जब भी तेरा ज़िक्र महफिल में हुआ
मिलने का दिल में बहाना आ गया
उसने जो देखा हमें बेसाख़्ता
मायूसी को मुस्कराना आ गया
आप क्यों बैठे हैं ऐसे ग़मज़दा
मिलने-जुलने का ज़माना आ गया
उसने जो महफ़िल में की गुस्ताखियाँ
हर इक को बातें बनाना आ गया
हम ज़रा सा नर्म लहज़ा क्या हुए
दुनिया को आँखे दिखाना आ गया
अभी तो सोलह भी पूरे ना हुए
आशिक़ों का दिल चुराना आ गया
-शाहनवाज़ 'साहिल'
फ़िलबदीह मुशायरा 042 में लिखी यह ग़ज़ल
मिलने का दिल में बहाना आ गया
उसने जो देखा हमें बेसाख़्ता
मायूसी को मुस्कराना आ गया
आप क्यों बैठे हैं ऐसे ग़मज़दा
मिलने-जुलने का ज़माना आ गया
उसने जो महफ़िल में की गुस्ताखियाँ
हर इक को बातें बनाना आ गया
हम ज़रा सा नर्म लहज़ा क्या हुए
दुनिया को आँखे दिखाना आ गया
अभी तो सोलह भी पूरे ना हुए
आशिक़ों का दिल चुराना आ गया
-शाहनवाज़ 'साहिल'
फ़िलबदीह मुशायरा 042 में लिखी यह ग़ज़ल











