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मस्जिदों पर बुलडोज़र, खामोश तंज़ीमें और बेचैन मुसलमान

अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर ने हाल ही में कहा कि भारत के मुसलमान जेनोसाइड की आठवीं स्टेज पर पहुंच चुके हैं। अगर हालात सचमुच इतने गंभीर हैं, तो सवाल यह है कि हमारी बड़ी-बड़ी क़ौमी तंज़ीमें आखिर किस दिन के इंतज़ार में हैं?


जब बुलडोज़र घरों से आगे बढ़कर मस्जिदों तक पहुंच चुका है, तो यह समझ लेना चाहिए कि आग सिर्फ़ दूसरों के दरवाज़े तक नहीं रुकेगी। आज अगर किसी और की बारी है, तो कल किसी और की होगी। इसलिए जो लोग खुद को क़ौम का रहनुमा और ठेकेदार समझते हैं, उनके पास अभी भी मौका है कि वे मुसलमानों की आवाज़ बनें। अगर नहीं, तो अपने दड़बों में बैठे रहिए और अपने नंबर का इंतज़ार कीजिए।


पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों ने बहुत कुछ देखा है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुईं, बुलडोज़रों ने घरों और दुकानों को निशाना बनाया। फिर अचानक मस्जिदों और दरगाहों के नीचे मंदिर होने के दावों की बाढ़ आ गई। और अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बुलडोज़र सीधे मस्जिदों की तरफ़ मुड़ गया है।


दो साल के भीतर बुलडोज़र कार्रवाइयों ने देशभर में लाखों लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित किया है। रिपोर्टों के मुताबिक़ इस दौरान 1.5 लाख से ज़्यादा घर ढहा दिए गए, जिसके कारण लगभग 7.38 लाख लोग बेघर होने पर मजबूर हुए। मानवाधिकार संगठन HLRN के आंकड़े बताते हैं कि दंडात्मक विध्वंस से जुड़े मामलों में सबसे ज़्यादा असर मुसलमानों पर पड़ा, और करीब 44 प्रतिशत मामलों में वे सबसे अधिक प्रभावित समुदाय के रूप में सामने आए।


लगभग हर हफ्ते किसी न किसी शहर से खबर आती है कि चौड़ीकरण, सौंदर्यीकरण या अवैध कब्ज़े के नाम पर किसी मस्जिद को गिरा दिया गया, किसी इबादतगाह को मलबे में बदल दिया गया। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा।


जब बुलडोज़र कार्रवाई के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई शुरू हुई, तब कुछ संगठनों ने अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश भी जारी किए। लेकिन ज़मीनी स्तर पर आज भी ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जिनमें लोग खुद को असुरक्षित और बेबस महसूस कर रहे हैं।


सबसे अफ़सोसनाक बात यह है कि आम मुसलमान परेशान है, डरा हुआ है, अपने भविष्य को लेकर फिक्र में है। दूसरी तरफ़ राजनीतिक दलों की ख़ामोशी और सोशल मीडिया की बयानबाज़ी से आगे बहुत कम कुछ दिखाई देता है।


यह मसला सिर्फ़ राजनीति का नहीं रह गया है। बहुत से लोगों को यह डर सताने लगा है कि कहीं उनकी पहचान, उनकी विरासत और उनके वजूद पर ही सवाल खड़े न किए जा रहे हों।


ऐसे वक़्त में ज़रूरत सिर्फ़ शिकायत करने की नहीं, बल्कि जागने की है। ज़रूरत है कि मुसलमान अपने हक़ और अपने संविधानिक अधिकारों के लिए संगठित हों, कानूनी और लोकतांत्रिक रास्तों पर मज़बूती से खड़े हों, और उन लोगों से जवाब मांगें जो सालों से उनकी नुमाइंदगी का दावा करते आए हैं।

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वर्साय से उठी नई गूंज: ईरान-अमेरिका समझौता और इज़राइल के लिए बड़ा झटका?

इतिहास कभी-कभी अजीब तरीके से खुद को याद दिलाता है।

कल फ़्रांस के मशहूर वर्साय महल में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के साथ हुए समझौते के मसौदे पर दस्तख़त किए। वही वर्साय, जहाँ 1919 में एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर हुए थे जिसने पहले विश्व युद्ध का अंत तो कर दिया, लेकिन साथ ही आने वाले वर्षों में एक नई तबाही की नींव भी रख दी।

उस दौर में जर्मनी के बहुत से लोगों को लगा था कि उन पर एक ऐसी शर्त थोप दी गई है जिसने उनकी इज़्ज़त, ताक़त और आत्मविश्वास को बुरी तरह चोट पहुँचाई। उस अपमान और ग़ुस्से ने आगे चलकर दुनिया को दूसरी विश्व युद्ध की आग में झोंक दिया।

आज लोग कह रहे हैं कि वर्साय में हुई ताज़ा संधि का सबसे बड़ा झटका इज़रायल को लगा है।

जिस देश की राजनीति कई दशकों से ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा बताती रही, जहाँ नेतन्याहू सालों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने और उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव में लाने की मुहिम चलाते रहे, ईरान के ऊपर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगवाए गए, वहीं अब हालात ऐसे मोड़ पर पहुँच गए हैं कि विश्लेषक इसे इज़रायली नेतृत्व की बड़ी राजनीतिक हार ठहरा रहे हैं।

इज़रायल के भीतर भी बेचैनी बढ़ रही है। नेतन्याहू की मज़बूत छवि पर सवाल उठ रहे हैं। जो नेता खुद को हर मोर्चे पर विजेता साबित करना चाहते थे, उनके आलोचक अब उनकी नीतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में नए दावेदार सक्रिय हैं और राजनीतिक संघर्ष पहले से ज़्यादा तेज़ दिखाई दे रहा है।


इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि जब किसी समाज की उम्मीदें टूटती हैं, तब अक्सर लोग अपने नेताओं, संस्थाओं और फैसलों पर सवाल उठाने लगते हैं। 1919 के जर्मनी में भी बहुत से लोगों को लगा था कि उनकी जीत उनसे छीन ली गई, कि कहीं न कहीं उनके साथ धोखा हुआ है। ऐसे ही जज़्बात बाद में बड़े राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बने।

क्या वर्साय का यह नया समझौता भी आने वाले वर्षों की राजनीति को बदल देगा? क्या यह मध्य पूर्व में एक नए दौर की शुरुआत है या किसी नए टकराव की भूमिका?

इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना ज़रूर है कि वर्साय का महल एक बार फिर दुनिया की राजनीति के एक ऐसे मोड़ का गवाह बना है, जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई दे सकती है।

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मुश्किल वक्त में ममता बनर्जी का साथ नहीं छोड़ सकता: शत्रुघ्न सिन्हा

टीएमसी में सियासी घमासान के बीच शत्रुघ्न सिन्हा का बड़ा बयान

पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों जबरदस्त उथल-पुथल से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मतभेद और बगावत की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रखी है। कई नेताओं और सांसदों के पार्टी नेतृत्व से नाराज़ होने की चर्चाओं के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा था कि आखिर कौन ममता बनर्जी के साथ खड़ा रहेगा और कौन उनका साथ छोड़ देगा।

इसी बीच टीएमसी सांसद और बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी चर्चाओं में आ गया। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि वह भी पार्टी के अंदर असंतुष्ट नेताओं के संपर्क में हैं। लेकिन अब खुद शत्रुघ्न सिन्हा ने सामने आकर इन तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है।

“मुश्किल वक्त में दीदी को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता”

शत्रुघ्न सिन्हा ने बेहद भावुक अंदाज़ में कहा कि ममता बनर्जी ने हमेशा उनका साथ दिया है। उन्होंने कहा कि जब उनके राजनीतिक जीवन में कठिन समय चल रहा था, तब ममता बनर्जी ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें सम्मान दिया।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा,

“मैं मुश्किल वक्त में ममता बनर्जी का साथ छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता।”

शत्रुघ्न सिन्हा का कहना है कि राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं होती, बल्कि रिश्तों और भरोसे का भी नाम है। जब कोई नेता आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा रहा हो, तो अच्छे या बुरे हालात में उसका साथ निभाना भी आपकी जिम्मेदारी बन जाती है।

वफादारी का संदेश या राजनीतिक रणनीति?

शत्रुघ्न सिन्हा के इस बयान को राजनीतिक जानकार अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह ममता बनर्जी के प्रति उनकी वफादारी का संदेश है, जबकि कुछ इसे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश मान रहे हैं।

हालांकि शत्रुघ्न सिन्हा के शब्दों में भावनाएं साफ दिखाई दीं। उन्होंने यह भी कहा कि वह टीएमसी के टिकट पर चुने गए सांसद हैं और जनता ने उन्हें इसी पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में संसद भेजा है। ऐसे में पार्टी और उसके नेतृत्व के प्रति उनकी जिम्मेदारी बनती है।

ऐसे दौर में जब नेता पाला बदल रहे हैं…

भारतीय राजनीति में अक्सर देखा जाता है कि मुश्किल हालात आते ही कई नेता अपने राजनीतिक फायदे के लिए पाला बदल लेते हैं। लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि उनके लिए राजनीतिक रिश्ते सिर्फ अवसरवाद तक सीमित नहीं हैं।

उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि जिसने आपके संघर्ष के दिनों में आपका साथ दिया हो, उसे मुश्किल समय में अकेला छोड़ देना सही नहीं है।

बंगाल की राजनीति पर सबकी नजर

TMC के भीतर चल रही हलचल और बगावत की खबरों के बीच शत्रुघ्न सिन्हा का यह बयान ममता बनर्जी के लिए राहत की खबर माना जा रहा है। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश गया है कि अभी भी कई वरिष्ठ नेता पार्टी नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े हैं।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का यह सियासी तूफान आगे क्या मोड़ लेता है। लेकिन फिलहाल शत्रुघ्न सिन्हा ने साफ कर दिया है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, वह ममता बनर्जी का साथ छोड़ने वाले नहीं हैं।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई फटकार, मंसूर अहमद को 2 लाख मुआवज़ा

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज निवासी मंसूर अहमद को कथित तौर पर 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने माना कि किसी नागरिक की व्यक्तिगत आज़ादी के साथ इस तरह का व्यवहार संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।


हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि मंसूर अहमद को 2 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए। साथ ही अदालत ने कहा कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद यह रकम प्रयागराज के तत्कालीन एसीपी (बारा) से वसूली जा सकती है। अदालत ने पुलिस कमिश्नर, प्रयागराज को आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी दाखिल करने को कहा है।


इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कानून का मकसद लोगों की आज़ादी की रक्षा करना है, न कि उन्हें बिना पर्याप्त कानूनी आधार के हिरासत में रखना। अदालत ने पुलिस के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें हिरासत को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी।


कभी-कभी एक फैसला सिर्फ एक शख्स को इंसाफ़ नहीं देता, बल्कि पूरे सिस्टम को आईना दिखा देता है। प्रयागराज के मंसूर अहमद का मामला भी कुछ ऐसा ही है।


आठ दिन… पूरे आठ दिन एक इंसान अपनी आज़ादी से महरूम रहा। अगर किसी की गलती साबित नहीं हुई, अगर कानून के मुताबिक उसकी हिरासत जायज़ नहीं थी, तो फिर उसकी ज़िंदगी के वो आठ दिन कौन लौटाएगा? उन्होंने और उनके परिवार ने जो झेला, समाज में जो तिरस्कार हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा?


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी दर्द को महसूस करते हुए यूपी सरकार को मंसूर अहमद को 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया। अदालत ने साफ संदेश दिया कि अगर किसी अफसर की लापरवाही या गलत कार्रवाई से किसी नागरिक की आज़ादी छीनी जाती है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होगी।


यह फैसला सिर्फ मंसूर अहमद की जीत नहीं, बल्कि उस उसूल की जीत है जो कहता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। चाहे आम आदमी हो या सरकारी अफसर, हर किसी को संविधान और कानून की हदों में रहकर काम करना होगा। इंसाफ़ देर से मिला, लेकिन अदालत ने यह बता दिया कि किसी बेगुनाह की आज़ादी की कीमत शून्य नहीं होती।

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यह नया पैटर्न है: अहमद बुहारी 31 महीने जेल में रहे, कंपनी बिक गई, फिर कोर्ट में केस खारिज

जाँच एजेंसियों के इस्तेमाल पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, राजनैतिक ही नहीं कारोबारी डील्स के भी पैटर्न सामने आ रहे हैं, अरविंद केजरीवाल के साथ क्या हुआ, सबने देख ही लिया है। बहुत से बड़े कारोबारियों को भी उसी PMLA के तहत सालों तक गिरफ्तार करके रखा गया, ब्लैकमेल करने के आरोप लगे। आइए एक और मामले को देखते हैं!

2022 में चेन्नई के कारोबारी अहमद ए.आर. बुहारी को ईडी ने लगभग 542 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया। आरोप यह था कि उनकी कंपनी ने कम गुणवत्ता वाले कोयले को ऊँचे दाम पर सरकारी कंपनियों को सप्लाई किया और उससे जुड़ी रकम को विदेशों के रास्ते घुमाया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। कई बार ज़मानत की कोशिश हुई, लेकिन अदालतों से राहत नहीं मिली। इस दौरान मीडिया में भी मामला लगातार चलता रहा और उन्हें एक बड़े “कोल स्कैम” के चेहरे की तरह पेश किया गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब कानूनी लड़ाई चल रही थी, उसी बीच उनकी कंपनी Coastal Energen आर्थिक संकट में फँसती चली गई। कर्ज़ बढ़ा, कारोबार कमजोर पड़ा और आखिरकार मामला insolvency process तक पहुँच गया। बाद में Adani Power और एक निवेश समूह के consortium ने कंपनी के अधिग्रहण की प्रक्रिया में प्रवेश किया और कंपनी पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। यानी जिस कारोबारी समूह ने कभी यह प्रोजेक्ट खड़ा किया था, वह धीरे-धीरे उससे बाहर हो गया।

फिर कई साल बाद अदालतों में तस्वीर बदलने लगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने मूल CBI केस को ही खारिज कर दिया। उसके बाद Madras High Court और विशेष CBI अदालत में भी कार्रवाई टिक नहीं पाई। अदालतों ने कहा कि जब मूल अपराध का आधार ही नहीं बचता, तो PMLA का मामला भी अपने आप कमजोर हो जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुहारी ने करीब 31–32 महीने जेल में बिताए, जबकि अंतिम रूप से एजेंसियाँ आरोप साबित नहीं कर सकीं।  

यहीं से यह मामला सिर्फ एक कारोबारी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक बड़े सवाल को जन्म देता है। सवाल यह कि अगर किसी उद्योगपति पर गंभीर आरोप लगते हैं, एजेंसियाँ सक्रिय होती हैं, कंपनी आर्थिक रूप से टूट जाती है, और सालों बाद अदालत कहे कि मामला साबित ही नहीं हुआ — तो उस नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्योंकि अदालत से बरी हो जाना और जिंदगी पहले जैसी हो जाना, दोनों अलग बातें हैं। तब तक प्रतिष्ठा जा चुकी होती है, कारोबार हाथ से निकल चुका होता है और बाज़ार में भरोसा टूट चुका होता है।

भारत में अब इस तरह के मामलों को लोग सिर्फ कानूनी केस की तरह नहीं देखते। इसमें एक पैटर्न दिखाई देने लगा है — पहले जांच, फिर लंबी कानूनी लड़ाई, फिर कारोबारी कमजोरी, फिर insolvency, और अंत में किसी बड़े कॉरपोरेट समूह द्वारा अधिग्रहण। यही मामला राजनैतिक विरोधियों को निपटाने का भी नज़र आ रहा है। आम आदमी पार्टी को ख़त्म करने को कोशिशें सबके सामने हैं। उसके सारे बड़े लीडर्स गिरफ़्तार हुए थे, महीनों, सालों जेल में रहे, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी को थी कि यह केस दो मिनट भी अदालत में नहीं टिकेगा और फिर सेशन कोर्ट ने केस को सुनवाई लायक़ भी नहीं समझा, यहाँ तक कहा कि जाँच एजेंसी कोई एक भी सबूत पेश नहीं कर पायी हैं।

यह धारणा सही है या गलत, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे संवेदनशील स्थिति वही होती है जब जनता को कानून और संस्थाओं की निष्पक्षता पर शक होने लगे।

अगर बात व्यापार की करें तो किसी भी लोकतंत्र में बाजार सिर्फ पैसों से नहीं चलता, भरोसे से भी चलता है। और जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि सफलता मेहनत, जोखिम और प्रतिस्पर्धा से कम, जबकि सत्ता के करीब होने से ज़्यादा तय होती है, तब नुकसान सिर्फ एक कारोबारी का नहीं होता — पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं।

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कॉकरोच जनता पार्टी’ से डरी सरकार? ट्विटर अकाउंट सस्पेंड


‘कॉकरोच जनता पार्टी’ पर आखिरकार गाज गिर ही गई… सोचिए मोदी सरकार कितना डरती है अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों से, ख़ासतौर पर GenZ यानी युवाओं से…


CJP का X (ट्विटर) अकाउंट भारत में सस्पेंड कर दिया गया है। कहीं डर ये तो नहीं कि मज़ाक-मज़ाक में शुरू हुई ये आवाज़, GenZ का बड़ा आंदोलन न बन जाए…?


सोशल मीडिया पर तूफान की तरह वायरल हुई इस सैटायरिकल ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP का अकाउंट भारत में “Withheld” कर दिया गया।


पार्टी से जुड़े अभिजीत दीप्के ने खुद इसका स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें लिखा था कि @CJP2029 अकाउंट को “in response to a legal demand” कहकर भारत में रोक दिया गया है।


अभिजीत ने पोस्ट करते हुए लिखा —

“जैसा उम्मीद था, Cockroach Janta Party का अकाउंट इंडिया में withheld कर दिया गया…”


बस फिर क्या था…

कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई।

लोग पूछने लगे —

क्या अब व्यंग्य से भी डर लगने लगा है?


‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शुरुआत में सिर्फ एक मज़ाक थी, लेकिन देखते ही देखते ये इंटरनेट की सबसे दिलचस्प आवाज़ बन गई।

सिर्फ 6 दिनों में इसके इंस्टाग्राम पर 11.3 मिलियन फॉलोअर्स हो गए।


महुआ मोइत्रा, कीर्ति आज़ाद से लेकर दिया मिर्जा, अनुराग कश्यप, कोंकणा सेन शर्मा, उर्फी जावेद, कुणाल कामरा, हिमांशी खुराना जैसे कई बड़े नाम इस ट्रेंड से जुड़ गए।


असल में ये पूरा आंदोलन उस बयान के बाद शुरू हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत द्वारा कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने की बात वायरल हुई।


जिस शब्द को ताने की तरह इस्तेमाल किया गया… उसी को GenZ ने अपनी पहचान बना लिया।


अब इंस्टाग्राम रील्स और मीम पेजों पर युवा मज़ाक में कह रहे हैं —

“हाँ, मैं कॉकरोच हूँ…”

और फिर अपनी बेरोजगारी, आलस, ओवरथिंकिंग और हमेशा ऑनलाइन रहने वाली जिंदगी को हँसते-हँसते बयान कर रहे हैं।


लेकिन इस हँसी के पीछे एक चुभन भी है।

सिस्टम से नाराज़गी…

भविष्य को लेकर डर…

और अनसुना कर दिए जाने का दर्द…


CJP के मेनिफेस्टो में भी सिर्फ मीम नहीं, कई गंभीर मांगें हैं —

रिटायर जजों को राज्यसभा सीट जैसा कोई लाभ नहीं मिले,

महिलाओं को 50% आरक्षण मिले,

दल-बदल करने वाले नेताओं पर 20 साल का बैन लगे,

और छात्रों से री-चेकिंग के नाम पर फीस न वसूली जाए।


इस पार्टी की “मेंबरशिप” भी अपने आप में एक तंज है —

अगर आप बेरोजगार हैं, आलसी हैं, और ज़रूरत से ज़्यादा ऑनलाइन रहते हैं… तो आप इसके “योग्य सदस्य” हैं।


कॉकरोच इसके लिए सिर्फ एक कीड़ा नहीं, बल्कि एक प्रतीक है।

एक ऐसे सिस्टम का प्रतीक…

जो लोगों के मुताबिक इतना सड़ चुका है कि अब युवा सड़कों और सोशल मीडिया पर उतरकर व्यंग्य में अपनी बात कह रहे हैं।


अब X अकाउंट पर रोक लगने के बाद सोशल मीडिया पर सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

हालांकि अब तक सरकार या X की तरफ से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है।


लेकिन एक बात साफ है —

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ सिर्फ एक मीम नहीं रही… ये उस पीढ़ी की आवाज़ बनती जा रही है,

जो हँसते-हँसते अपना गुस्सा बोलना सीख गई है।


आप इसके ऊपर क्या सोचते हैं?

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हर संकट का बहाना ‘युद्ध’ क्यों? दस साल की जवाबदेही पर बड़े सवाल


हर नाकामी का ठीकरा युद्ध पर फोड़ देना आसान है…

लेकिन सवाल ये है कि अगर हर समस्या की जड़ सिर्फ़ युद्ध है, तो फिर पिछले दस साल की नीतियों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

आजकल टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही लाइन दोहराई जा रही है —
“रुपया गिरा क्योंकि युद्ध हो गया… विदेशी निवेश भागा क्योंकि दुनिया में अस्थिरता है… तेल महंगा हुआ क्योंकि जंग चल रही है…”

लेकिन ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचिए।
क्या दुनिया में युद्ध सिर्फ़ भारत के लिए हुआ था?
क्या बाकी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ किसी दूसरे ग्रह पर थीं?
और अगर हर चीज़ का कारण सिर्फ़ युद्ध है, तो फिर सरकारें होती किसलिए हैं?

1. रुपया इतना कमज़ोर क्यों हुआ? क्या युद्ध सिर्फ़ भारत पर हुआ था?

अगर युद्ध ही हर बर्बादी की वजह है, तो फिर सवाल ये है कि
दुनिया की बाकी करेंसीज़ उसी दौर में इतनी नहीं टूटीं जितना रुपया टूटा क्यों?

सच ये है कि किसी भी करेंसी की ताकत सिर्फ़ युद्ध से तय नहीं होती।
उसके पीछे कई चीज़ें होती हैं:

* देश में निवेश कितना आ रहा है
* एक्सपोर्ट कितना बढ़ रहा है
* सरकार का वित्तीय अनुशासन कैसा है
* बेरोज़गारी और महंगाई कितनी है
* विदेशी निवेशकों का भरोसा कितना बचा है

अगर लगातार निवेश घट रहा हो, मैन्युफैक्चरिंग का ढांचा कमजोर हो, आयात बढ़ते जाएँ और सरकार सिर्फ़ इवेंट मैनेजमेंट करती रहे, तो करेंसी दबाव में आएगी ही।

युद्ध ने असर डाला — इसमें बहस नहीं।
लेकिन हर गिरावट को युद्ध पर डाल देना ऐसा है जैसे घर की छत दस साल से टपक रही हो और आदमी बारिश को दोष देता रहे।

2. FII और FPI पिछले कई सालों से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?

सबसे बड़ा सवाल यही है।
अगर वजह सिर्फ़ युद्ध है, तो विदेशी निवेशक 2020 से पहले भी पैसा क्यों निकाल रहे थे?

विदेशी निवेशक भावनाओं पर नहीं चलते, डेटा पर चलते हैं।
उन्हें चाहिए:

* नीति में स्थिरता
* टैक्स सिस्टम में भरोसा
* संस्थाओं की स्वतंत्रता
* न्यायिक पारदर्शिता
* बिज़नेस का अनुमानित माहौल

लेकिन यहाँ क्या दिखा?

* अचानक टैक्स फैसले
* रेगुलेटरी अनिश्चितता
* सरकारी दखल का डर
* बेरोज़गारी के आंकड़ों पर सवाल
* उपभोग क्षमता में गिरावट

ऊपर से शेयर बाज़ार कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों के इर्द-गिर्द घूमता दिखे, तो निवेशक सतर्क हो जाते हैं।

युद्ध एक ट्रिगर हो सकता है,
लेकिन पाँच साल की पूँजी निकासी को सिर्फ़ युद्ध कह देना आधा सच नहीं, पूरा भ्रम है।

3. चाबहार पर अरबों खर्च करके पीछे क्यों हटे? रूस-ईरान से सस्ता तेल क्यों छोड़ा?

ये सवाल सिर्फ़ विदेश नीति का नहीं, रणनीतिक समझ का भी है।

Chabahar Port को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया था क्योंकि इससे भारत को पाकिस्तान को बायपास करके अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच मिलती थी।
और सबसे बड़ी बात — तेल सप्लाई के मामले में यह रणनीतिक सुरक्षा देता था।

लेकिन हुआ क्या?

* वर्षों तक धीमी प्रगति
* अमेरिकी दबाव के आगे झुकाव
* ईरान से तेल आयात लगभग बंद
* रूस से तेल लेने पर भी “अनुमति” वाली मानसिकता

सवाल उठता है:
अगर भारत “विश्वगुरु” और “रणनीतिक महाशक्ति” है, तो अपनी ऊर्जा नीति वॉशिंगटन देखकर क्यों तय करता है?

दुनिया के बड़े देश अपने हित देखते हैं।
भारत को भी वही करना चाहिए था।

रूस से यूरोप ने भी अलग-अलग रास्तों से व्यापार जारी रखा,
लेकिन यहाँ जनता को राष्ट्रवाद का भाषण मिला और नीति में निर्भरता बढ़ती गई।

4. पासपोर्ट रैंकिंग क्यों गिरती रही? इसका युद्ध से क्या लेना-देना?

Indian Passport की ताकत सिर्फ़ देशभक्ति के नारों से नहीं बढ़ती।
उसके पीछे दुनिया का भरोसा होता है।

पासपोर्ट मजबूत तब होता है जब:

* देश की अर्थव्यवस्था भरोसेमंद हो
* संस्थाएँ मजबूत हों
* विदेश नीति संतुलित हो
* नागरिकों की वैश्विक साख अच्छी हो

अगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार ध्रुवीकरण, धार्मिक तनाव, प्रेस फ्रीडम और संस्थागत कमजोरी की खबरें जाएँ, तो असर पड़ता है।

युद्ध का इससे सीधा संबंध नहीं है।
ये लंबे समय की शासन शैली का परिणाम होता है।

असली खेल क्या है?

आज हर आलोचना को “राष्ट्रविरोध” कह देना आसान बना दिया गया है।
अगर रुपया गिरे — युद्ध।
अगर बेरोज़गारी बढ़े — युद्ध।
अगर निवेश भागे — युद्ध।
अगर तेल महंगा हो — युद्ध।

मतलब सरकार कभी ज़िम्मेदार ही नहीं?

लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं होता।
असल देशभक्ति अंधभक्ति नहीं, जवाबदेही मांगना होती है।

और सबसे दिलचस्प बात ये है कि
जो लोग हर बात पर “70 साल” गिनाते थे,
अब खुद पूरे दस साल की जवाबदेही से बचने के लिए हर वैश्विक संकट की आड़ ले रहे हैं।



आख़िरी बात

युद्ध ने असर डाला — बिल्कुल डाला।
लेकिन अच्छी सरकार वही होती है जो संकट में भी देश को संभाले।

पेट्रोल डीज़ल के दाम इतने वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय मार्केट में आधे से भी कम थे, तब भी तो सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों के खूब पैसा कमाया था, आज बढ़ रहे हैं तो उन्हें यह बोझ क्यों नहीं उठाना चाहिए?

और अगर हर असफलता के लिए हमेशा कोई बाहरी दुश्मन चाहिए, तो फिर “मजबूत नेतृत्व” का दावा किस बात का?

देश गोदी मीडिया के ज़रिए सेट किए गए नेरेटिव और टीवी डिबेट से नहीं चलता।
देश चलता है मज़बूत अर्थव्यवस्था, दूरदर्शी विदेश नीति, भरोसेमंद संस्थाओं और ईमानदार जवाबदेही से।

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क्या आपका वोट सुरक्षित है? बंगाल में 89 लाख नाम कटने से उठे लोकतंत्र पर बड़े सवाल!

क्या आपका वोट… सच में आपका है? या कोई सिस्टम, कोई लिस्ट, चुपचाप आपका हक छीन सकता है…?



सोचिए… आप सालों से वोट दे रहे हैं। हर चुनाव में लाइन में खड़े हुए, अपनी आवाज़ उठाई।
लेकिन अचानक एक दिन पता चले — आपका नाम ही वोटर लिस्ट से गायब है!

यही दर्द आज पश्चिम बंगाल के लाखों लोगों का है… 😔


क्या हुआ आखिर?

2026 के चुनाव से ठीक पहले Special Intensive Revision (SIR) के नाम पर
लगभग 89 लाख (8.9 मिलियन) वोटर्स के नाम लिस्ट से हटा दिए गए —
यानी करीब 11% से ज्यादा पूरा वोट बैंक गायब!  

कुछ रिपोर्ट्स तो ये भी कहती हैं कि ये आंकड़ा 90 लाख के आसपास है।  


मामला इतना गंभीर क्यों है?

  • लाखों लोगों ने अपील की… लेकिन करीब 27 लाख लोग फिर भी वोट नहीं दे पाएंगे
  • कई इलाकों में आधे तक वोटर्स के नाम कट गए
  • खासकर अल्पसंख्यक और गरीब तबकों पर असर ज़्यादा बताया जा रहा है  

सोचिए… एक झटके में आपकी पहचान, आपका अधिकार — सब खत्म!


ममता बनर्जी का बड़ा आरोप

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुलकर सवाल उठाए:

👉 उन्होंने चुनाव आयोग पर “पक्षपात” का आरोप लगाया
👉 अधिकारियों से कहा — “डर के नहीं, ईमानदारी से काम करो”
👉 ये भी कहा कि कुछ लोग जानबूझकर चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं  


लोगों का दर्द…

  • कई बुजुर्ग, जो 40-50 साल से वोट दे रहे थे… अब बाहर
  • जो लोग कभी “बेघर” थे और बाद में नागरिक बने… उनका नाम फिर से गायब
  • रोज़गार छोड़कर लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं  

ये सिर्फ एक “लिस्ट” नहीं…
ये लोगों की पहचान, सम्मान और लोकतंत्र का सवाल बन चुका है।


दूसरी तरफ क्या कहा जा रहा है?

सरकार और चुनाव आयोग का कहना है:
✔️ ये प्रक्रिया “फर्जी वोटर्स” हटाने के लिए है
✔️ टेक्नोलॉजी और AI का इस्तेमाल पारदर्शिता के लिए किया जा रहा है  

लेकिन सवाल वही है…
👉 अगर असली लोग ही बाहर हो जाएं, तो ये सफाई है या साज़िश?


सबसे बड़ा सवाल

अगर लाखों लोग वोट ही नहीं दे पाए…
तो क्या चुनाव सच में “जनता की आवाज़” रहेगा?

या फिर…
एक ऐसा सिस्टम बन जाएगा जहां कुछ लोगों की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाएगी?


आप क्या सोचते हैं?
क्या ये सिर्फ एक प्रशासनिक गलती है… या लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी?

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क्या चुनाव में भी बराबरी नहीं? 700 हस्तियों ने PM मोदी पर उठाए सवाल, चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग!


यह सिर्फ एक ख़बर नहीं है… ये सवाल है कि क्या सच में चुनाव के दौरान सब कुछ बराबरी से हो रहा है… या फिर कहीं खेल कुछ और ही चल रहा है?

हाल ही में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहाँ देशभर के 700 से ज़्यादा पूर्व IAS अफसर, शिक्षाविद, पत्रकार और एक्टिविस्ट एक साथ खड़े हो गए। इन लोगों ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर सीधे तौर पर आरोप लगाया कि Narendra Modi ने अपने एक भाषण में चुनाव आचार संहिता यानी MCC का उल्लंघन किया है। हालांकि पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग भी स्वतंत्र संस्था की जगह सरकार के अंग की तरह ही बिहेव करता आ रहा है।

ये मामला उस वक्त का है जब देश के कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं और MCC लागू है। आरोप है कि प्रधानमंत्री का जो राष्ट्र के नाम संबोधन था, वो सरकारी प्लेटफॉर्म्स—जैसे दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो—पर दिखाया गया… और यह पहली बार है कि किसी प्रधानमंत्री के द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में राजनीतिक बातें की गईं। भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह अपने आप में ही पीएम पद की गरिमा को गिराने वाला कदम है।

लोगों का कहना है कि ये सिर्फ एक भाषण नहीं था… बल्कि “चुनावी प्रचार” था, वो भी सरकारी संसाधनों के जरिए। और अगर ऐसा है, तो क्या ये बाकी पार्टियों के साथ नाइंसाफी नहीं है?

चिट्ठी में ये भी कहा गया कि जब चुनाव चल रहे हों, तब सत्ता में बैठी सरकार को ज़्यादा जिम्मेदारी निभानी चाहिए… ताकि मैदान सबके लिए बराबर रहे। लेकिन अगर वही सरकार अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके जनता को प्रभावित करे… तो फिर लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है।

दिलचस्प बात ये है कि सिर्फ एक्टिविस्ट ही नहीं, बल्कि कुछ नेताओं ने भी इसी मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के भाषण “राजनीतिक और पक्षपातपूर्ण” थे और चुनाव के माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। 

अब सबसे बड़ा सवाल ये है…

क्या चुनाव आयोग इस पर कोई कार्रवाई करेगा? या फिर ये मामला भी बाकी मामलों की तरह बस बहस बनकर रह जाएगा?

आप क्या सोचते हैं?

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क्या ये सच में “महिला सशक्तिकरण” है… या फिर राजनीति?


क्या ये सच में “महिला सशक्तिकरण” है… या फिर राजनीति की एक ऐसी चाल, जिसमें महिलाओं का नाम लेकर खेल कुछ और ही खेला जा रहा है?

आज संसद में जो बहस चल रही है, वो सिर्फ महिला आरक्षण की नहीं है… बल्कि उसके पीछे छुपी राजनीति की भी है। सरकार कह रही है—देश की संसद में महिलाओं को 33% हिस्सा मिलेगा, उनकी आवाज़ और मज़बूत होगी। सुनने में ये सपना जैसा लगता है… लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 

असल पेंच यहाँ आता है—इस आरक्षण को डिलिमिटेशन यानी सीटों के नए बंटवारे से जोड़ दिया गया है। मतलब, पहले पूरे देश का चुनावी नक्शा बदलेगा… फिर महिलाओं को आरक्षण मिलेगा। और यही वो बात है, जिस पर सियासत गरमा गई है। 

विपक्ष का कहना है—अगर नीयत साफ है, तो आज की 543 सीटों में ही महिलाओं को हिस्सा क्यों नहीं दिया जा सकता? इंतज़ार क्यों? ये सवाल सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि भरोसे का है।   सरकार परिसीमन 2026 की जनगणना के आधार पर कराने की जगह 2011 की जनगणना के आधार पर कराना चाहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब जाति आधार पर जनगणना नहीं हुई थी। 

अगर इसकी इजाज़त दे दी जाए तो OBC पिछड़े समाज का हक़ मार लिया जाएगा। दूसरी तरफ़ साउथ के लीडर्स का तर्क है कि उन्होंने केंद्र सरकार की जनगणना नीति को आगे बढ़ाया, जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाई, तो क्या हमने गलती की कि संसद में हमारा प्रतिनिधित्व कमजोर करने की साजिश रची जा रही है।

बात में पेंच यह है कि हर राज्य में 50% प्रतिशत सीटों की वृद्धि की जाएगी। मतलब जिनकी सीटें कम हैं उनकी कम बढ़ेगी। जैसे कि एक साथ सब के लिए समान 50% वेतन बढ़ाने का ऐलान हो तो जिनको आय 5 लाख है उसकी लाखों में बढ़ेगी और जिनकी 50 हज़ार उनकी हज़ारों में। इसका विरोध साउथ में बहुत तेज़ी से हो रहा है। उनके सवाल वाजिब हैं एयूए गृहमंत्री को उनका जवाब देना चाहिए, उन्हें संतुष्ट करना चाहिए।

कुछ नेताओं का आरोप है कि ये “महिलाओं के नाम पर राजनीति” है… एक ऐसा दांव, जिसमें अगर कोई विरोध करे तो उसे “महिला विरोधी” साबित कर दिया जाए। यानी चाल ऐसी कि हर तरफ से फायदा ही फायदा। 

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि देश बदल रहा है, आबादी बढ़ रही है, और संसद को भी उसी हिसाब से बदलना ज़रूरी है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो लोकतंत्र और मजबूत होगा।  
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं है…
क्या ये बिल सच में महिलाओं को उनका हक दिलाएगा?
या फिर ये सिर्फ एक “टाइमिंग वाला वादा” है, जो चुनावी गणित में फिट बैठता है? चुनाव ख़त्म और बात ख़त्म…

सच ये है कि भारत की आधी आबादी आज भी पूरी ताकत से राजनीति में नहीं दिखती। और अगर ये बिल सही नीयत से लागू हुआ—तो इतिहास बदल सकता है। लेकिन अगर इसके पीछे राजनीति भारी पड़ गई… तो ये एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगा।

आख़िरी बात:
ये सिर्फ एक बिल नहीं… ये भरोसे की लड़ाई है।
महिलाओं के हक़ और राजनीति की नीयत के बीच।


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कोर्ट में टकराव! जज ने Arvind Kejriwal से कहा — ‘मुझे घूरिए मत’…


दिल्ली हाई कोर्ट का वो पल अब सुर्खियों में है, जब अदालत की गंभीर दीवारों के बीच शब्दों की तल्खी भी दिखी और तंज भी। अरविंद केजरीवाल खुद कोर्ट में खड़े थे, अपने ही केस में दलीलें दे रहे थे… लेकिन माहौल तब अचानक बदल गया, जब जज जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने उन्हें कहा— आरोप लगाकर इस तरह मुझे घूरिए मत। केजरीवाल बोले मैं पहली बार आया हूं इस कोर्ट में, इसलिए थोड़ा नर्वस हूं।

यह सिर्फ एक सुनवाई नहीं थी, बल्कि भरोसे और शक के बीच की टकराहट थी। केजरीवाल ने अदालत में एक तेजतर्रार वकील की तरह नज़र आए। उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के 4 बार RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने का हवाला देते हुए पक्षपात की आशंका जताई। उन्होंने कहा कि “हम उनकी विचारधारा के कट्टर विरोधी हैं, ऐसे में मेरे मन में डर पैदा होता है कि मुझे इस पीठ से इंसाफ़ मिलेगा या नहीं।”

केजरीवाल ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट का फैसला आया था, और हैरानी की बात ये है कि सिर्फ 4 घंटे के अंदर ही CBI ने इस हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। उन्होंने बताया कि वो फैसला 500 पन्नों से भी ज़्यादा का था, जिसमें कोर्ट ने हर एक आरोप को बारीकी से जांचा और फिर विस्तार से अपनी राय दी। जबकि सीबीआई की अपील में किसी भी फाइंडिंग को लेने के कोई फाइंडिंग नहीं है। ऐसे में इस अपील को तो पहले ही दिन खारिज कर देना चाहिए था, क्योंकि वह डिफेक्टिव है। पर उस डिफेक्टिव पिटीशन पर ही स्वीपिंग ऑर्डर पास किया गया।

कोर्टरूम में हर शब्द भारी था… एक तरफ एक पूर्व मुख्यमंत्री, जो खुद अपनी लड़ाई लड़ रहा था, और दूसरी तरफ न्याय की कुर्सी। इस दौरान माहौल कई बार भावुक भी हुआ, तो कई बार तीखा भी।

आख़िर में पीठ ने कहा आपने बहुत अच्छी बहस की। आप वकील भी बन सकते हैं। इस पर केजरीवाल ने कहा धन्यवाद मैडम, मैं जो अभी कर रहा हूँ उसमे खुश हूँ। इसके ऊपर अधिवक्ता हेगड़े ने मज़ाक करते हुए कहा कि मै भी यही कह रहा हूं आप वकील बनकर हमारे साथ प्रतिस्पर्धा मत बढ़ाइए। 😊

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया— क्या इंसाफ सिर्फ होना ही काफी है, या इंसाफ होता हुआ “दिखना” भी उतना ही ज़रूरी है? अदालत ने फिलहाल इस मांग पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन इस टकराव ने कानून, राजनीति और भरोसे के रिश्ते को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।


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नार्थ कोरिया चुनाव 2026: लोकतंत्र की “मास्टरक्लास”

ताज़ा चुनावी नतीजे आ चुके हैं, और इस बार भी इतिहास खुद को दोहराने से खुद को रोक नहीं पाया।

आंकड़े देखिए और गर्व कीजिए:

 • कुल वोटिंग: 99.9%

 • विजेता उम्मीदवार: 100%

 • विपक्ष: सर्चिंग… Not Found

 • NOTA: “ये क्या होता है?” 🤔


कहते हैं लोकतंत्र में जनता अपने नेता चुनती है…

लेकिन यहाँ तो जनता का काम बस ये कन्फर्म करना है कि नेता वही है, जो पहले से है 😌


रिज़ल्ट का गणित भी बड़ा दिलचस्प है:

 • 100% वोट एक ही उम्मीदवार को

 • 0% असहमति

 • 0% विवाद

 • 0% एग्जिट पोल की ज़रूरत


इतना क्लियर रिज़ल्ट तो मैथ्स के एग्जाम में भी नहीं आता 😄


चुनाव आयोग ने भी बयान जारी किया:

“इस बार भी जनता ने पूरी आज़ादी के साथ वही फैसला लिया, जो उन्हें लेना था।”


मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें थीं,

लेकिन किसी को जल्दी नहीं थी… क्योंकि रिज़ल्ट तो पहले से ही “सेव” था 


मीडिया कवरेज भी शानदार रही:

“देश की जनता ने एक बार फिर से ऐतिहासिक समर्थन दिया!”

(इतिहास हर बार वही रहता है, बस तारीख बदल जाती है)


विपक्ष ने भी शानदार प्रदर्शन किया:

उन्होंने चुनाव में हिस्सा लेकर माहौल को संतुलित रखा…

(हालाँकि उन्हें ढूंढने के लिए माइक्रोस्कोप चाहि)


सबसे बड़ी बात —

यहाँ हारने का कोई डर नहीं,

क्योंकि जीतने वाला पहले से तय है… और बाकी सब “भागीदारी” निभा रहे हैं।


अगर दुनिया के बाकी लोकतंत्रों में भी इतनी “स्थिरता” आ जाए,

तो एग्जिट पोल, डिबेट, और रिज़ल्ट वाले दिन का ड्रामा ही खत्म हो जाए 😄


निष्कर्ष:

नार्थ कोरिया ने फिर साबित कर दिया कि

“लोकतंत्र” सिर्फ एक व्यवस्था नहीं,

बल्कि एक फिक्स्ड डिपॉज़िट है — जहाँ रिज़ल्ट गारंटीड होता है 😌


#NorthKorea #ElectionSatire #Vyanga #PoliticalHumor #Democracy

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साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और इसका नुक़सान


मैं अपने बचपन से चुनावों में सांप्रदायिक नफरत का चक्रव्यूह देखता आ रहा हूं। चुनाव करीब आते ही बीजेपी तुरंत हिन्दू मुस्लिम पर और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां जनता के कामों पर सवाल करने या हिसाब-किताब देने की जगह बीजेपी के चक्रव्यूह में फंसकर उसके एजेंडे पर बात करती नज़र आती हैं। 

यह दोनों तरफ़ की पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता पर लड़ा जाए। क्योंकि इससे दोनों तरफ के लोगों को किसी एक पार्टी को वोट देना मजबूरी बन जाता है। फिर चुनाव में लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके काम हुए या नहीं हुए, देश या राज्य तरक़्क़ी की राह पर जा रहा है या नहीं।

हालांकि कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जब नफरतें चरम पर होती हैं, तो फिर चाहे सेकुलर माइंडसेट वाले हिंदू हों या फिर मुसलमान, दोनों ही कम्युनल एजेंडे पर वोट देने को मजबूर हो जाते हैं और इनकी हार की यही वजह है!

देश के लोगों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि चुनाव इमोशनल इशुज़ की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता के कामों पर होने चाहिए। मतलब क्या काम किए, क्या नाकामी रही और आगे का क्या एजेंडा है, लोकतंत्र इसी का नाम है कि चुनाव के वक्त जनता अपने कामों के हिसाब से वोट दे! 

साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के नाम से होने वाली राजनीति को हाशिए पर लाने का मेरी नज़र में सिर्फ यही एक हल है।

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मुस्लिम प्रजनन दर और उसकी आड़ में जनसंख्या वृद्धि के हौव्वे की राजनीति

भारत में मुस्लिम प्रजनन दर 1992 में 4.4 थी जो कि 2019 में गिरकर 2.4 हो गई। वहीं हिन्दू प्रजनन दर जो कि 1992 में 3.3 थी वो 2019 में गिरकर 1.9 हो गई है। अगर सरकार के इस आंकड़ें को देंखेंगे तो मुस्लिम प्रजनन दर में जितनी तेज़ी से गिरावट आई है, उतनी किसी और समाज में नहीं आई है।

अभी सभी समुदायों की प्रजनन दर तक़रीबन 2 के आसपास है। जिसका अर्थ है 2 लोगों (पति-पत्नि) के द्वारा जन्म दिए बच्चों की संख्या 2 के आसपास है और इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्दी ही ऐसा समय आने वाला जबकि देश की जनसख्या बढ़ने की जगह घटने लग जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर समुदाय में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। आप शिक्षा के असर का इससे अंदाज़ा लगाइये कि शहरों में प्रजनन दर 1.6 रह गई है, जबकि गांवों में यह 2.1 प्रतिशत है। अगर राज्यों की बात करें तो बिहार 3, मेघालय में 2.9, यूपी में 2.4, झारखंड 2.3 और मणिपुर में 2.2 है।

और अगर देखा जाए तो हिन्दू समुदाय की प्रजनन दर (1.9), बौद्ध (1.4), जैन (1.6) और सिख (1.6) समुदाय से ज़्यादा है तो क्या इन समुदायों को हिन्दू समुदाय के विरुद्ध झंडा उठाना चाहिए? 
जन्मदर का ताल्लुक शिक्षा के स्तर से होता है, पर बेशर्मी यह है कि भाजपा इसके हल अर्थात शिक्षा के स्तर को बढ़ाने पर मंथन करने की जगह इसे भी नफरत का हथियार बनाती है।

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दिल्ली की जनता के अधिकार और वोट की कीमत आधी क्यों?

कोई सरकार सिर्फ किसी पार्टी की सरकार भर नहीं होती है बल्कि जनता की प्रतिनिधि होती है और वह अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्षेत्र में काम करती है, उसी के अनुरूप जनता में उसकी जवाबदेही तय होती है और उसी जवाबदेही के अनुसार किये गए कार्यों को लेकर अगले चुनाव में सरकार से संबधित पार्टी मैदान में उतरती है।   इसलिए लोकतंत्र का तकाज़ा यह है कि हर सरकार को उससे सम्बंधित कार्यक्षेत्र में कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो, यही जनतंत्र अर्थात जनता का शासन कहलता है।

केंद्र सरकार ने तानाशाही दिखाते हुए दिल्ली सरकार के अधिकारों को समाप्त किया:

केंद्र सरकार ने  दिल्ली सरकार की राह में रोड़ा अटकाने की, कार्यों को रोकने की हर संभव कोशिश की। दिल्ली सरकार से सर्विस मैटर और एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) को छीन लिया गया, जिसका मतलब यह हुआ कि अगर दिल्ली सरकार किसी काम को करती है तो उसके लिए अपनी पसंद के अधिकारी अपॉइंट नहीं कर सकती है। अगर अधिकारी काम करने में ढील बरते, काम नहीं करे तो उसके खिलाफ एक्शन नहीं ले सकती है और अगर कोई अधिकारी दिल्ली सरकार के काम करने में रिश्वत लेता है तो उसके खिलाफ जाँच और कार्यवाही नहीं कर सकती है। क्या इस तरह कोई सरकार काम कर सकती है?

सरकारी अधिकारी अगर सरकार की जगह विपक्षी पार्टी के अधीन होंगे तो जनता के काम कैसे होंगे:

सोचिये अगर किसी कॉलोनी में गन्दा पानी आ रहा है और अधिकारी इस समस्या पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो मुख्यमंत्री तक को यह पावर नहीं है कि अधिकारी के विरुद्ध एक्शन ले सके, जबकि जल बोर्ड दिल्ली सरकार के अधीन आता है। अगर सरकार को अपने अधीन आने वाले कार्यक्षेत्र में भी काम नहीं करने वाले या रिश्वत लेकर काम बिगाड़ने वाले सरकारी अधिकारियों पर कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होगा तो जनता के काम कैसे होंगे? और फिर यह जनता का राज कहाँ से हुआ?

आप स्वयं विचार करिये कि उन अधिकारीयों/कर्मचारियों को नियुक्त करने का, काम नहीं करने या फिर रिश्वत लेकर काम खराब करने पर जांच करने का, एक्शन लेने का, अधिकार अगर जनता के द्वारा चुने जान प्रतिनिधियों की जगह विपक्षी पार्टी के पास हुआ तो फिर क्या जनता के मत का अपमान नहीं हुआ? और विपक्षी क्यों चाहेगा कि सरकार सही से काम करे? आखिर दिल्ली में यह नियम किस लॉजिक से बनाया गया है?

स्टाफ नियुक्त नहीं होने के कारण मौहल्ला क्लिनिक, हॉस्पिटल्स, स्कूलों सहित सभी विभागों में काम बाधित:

आज दिल्ली सरकार के 7०% से ज़्यादा पद खाली पड़ें हैं, अगर यह पद भर जाते हैं तो कई लाख लोगो को रोज़गार मिल सकता है और दिल्ली सरकार के कामों में कई गुना तेज़ी आ सकती है। पर नौकरियां भरने का अधिकार विपक्षी पार्टी को है और यही वजह है कि सरकार के हर डिपार्टमेंट में पद खाली हैं, काम बेहद धीमा है। कई मोहल्ला क्लिनिक बनकर कई महीनों से धूल चाट रहे हैं, कई स्कूलों में टीचर कम होने की वजह से पढ़ाई बाधित है, कई हॉस्पिटल्स में स्टाफ कम होने की वजह से मरीज़ों का नुकसान हो रहा है, इसकी जवाबदेही किसकी है?

सरकार को नीचा दिखाने के लिए बिना सबूत के गिरफ्तारियाँ और सीबीआई रेड की गईं:

दिल्ली की जनता द्वारा चुने गए 25 से ज़्यादा विधायकों को बिना किसी सबूत के सड़क से उठाकर जेल में डाल दिया, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों पर सीबीआई रेड डलवाकर खुलेआम जनता द्वारा चुनी गई सरकार की बेइज़्ज़ती की गई, पर इसके बावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई एक भी सबूत नहीं मिला। गोदी मीडिया द्वारा खूब जमकर ज़हर उगला गया, किसी भी विज़िबल सबूत के ना होने के बावजूद दोषारोपण ऐसे किया गया जैसे दोष साबित हो गया हो, पर हर बार अदालत में आरोपों के झूठा पाए जाने पर मीडिया को साँप सूंघ गया! उसने फिर एक भी स्टोरी नहीं चलाई और ना ही अपनी गलती स्वीकार की।

चुनी गई सरकार के कार्यों को को नियुक्त किये गए LG के माध्यम से रोका गया:

केंद्र सरकार द्वारा LG के माध्यम से दिल्ली की जनता के हर बिल को अटकाया गया, जाँच के नाम पर कई महीने तक दिल्ली सरकार की सारी फाइलें उठाकर दिल्ली के हर काम को रोक दिया गया। यह तो शुक्र है अदालत का जहाँ से न्याय मिला। विधायक बरी हुए और LG के नाम पर केंद्र की दादागिरी काफी हद तक ख़त्म हुई। यह तो सिर्फ दिल्ली की झलक है, देश में जो तानाशाही की गई, वोह तो इससे भी कहीं ज़्यादा बड़ी है।

फिर भी भाजपा समर्थक पूछते हैं कि तानाशाही कहाँ है? यह किस मुँह से केजरीवाल के इस तानाशाही को ख़त्म करने के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष पर सवाल उठा रहे हैं?

विपक्षी पार्टियों और करप्शन पर आम आदमी पार्टी का रुख:

अरविंद केजरीवाल ने कभी नहीं कहा कि कांग्रेस, भाजपा सहित सारी पार्टियों के सभी नेता करप्ट हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि जिस भी नेता के विरुद्ध विज़िबल सबूत सामने आए हैं, उनकी लोकपाल जैसी संस्था से निष्पक्ष जाँच कराई जाए और तब तक सरकारी पद से ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी द्वारा भी निलंबित किया जाए। आरोप साबित होने पर सख़्त से सख़्त सज़ा दी जानी चाहिए, या फिर बरी होने पर ही सरकारी या पार्टी पद पर वापिस लिया जाना चाहिए।

आम आदमी पार्टी ने अपने मंत्रियों के विरुद्ध भी विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत कार्यवाही की थी, करप्शन ही नहीं बल्कि कैरेक्टर लेस होने के विज़िबल सबूत सामने आने पर तुरंत ही मंत्रिपद ही नहीं बल्कि पार्टी से भी निलंबित किया था, वहीँ एक पूर्व मंत्री को सीबीआई द्वारा जाँच में बरी होने पर ही पार्टी निलंबन ख़त्म किया है।

पर करप्शन खतरनाक होने के बावजूद ऐसा मुद्दा है जो देश से बड़ा नहीं है, अगर देश में लोकतंत्र समाप्त करने, संविधान को ख़त्म करने, संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाने की कोशिशें होती हैं, देश को नफरत के नाम पर बाँटने की कोशिश होती है, तो देश के हर व्यक्ति और हर पार्टी का फर्ज है कि देश को बचाने की मुहिम में शामिल हो। उनमें से अगर कोई करप्ट भी होगा तो अगर संविधान बचेगा, लोकतंत्र बचेगा तो लोकपाल जैसी निष्पक्ष संस्था बनाकर, सख़्त नियम कानून और फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट बनाकर, उन्हें सज़ा दी जा सकती है।

करप्शन ख़त्म किया जा सकता है, दिल्ली सरकार ने तो बिना एसीबी जैसी किसी भी जांच एजेंसी के भी ऑटोप्रोसेस, डोर स्टेप डिलीवरी जैसी इनोवेटिव योजनाओं के द्वारा करप्शन पर रोक लगाई है, जबकि दिल्ली के सभी अधिकारियों की रिपोर्टिंग LG को कर दी गई थी।


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फलफूल रही है नफरत की राजनीति

कट्टरता से नफ़रत, नफ़रत से हिंसा और हिंसा से बर्बादी आती है!

किसी समुदाय के नाम, पहनावे या चेहरे-मोहरे को देखकर या फिर गौमाँस जैसे इल्जाम पर कट्टरपंथी तत्व लोगों को खुलेआम मार रहे हैं और ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं, जबकि उनसे कहीं बड़ी भीड़ उन बाज़ारों में या फिर ट्रेनों में मौजूद होती है। पर नफरत का आलम यह है कि वोह भीड़ चुप रहती है, बल्कि कई जगह तो कट्टरपंथियों में शामिल हो जाती है और मौके पर इतनी भारी भीड़ होने के बावजूदु पुलिस को गवाह तक नहीं मिलते...

पहले जब भी दंगे हुए और लोग मरे तब बचाने वाले और दंगाइयों का विरोध करने वाले खुलकर सामने आते थे, पर अब मौन समर्थन सामने आ रहा है। बल्कि विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहराया जा रहा है, भले ही वोह 10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति ही क्यों ना रहा हो।

क्या ऐसा होना किसी देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए चिंता का सबब नही है? और अगर चिंता व्यक्त की गई तो उसपर विचार करके हल खोजने की जगह नफरत भरी प्रतिक्रिया देना क्या खुद में उसी नफरत को साबित नहीं कर रहा है, जिस पर चिंता ज़ाहिर की जा रही है? 

मैं अपने दोस्तों की सूचि में मौजूद लोगों में भी ऐसी नफरत को देख रहा हूँ। हालाँकि हैरान नहीं हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि कट्टरपंथी मुखर होते हैं और मासूम लोगों को बड़ी जल्दी अपनी ज़द में ले लेते हैं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुल्क इसका जीता-जागता उदहारण हैं!

दरअसल कट्टरपंथी सवाल से डरते हैं, यह कभी नहीं चाहते कि कोई उनके ऊपर उंगली उठाए, उनके फैसलों पर 'सवाल' करे। वोह जो करते हैं, हर हाल में उसे सबसे मनवाना चाहते हैं, सो अब सवाल करने वाला देशद्रोही है। कट्टरपंथी हमेशा से ही सवाल और सवाल पूछने वालों से नफरत करते आए हैं, क्योंकि इनके पास सवालों के जवाब नहीं होते और ना ही जवाब देने की सलाहियत, केवल कुतर्क होते हैं। आप ईरान पर सवाल करेंगे तो यह तूरान का ज़िक्र छेड़ेंगे...

इन नफ़रत पालने वालों को
कहां परवाह है सत्य की
उन्हें बस नफरत है, 
कुछ नामों से, 
कुछ चेहरों से,
कुछ लिबासों से,
और अपने ख़िलाफ़ 
उठती हुई आवाज़ों से...

कट्टरता हमारे मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेती है, जिससे हम विपरीत विचारधारा की तार्किक बातों को भी नहीं देख पाते। इंसानियत के दुश्मनों से सख़्ती से निपटने के लिए देश को एकजुट होना चाहिए, कट्टरपंथी किसी एक धर्म के नहीं होते, इसलिए हर तरफ के कट्टरपंथीयों के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। 

आम हिंदू आम मुस्लिम से नहीं लड़ता और ना ही आम मुस्लिम आम हिंदू से, यह कट्टरपंथी ही हैं जो राजनैतिक आकाओं के इशारों पर नफ़रतें फैलाते हैं। आज हमें यह समझना होगा कि समाज के अंदर फैली यह नफ़रतें हुई नहीं हैं बल्कि पैदा की गईं हैं, इसलिए मुक़ाबले के लिए साज़िशों को बेनक़ाब और मुहब्बतों की कोशिश करनी होंगी। सच्चाई यह है कि नफ़रत की राजनीति 'देशहित' की आड़ में 'देश हिट' कर रही है और इसका जवाब आपसी मौहब्बत और विश्वास है। 

सहिष्णुता, नरमपंथ और मुहब्बत हमेशा से ही मेरे देश की ताकत रही है, इसलिए मैं उन्हें देशद्रोही मानता हूँ जो इसे नफ़रत में बदलना चाहते हैं। सत्ता के लिए नफ़रत की जो खेतियाँ बोई गईं उसकी फसल आज लहलहा रही है, इसलिए देश में हो रही सांप्रदायिक हत्याओं के ज़िम्मेदार वोह भी हैं जिन्होंने नफ़रत के कारोबारियों का समर्थन किया... यह आज की ज़रूरत है कि कट्टरपंथीयों से लड़ने के लिए नरमपंथियों को आगे आएं! 

हालाँकि यह सच है कि हमारे देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी मौहब्बत में अब वोह पहले वाली बात नहीं रही, आपसी रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं... पर हम कोशिश करें, अपने बच्चों को सही सीख दें, मुहब्बत सिखाएं तो शायद फिर से बात बन सकती है... वर्ना नफरत की राजनीति तो अपना काम कर ही रही है!

और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि "जो लोग नफ़रत करते-करते ऊब गए हों वोह मुहब्बत करके देखें, खुशियाँ इसी में हैं!"







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