और फिर रिश्ता प्यार में बदल गया। जब विनोद को इस बारे में पता चला, तो घर में झगड़े शुरू हो गए। इसके बाद निधि और Sumit ने फैसला किया कि अगर उन्हें साथ रहना है, तो विनोद को रास्ते से हटाना होगा। सबसे पहले truck accident करवाया गया, लेकिन विनोद बच गए। फिर दो महीने बाद उसी दीपक से गोली चलवाकर उनकी हत्या करवा दी गई! 😢
सोचिए… जिस इंसान ने अपनी पत्नी को अपनी दुनिया माना, जिसे वो अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, उसी ने कुछ महीनों के रिश्ते के लिए उसे हमेशा के लिए मौत के हवाले कर दिया। आज निधि और Sumit दोनों जेल में हैं। लेकिन इस कहानी ने एक सवाल सबके दिल में छोड़ दिया — क्या कुछ पलों का प्यार किसी की पूरी जिंदगी और भरोसे से ज्यादा कीमती हो सकता है? 💭
कभी-कभी एक खबर सिर्फ खबर नहीं होती… वो एक मां की टूटती दुनिया होती है, एक घर की बुझती रोशनी होती है… और एक सवाल बनकर रह जाती है—आख़िर इंसाफ कब मिलेगा?
दिल्ली के त्रिलोकपुरी से आई ये खबर दिल को झकझोर देती है। 16 साल का मासूम अयान सैफी
… एक ऐसा बच्चा, जो अभी जिंदगी को समझ ही रहा था, सपने देख रहा था… अचानक इस दुनिया से छीन लिया गया।
बताया जा रहा है कि अयान अपने इलाके के पास मौजूद पार्क में था, जब कुछ लोगों ने उसे घेर लिया। वो लोग सिर्फ झगड़ा करने नहीं आए थे… उनके हाथों में चाकू थे, और इरादे बहुत खतरनाक। अयान को दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से चाकुओं से गोदा गया।
उसकी मां के लिए वो सिर्फ बेटा नहीं था… उसकी पूरी दुनिया था। “मेरा एक ही बच्चा था…” — ये कहते हुए मां की आवाज़ कांप जाती है। वो रोते-रोते बस एक ही बात कह रही है— मुझे इंसाफ चाहिए… मेरे बेटे के कातिलों को सज़ा चाहिए।
पर इस कहानी में दर्द सिर्फ इतना ही नहीं है… परिवार का आरोप है कि अयान को पहले से धमकियां मिल रही थीं। उसे मुल्ला, मुसल्ला, कटुवा कहकर बुलाया जाता था, डराया-धमकाया जाता था… लेकिन पुलिस में शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। काश अगर सुनवाई हो जाती तो आज एक माँ की दुनिया नहीं उजड़ी होती।
परिवार का कहना है कि ये सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश थी। कई लोगों ने मिलकर उसे घेरा, हमला किया… और फिर सब कुछ खत्म कर दिया।
मीडिया से बातचीत में परिवार ने बताया कि अयान पर हमला करने वाले लड़के नहीं थे, बल्कि लंबे-चौड़े, कम से कम 30-35 साल के आदमी थे। अयान की माँ का कहना है कि मेरा बच्चा तो बस 16 साल का था। जब वह अपने एक दोस्त के साथ पार्क में खेल रहा था, तो कम से कम 8-10 लोगों ने उसे घेर लिया। उसने कभी किसी का कुछ बुरा नहीं किया था. वे उसे मुझसे छीन ले गए.
सबसे बड़ा सवाल यहीं खड़ा होता है—
अगर पहले ही सुनवाई हो जाती… अगर समय पर कदम उठाया जाता… तो आज अयान जिंदा होता!
अब पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है, आरोपियों की तलाश जारी है… लेकिन एक मां के लिए ये सब काफी नहीं है। उसके लिए तो उसकी दुनिया पहले ही खत्म हो चुकी है।
आख़िर में एक सवाल:
जब तक इंसाफ मिलेगा… क्या तब तक उस मां का दर्द कम हो पाएगा?
या ये भी एक और कहानी बनकर रह जाएगी… जिसे कुछ दिनों बाद हम सब भूल जाएंगे?
दिल्ली की गलियों में एक ऐसा सच दफन था, जिसे वक्त भी मिटा नहीं पाया। साल था 1995… एक 13 साल का बच्चा, जो रोज़ की तरह स्कूल के लिए निकला… लेकिन उस दिन वो घर वापस नहीं लौटा। घरवालों की बेचैनी, मां-बाप की आंखों में डर… और फिर एक फोन—“30 हजार दो, वरना बेटे को भूल जाओ…”
लेकिन ये कहानी सिर्फ अपहरण तक नहीं रुकी… कुछ ही वक्त बाद उस मासूम की लाश एक नाले से मिली… और परिवार की दुनिया हमेशा के लिए उजड़ गई।
जांच शुरू हुई… और शक गया उसी शख्स पर, जो बच्चे को मार्शल आर्ट सिखाता था—एक भरोसे का चेहरा। पूछताछ हुई… और सच सामने आया—पैसों के लालच में उस मासूम की जान ले ली गई। कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई… लगा कि इंसाफ हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
साल 2000 में उसे जमानत मिली… और फिर वो गायब हो गया—ऐसे जैसे कभी था ही नहीं।
इसके बाद शुरू हुआ एक लंबा खेल—पहचान बदलने का, सच्चाई से भागने का।
उसने खुद को “मरा हुआ” तक घोषित कर दिया… नाम बदला… शहर बदले… और आखिरकार एक नई जिंदगी बना ली—गाजियाबाद में दुकान, सोशल मीडिया पर पहचान, और एक नया चेहरा—यूट्यूबर सलीम वास्तिक। उसने सोचा था कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ आग उगलेगा, इस्लाम के ख़िलाफ़ झूठ बोलेगा, घटिया तरीक़े से मज़ाक़ उड़ाएगा तो नफ़रत की घुट्टी में पले हुए कुछ लोग उसे हीरो बनाएँगे और वो अपने जुर्म को छुपा लेगा।
लोग उसके झूठ को सुनते थे… फॉलो करते थे… कोई नहीं जानता था कि कैमरे के पीछे खड़ा इंसान यह सब अपने खून से सने हाथों को छुपाने के लिए कर रहा है…
कहानी में मोड़ तब आया जब फरवरी 2026 में उस पर जानलेवा हमला हुआ… गला काटने की कोशिश… कई वार… वो बच तो गया, लेकिन यहीं से उसके अतीत के दरवाज़े खुलने लगे। उसकी गलीच असलियत सबके सामने लाने के लिए उसके रब ने उसे ज़िंदा रखा…
पुलिस को शक हुआ… पुराने रिकॉर्ड निकाले गए… फिंगरप्रिंट मैच हुए… और फिर जो सच सामने आया, उसने सबको हिला दिया—
👉 असल में 31 साल पुराना कातिल निकला…
आखिरकार पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया… और अब वो तिहाड़ जेल में है—अपनी उसी सजा को काटने के लिए, जिससे वो सालों भागता रहा।
ये कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं है…
ये कहानी है उस दर्द की, जो एक परिवार ने 31 साल तक सहा…
ये कहानी है उस सच्चाई की, जो देर से सही, लेकिन सामने आ ही जाती है…
और ये एक सवाल भी छोड़ जाती है—
👉 क्या हम सच में किसी को जानते हैं… या फिर इमोशनल बेवकूफ बनाए जाने पर इमोशंस में बहकर सिर्फ उसके दिखाए हुए नक़ली चेहरे को ही सच मान लेते हैं?
अमरावती का एक साधारण सा फ्लैट… लेकिन उसके पीछे छुपा ऐसा काला सच, जिसने पूरे शहर को हिला कर रख दिया…
महाराष्ट्र के अमरावती के कटोरा नाका इलाके में स्थित कमल रेजिडेंसी का एक फ्लैट इस वक्त एक बड़े सेक्स स्कैंडल की जांच का केंद्र बना हुआ है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखने वाला ये फ्लैट अंदर ही अंदर एक संगठित अपराध का हिस्सा बन चुका था।
जांच में सामने आया है कि इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी अयान खान है। पुलिस के मुताबिक, उसने और उसके साथियों ने मिलकर लड़कियों को फंसाने और उनका शोषण करने का काम किया। इतना ही नहीं, इस पूरी वारदात के वीडियो बनाकर उन्हें वायरल करने का भी आरोप है। हालाँकि एक पहलू यह भी है कि यह सिर्फ पुलिस की थ्योरी है, जिसकी अभी जांच पूरी नहीं हुई है और किसी पीड़िता ने भी सामने आकर सच सामने नहीं रखा है, पर जो आरोप हैं वो बेहद गंभीर हैं।
इस केस में फ्लैट उपलब्ध कराने वाला आरोपी मानव सुगंदे, जो वर्धा से पढ़ाई के लिए परतवाड़ा आया था, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस अधीक्षक के अनुसार अब तक कुल 8 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है—जिनमें एक ने फ्लैट देकर मदद की, जबकि 6 आरोपी वीडियो वायरल करने में शामिल बताए जा रहे हैं। आरोप के मुताबिक आरोपी युवकों में से एक ने कुछ पैसे मांगे थे और नहीं मिलने पर वीडियोज टेलीग्राम चैनल पर शेयर कर दिए।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से 5 मोबाइल फोन, 1 लैपटॉप और 1 टैबलेट जब्त किए हैं, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। अब तक 18 आपत्तिजनक वीडियो और 39 फोटो बरामद किए जा चुके हैं, जिससे इस पूरे नेटवर्क की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि पुलिस के मुताबिक उस ने 8 पीड़ित लड़कियों की पहचान कर ली है, लेकिन अभी तक किसी ने भी आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। यही वजह है कि जांच एजेंसियों के सामने सच्चाई तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब महिला एवं बाल कल्याण समिति और अल्पसंख्यक आयोग ने भी दखल दिया है। उनके प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की, साथ ही थाने पहुंचकर मामले की जानकारी ली और आरोपियों से पूछताछ भी की।
सूत्रों के अनुसार, कोशिश की जा रही है कि पीड़ित लड़कियां सामने आकर शिकायत दर्ज कराएं, लेकिन अब तक कोई भी आगे नहीं आई है। वहीं पुलिस अधीक्षक विशाल आनंद ने लोगों से अपील की है कि अफवाहों पर ध्यान न दें और जांच में सहयोग करें, ताकि सच्चाई जल्द सामने आ सके।
ये सिर्फ एक केस नहीं… ये समाज के उस डरावने सच की झलक है, जहां खामोशी ही सबसे बड़ी दीवार बन जाती है।
सवाल ये है—क्या हम सच को सामने लाने में साथ देंगे, या फिर ये सन्नाटा ऐसे ही बना रहेगा?
दोस्तों, अगर आपका अपना परिवार आपकी मुहब्बत की वजह से आपकी जान लेने का फ़ैसला कर ले…
तो उसे क्या कहंगे? इज़्ज़त? सम्मान? या फिर सीधी-सीधी इंसानियत की हत्या?
आज हम एक ऐसी ही सच्ची घटना पर डिस्कशन करने जा रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद ज़िले में हुई, और जिसने पूरी इंसानियत का सर शर्म से झुका दिया है।
यह मामला है मुरादाबाद ज़िले के उमरी सब्ज़ीपुर गाँव का।
यहाँ रहने वाली एक लड़की जो कि हिंदू समुदाय से थी और एक लड़का जो कि मुस्लिम समाज से आता था, बहुत वक्त से एक-दूसरे को जानते थे। पसंद करते थे। दोनों बालिग थे। दोनों समझदार थे।
और दोनों ने तय किया था कि वे शादी करके एक साथ ज़िंदगी बिताएँगे। लेकिन उनकी यह मुहब्बत कुछ लोगों को नागवार गुज़री।
लड़की का परिवार, ख़ासकर उसके भाई, इस रिश्ते के सख़्त खिलाफ़ थे। उन्होंने कई बार लड़की पर दबाव बनाया, धमकियाँ दीं, और कहा गया कि “यह रिश्ता हमारे समाज की इज़्ज़त के ख़िलाफ़ है।”
लेकिन जब लड़की और लड़के ने अपना फ़ैसला बदलने से इनकार कर दिया, तो मामला बहस से आगे बढ़ गया।
पुलिस जांच के मुताबिक, लड़की के परिवार के कुछ लोगों ने दोनों को बहाने से एक जगह बुलाया। वहाँ उन्हें बंधक बनाया गया, उनके साथ मारपीट की गई, और फिर बेरहमी से दोनों का क़त्ल कर दिया गया।
क़त्ल के बाद, इस जघन्य अपराध को छुपाने के लिए उनके शवों को गाँव के बाहर एक सुनसान जगह पर दफ़ना दिया गया।
कुछ दिनों तक दोनों के बारे में कोई खबर नहीं थी।लेकिन जब मामला सामने आया, तो पुलिस ने जांच की, शव बरामद हुए, और इस तरह सच्चाई सबके सामने आ गई।
पुलिस के अनुसार, यह हत्या लड़की के सगे भाइयों द्वारा की गई, और इसे ऑनर किलिंग यानी सम्मान के नाम पर हत्या के रूप में दर्ज किया गया।
दोस्तों, हमें यहाँ रुककर सोचना चाहिए।
क्या वाकई यह “सम्मान” था? बताइए ज़रा…
किस क़ानून में लिखा है कि प्यार करना अपराध है?किस धर्म में लिखा है कि इंसान की जान ले ली जाए? किस समाज में यह तय किया गया कि परिवार ही ख़ुदा बन जाएगा?
यह कोई सम्मान नहीं था। यह था — डर, नफ़रत और समाज से मिलने वाले तानों से उपजा हुआ ग़ुस्सा। जिसे मुहब्बत की कुर्बानी देकर शांत किया गया।
और सवाल यह है कि क्या अब वो सम्मान बच गया होगा? सवाल यह है कि हमारा क़ानून क्या कहता है?
भारत का संविधान साफ़ कहता है — कि हर बालिग नागरिक अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला खुद ले सकता है। धर्म, जाति या समाज के नाम पर किसी की हत्या सीधा मर्डर है। ऑनर किलिंग कोई अलग परंपरा नहीं, बल्कि एक जघन्य अपराध है।
दोस्तों, सबसे डरावनी बात यह नहीं है कि हत्या हुई।उससे भी डरावनी बात यह है कि आज भी बहुत से लोग कहते हैं कि — “गलत तो किया… लेकिन समाज में तो ऐसा ही होता है।”
याद रखिए, जब हम “ऐसा ही होता है” कह देते हैं, उसी दिन हम अगली हत्या को जायज़ बना देते हैं।
असल इज़्ज़त इसमें नहीं है कि लोग क्या कहेंगे।दुनिया के लोग तो किसी भी हालत में नहीं छोड़ते हैं, पर अगर कोई सख्त ज़रूरत पड़ जाए तो कोई काम भी नहीं आता है
असल इज़्ज़त इसमें है कि आपका बच्चा ज़िंदा है, महफ़ूज़ है और ख़ुश है। असल इज़्ज़त इसमें है कि आप इंसान बने रहें, क़ातिल नहीं।
किसी इंसान के क़त्ल की इजाज़त हमें कोई धर्म कभी नहीं दे सकता है।
आपका बच्चा आपकी इज़्ज़त नहीं है, आपकी ज़िम्मेदारी है।
हालाँकि मैं यह हमेशा से कहता आया हूँ कि अलग-अलग धर्म के मानने वाले लड़के और लड़की में से दोनों या कोई एक भी अगर धार्मिक है तो उन्हें शादी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ऐसे मामलों में शादी के बाद बहुत ज़्यादा कॉम्प्लीकेशन्स होती हैं, बल्कि प्रोब्लम्स इतनी ज़्यादा बढ़ जाती हैं कि साथ में रहना भी एक अज़ाब बन जाता है।
ऐसे में दोनों में से कोई एक अगर अपना धर्म बदलता है तो यह तो उल्टा अपनी आस्था का मज़ाक उड़ाना होता है, क्योंकि धर्म सिर्फ और सिर्फ आस्था बदलने पर ही बदला जा सकता है। डर, लालच या प्रेम की वजह से धर्म बदलने का नाटक तो हो सकता है, पर आस्था हरगिज़ नहीं बदल सकती है।
पर अगर दोनों ने फैसला कर ही लिया तो फिर ऐसे में उनके परिवार वाले भी रोककर क्या हासिल कर लेंगे? अगर आप उनके फैसले से सहमत नहीं हैं तो आने वाली कम्प्लीकेशन पर उनके साथ डिस्कशन करिये, हम बस इतना ही कर सकते हैं। इसके बाद हमारा काम खत्म।
अगर वो फिर भी नहीं माने तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिये।
उनकी ख़ुशी के लिए दुआ कीजिये, क्योंकि वो आपकी संतान हैं, बहन या भाई हैं। उन्हें अपनी ज़िन्दगी जीने का उतना ही हक़ है, जितना आपको या दुनिया के किसी भी इंसान को है!
दोस्तों, उमरी की यह घटना सिर्फ़ दो लोगों की मौत नहीं है। यह हमारे समाज की सोच पर एक काला धब्बा है।
जैसा कि दिल्ली में अंकित सक्सेना की हत्या से लगा था।
अगर आज भी हमने यूँ बेगुनाहों को क़त्ल होते देखा और चुप रहे, तो कल हमारी चुप्पी किसी और की कब्र खोदेगी।
अगर आप इस सोच के खिलाफ़ हैं, तो आवाज़ उठाइये, चुप्पी मत अपनाइए।
अच्छा एक बात बताओ, मुसलमान चार-चार शादियां और इतने ज़्यादा बच्चे क्यों पैदा करते हैं? देश की जनसंख्या बढ़ा रखी है…
यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है, दरअसल राजनीतिक गिद्ध चंद वोटों के लिए झूठ का सहारा लेकर धार्मिक नफरत फैलाते हैं इमोशन भड़काने के लिए फैलाया जाता है कि मुस्लिम समाज में बहुत ज्यादा तलाक होती हैं चार-चार शादियां की जाती हैं या फिर यह कि मुस्लिम बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। ऐसा वह लोग भी कहते हैं जो खुद पांच-छह भाई बहन हैं।
हाल के दिनों में मुस्लिम प्रजनन दर अर्थात फर्टिलिटी रेट के बारे में जानबूझकर झूठ फैलाया गया है. ऐसा नैरेटिव सेट करने की कोशिश की गई है कि जैसे मुसलमान छह सात बच्चे पैदा करते हैं। आइए, आज इसी मुद्दे को समझने के लिए फैक्ट चेक करते हैं।
अगर हम भारत सरकार के ऑफिशियल आंकड़ों की बात करें तो भारत में मुस्लिम प्रजनन दर 1992 में 4.4 थी जो कि 2019 में गिरकर 2.4 हो गई। वहीं हिंदू प्रजनन दर जो कि 1992 में 3.3 थी वह 2019 में गिरकर 1.9 हो गई। अगर सरकार के इस आंकड़े को देखेंगे तो हमें पता चलता है कि जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ा है प्रजनन दर में उतनी ही तेजी से गिरावट आई। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि जितनी तेजी से मुस्लिम समाज में गिरावट आई है उतनी तेजी से गिरावट किसी और समाज में नहीं आई है।
अगर आसान भाषा में कहे तो इसका मतलब है कि भारत में सभी समुदायों की प्रजनन दर तकरीबन 2 के आसपास है मतलब 2 लोग यानी पति-पत्नी के द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या 2 के आसपास है और इसका मतलब है कि फ्यूचर में जल्दी ही ऐसा वक्त आने वाला है जबकि देश की जनसंख्या बढ़ने की जगह घटने लग जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर समुदाय में शिक्षा का स्तर बड़ा है हालांकि राजनीतिक हल्कों में इसके उलट जनसंख्या तेजी से बढ़ने का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है। आप शिक्षा के असर का इससे अंदाजा लगाइए कि हमारे यहां शहरों में प्रजनन दर 1.6 रह गई है जबकि गांवों में यह दर 2.1 है।
अगर राज्यों की बात करें तो यह दर बिहार में तीन है जबकि मेघालय में 2.9 है यूपी में 2.4 है झारखंड में 2.3 और मणिपुर में 2.2 है। मतलब यह हुआ कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की प्रजनन दर मुस्लिम समुदाय के प्रजनन दर से ज्यादा या बराबर है।
अगर हम सामुदायिक ऐतबार से बात करें तो हिंदू समुदाय की प्रजनन दर जो कि 1.9 है वह बौद्ध समुदाय की 1.4 जैन समुदाय की 1.6 और सिख समुदाय की 1.6 से ज्यादा है। तो फिर सोचिए क्या इन समुदाय के लोगों को हिंदू समुदाय की प्रजनन दर अपने ज्यादा होने के खिलाफ झंडा उठाना चाहिए? नहीं ना?
आपने कभी इन समुदाय के लोगों को हिंदू समुदाय के लोगों से यह शिकायत करते हुए देखा है कि आपकी प्रजनन दर यानी फर्टिलिटी रेट हमसे ज्यादा क्यों है? ऐसा इसलिए देखने में नहीं आता है क्योंकि ऐसा करने से राजनीतिक फायदा मिलने की संभावना नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि मामला राजनीतिक फायदा उठाने का ज्यादा है।
ज्यादा जनसंख्या के बहुत सारे नुकसान हैं हालांकि इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि ज्यादा जनसंख्या हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत भी है। 90 के दशक के ग्लोबलाइजेशन के बाद हमारे देश के लोगों की परचेसिंग पावर बढ़ने से हमारी यह ताकत भी कई गुना बढ़ना शुरू हो गई थी। यही वजह है कि हमारा देश दुनिया के अमेरिका चाइना और यूरोपियन कंट्रीज के लिए एक बड़े बाजार जैसा है और यही वह वजह है कि आज कोई भी बड़ा देश हमारी नाराजगी मोल नहीं ले सकता है, ज़रूरत मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को खड़ा करने की है, जो कि हाल के सालों में बहुत डिक्लाइन हुई है।
आंकड़ों से यह समझ में आता है कि जन्मदर का ताल्लुक शिक्षा के स्तर से होता है। पर बेशर्मी यह है कि सरकार इसके हल मतलब शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर मंथन करने की जगह इसे भी नफरत का हथियार बनाती हैं। जबकि इसकी जगह यह होना चाहिए था कि ज्यादा से ज्यादा और विश्व स्तरीय स्कूल और सरकारी कॉलेज खोले जाएं।
आप अपने परिवार और आसपास देखकर हमें कमेंट में बताइए कि क्या 12वीं क्लास में पास होने वाले सभी बच्चों का सरकारी कॉलेज या यूनिवर्सिटीज में एडमिशन हो जाता है। इसी एक टेस्ट से आपको पता चल जाएगा कि सरकारें मसलों को हल करने के लिए कोशिश करती हैं या फिर उसकी जगह वोट पाने के लिए जनता को इमोशनल बेवकूफ बनाती हैं। अगर ज्यादा कॉलेजेस होंगे तो एडमिशन के लिए मारामारी नहीं होगी हालांकि यह सरकार का कर्तव्य है कि हर पास होने वाले बच्चे का हायर स्टडी के लिए एडमिशन होना सुनिश्चित किया जाए। क्योंकि पढ़ेगा इंडिया तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया।
बहुत सारे स्टूडेंट अच्छे मार्क्स से पास हो रहे हैं, खूब दिल लगाकर पढ़ाई करना और इम्तेहान में अच्छे मार्क्स से पास होना ज़रूरी तो है, पर जिस तरह से अच्छी सरकारी शिक्षण संस्थाओं में कमी आयी है, या यह कहा जाए कि जिस तरह से माध्यम और गरीब वर्ग के बच्चे अब शिक्षा का महत्व समझकर पढ़ाई कर रहे हैं, उसके मुक़ाबले सरकारी शिक्षण सास्थाएँ बहुत कम बनाई गई हैं। जिसकी वजह से उच्च शिक्षण संस्थानों में एडमिशन लेने के लिए स्टूडेंट्स के ऊपर ज़्यादा से ज़्यादा मार्क्स लाना मजबूरी बन गया है।
यही वजह ही कि मुझे ज़्यादा मार्क्स लाने वाले स्टूडेंट्स के साथ ख़ुशी से ज़्यादा सहानुभूति होने लगी है।
स्टूडेंट्स पढ़ाई में मेहनत सीखने की जगह ज़्यादा मार्क्स लाने के लिये करते हैं, चैप्टर्स को समझने और रिसर्च करने की जगह रट्टा मारा जाता है, जिससे कि बस फ़ौरी तौर पर अच्छे से अच्छे मार्क्स लाकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए एडमिशन मिल सके।
यह कंपीटिशन बच्चों के अंदर ऐसा प्रेशर भरता है कि वो अंदर से कमज़ोर होते चले जाते हैं। अक्सर बच्चे इस प्रेशर को सहन नहीं कर पाते हैं और बीच में ही जीवन से हार जाते हैं और बाक़ी स्टूडेंट्स उस मानसिक कमज़ोरी को ज़िंदगी भर झेलते रहते हैं।
माध्यम और गरीब वर्ग के पैरेंट्स के लिए तो अपने बच्चों को कमज़ोर आर्थिक स्थिति से बाहर निकलने का यही रास्ता बचता है, क्योंकि वो अपने बच्चों का एडमिशन प्राइवेट संस्थाओं मे करा ही नहीं सकते हैं।
हमारे देश में सरकारें अच्छे सरकारी शिक्षण संस्थान इसलिए नहीं बना रही हैं कि अगर माध्यम और गरीब वर्ग के बच्चे भी पढ़ लिख गये तो फिर अमीर वर्ग के बच्चों का क्या होगा? क्योंकि फिर उच्च स्तरीय नौकरियों पर बड़ी तादाद में पास हुए गरीब तबके के बच्चे अपना दावा पेश करेंगे।
हर साल 20 लाख से ज़्यादा बच्चे NEET की परीक्षा में बैठते हैं और मात्र 50 हज़ार के आसपास ही MBBS की सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। यही हाल JEE जैसी दूसरी परीक्षाओं का भी है।
पर सब राजनैतिक पार्टियाँ मस्त हैं, क्योंकि उन्हें वोट धार्मिक नफ़रत की राजनीति और इस राजनीति का विरोध करने से मिल ही रहे हैं। वोट डालने वालों को अपने बच्चों के मुस्तक़बिल की कोई परवाह ही नहीं है तो किसी और को भी क्यों ही हो?
हम आमतौर पर अपने बच्चों पर प्रेशर डालकर काम करवाना चाहते हैं, जैसे कि पिटाई का डर दिखाकर, नाकामयाबी का डर दिखाकर, गरीबी का डर दिखाकर... जबकि इंसान प्रेशर में जबरदस्ती काम तो कर लेता है, पर उसका दिमाग प्रेशर को बहुत देर तक झेल नहीं पाता है।
कुछ बच्चों का दिमाग इतना मजबूत नहीं होता है और धीरे-धीरे उनकी प्रेशर झेलने की क्षमता खत्म होती चली जाती है। ऐसे ही बच्चे, बचपन में या फिर बड़े होने के बाद भी नाकामयाबी के डर से ख़ुद को नुकसान तक पहुंचा देते हैं।
आजकल की कंपनियां भी अपनी एम्पलाईज को मोटिवेट करने की जगह प्रेशर में झोंक कर काम करवाती हैं, खासतौर पर सेल्स टारगेट वाली कंपनियां तो इंसानी जिंदगी के लिए नासूर की तरह हैं!
जबकि होना यह चाहिए कि जो हम करवाना चाहते हैं, हर बार उन्हें वो करने के लिए मोटिवेट करें, लॉजिक से समझाएं, कि फलां काम क्यों ज़रूरी है और उसके होने या नहीं होने के क्या फायदे और क्या नुकसान हैं। उन्हें नाकामयाबी से डराएं नहीं, बल्कि सिर्फ मार्गदर्शन करके उनके ऊपर छोड़ दें, उन्हें खुद से फेल या पास होने दें। और फेल होने पर समझाएं कि यही ज़िंदगी है, फेल होने का भी लुत्फ उठाओ और जिन वजहों फेल हुए हो, उनके ऊपर गौर करो।
वो अगर बार-बार भी फेल होते हैं, तब भी उन्हें मोटिवेट करना हैं। क्योंकि इससे उनके अंदर जो समझ पैदा होगी, हार का डर खत्म होगा, वो उन्हें स्थाई तौर पर मज़बूत और कामयाब बनाएगा।
यही काम सफलता पर भी करना है, सफलता इंसान को अपनी कमियों को देखने से रोकती है, जो कि लॉन्ग टर्म पर और भी ज़्यादा नुकसानदेह है।
मतलब फेलियर और सफलता दोनों इंसान के लिए उसके रब की तरफ से अवसर हैं!
इमोशनली बेवकूफ लोग चलते फिरते बारूद की तरह हैं, कोई भी कभी भी इनके ज़रिए किसी का भी कत्ल करवा सकता है, दंगा भड़का सकता है।
हमारे देश में ऐसे लोगों गोमांस या फिर धर्मविरोध के नाम पर मॉब लिंचिंग करते पाए जाते हैं। ठीक ऐसे ही पाकिस्तान में भी गली गली में ऐसे बारूद के ढेर घूम रहे हैं। बस उन्हे यह कहकर इमोशनल बेवकूफ बनाना होता है कि फलां ने अल्लाह या फिर अल्लाह के रसूल (स.) की शान में गुस्ताखी की है।
फिर इमोशंस भड़कने पर शैतान बने यह लोग ना तो कोई फैक्ट्स चेक करते हैं, ना उन्हे किसी प्रूफ की ज़रूरत होती है और ना ही किसी अदालत में जुर्म साबित करना होता है। सज़ा भी थोड़ी बहुत नहीं, बल्कि शैतानों की भीड़ खुद ही सज़ा देते हुए सीधे लिंचिग कर देती है।
पिछले दिनों पाकिस्तान से ऐसी ही एक दिल दुखाने वाली खबर आई थी, उमेरकोट के रहने वाले डॉ शाहनवाज खानबर के फेसबुक अकाउंट से एक पोस्ट हुई, जिसमे उनके ऊपर पैगंबर मुहम्मद (स.) की बेहुरमती करने का आरोप लगा। भीड़ इनके घर पहुंच गई, वह उस समय शहर में भी नही थे। इन्होंने कहा कि उनका फोन हैक हुआ है, पुलिस जांच कर ले, मैं जांच के लिए तैयार हूं।
पर ख़ुद पुलिस ने ही उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार डाला और इसके बाद वहां के कट्टर मज़हबी पार्टी वालो ने उनकी लाश तक को जला डाला।
यह सिर्फ एक उदाहरण है, पर ऐसा वहां भी आए दिन होता रहता है। पाकिस्तान की आर्थिक और दिमागी बदहाली की ज़िम्मेदारी इन इमोशनल बेवकूफ कट्टरपंथियों पर भी आती है।
उनकी इस बदहाली के बावजूद इस तरफ वाले इमोशनल बेवकूफ उनसे खूब रेस लगा रहे हैं!
भारत में मुस्लिम प्रजनन दर 1992 में 4.4 थी जो कि 2019 में गिरकर 2.4 हो गई। वहीं हिन्दू प्रजनन दर जो कि 1992 में 3.3 थी वो 2019 में गिरकर 1.9 हो गई है। अगर सरकार के इस आंकड़ें को देंखेंगे तो मुस्लिम प्रजनन दर में जितनी तेज़ी से गिरावट आई है, उतनी किसी और समाज में नहीं आई है।
अभी सभी समुदायों की प्रजनन दर तक़रीबन 2 के आसपास है। जिसका अर्थ है 2 लोगों (पति-पत्नि) के द्वारा जन्म दिए बच्चों की संख्या 2 के आसपास है और इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्दी ही ऐसा समय आने वाला जबकि देश की जनसख्या बढ़ने की जगह घटने लग जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर समुदाय में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। आप शिक्षा के असर का इससे अंदाज़ा लगाइये कि शहरों में प्रजनन दर 1.6 रह गई है, जबकि गांवों में यह 2.1 प्रतिशत है। अगर राज्यों की बात करें तो बिहार 3, मेघालय में 2.9, यूपी में 2.4, झारखंड 2.3 और मणिपुर में 2.2 है।
और अगर देखा जाए तो हिन्दू समुदाय की प्रजनन दर (1.9), बौद्ध (1.4), जैन (1.6) और सिख (1.6) समुदाय से ज़्यादा है तो क्या इन समुदायों को हिन्दू समुदाय के विरुद्ध झंडा उठाना चाहिए?
जन्मदर का ताल्लुक शिक्षा के स्तर से होता है, पर बेशर्मी यह है कि भाजपा इसके हल अर्थात शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर मंथन करने की जगह इसे भी नफरत का हथियार बनाती है।
यह बेहद फख्र की बात है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। मतलब देश के हर हिस्से में किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती की नहीं बल्कि जनता की मर्ज़ी से चुनी हुई सरकार प्रशासक का काम करती है। देश के किसी भी हिस्से में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, वो उस हिस्से के हर नागरिक की सरकार होती है। और हर नागरिक का यह फ़र्ज़ है कि नीचा दिखाने की नीयत की जगह सुधार की नीयत से कमियों को सामने लाए। जो कि किसी भी सरकार के पक्ष की ही बात है, क्योंकि जब तक कमिंयाँ सामने नहीं आएंगी, तब तक सुधार कैसे होगा? ऐसे ही देश की हर सरकार को जनता के हर सवाल का जवाब देना चाहिए, जहाँ सरकार की गलती है उसे ठीक करने की कोशिश होनी चाहिए और जहाँ जनता के तथ्य गलत हैं, वहाँ असली तस्वीर सामने रखनी चाहिए।
लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि अगर सरकार जनता के हित में सुधार करती है तो ठीक है, वरना अगले चुनाव में हिसाब कर लिया जाता है। हालांकि लोकतंत्र का असल मक़सद तभी कामयाब होगा जबकि देश में पूर्णत: साक्षरता होगी। तभी देश का हर नागरिक अपने वोट की कीमत समझ पाएगा, धार्मिक, जातीय, आर्थिक प्रलोभनों या फिर भावनाएँ भड़काने वालो के बहकावे में आए बिना अपने भविष्य के लिए वोट करके सक्षम सरकार बनाने में योगदान दे पाएगा।
देश को वापिस विश्वगुरु बनाना है तो देश की जनता में इतनी जागरूकता होना ज़रूरी है। विश्व ने पूंजीवादी और साम्यवादी दोनो तरह के मॉडल फेल हो चुके हैं। विश्व अब किसी नई व्यवस्था की तलाश में है और आज पूरा विश्व हमारी ओर देख रहा है। देश मे विश्व को नई व्यवस्था देने की पूरी काबिलियत मौजूद है। माँ भारती के बेटे-बेटीयाँ मिलकर विश्व को एक ऐसी व्यवस्था दे सकते हैं जो मनुष्य को विकास की एक अलग परिभाषा सीखा सकती है। जिसमें विश्व के हर जीव ही नहीं बल्कि प्रकृति के भी उद्धार की संभावनाएं हों। जो अमीर-गरीब, काले-गोरे, धर्म-जाती के भेदभाव को समाप्त करके सारी मनुष्य जाति को समकक्ष ला सकती है। और ऐसी व्यवस्था बनाने में लोकतंत्र का हमारा मॉडल कामयाब भूमिका बना सकता है, बशर्ते कि हम इसे सही तरह से लागू कर पाएं, अर्थात लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका के प्रति जागरूकता ला पाएं।
विश्व की व्यवस्थाओं के ध्वस्त होने का कारण उनके अंदर का कट्टरपन है। हर व्यवस्था सिर्फ अपने को ही सर्वोपरि समझती और दूसरे को कुचलती आई है। जबकि छोटी-मोटी कमियों के बावजूद भी भारतीय संस्कृति में कट्टरता का स्थान कभी नहीं रहा, हम हमेशा ही दूसरे विचारों को सम्मान देते और अपनाते आए हैं, और कारण रहा कि यहाँ कट्टरता की हर कोशिश समय-समय पर हारती आई है। हम कट्टरता की जगह सबको साथ लेकर चलने वाले अर्थात वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले लोग हैं, यही हमारी संस्कृति की सच्चाई है।
एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण होगा जहाँ अमीर-गरीब का भेद इतना ज़्यादा ना हो कि अमीर बेहद अमीर हों और गरीब को जीना दूभर हो जाए। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि धरती पर जो भी बच्चा पैदा हुआ है उसे दूसरे बच्चों के बराबर ही आगे बढ़ने का मौक़ा मिले। हमारे देश में प्राकृतिक संसाधन पुरे विश्व से ज़्यादा हैं और इसीलिए हमें ऐसी व्यवस्था बनाई होगी जो प्रकृति की रक्षा करती हो और प्रकृति का फायदा बिना अमीरी-गरीबी के भेदभाव के हर उस बच्चे को मिल सके जो आगे बढ़ने की योग्यता रखता हो।
पूरे विश्व को इस तरह की एक नई व्यवस्था देने के सारे गुण हमारे देश की संस्कृति और आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के समागम में मौजूद है, आवश्यकता उनमें आई कमियों को दूर करने भर की हैं। जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि लोकतंत्र के मॉडल में आई कमियों को दूर करने के लिए और साथ ही साथ समाज में फैलने शुरू हुए कट्टरपंथ के वायरस को दूर करने के लिए जागरूकता की आवश्यकता है। अगर हम इसमें कामयाबी पा लेते हैं तो नई राह बनाई जा सकती है और विश्व पटल पर एक नया मॉडल पेश किया जा सकता है। कामयाबी अवश्य प्राप्त होगी, पर सामूहिक प्रयास करना होगा, ऐसी कोशिशें अब देश के हर समाज और हर वर्ग को मिलकर करनी होगी।
जय हिंद
We can show a new path to the world through the combination of our rich Indian culture and strong democracy.
ना तो सारे मुसलमान जमाती होते हैं और ना ही हर जमाती को कोरोना हुआ है और ना ही जमाती जानबूझकर बीमार हुए हैं। जो गलती मैजमेंट से हुई हो उसकी सज़ा भी उनकी जगह बीमारों को नहीं दी जा सकती है, बल्कि बीमारों के साथ सहानुभूति होनी चाहिये। हालांकि जैसी गलती मरकज़ मैनजेमेंट से हुई, वैसी गलती कम हो या फिर ज़्यादा परंतु उस समय हर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में हो रही थी। लॉक डाउन होने तक हर जगह भीड़ जमा हो रही थी, धार्मिक ही नहीं सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रमों में भी...
मरकज़ मैनेजमेंट की बड़ी गलती थी कि एडवाइज़री के बावजूद हज़ारों लोग जुटते रहे। हालांकि लॉक डाउन के बाद जो लोग फंस गए थे, उसमें भी और उससे पहले भी प्रशासन को लिखित जानकारी के बावजूद, रोज़ाना रिपोर्ट लेने के बावजूद अगर लोग आना-जाना कर रहे थे, तो इसमें प्रशासन की भी उतनी ही गलती थी। दरअसल लॉक डाउन से पहले तक प्रशासन स्वयं इतना गंभीर नहीं था।
22 तारीख तक शाहीन बाग जैसे धरने चलते रहे, मध्य प्रदेश में सरकार गिरती-बनती रही, संसद का सत्र चलता रहा, बड़े-बड़े लोगों की शादियों होती रही, अंतिम संस्कार जैसे कार्यक्रमों में हज़ारों लोग जुटते रहे। सभी बड़े मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में भीड़ जुटती रही, कई जगह तो अभी भी भीड़ जुट रही है।
यह अवश्य है कि जमात से जुड़ा हर वह व्यक्ति व्यक्ति गुनहगार है, जिसने मेडिकल स्टॉफ अथवा प्रशासन के साथ दुर्व्यहार किया, जबकि मेडिकल स्टाफ और प्रशासन इस समय अपनी जान की परवाह किये बिना कोरोना को हारने की लड़ाई में लगे हुए हैं। हालाँकि उनके साथ प्रशासन के वो लोग भी ज़िम्मेदार हैं जो जमात से जुड़े बाकी लोगों से क़्वारन्टाइन में गुनहगारों जैसा व्यवहार कर रहे हैं, जिसके चलते दिल्ली के सुल्तान पूरी में बने क़्वारन्टाइन सेंटर में टाइम से दवाई और खाना नहीं मिलने के कारण शुगर पेशेंट 2 लोगों की मौत तक हो गई।
सलेक्टिव होकर दूसरों के किसी एक को या एक की वजह से हर एक जो दोष देने की जगह हर गलती को गलत कहिए और अगर अपनों को गलत नहीं कह सकते हैं तो आपको दूसरों पर बोलने का भी कोई अधिकार नहीं है।
मरकज़ भी एक मस्जिद ही है तो अगर मरकज़ में भीड़ जुटने को मैं गलत कह रहा हूँ तो आप बड़े-बड़े मंदिरों और गुरुद्वारों इत्यादि धार्मिक स्थलों में भीड़ जुटने का विरोध कीजिये और हम सब को मिलकर इन सभी धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम आयोजित करने वालों पर सख्त कार्यवाही की मांग करनी चाहिए, इनकी हठधर्मिता और स्वयं को सर्वोच्च समझने की सोच इंसानियत के लिए नुकसानदेह है।
दिल्ली की केजरीवाल सरकार के लिए कोई भी विचार बनाने से पहले हमारे लिए यह जानना अति आवश्यक है कि दिल्ली सरकार के पास प्रशासनिक अधिकार नहीं है। दिल्ली में सर्विस मैटर मोदी सरकार ने 2014 में ही नोटिफिकेशन लाकर LG के अधीन कर दिया था, मतलब दिल्ली सरकार के किसी भी अधिकारी/कर्मचारी की रिपोर्टिंग दिल्ली सरकार को नहीं है बल्कि LG को है। दिल्ली सरकार के अधीन आने वाला कोई भी अधिकारी/कर्मचारी अगर अपने दायित्वों को नहीं निभाता है, कामचोरी या गलत तरीके से काम करता है, रिश्वतखोरी में लीन होता है तो दिल्ली सरकार उसके ऊपर कोई एक्शन नहीं ले सकती है, सिर्फ कार्यवाही के लिए शिकायत ही कर सकती है। उनकी जाँच तक के अधिकार LG को दे दिए गए थे। जिसके लिए दिल्ली सरकार अदालतों में लड़ रही है, फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट की तीन जज की बेंच में है।
शुरू में अरविंद केजरीवाल इस व्यवस्था के विरुद्ध लड़ता था, तब यह कहते थे कि केजरीवाल लड़ता बहुत है इसलिए दिल्ली वालों के काम नहीं हो रहे हैं। हालाँकि देर से ही सही पर केजरीवाल लड़-झगड़कर और कानूनी बाध्यताओं में बांधकर काम करवा लेता था। फिर जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के अधिकारों पर केजरीवाल सरकार के पक्ष में निर्णय दिया, जिसने दिल्ली पुलिस, लॉ एंड ऑर्डर तथा लैड को छोड़कर बाकी अधिकार दिल्ली सरकार को दिए गए, जिससे LG राज कुछ हद तक खत्म हुआ, परंतु सर्विस मैटर पर मामला 2 जज की बेंच के सुपुर्द कर दिया गया।
फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट की 2 जज वाली बैंच में से एक ने कुुुह हद तक दिल्ली सरकार और दूसरे ने केंद्र के पक्ष में फैसला दिया और इस कारण मामला 3 जज की बड़ी बैंच को ट्रांसफर कर दिया, जिसका फैसला अभी तक नही आया है। यही कारण है कि केजरीवाल ने कामों को करवाने के लिए समन्वय के साथ नियमों की बाध्यताओं के सहारे और अधिक से अधिक काम करने की नीति अपनाई, तो अब यही लोग कहते हैं कि केजरीवाल बोलता नहीं है।
मैं भी मानता हूँ कि अब केजरीवाल कम बोलता है और केवल बेहद ज़रूरी मुद्दों पर ही आवाज़ उठाता है, क्योंकि राजनीति के इतने अनुभव के बाद समझ में आ गया है कि आज की परिस्थिति में कम बोलने और ज़्यादा करने से ही जनता के हित पॉसिबल हैं। इसलिए जो अधिकार क्षेत्र में है, उसमें ज़्यादा से ज़्यादा कोशिशें कर लिया जाना सबसे बेहतर तरीका है। और यही वजह है कि दिल्ली में इतने काम पॉसिबल हो पाए।
महिला अधिकारों के हनन के अनेक कारण हो सकते हैं, पर मेरे हिसाब से महिलाओं में शिक्षा तथा आर्थिक सशक्तिकरण की कमी इसके प्रमुख कारण हैं और इनसे भी बड़ा एक वजह है पौरुषीय दंभ। आइये इसी पर चर्चा करते हैं।
शिक्षा के साथ साथ महिलाओं के अधिकारों के दमन में आर्थिक सशक्तिकरण होना या नहीं होना भी एक महत्वपूर्ण कारक होता है। गरीब परिवारों में महिलाएं भी परिवार को चलाने के लिए उपलब्ध आय के स्रोतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर आप देखेंगे तो गरीब किसान परिवारों में महिलाएं फसलों की बुआई तथा कटाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, वहीं गरीब मज़दूर परिवारों में भी महिलाएँ मजदूरी करके परिवार चलाने में अपनी भूमिका निभाती हैं।
वहीं दूसरी तरफ आर्थिक तौर पर मज़बूत अर्थात अमीर परिवारों में भी महिलाएं आर्थिक तौर पर सशक्त होती हैं। और यही कारण है कि गरीब तथा अमीर परिवारों में महिला अधिकारों का दमन उतने बड़े रूप में नहीं होता जितना कि मध्य आय वर्ग में होता है। मध्य आय वर्ग ही वोह समूह है जहाँ महिलाओं के अधिकारों का सबसे ज़्यादा दमन होता है।
इसके अलावा हमारा सामाजिक तानाबाना भी महिला अधिकारों के दमन का जिम्मेदार होता है। एक लडकी अपने माता-पिता के घर मे पली-बढ़ी होती है, और एक कम्फर्ट लेवल का जीवन जी रही होती है, पर शादी के बाद उसे ऐसे घर मे जाना होता है, जिसके बारे में वोह ज़्यादा नहीं जानती। उसे वहाँ ऐसे परिवार के सदस्यों के साथ रहना होता है जो पहले से ही उस परिवार का हिस्सा होते हैं। ऐसे में नए घर के सदस्यों की सोच और नई बहु की सोच में बहुत बड़ा गैप आना स्वाभाविक है। नए परिवार में हर कोई दूसरों को अपने हिसाब से चलना चाहता है, यही घर के क्लेश की वजह भी बनती है और यहीं से महिला अधिकारों के दमनचक्र की शुरुआत भी हो सकती है।
आज समाज को इस व्यवस्था का हल ढूंढना होगा। ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद लड़की ही अपना घर छोड़कर लड़के के घर जाकर रहे? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि दोनों एक-दूसरे के घर-परिवार में जाकर रहने की जगह मिलकर एक तीसरा घर बसाएं। पर इस व्यवस्था में हमें लड़के और लड़की के बुजुर्ग माता-पाता के भरण-पोषण और बुढ़ापे में ज़रूरी केयर कैसे मिले, इसके ऊपर भी विचार करना पड़ेगा।
कट्टरता से नफ़रत, नफ़रत से हिंसा और हिंसा से बर्बादी आती है!
किसी समुदाय के नाम, पहनावे या चेहरे-मोहरे को देखकर या फिर गौमाँस जैसे इल्जाम पर कट्टरपंथी तत्व लोगों को खुलेआम मार रहे हैं और ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं, जबकि उनसे कहीं बड़ी भीड़ उन बाज़ारों में या फिर ट्रेनों में मौजूद होती है। पर नफरत का आलम यह है कि वोह भीड़ चुप रहती है, बल्कि कई जगह तो कट्टरपंथियों में शामिल हो जाती है और मौके पर इतनी भारी भीड़ होने के बावजूदु पुलिस को गवाह तक नहीं मिलते...
पहले जब भी दंगे हुए और लोग मरे तब बचाने वाले और दंगाइयों का विरोध करने वाले खुलकर सामने आते थे, पर अब मौन समर्थन सामने आ रहा है। बल्कि विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहराया जा रहा है, भले ही वोह 10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति ही क्यों ना रहा हो।
क्या ऐसा होना किसी देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए चिंता का सबब नही है? और अगर चिंता व्यक्त की गई तो उसपर विचार करके हल खोजने की जगह नफरत भरी प्रतिक्रिया देना क्या खुद में उसी नफरत को साबित नहीं कर रहा है, जिस पर चिंता ज़ाहिर की जा रही है?
मैं अपने दोस्तों की सूचि में मौजूद लोगों में भी ऐसी नफरत को देख रहा हूँ। हालाँकि हैरान नहीं हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि कट्टरपंथी मुखर होते हैं और मासूम लोगों को बड़ी जल्दी अपनी ज़द में ले लेते हैं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुल्क इसका जीता-जागता उदहारण हैं!
दरअसल कट्टरपंथी सवाल से डरते हैं, यह कभी नहीं चाहते कि कोई उनके ऊपर उंगली उठाए, उनके फैसलों पर 'सवाल' करे। वोह जो करते हैं, हर हाल में उसे सबसे मनवाना चाहते हैं, सो अब सवाल करने वाला देशद्रोही है। कट्टरपंथी हमेशा से ही सवाल और सवाल पूछने वालों से नफरत करते आए हैं, क्योंकि इनके पास सवालों के जवाब नहीं होते और ना ही जवाब देने की सलाहियत, केवल कुतर्क होते हैं। आप ईरान पर सवाल करेंगे तो यह तूरान का ज़िक्र छेड़ेंगे...
इन नफ़रत पालने वालों को
कहां परवाह है सत्य की
उन्हें बस नफरत है,
कुछ नामों से,
कुछ चेहरों से,
कुछ लिबासों से,
और अपने ख़िलाफ़
उठती हुई आवाज़ों से...
कट्टरता हमारे मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेती है, जिससे हम विपरीत विचारधारा की तार्किक बातों को भी नहीं देख पाते। इंसानियत के दुश्मनों से सख़्ती से निपटने के लिए देश को एकजुट होना चाहिए, कट्टरपंथी किसी एक धर्म के नहीं होते, इसलिए हर तरफ के कट्टरपंथीयों के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी।
आम हिंदू आम मुस्लिम से नहीं लड़ता और ना ही आम मुस्लिम आम हिंदू से, यह कट्टरपंथी ही हैं जो राजनैतिक आकाओं के इशारों पर नफ़रतें फैलाते हैं। आज हमें यह समझना होगा कि समाज के अंदर फैली यह नफ़रतें हुई नहीं हैं बल्कि पैदा की गईं हैं, इसलिए मुक़ाबले के लिए साज़िशों को बेनक़ाब और मुहब्बतों की कोशिश करनी होंगी। सच्चाई यह है कि नफ़रत की राजनीति 'देशहित' की आड़ में 'देश हिट' कर रही है और इसका जवाब आपसी मौहब्बत और विश्वास है।
सहिष्णुता, नरमपंथ और मुहब्बत हमेशा से ही मेरे देश की ताकत रही है, इसलिए मैं उन्हें देशद्रोही मानता हूँ जो इसे नफ़रत में बदलना चाहते हैं। सत्ता के लिए नफ़रत की जो खेतियाँ बोई गईं उसकी फसल आज लहलहा रही है, इसलिए देश में हो रही सांप्रदायिक हत्याओं के ज़िम्मेदार वोह भी हैं जिन्होंने नफ़रत के कारोबारियों का समर्थन किया... यह आज की ज़रूरत है कि कट्टरपंथीयों से लड़ने के लिए नरमपंथियों को आगे आएं!
हालाँकि यह सच है कि हमारे देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी मौहब्बत में अब वोह पहले वाली बात नहीं रही, आपसी रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं... पर हम कोशिश करें, अपने बच्चों को सही सीख दें, मुहब्बत सिखाएं तो शायद फिर से बात बन सकती है... वर्ना नफरत की राजनीति तो अपना काम कर ही रही है!
और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि "जो लोग नफ़रत करते-करते ऊब गए हों वोह मुहब्बत करके देखें, खुशियाँ इसी में हैं!"
दया और न्याय का स्थान
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मुसलमानों के लिए यह ज़रूरी है कि वह जान और मान लें कि इस्लाम दया और न्याय
का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी
व्याख्या कर स...