व्यंग्य: सुपरपावर का ‘सरेंडर स्पेशल’!
नार्थ कोरिया चुनाव 2026: लोकतंत्र की “मास्टरक्लास”
आंकड़े देखिए और गर्व कीजिए:
• कुल वोटिंग: 99.9%
• विजेता उम्मीदवार: 100%
• विपक्ष: सर्चिंग… Not Found
• NOTA: “ये क्या होता है?” 🤔
कहते हैं लोकतंत्र में जनता अपने नेता चुनती है…
लेकिन यहाँ तो जनता का काम बस ये कन्फर्म करना है कि नेता वही है, जो पहले से है 😌
रिज़ल्ट का गणित भी बड़ा दिलचस्प है:
• 100% वोट एक ही उम्मीदवार को
• 0% असहमति
• 0% विवाद
• 0% एग्जिट पोल की ज़रूरत
इतना क्लियर रिज़ल्ट तो मैथ्स के एग्जाम में भी नहीं आता 😄
चुनाव आयोग ने भी बयान जारी किया:
“इस बार भी जनता ने पूरी आज़ादी के साथ वही फैसला लिया, जो उन्हें लेना था।”
मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें थीं,
लेकिन किसी को जल्दी नहीं थी… क्योंकि रिज़ल्ट तो पहले से ही “सेव” था
मीडिया कवरेज भी शानदार रही:
“देश की जनता ने एक बार फिर से ऐतिहासिक समर्थन दिया!”
(इतिहास हर बार वही रहता है, बस तारीख बदल जाती है)
विपक्ष ने भी शानदार प्रदर्शन किया:
उन्होंने चुनाव में हिस्सा लेकर माहौल को संतुलित रखा…
(हालाँकि उन्हें ढूंढने के लिए माइक्रोस्कोप चाहि)
सबसे बड़ी बात —
यहाँ हारने का कोई डर नहीं,
क्योंकि जीतने वाला पहले से तय है… और बाकी सब “भागीदारी” निभा रहे हैं।
अगर दुनिया के बाकी लोकतंत्रों में भी इतनी “स्थिरता” आ जाए,
तो एग्जिट पोल, डिबेट, और रिज़ल्ट वाले दिन का ड्रामा ही खत्म हो जाए 😄
निष्कर्ष:
नार्थ कोरिया ने फिर साबित कर दिया कि
“लोकतंत्र” सिर्फ एक व्यवस्था नहीं,
बल्कि एक फिक्स्ड डिपॉज़िट है — जहाँ रिज़ल्ट गारंटीड होता है 😌
#NorthKorea #ElectionSatire #Vyanga #PoliticalHumor #Democracy
'जान' बची तो लाखो पाए
वैलेंटाइन डे पर एक युवक को उसकी होने वाली प्रेमिका ने अपनी फोटो और फेविकोल की ट्यूब थमाते हुए सीने से चिपकाने का इशारा किया। युवक को गाने की नायिका के साक्षात् दर्शन होने लगे, उसने अतिउत्साहित होते हुए बोला कि नायिका के अंदाज़ में कहो तो कुछ बात बने। युवक के इस दुस्साहस पर युवती का उसको गुस्से से घूरना स्वाभाविक था। वोह भूल गया कि मृगनयनी को शेरनी बनते देर नहीं लगती है।
satire, valentine day, vyangya, critics
हरिभूमि: गरीब सांसदों को सस्ता भोजन
हमारे प्यारे देश भारत में एक जगह ऐसी भी हैं जहाँ गरीब लोगो के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन इसका मतलब घटिया नहीं बल्कि फर्स्ट क्लास भोजन और बेहद सस्ता। बस एक ही कमी है, ऐसा भोजन केवल एक ही केन्टीन में उपलब्ध है, और यह सुविधा केवल उस क्षेत्र के गरीबों के लिए ही है। यह ऐसे गरीब हैं जिनकी मासिक आय केवल अस्सी-नब्बे हज़ार रुपये है, यह और बात है कि साथ में भारी बोनस घोटालों के रूप में मिल जाता है। बोनस के मामले में पहले बहुत थोडा सा पैसा (केवल कुछ लाख या कुछ करोड़) ही मिलता था, लेकिन आजकल इसमें थोडा इजाफा हुआ है। अब यह कुछ हज़ार करोड़ तक पहुँच गया है, फिर भी गरीब हैं तो सरकार का दायित्व बनता है कि इनके लिए उचित दर पर भोजन की व्यवस्था की जाए! हमें अपनी सरकार को इस कार्य के लिए बधाई देनी चाहिए कि उसने कम से कम इन बेचारों के लिए तो यह बंदोबस्त कर ही दिया है। आखिर हमारी सरकार इतनी निकम्मी थोड़े ही है।गरीब सांसदों को सस्ता भोजन
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| (चित्र गूगल से साभार) |
अब इतनी उत्सुकता दिखा रहे हैं तो चलिए उनकी कैंटीन में भोजन की दरें आप को भी पढवा ही देते हैं.
1. चाय ----------- 1.00 रूपया
2. सूप ------------ 5.50 रुपये
3. दाल ----------- 1.50 रुपये
3. मील ----------- 2.00 रुपये
4. चपाती -------- 1.00 रूपया
5. डोसा ---------- 4.00 रुपये
6. वेज बिरयानी - 8.00 रुपये
7. फिश --------- 13.00 रुपये
हरिभूमि में: "निगम की चाल!"
लेकिन यहां भी डरने की कोई बात नहीं है, ऐसे फालतू लोगो की आवाज़ नक्कार खाने में तूती बजाने जैसी ही होती है।’
व्यंग्य - जैसे लोग वैसी बातें!
इसी कड़ी में मेरा व्यंग्य आज खबर इंडिया पर प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है:
जैसे लोग वैसी बातें!
दुनिया में लोग भी बड़े अजीब तरह के होते हैं, हमारे देश में अधिकतर लोग तो ऐसे मिलेंगे कि किसी विषय पर जानकारी हो या ना हो मगर अपनी राय देना परमोधर्म! सोचिए ज़रा एक सरकारी बाबू, जिसे अपने कार्यालय की फाईल के स्थान की जानकारी नहीं होती है, किसी पान की दुकान पर खड़े होकर क्रिकेट मैच का लुत्फ लेते समय राय देता है कि अगर फिल्डर गली में ख़ड़ा होता तो कैच ज़रूर लपक सकता था, पता नहीं कैप्टन कैसी कैप्टनशिप कर रहा है? जो लड़का कभी एक भी गर्ल को फ्रैंड नहीं बना पात वह हमेशा दूसरों को सलाह देता है कि फलां लड़की को मनाने के लिए केवल उसका ही आईडिया फिट बैठेगा! और तो और अक्सर लोगों में इस बात पर ही सर-फुटव्वल होता रहता है कि चुनाव में उसकी पसंद का उम्मीदवार ही जीतेगा। अगर किसी ने गलती से दो-चार शेयर ले डाले तो वह समझता है कि शेयर बाज़ार में उससे अधिक किसी को जानकारी हो ही नहीं सकती है।
अच्छा एक हुनर में तो हमारा पूरा देश ही माहिर है और वह है चिकित्सा! हर परिवार के अधेड़ और बुज़ूर्ग तो पहले ही डॉक्टर थे, लेकिन आजकल के चार जमात पास लोग भी पूरी निपुणता के साथ दवाईयों के बारे में सलाह देते नज़र आएंगे। एक बात तो बहुत चैकाने वाली है, सभी कहते मिलेंगे कि झाड़-फूक बाबा दूसरों को लूटने की दुकान चलाते हैं। लेकिन हर अवसर पर उन्हीं से सलाह लेने पहुंच जाएंगे और कहेंगे कि मेरे महान बाबा के जैसा तो पूरी दुनिया में कोई नहीं है। वहीं उन बाबा महोदय को दूसरे बाबा के भक्त दूनिया का सबसे भ्रष्ट बाबा साबित करने पर तुले नज़र आएंगे! इस सब में बच्चे भी किसी से पीछे नहीं है, (जब माहौल ही ऐसा है तो वह भी क्या करें)। परिक्षा के समय बेचारे किताबों से नहीं बल्कि अपने इष्ट देव से सहायता मांगते और उनको प्रसाद का प्रलोभन देते दिखाई देंगे, "हे ईश्वर! इस बार अच्छे नंबर दिलवा दो, सवा सात रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा!
एक मंत्री महोदय तो राय देने में महान निकले, राष्ट्रमंडल खेलों से पहले सीधे भगवान् को ही सलाह दे रहे थे कि उसको खेलों के बीच में तेज़ बारिश करनी चाहिए, तो वहीं एक टैक्सी चालक की राय थी कि खेल करवाना हमारी सरकार के बस का काम नहीं है। मतलब मंत्री जी को भगवान के और टैक्सी चालक को सरकार के कार्य में निपुणता हासिल होने का यकीन है? वैसे हमारा भारत है बहुत ही महान देश, जहां स्टेडियम की छत का एक टुकड़ा गिरने पर लोग अड़ जाते हैं कि पूरी छत गिरी है और इस बात पर भी शर्त लग जाती है, तो वहीं सट्टा इस बात पर लगता है कि बाढ़ आएगी या नहीं! और अगर आएगी तो कितने घर डूबंगे, कितने लोग मरेंगे? वैसे कुछ लोग तो खेलों की विफलता की प्रार्थना केवल इस लिए कर रहे थे कि सफलता का सेहरा कहीं सरकार को ना मिल जाए! क्या कह रहे हैं.....देश? अब देश का क्या है? उसकी चिंता कौन करे?
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- शाहनवाज़ सिद्दीकी
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यह दिल्ली को क्या हुआ?
अच्छा वैसे तो शहर में पुलिस नज़र आती ही नहीं है, ट्रैफिक पुलिस भी पेड़ के पीछे छुप कर शिकार करती है! लेकिन यहां का नज़ारा देखकर दिल घबराने लगा, चप्पे-चप्पे पर पुलिस देखकर पेट में घुड़घुड़ाहट होने लगी! कहीं फिर से शहर में कोई आतंकवादी हमला तो नहीं हो गया है? फिर दिमाग ने थोड़ी मेहनत करके सुझाया कि झगड़े होने का खतरा लगता है! "हंस क्यों रहे हो? कभी-कभी अपना दिमाग़ भी मेहनत कर लेता है यार! अब इसमें कोई कूडा़ थोड़े ही भरा है?" कूड़े से सड़क पर ध्यान गया और उछल कर सर ऑटो की छत पर जा लगा! यह क्या? कहीं दूर-दूर तक कूडे का नामोनिशान तक नहीं है। हमारा नगर निगम और इतनी सफाई! ऊपर से सड़क पर इतनी कम भीड़ कि चलने का मज़ा ही किरकिरा हो जाए! गाड़ियों के हार्न से मनोरंजन के इतने आदि हो चुके हैं कि संगीत की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती। लेकिन ना जाने क्यों शोर बिलकुल नहीं है? लाल बत्ती तक पर आज किसी को पहले भागने की जल्दी नहीं है। कितनी जिंदादिल थी दिल्ली? कुछ तो जोश में हरी बत्ती हुए बिना ही निकल जाते हैं, लेकिन लोगों में जोश गायब है, आज दिल्ली में कितना नीरसपन है? दिल्ली पहले कितनी हंसीन थी!
व्यंग्य: निगम की तर्ज़ पर सफाई
अपने एक मित्र के घर जाना हुआ, घर की साफ-सफाई देखकर दिल खुश हो गया। फोन पर बात करते हुए एक कोने में गया तो देखा परदे के पीछे कूड़ा भरा हुआ था। मतलब मेहमान की आमद पर कूड़े-करकट को छुपाया गया था। देखकर अहसास हुआ कि यह तो हमारे नगर निगम की नकल है! हमारी कॉलोनी में भी तो ठीक इसी तरह सफाई रहती है, लेकिन सड़क पर एक बड़ा सा बदबूदार कूड़ादान बनाया हुआ है। मज़े की बात तो यह है कि कूड़ा कू़ड़ेदान की जगह सड़क पर भरा रहता है। ज़रा सोचिए सड़क को खाली रखने के लिए क्या बेहतरीन योजना बनाई गई है। सड़क गंदी होगी तो लोग सड़क पर से गुज़रेंगे ही नहीं।- शाहनवाज़ सिद्दीकी
(दैनिक हरिभूमि के आज [20 सितम्बर] के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा व्यंग्य)
अहोभाग्य! बिजली गुल!
बिजली विभाग के बड़े उपकार है हम मर्दो पर। अगर बिजली गुल नही होती तो प्रेम के परवानों का क्या होता? प्रेमी तो इंतज़ार किया करते हैं कि बिजली भागे और मिलने का प्रोग्राम बने। सोचिए अपनी छत पर खड़े होकर अंधेरी रात में भी पड़ोसन को चुपचाप देखने का क्या मज़ा है? पड़ोसन चाहे कहीं ओर देख रही हो, लेकिन मजनू मिंया खुश! अंधेरा यह सुखद अहसास दिलाता रहता है कि नज़रे इनायत उस पर ही हैं। कुछ मामलों में तो बिजली गुल होना अमीरी-गरीबी की दिवारें तक मिटा देता है। अब कैंडल लाईट डिनर का मज़ा लेने का हक केवल अमीरो को ही क्यों हो? भला हो बिजली विभाग का जिनकी कृपा दृष्टि के कारण अमीरों का यह शौक गरीब भी पूरा कर लेते है।बीते दिनों में कौन नहीं लौटना चाहता? अब देखिए बिजली विभाग कितना खयाल रखता है लोगों की भावनाओं का! बिजली भागते ही हाथ के पंखे निकल आते हैं। वैसे भी बड़े कहते हैं कि पुराने दिन हमेंशा याद रखने चाहिए, इससे इन्सान, इन्सान बना रहता है। तो अब समझ में आया कि बिजली का गुल होना हमारे इन्सान बने रहने में कितना सहायक है? वैसे इन्सान ही क्या बिजली विभाग से तो भगवान भी खुश रहते होंगे! बिजली के समय भी कोई भक्ति होती है? भक्त बस कैसेट लगाकर सुनते रहते हैं, लेकिन बिजली गुल होने पर भक्तों को स्वयं भजन-कीर्तन करना पड़ता है! है ना बिजली गुल की भी अजीब ही लीला? प्रभु भी खुश और भक्त भी! आजकल सबसे अधिक परेशानी उत्पन्न होती है मोबाईल फोन से, इसने जीवन को बंधक बना दिया है। अब देखिए जब बिजली गुल हो जाती है तो यह चार्ज ही नहीं हो पाता है, मतलब जीवन चिंता मुक्त! प्रेमीयों की तो पौ बाराह हो जाती है, बातचीत से आराम मिला सो अलग ऊपर से जेब भी ढीली होने से बच गई!
वैसे गृहणियां भगवान से अपने पति की कामयाबी की प्रार्थना करे या ना करें लेकिन धारावाहिक के समय बिजली गुल नहीं होने की मन्नत अवश्य मांगती हैं। वैसे भी अगर काम के समय बिजली भाग भी जाए तो क्या होगा? हद से हद कार्यालय में कार्य बंद हो जाएंगे, कहीं जहाज़ नहीं उड़ पाएगा या कहीं रेल नहीं चल पाएगी, स्कूल में पढ़ाई बंद हो जाएगी अथवा व्यापार में घाटा हो जाएगा, इससे अधिक और क्या हो सकता है? यह भी कोई नुकसान हैं? गृहणियों की नज़रों में असल नुकसान तो किसी धारावाहिक के समय बिजली गुल होना है। उधर कोई मरा हुआ हीरो ज़िंदा हो जाएगा! दूसरी छोड़ो, तीसरी शादी भी हो जाएगी! सास बहु के अथवा बहु अपनी सास के खिलाफ साज़िश को अंजाम दे देगी तो कोई ननद अपनी भाभी को घर से निकलवा देगी और इधर बेचारी गृहणियों को खबर भी नहीं होगी!
"अब पता चला कि बिजली विभाग बिजली गुल करके मर्दो का कितना खयाल रखता है? बिजली गुल होती है तो लगता है कि पत्नी आज घर पर है वर्ना तो टीवी के चक्कर में बीवी का दीदार ही नामुमकिन है।"
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
(दैनिक हरिभूमि - 6 सितम्बर के संस्करण में प्रकाशित व्यंग्य)
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उफ्फ! यह ट्रैफिक!
हम गांव से दिल्ली के लिए स्कूटर लेकर निकल पड़े। माताजी ने समझाया कि बस से जाओ, लेकिन हमने सोचा कि स्कूटर से जाएंगे तो रौब पड़ेगा। बार्डर पहुंच कर जैसे ही प्रवेश की कोशिश की तो मामाजी ने रोक लिया। पेपर चेक करने के बाद भी जब कुछ नहीं मिला तो बोले, "क्या पहली बार दिल्ली आए हो?" हमने गर्व से कहा "नहीं जी आता रहता हूँ।" "फिर भी बिना लाईट की गाड़ी चला रहे हो!" हमने कहा "अभी तो दिन है, पहुंच कर ठीक करवा लूंगा।" गुर्राकर बोले "रास्ते में रात हो गई तो?" "पेड़ के पास खड़े पानी वाले को हरी पत्ती थमा कर निकल जा।" समझ में तो कुछ आया नहीं, सोचा उसी से मालूम करते हैं। उसने बताया "भैया हरी पत्ती का मतलब सौ रूपया वर्ना स्कूटर ज़ब्त।" बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया और भगवान का नाम लेकर आगे चल दिया। कुछ दूर चलने पर लाल बत्ती मिली, हरी होने पर हमने अपने स्कूटर में किक मारी, मगर यह क्या! सामने से एक धनधनाती हुई बाईक हमारे स्कूटर को ज़मीदौज़ करते हुए निकल गई। शायद उस भले मानुष को अपनी लाल बत्ती दिखाई नहीं दी। हम अपनी चोटों पर करहाते हुए बड़ी मुश्किल से उठे और अपनी शर्म को छुपाते हुए किसी तरह स्कूटर को स्टार्ट करके आगे चल दिए। कुछ दूर ही चले थे कि एक गाड़ी हमारे बाएं हाथ की तरफ से ओवरटेक करते हुए तेज़ी से निकली। ड्राइवर चिल्लाया "चलना नहीं आता तो दिल्ली में आते ही क्यों हों?" बड़ी मुश्किल से अपने स्कूटर को संभाला, लेकिन समझ में नहीं आया कि हमारी गलती क्या थी? सोचा कि शायद हमें ही हार्न सुनाई ना दिया हो और बेचारा मजबूरी में उलटी तरफ से निकला हो! जब समझ के कुएं से पानी नहीं निकला तो हमने आगे चलने में ही भलाई समझी।
अल्ला-अल्ला करते हुए आगे बढ़े, तो देखा कि एक कार सवार रफ्तार के नशे में साईकिल सवार को नहीं देख पाया। वैसे भी गरीबों को देखता कौन है, उसने ही नहीं देखा तो क्या गुनाह किया? मैंने गुहार लगाई कि इसको अस्पताल ले चलो, तो एक चिल्लाया "पागल हो गया है क्या? पुलिस को जवाब कौन देगा?" "यार! एक मरते हुए की जान बचाने में पुलिस क्यों सवाल करेगी?" एक व्यक्ति ने फिर वही सवाल किया "अबे, दिल्ली में नया आया है क्या?" हमने झेंप मिटाने के इरादे से कहा "नहीं जी, आता रहता हूँ" तो एक तपाक से बोला "फिर बेवकूफी की बातें क्यों कर रहा है?" जब पुलिस उसे लेकर चली गई तो जान में जान आई।
गाड़ियों की रफ़्तार देखकर लगता है जैसे कोई इनके पीछे पड़ा है, कुछ पलों की जल्दी में हम कितनी ही जानों को खतरे में डाल देते हैं। सड़क हादसों के कारण हज़ारों लोग अपनी जान अथवा शरीर के महत्त्वपूर्ण अंगो से हाथ गवां बैठते हैं। अनेक सवालों के साथ हम तो अपनी मंज़िल पर पहंच गए, लेकिन कितने लोग मंज़िल को पहुंचते होंगे, कभी किसी ने सोचा है?
-शाहनवाज़ सिद्दीकी
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Keywords:
दैनिक हरिभूमि, व्यंग, व्यंग्य, Hindi Critics
व्यंग्य: "दिल का बिल"
जब फोन पर बातचीत करने का सिलसिला शुरू होता है, तो प्रेमी की धढ़कन बिल पर टिकी होती है। इधर प्रेमिका चाहती है कि खूब देर तक बातें होती रहें, उधर प्रेमी फोन काटने का बहाना ढ़ूंढ़ते रहते हैं। वैसे बहाना चलता नहीं है! प्रेमिका कहती है "सुनो, कल लंच पर मिलते हैं", इधर प्रेमी "लेक्चर अटेंड करना है।" प्रेमिका "अरे यार! यह लेक्चर तो मैं तुम्हे लंच पर ही समझा दुंगी।" अब बेचारा लेक्चर के कारण लंच पर आने से मना करता तो उसकी समझ में बात आती भी। कुछ कह दिया तो समझो कयामत आ गई, "फोन तो मैंने किया है और बिल की परवाह तुम कर रहे हो?" अब प्रेमिका को समझाए कौन कि बिल तो उसने ही देना है। खिसियाते हुए बोलता है "यार! बिल तुम्हारा हो या मेरा बात तो एक ही है" इस पर प्रेमिका खुश! हालांकि बात प्रेमी की एकदम सही है, क्योंकि खर्च चाहे प्रेमिका करे बिल तो प्रेमी के ही पल्ले पड़ना है। मतलब छुरी खरबू़ज़े पर गिरे या खरबूज़ा छुरी पर, कटता तो खरबूज़ा ही है।
वैसे प्रेमिका की बातें भी अजीब ही होती हैं, लंच पर चलने का इसरार करते हुए कहती हैं कि "चलो आईसक्रीम मैं खिला दूंगी।" उसे पता है कि आप उसको बिल तो देने नहीं देंगे, चाहे अन्दर से कितना ही चाहें। इसलिए बोल दो, बोलने में क्या जाता है। बाद में तुर्रा यह कि आईसक्रीम तो उसकी तरफ से थी, पैसे आपने क्यों दिए? बेचारा मन ही मन खीजने के सिवा और कर भी क्या सकता है। एक अदद प्रेमिका रखना इतना आसान थोड़े ही है।
दिल का बिल तो नहीं आता है लेकिन बिल के लिए दिल अवश्य ही चाहिए।
(हरिभूमि के आज [19 जुलाई) के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा व्यंग्य)
-शाहनवाज़ सिद्दीकी
बहार राजनैतिक मानसून की
मुद्दा चाहे कितना ही गम्भीर हों, लेकिन नेता जी उसमें भी अपना उल्लू सीधा करने का मौका ढूंढ ही निकालते हैं। मज़े की बात तो यह है कि जब विपक्षी नेता सरकार बनाते है तो अपने द्वारा किए गए विरोध को भूलकर खुद भी उन्ही कार्यो में मस्त हो जाते है। गोया विरोध का नाता केवल विपक्ष की कुर्सी से ही है। वैसे यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर हल निकल गया तो नया मुद्दा कहां से मिलेगा? पक्ष हो या प्रतिपक्ष, सबका लक्ष्य जनता को उल्लू बनाना ही तो हैं। वैसे हमें उल्लू बनना भी चाहिए, क्योंकि अगर जनता उल्लू ही नहीं बनेगी तो फिर देश के कर्णधारों के रोज़गार का क्या होगा? जनता चुनाव में एक-दूसरे को लाठी-डंडा तो मार सकती है, लेकिन किसी के रोज़गार पर लात कैसे मार सकती है?
सबसे बड़ी बात तो यह कि भारत की जनता तमाशबीन है तो दिल लगाने के लिए कुछ ना कुछ तमाशा भी तो चाहिए। आप स्वच्छता अभियान चलाईये, अकेले ही झाड़ू हाथ में लिए नज़र आएंगे। उधर सड़क छाप नेताओं का साथ देने के लिए भी हज़ारों की तादाद में भी़ड़ इकट्ठी हो जाएगी।
हम बात कर रहे थे भाषण की, नेताओं को सबसे अधिक शौक इसका ही होता है। चाहे मुद्दा कोई भी हो, एक अदद भाषण अवश्य होना चाहिए। किसी अच्छे से अच्छे काम का भी अगर दूसरे पक्ष ने समर्थन कर दिया तो बस फिर क्या, हो गई कमियां निकलनी शुरू। आजकल हाईटेक ज़माना है, किसी मुद्दे पर विरोध की लाईन ना मिले तो मार्किटिंग कम्पनियां हैं ना? यह किसी भी मुद्दे की कमियां निकालने और नए मुद्दे तलाशने से लेकर इस बात तक का ध्यान रख सकती हैं कि नेता जी कैसे दिखें तथा क्या बोलें। यहां तक कि किससे मिलें, मतलब जिससे नहीं मिलना है उससे छुपकर मिलें। गिरगिट की क्या औकात इनके सामने। वैसे नेतागिरी के फायदे भी हैं, अगर किसी ने पढ़ाई नहीं कि तो उसे यहां आराम से रोज़गार मिल सकता है। चैकिदारी करने के लिए पढ़ाई की आवश्यकता पढती है, देश चलाने के लिए थोड़े ही।
चलते-चलते एक सीन याद आ गया, क्षेत्र में बाढ़ आने से एक नेता जी बहुत खुश होते हैं और सेकेट्री से दो तरह के वक्तव्य तैयार करके करने के लिए कहते हैं। "अगर मुख्यमंत्री क्षेत्र का मुआयना करने हैलिकाप्टर से पहुंचे तो हम वक्तव्य देंगे कि देखो भय्या! यहां जनता परेशान है और मुख्यमंत्री जी लोगों का हाल-चाल जानने की जगह हैलिकाप्टर से ही देखकर चले गए। और अगर वह सड़क मार्ग से जनता के बीच गए तो हमारा वक्तव्य होगा कि अगर मुख्यमंत्री जी हैलिकाप्टर से क्षेत्र का मुआयना करते तो कम से जनता को ऊपर से अन्न तो पहुंचा सकते थे। अब ऐसे में सिवा वादों के और क्या देंगे?"
-शाहनवाज़ सिद्दीकी
Keywords:
Critics, Haribhumi, व्यंग, व्यंग्य, हरिभूमि
धर्मपत्नी की महिमा
श्रीमती जी की सबसे पंसदीदा चीज़ होती है शापिंग। अब शापिंग तो शापिंग है, ज़रूरत हो या ना हो लेकिन करनी है तो करनी है। उस पर तुर्रा यह कि इतनी महंगी वस्तु इतनी सस्ती ले आई। दुकानदार से दाम तय करने की भी अलग ही अदा होती है। पता नहीं श्रीमती जी दुकानदार को बेवकूफ बनाती हैं या दुकानदार श्रीमती जी को? लेकिन कटता तो बेचारा पति ही है।
थके हारे घर वापिस आए और आते ही आपके हाथ में चाय की प्याली आ गई तो समझो मामला गड़बड़ है। रोज़ तो चाय के लिए कहते-कहते थक जाते हैं, उस पर ज्यादा आवाज़ लगा ली तो सवाल ‘खुद क्यों नहीं बना लेते, देखते नहीं कितनी व्यस्त हूँ आपके बच्चों में’। ‘मेंरे बच्चे!’ मतलब अब यह बच्चे केवल मेरे हो गए। वैसे पत्नी के साथ छोटा तो कुछ होता ही नहीं है, चप्पल की ऐड़ी भी टूट गई तो समझो बड़ा नुकसान है। रास्ते में श्रीमती जी अपनी चप्पल तुड़वा बैठी, तो हमारे मूंह से निकल गया कि देख कर चल लेती। बस फिर क्या था ‘सस्ती चप्पलें दिलवाओगे तो यही होगा ना? इन्हे तो बस यही पसंद है कि रात-दिन घर में खपते रहो और कुछ मांगो मत। कहा था किसी अच्छे ब्राण्ड की दिलवा दो, लेकिन फर्क किसे पड़ता है? रास्ते में परेशान तो मैं हो रही हूँ ना।’ हम भी तपाक से बोले ‘लेकिन यह तुमने अपनी मर्ज़ी से ही तो खरीदी थी।’ जैसी दुकान पर ले जाओगे तो वैसी ही चप्पले खरीदूंगी ना।’ हमने मालूम किया ’लेकिन तुमने हमसे कब कहा था नई चप्पलों के लिए’? झट से बोली ‘तुम सुनते ही कब हो मेरी बात?
रास्ते में एक लड़की हमें देख रही थी, अब किसी की आंखे तो बंद कर नहीं सकते। परेशानी की बात यह हो गई कि श्रीमती जी ने उसे हमें देखते हुए देख लिया। वैसे अन्दर की बात तो यह है कि आप यमराज को तो मना सकते हैं लेकिन रूठी हुई पत्नी को मनाना नामुमकिन है! बात पत्नी की हो और सास का ज़िक्र ना आए? ‘सास’ नाम सुनते ही पत्नी एकदम से बहु बन जाती है। सास के सामने तो माँ जी, माँ जी, लेकिन पति के सामने बात ‘तुम्हारी माँ जी’ पर आ जाती है। अजीब रिश्ता है भय्या, एक-दूसरे को देखकर तेवर बदलना कोई समझ ही नहीं पाया है।
अंत में बस आपसे यही प्रार्थना है कि यह सब बाते मेंरी पत्नी को मत बताना, वर्ना!
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
Keywords:
Critics, Vyang, Wife, धर्मपत्नी, पत्नी
व्यंग्य" कैसे कैसे हार्न
हार्न भी भईया बड़े अजीब-अजीब तरह के होते है। एक होंडा सिटी निकली तो उसका हार्न सुनकर लगा, जैसे उसके मालिक ने कार का गला घोंट दिया है और बड़ी मुश्किल से वह बेचारी कहने की कोशिश कर रही है कि ‘आगे से हट जाओ जी’। वैसे अधिकतर लोग अपने मिजाज़ के मुताबिक ही हार्न लगाते है। कुछ हार्न तो ऐसे बजते है जैसे डांट रहे हो, "हट बे!" वहीं कुछ पशु प्रेमी होते हैं, उनके हार्न सुन कर लगता है जैसे कोई बुल-डॉग पीछे से आ रहा है। एक बार तो अचानक पीछे से शेर कि चिंघाड़ सुन कर हाथ कांप गया और डर के मारे हमारा स्कूटर फुटपाथ से टकराते-टकराते बचा। लेकिन बाद में पता चला कि पीछे से शेर नहीं, बल्कि एक अजीब से मूंह वाली मोटर साईकिल हार्न बजाते हुए तेज़ी से गुज़र गई है। कुछ तो दुसरों को डराने के लिए ही हार्न लगाते हैं, एकदम करीब आकर तेज़ी से हार्न बजाते है। अगर अगला डर जाए तो उस पर दांत फांड़ते हुए किसी और को बकरा बनाने के लिए निकल जाते हैं। ट्रक और कैब के हार्न ऐसे होते हैं, जैसे कोई बच्चा अपने खिलौने के उपर बैठ गया हो और खिलौना दम घुटने से बचने के लिए लगातार चिल्ला रहा हो टूँ-टूँ-टूँ-टूँ.....। उसपर बच्चा हटने की जगह उसकी आवाज़ से और भी खुश हो रहा हो। अब किसी की हिम्मत तो होती नहीं कि उन्हे कुछ कह दे, हां हार्न ही निकल कर डाईवर से कहे "भईया गला घोट कर ही छोड़ोगे क्या?" तो अलग बात है। क्या कह रहे हो ट्रैफिक पुलिस? अरे यार ‘हफ्ता’ उनको कुछ सुनने-देखने देता है भला?Keywords:
Horn, Newspaper, व्यंग, व्यंग्य, हरिभूमि, हार्न, critics, haribhumi, hari-bhumi
अपने पहले लेख का इंतज़ार
समाचार पत्र "हरिभूमि" के आज के संस्करण में मेरा व्यंग्य - "अपने पहले लेख का इंतज़ार".
लेखन के बारे में सोचते-सोचते समय निकलता जा रहा है। अब जब मैं लिखने के लिए बैठा हूँ तो मुझे कुछ ना कुछ तो लिखना ही चाहिए। वैसे भी अगर लिखुंगा ही नहीं तो छपेगा क्या? और अगर कुछ छपेगा नहीं तो सेलैरी कैसे मिलेगी? फिर बॉस के साथ-साथ श्रीमति जी का गुस्सा! और बच्चे क्यों सोचेंगे? अगर उन्होने सवाल कर दिया कि बापू कुछ लिखा क्या? तो क्या जवाब दूंगा? समय व्यतीत होने के साथ-साथ मन बहुत विचलित होता जा रहा है। आज कई दिन हो गए हैं, रोज़ाना लिखने के लिए बैठता हूँ, लेकिन लिख ही नहीं पाता हूँ। आखिर लिखने के लिए कुछ सोच तो होनी चाहिए? वैसे लोग तो बिना सोच के भी लिख देते हैं. मित्रों दुआ करो की आज मैं कुछ ना कुछ लिख ही दूं। आप तब तक इंतज़ार करो, मैं कुछ ना कुछ लिख कर दिखाता हूँ। वैसे इंतज़ार तो मेरा बॉस भी कर रहा है, मेरे पहले लेख का!
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
Keywords:
Haribhumi, व्यंग, व्यंग्य, हरिभूमि
दिल्ली का ट्रैफिक!
कुछ दूर चलने पर चैक पर लाल बत्ती मिली, हम भी खड़े हो गए। जैसे ही बत्ती हरी हुई, हमने भी चलने के लिए अपने स्कूटर में किक मारी और चलने लगे। मगर यह क्या सामने से एक बाईक धनधनाती हुई हमारे स्कूटर को ज़मीदौज़ करते हुए निकल गई। शायद उस भले आदमी को अपनी लाल बत्ती दिखाई नहीं दी। बड़ी मुश्किल से अपनी चोटों पर करहाते हुए हम भी उठे, अपने प्यारे स्कूटर का हैंडल सीधा किया। अपनी शर्म को छुपाते हुए स्कूटर को किसी तरह स्टार्ट किया और आगे चल दिए।
अभी थोड़ी दूर ही चला था कि एक कैब ड्राइवर हमारे बाएं हाथ की तरफ से हमें ओवर-टेक करते हुए और हमें गालियां देते हुए बड़ी तेज़ी से निकला। "गाड़ी चलानी नहीं आती, तो फिर दिल्ली में आते ही क्यों हों"। हमने बड़ी मुश्किल से अपने स्कूटर को संभाला, लेकिन हज़ार बार सोचने पर भी समझ में नहीं आया कि आखिर हमारी गलती क्या थी। सोचा कि शायद उसने हौर्न दिया होगा और हमें सुनाई ना दिया हो। फिर बेचारा मजबूरी में उलटे हाथ की तरफ से निकलनें के लिए मजबूर हुआ हो! मगर ताऊ तो कहतें हैं कि "तेरे कान बहुत तेज़ हैं, चींटी की आवाज़ भी सुन लेते हैं"। जब समझ के कुएं से पानी नहीं निकला तो हमने आगे चलने में ही भलाई समझी।
अल्ला-अल्ला करते हुए आईटीओ पहुंचे, तभी देखा कि एक कार सवार अपनी कार की रफ्तार के नशे में साईकिल सवार को नहीं देख पाया। वैसे भी गरीबों को देखता कौन है, उसने ही नहीं देखा तो क्या गुनाह किया? बेचारा सड़क पर पड़ा हुआ था और उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था। मैंने लोगो से गुहार लगाई कि इसको किसी गाडी या रिक्शा में डालकर अस्पताल ले चलो। तभी एक चिल्लाया "अबे पागल हो गया है क्या? पुलिस के सवालों के जवाब कौन देगा? उलटे हम पर ही केस चल जाएगा।" मैंने कहा कि "भाई हम एक मरते हुए की जान बचा रहें है तो इसमें पुलिस क्यों सवाल करेगी?" एक व्यक्ति ने फिर वही सवाल किया जो दिल्ली में आने के बाद कई बार सुन चुका था, " यार! दिल्ली में नया आया है क्या?" मैंने सोचा कि "इसे कैसे पता चला?" फिर अपनी झेंप मिटाने के इरादे से कहा कि "नहीं भाई आता रहता हूँ" तभी एक तपाक से बोला "तब भी बेवकूफी की बातें कर रहे हो?" वह बेचारा पड़ा हुआ तड़प रहा था। तभी वहां से एक पुलिस की वैन गुज़री, भीड़ देखकर रूक गई। मुझे लगा कि शायद यह ही उसको अस्पताल पहुंचा देंगे। थोड़ी गुहार लगाने पर वह तैयार हो गए। जब पुलिस उसे लेकर चली गई तो मेरी सांस में सांस आई और मैने सोचा कि आगे चला जाए।
इन सवालों के साथ आखिर हम अपनी मंज़िल पर पहंच गए। लेकिन कितने लोग रोज़ाना अपनी मंज़िल को पहुंचते होंगे, कभी किसी ने सोचा है?
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
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accident, Delhi, Traffic, Hindi Critics
चूहें की महिमा और मुख्यमंत्री जी
सुबह आँख खुली और हमने टीवी का बटन ऑन कर दिया। सामने एक खबरिया चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी कि ‘मुख्यमंत्री जी को चूहें ने काटा’। देखिये कैसा कलयुग आ गया है, अब तक तो सिर्फ इन्सान ही बड़े लोगों को एहमियत देते हैं। परंतु अब तो चूहें जैसे तुच्छ प्राणी भी! हाँ नहीं तो। वैसे मैं मज़ाक कर रहा हूँ, चुहा तो महान प्राणी है। और आज कल तो इस प्राणी के महान अवतार ‘माउस’ के बिना कोई कम्यूटर भी नहीं चलता है। अगर चूहां ना होता, अररररर! मेंरा मतलब ‘माउस ना हो तो हम जैसे ब्लॉग छाप लिखइयों का कार्य कैसे चलता? हमारी रोज़ी-रोटी कैसे चलती? फिर खामाखां लक्ष्मी जी को कष्ट करना पड़ता!
हम डेली अपने पैर खुले छोड़ कर लेटते हैं, कभी-कभी तो चुहों के बिल में ही अपना पैर घुसा कर सोते हैं। और वहां बड़े लोग ऐसी रूम में मखमली बिस्तर पर और शानदार कम्बल में लिपट कर सोते हैं। इधर हम चूहें को खुली दावत देते हुए सोते हैं और उधर बड़े लोग उनके खिलाफ पूरा बंदोबस्त करके। फिर भी चूहें महाराज के द्वारा उन्हें ही एहमियत। मुझे तो इसमें किसी साजिश की बू आ रही है।हम पर तो अब तक गणेश जी के सबसे करीबी की हम पर नज़र नहीं पड़ी। वो भी पहुँच गए पहुंच गए बड़े लोगों के पास। आखिर मुझ जैसे फक्कड़ के घर में उन्हे खाने को क्या मिलता? अब बड़े लोगों की तो बात ही अलग है, बड़े लोग हैं तो उनके लिए खाना भी बड़ा अच्छा। हमारे यहां तो उन्हे बची हुई सूखी रोटी ही मिलती होगी और वह भी कभी-कभी, क्योंकि अक्सर तो वह हमें ही नहीं मिलती। हाँ उनके यहां अवश्य ही देसी घी के लड्डू मिल जाते होंगे। फिर वहां हिसाब रखने वाला भी कौन होगा कि लड्डू गायब कैसे हो गए, हमें तो पता रहता है कि हमने दो रोटी बनाई थी और उसमें से आधी बचा दी थी कि सुबह उठ कर खा लेंगे। परंतु जब सुबह वह रोटी नहीं मिलती है तो उसके लिए खोजबीन शुरू कर देते हैं। आखिर इतनी मुश्किल से रोटी कमाई जाती है। अब अखबार के लिखईया तो हैं नहीं कि डेली लेख अखबारों की शान बनें। ब्लॉग में ही तो लिखते हैं, कौन छापता है इसे अपने अखबार में? फिर यहां कोई एड-वैड भी नहीं मिलता। कभी-कभार हॉट लिस्ट में आ जाता है हमारा लेख, लेकिन अक्सर ही हमारे दुश्मन (हमसे जलने वाले दुसरे धुरंधर लेखक गण), हमारे लेख के छपते ही ताड़ लेतें हैं। और कहीं दूसरे ना पढ़ लें इसलिए धड़ा-धड़ नापंसद के चटके लगा देते हैं। बस फिर क्या लेख एग्रीगेटर से गायाब! बस यही कहानी है हमारी। कभी-कभार एक-आध कवि सम्मेलन में कोई बुला लेता है तो कुछ दान-दक्षिणा मिल जाती है, उसी से हम अपनी जीविका चला लेते हैं। भला हम जैसे फक्कड़ों के यहां क्यों कोई चूहां, मच्छर, छिपकली जैसे जंतु घूमेंगे?
अब जब खाते कम हैं तो पक्का है कि शरीर में खून भी कम ही होगा ना। बड़े लोगों की तरह थोड़े ही कि बदन में खून लबा-लब भरा रहे और महाशय अस्पताल में खून की कमीं के बहाने से मुफ्त में अपना ईलाज कराने के बहाने आराम करते रहें, चाहे अदालतें उनका कितना ही इंतज़ार करती रहे। और जब हमें कभी अस्पताल की ज़रूरत पड़ जाए तो जनरल बैड भी खाली नही मिल सकते। उसमें भी ले-दे कर काम चलाना पड़ता है।
खैर चूहा तो चूहा है, मनमौजी है! जब जी चाहेगा, जहाँ जी चाहेगा, वहीं जाएगा।
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
(यह व्यंग्य "हरिभूमि" समाचार पत्र में दिनांक 12 जून 2010 को "चूहा तो महज़ प्राणी है" नमक शीर्षक के साथ छपा है.)
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