सहनशीलता और असहनशीलता को हर जगह लागु किया जा सकता है, बात चाहे वृहत परिप्रेक्ष में हो अथवा घर की। अक्सर तलाक के कारण घर टूट जाते हैं, हालाँकि अल्लाह (ईश्वर) ने तलाक को एक बदतरीन कार्य बताया है और इसलिए इसका उपयोग आखिरी हल के तौर पर करना चाहिए। यह नहीं कि अगर पति-पत्नी में झगडा हो जाए तो फ़ौरन 3 बार तलाक दे दिया जाए। गुस्सा तो इस्लाम में हाराम करार दिया गया है, क्योंकि यह प्राकृतिक प्रक्रिया को पूरा नहीं होने देता। इसलिए एक-एक महिना करके 3 महीने मैं 3 बार तलाक दिया जाना उत्तम विधि है। जब हम गुस्से होने के बाद सो जाते हैं तो सुबह तक प्रकृति स्थिति को सामान्य बना देती है। अगर इस विधि को अपनाया जाए तो तलाक होगी ही नहीं।
सहनशीलता सारी कामयाबियों की कुंजी है, जब कोई व्यक्ति सहनशीलता धारण करता है तो सारी प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायता करना शुरू कर देती है। वहीँ असहनशीलता अर्थात बेसब्री स्थिति को सामान्य करने की प्राकृतिक प्रक्रिया को समाप्त कर देती है।
इसको समझने के लिए कुछ उदहारण लेते हैं। पहला उदहारण 610 AD का है जब मुहम्मद (स.) को खुदा (ईश्वर) की तरफ से ईशदूत बनाया गया, तो उन्होंने समझाया कि अगर कहीं आस्था में विरोधाभास के चलते उत्पन्न विरोधाभास में भी सहनशीलता का दामन थामे रखना चाहिए। एक ईश्वर की आराधना के लिए ईशदूत अब्राहम (अ.) द्वारा बनाया गए 'काबा शरीफ' में समय के साथ बदलाव आने से लोगो ने 360 मूर्तियाँ रख दी थी। लेकिन इस पर रसूल अल्लाह (मुहम्मद स.) भड़के नहीं बल्कि उन्होंने सब्र से काम लिया, दूसरी तरफ 1949 में बाबरी मस्जिद में 3 मूर्तियाँ रखे जाने से मुसलमान भड़क गए, पूरी दुनिया में हंगामा किया। कुरआन में आयत (श्लोक) उतरी कि (अर्थ की व्याख्या) "अपने आप को पाक करो", कुरआन ने यह नहीं कहा कि काबा को पाक करो, बल्कि कहा गया कि अपने आप को पाक करो। अब दोनों स्थितियों को तुलना करके देखिये, हमारे देश के मुसलमानों के हंगामे का परिणाम यह निकला कि आपस में ज़िद्द, तनाव, टकराव इतना बढ़ा, ज़िद्द की ऐसी राजनिति हुई कि बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी। रसूल अल्लाह ने मूर्तियों को कुछ भी नहीं किया, तो एक समय आया कि काबा शरीफ को लोगो ने स्वयं ही एक ईश्वर की उपासना के लिए पाक कर दिया। सब्र और बेसब्री का फर्क आप स्वयं देख सकते हैं।
जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ तो 1945 में अमेरिका ने जापान पर एटम बम गिरा दिया तो जापान को झुकना पड़ा। वहां एक जज़ीरा है ओकिनावा जो कि 1200 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है, उस पर अमेरिका ने कब्ज़ा कर लिया। अब जापान के दो लक्ष थे, एक था जापान का पुन:निर्माण और ओकिनावा की आजादी। इस पर उन्होंने सहनशीलता दिखाई, और शिक्षा के द्वारा अपने आप को मज़बूत करने के लिए 30 साल की शिक्षा की योजना बनाई और ओकिनावा को वैसे ही छोड़ दिया। 30 साल में जापान दुनिया की आर्थिक ताकत बन गया और अमेरिका ने स्वयं 1972 में ओकिनावा को वापिस जापान को दे दिया।
सद्दाम हुसैन ने असहनशीलता दिखाते हुए कुवैत पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया तब सारे मुस्लिम जगत ने उसका समर्थन किया, हालाँकि इस्लाम के एतबार से यह एक गलत कदम था। इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप अमेरिका सहित बहुत से देशो ने उस पर हमला कर दिया और अंत में सद्दाम हुसैन से मांग की गई की वह अपनी गद्दी छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीके से इराक की सरकार बनने दे। हालात के मुताबिक सद्दाम हुसैन को सहनशीलता दिखाते हुए अमेरिका की मांग को मान लेना चाहिए था। उसके पास 8 बड़े महल थे, अगर वह अपने महलों में बड़े-बड़े शिक्षण संसथान खोल देता तो वहां की जनता को कितना फायदा होता। साथ ही साथ उसके इस तरह के प्रयास के कारण लोग उसे चुनकर दोबारा इराक की सत्ता सौंप देते। लेकिन असहनशीलता दिखने का नुक्सान यह हुआ कि उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा, बाद में उसे फंसी की सजा हुई तथा इराक को भी कितना भरी नुक्सान उठाना पड़ा।
मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान को ऑनलाइन सुनने के लिए
http://www.cpsglobal.org/content/6th-june’2010-sunday-urdu-060510-1105pm पर चटका लगा कर सुनिए।
- शाहनवाज सिद्दीकी
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