मुनव्वर राना साहब से ख़ुसूसी मुलाक़ात

एक ऐसे शायर से मुलाकात जिसकी जुबान पर महबूब के पांव की खामोशी नहीं बल्कि कान छिदवाती गरीबी होती है... मिलिए मुनव्वर राना से इस बार के हम लोग में।




कल मेरी ज़िन्दगी को मशहूर शायर जनाब मुनावार राना  साहब के साथ मुलाक़ात का ताउम्र ना भूलने वाला मौका मयस्सर हुआ। इस लुफ्त-अन्दोज़ मुलाक़ात के सफ़र में दीगर हज़रात के साथ जनाब संतोष त्रिवेदी और सानंद रावत जी मेरे हम-कदम थे। एनडीटीवी के प्रोग्राम 'हमलोग' में उनकी आमद की खबर संतोष भाई ने मुझे दी और मालूम किया कि क्या आप आना चाहते हैं... भला इसका जवाब ना में कैसे दिया जा सकता था?

उनसे मिलना, उनको अपनी आँखों के सामने सुनना, मेरे लिए ख्वाब जैसा था, इसलिए बिना सोचे समझे ही हाँ कर दी। इस मुलाक़ात के लिए मैं संतोष भाई का तहे-दिल से आभारी हूँ...

उम्मीद है उनको देख-सुन कर आपको भी एक अजब सा लुत्फ़ मिला होगा!


मुनव्वर राना साहब के साथ खाकसार




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धौखा है हज सब्सिडी

हज सब्सिडी के नाम पर मुसलमानो को धोखा दिया जा रहा है। हमारे देश से हज यात्रा के लिए डेढ़ लाख से अधिक लोग हर वर्ष साउदी अरब की यात्रा पर जाते हैं। जिसमें से सवा लाख लोग हज कमेटी से तथा बाकी अलग-अलग प्राइवेट टूर्स ऑपरेटर्स के ज़रिये जाते हैं।

हमारे देश की सरकार इस यात्रा पर किराए में सब्सिडी देने की बात करती है, जो कि पूरी तरह धौखा है। हज के लिए जेद्दाह जाने का जो किराया आम दिनों में 16-17 हज़ार होता है, इंडियन एयर लाइन्स के द्वारा सरकार वही किराया हज के दिनों के करीब आते-आते कई गुना बढ़ा देती है। पिछले वर्ष यह किराया तकरीबन 52 हज़ार था, इस साल यह करीब 55 हज़ार तक पहुँचने की उम्मीद है।

आम दिनों में पवित्र शहर मक्का में "उमरा" के लिए 20 दिन की यात्रा का खर्च तकरीबन 33-35 हज़ार रूपये ही आता है लेकिन हज के दिनों में यही खर्च बढ़कर दुगने से भी अधिक हो जाता है। हज यात्रा आम तौर पर 40 दिन तक चलती है और इसमें खर्च सवा लाख रूपये के आस-पास होता है। ऐसा केवल इसलिए है क्योंकि हज पर जाने के लिए केवल एयर इंडिया तथा सउदी एयरवेज़ को ही इजाज़त है। सरकार सउदी अरब सरकार के साथ मिलकर यह गोरखधंधा चला रही है, इसी मोनोपोली का फायदा उठाकर हर साल किराया इतना बढ़ा दिया जाता है जिससे कि मुसलमानों को सब्सिडी के नाम पर ठगा जा सके।

यह खुली लूट नहीं है तो और क्या है? अगर डेढ़-दो लाख लोग एक साथ मिलकर किसी भी एयर लाइन्स से टिकट लें तो क्या वहां किराए में छूट नहीं मिलेगी? लेकिन सरकार द्वारा नियुक्त हज कमिटी इस मसले पर चुप है, आखिर क्यों? उन्हें साफ़ करना चाहिए कि वह हाजियों की नुमाइंदगी करती हैं या सरकार की।

इस कदम से सरकार की नियत का अंदाजा लग जाता है, कि वह केवल मुसलमानों की मदद करने का ढोंग करती है, अगर सरकार वाकई मुसलमानों का की मदद करना चाहती तो इस गलत रास्ते को क्यों चुनती है?

जिस छूट पर हज यात्रियों का हक़ है, सरकार उसी हक को सब्सिडी नामक भीख के तौर पर देती है। कम से कम हज यात्रियों का पैसा ही उन्हें छूट नामक झूट के नाम से देती तो भी चलता लेकिन सब्सिडी के नाम से तो यह सरकार की खुली लूट है।

आज ज़रूरत है कि यह आवाज़ उठाई जाए कि या तो हमारा हक दो नहीं तो कम से कम इस सब्सिडी नाम की भीख को समाप्त करो। वैसे भी हज जैसी पवित्र यात्रा के किराए पर सरकार की (झूठी) मदद जायज़ ही नहीं है, हज के लिए जाने वाले जहाँ डेढ़-दो लाख रूपये प्रति व्यक्ति खर्च करते हैं, क्या वह थोडा और पैसा खर्च नहीं कर सकते हैं?



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ग़ज़ल: "अँधेरी रात है खुद का भी साया साथ नहीं"


अँधेरी रात है खुद का भी साया साथ नहीं
कोई अपना ना हो, ऐसी भी कोई बात नहीं

साथ है जो, वोह ज़रूरी तो नहीं साथ ही हो
बात ऐसी भी नहीं, मिलते हो जज़्बात नहीं

कैफियत रात की कुछ ऐसी हुई जाती है
पास लेटा है जो, उससे ही मुलाक़ात नहीं

रिश्ता नयनों का हुआ बारिशों के साथ ऐसा
बादलों को ही यह पहचानती बरसात नहीं

टूटकर चाहा मगर चाहने का हासिल क्या
उसकी नज़रों में जो यह चाहतें सौगात नहीं

अपनी हस्ती को फ़ना कर दिया जिसकी धुन में
उसकी नज़रों में लड़कपन है यह सादात* नहीं

- शाहनवाज़ सिद्दीक़ी 'साहिल'

*सदात = बुज़ुर्गी, गंभीरता



यह ग़ज़ल मैंने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखी थी...




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सीने की बुझी राख में अंगारों की दमक बाकी है




सीने की बुझी राख में अंगारों की दमक बाकी है
हौसले पस्त क्यों हों, जोशीली खनक बाकी है


नादां ना कर गुमां, कि बूढ़ा हो चला है शेर
वोह बाजुओं का ज़ोर और दांतों की चमक बाकी है


मुझको सफ़र का थक चुका रहबर न समझना
हम-कदम रहो, अगर चलने की सनक बाकी है

- शाहनवाज़ 'साहिल'

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क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?

योजना बनकर 'हलाला' करना शरीयत का हिस्सा नहीं है बल्कि इस्लाम के खिलाफ है। मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि इस्लाम के अनुसार तलाक़ क्या होती है और एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी महिला की या उसके पति की उससे नहीं बनती और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है। 


क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?


तलाक़ को इसलिए सख्त बनाया गया है कि पुरुष महिलाओं पर ज्यादतियां करने की नियत से इसका मज़ाक ना बना लें, जब चाहे तलाक़ दिया और फिर जब चाहे दुबारा विवाह कर लिया। इसीलिए तलाक़ के बाद वापिस दुबारा शादी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। यहाँ यह भी बताता चलूँ कि इस्लाम में तलाक़ को सबसे ज्यादा नापसंदीदा काम माना गया है और केवल विशेष परिस्थितियों के लिए ही इसका प्रावधान है।

एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी तलाकशुदा महिला का अपने पति या उसके पति का उसके साथ तालमेल नहीं बैठता और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है, जिसे 'हलाला' कहा जाता है। अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया अर्थात 'हलाला' को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो इस्लामिक कानून के मुताबिक उनके लिए बेहद सख्त सज़ाओं का प्रावधान है। सन्दर्भ के लिए यह लिंक देखा जा सकता हैं.

http://www.islamawareness.net/Talaq/talaq_fatwa0008.html




निकाह की हर एक सूरत में महिला और पुरुष दोनों की 'मर्ज़ी' आवश्यक है

इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला अथवा पुरुष की मर्ज़ी के शादी हो ही नहीं सकती है। अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती 'हाँ' कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं तो इस सूरत में विवाह नहीं होता है। और क्योंकि ऐसी स्थिति में क्योंकि विवाह वैध नहीं होता है इसलिए अलग होने के लिए तलाक़ की आवश्यकता भी नहीं होती है। उपरोक्त संदर्भो से यह साफ़ हो जाता है कि योजनाबद्ध तरीके से किये गए हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है।

मैंने तीन बार तलाक़ हो जाने पर दुबारा विवाह को लगभग नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला 'योजना बनाकर हलाला करने' जैसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी। अगर किसी महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विश्वास है तब तो वह ऐसा गुनाह बिलकुल भी नहीं करेंगे और अगर विश्वास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है, वह देश के सामान्य कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं।


इस विषय के सन्दर्भ को समझने तथा टिप्पणियों के माध्यम से विचारों के आदान-प्रदान के लिए मेरी पिछली पोस्ट पढ़ें.

तलाक़ पर लेख और मेरी प्रतिक्रिया





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गायब होती टिप्पणियों का राज़ - शाहनवाज

हमने ब्लॉग बुलेटिन पर गायब होती टिप्पणियों का राज़ क्या बताया, गूगल बाबा हमसे नाराज़ हो गए और हमारी पोस्ट की फीड को गूगल रीडर पर अपडेट करने से इंकार कर दिया. दोपहर ब्लॉग बुलेटिन पर पोस्ट डाली थी और फीड है कि अब तक अपडेट नहीं हुई है. अब जब फीड अपडेट नहीं हुई है तो पाठकों तक नई पोस्ट की खबर कैसे पहुंचेगी भला? बताता चलूँ कि हर एक ब्लॉग की पोस्ट गूगल रीडर के द्वारा ही फोलोवर्स तक पहुँचती है, चाहे वोह सीधे रीडर पर जाकर, ब्लोगर डेश बोर्ड पर अथवा अपने ब्लॉग पर लगे विजेट पर ताज़ा पोस्ट पढ़ पाते हैं. यहाँ तक कि हमारीवाणी जैसे ब्लॉग संकलक भी तभी पोस्ट अपडेट कर पाते हैं.

इस अकस्मक समस्या के हल के लिए हमने यह रास्ता निकला है. अब देखते हैं गूगल बाबा नज़रे करम करते हैं कि नहीं. आप तब तक नीचे दिए लिंक पर जाकर देखिये गायब होती टिप्पणियों का राज़ तथा ब्लॉग जगत की ताज़ा हलचल.

ब्लॉग बुलेटिन: गायब होती टिप्पणियों का राज़ - शाहनवाज़






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मुस्लिम समाज में तलाक़ का प्रावधान

सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि इस्लाम में विवाह एक कोंट्रेक्ट मैरिज होती है जिसमें क़ाज़ी, वकील तथा 2 गवाहों के सामने कुबूल कर लेने से निकाह हो जाता है तथा विशेष परिस्थितिओं में विवाह को 'तलाक' अथवा 'खुला' के द्वारा विच्छेद किया जा सकता है। मुस्लिम विवाह में गवाह, वकील तथा क़ाज़ी केवल इसलिए होते हैं जिससे कि कोई भी पक्ष विवाह से मुकर ना जाए।

ठीक इसी तरह जब यह एहसास हो जाए कि अब साथ रहना नामुमकिन है और ज़िन्दगी की गाडी को आगे बढाने के लिए अलग होना ही एकमात्र तरीका बचा है, तब ऐसे हालात के लिए तलाक़ का प्रावधान है।

तलाक़ का इस्लामिक तरीका यह है कि जब यह अहसास हो कि जीवन की गाडी को साथ-साथ चलाया नहीं जा सकता है, तब क़ाज़ी मामले की जाँच करके दोनों पक्षों को कुछ दिन और साथ गुज़ारने की सलाह दे सकता है अथवा गवाहों के सामने पहली तलाक़ दे दी जाती है, उसके बाद दोनों को 30 दिन (माहवारी की समयसीमा) तक अच्छी तरह से साथ रहने के लिए कहा जाता है। अब अगर उसके बाद भी उन्हें लगता है कि साथ रहना मुश्किल है तो फिर दूसरी बार गवाहों के सामने "तलाक़" कहा जाता है, इस तरह दो "तलाक" हो जाती हैं और फिर से 30 दिन तक साथ रहा जाता है। अगर फिर भी लगता है कि साथ नहीं रहा जा सकता है तब जाकर तीसरी बार तलाक़ दी जाती है और इस तरह तलाक़ मुक़म्मल होती है।

इसके अलावा 1 तलाक़ देने के बाद तीन महीने तक भी इंतज़ार किया जा सकता है और तीन महीने पूरे होने से पहले साथ रहने या नहीं रहने का फैसला किया जाता है, अगर साथ नहीं रहना है तो तलाक़ हो जाती है। इस हालत में अगर कुछ दिनों या महीनों के बाद दोनों को अगर लगता है कि तलाक़ देकर गलती की है तो दुबारा निकाह किया जा सकता है, पर इस तरीके से भी अलग-अलग बार तीन बार तलाक़ देने के बाद फिर से शादी का हक़ ख़त्म हो जाता है।

इसमें सुन्नी मुस्लिम समाज का 'हनफी', 'शाफ़ई' तथा 'मालिकी' मसलक में एक ही समय में "तीन तलाक़" को भी सही माना जाता हैं, हालाँकि वह भी इस तरीके को अच्छा तरीका नहीं मानते। अन्य मुस्लिम उलेमा एक समय में तीन तलाक़ दिए जाने को "तलाक़" नहीं मानते हैं और कई मुस्लिम देशों में इस तरह से तलाक देने पर व्यक्ति के विरुद्ध सज़ा का प्रावधान है।



महिलाओं को तलाक़ का हक

यह कहना गलत है कि महिलाओं को तलाक़ का हक नहीं है। अगर किसी महिला को पति पसंद नहीं है या फिर वह शराबी, जुआरी, नामर्द, मार-पीट करने वाला, बुरी आदतों या स्वाभाव वाला या किसी ऐसी सामाजिक बुराई में लिप्त है जो कि समाज में लज्जा का कारण हो तो उसे सम्बन्ध विच्छेद का हक है। इसके लिए उसे भी क़ाज़ी के पास जाना होता है। महिला के आरोप सही पाए जाने की स्थिति में विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाता है, जिसको 'खुला' कहा जाता है।

इस विषय में कुछ लोगो का यह कहना है कि जब विवाह पति-पत्नी की मर्ज़ी से होता है तो तलाक़ किसी एक की मर्ज़ी से कैसे हो सकता है। मेरे विचार से ऐसा कहना व्यवहारिक नहीं है, सम्बन्ध हमेशा दो लोगो की मर्ज़ी से ही बनते हैं परन्तु किसी एक की भी मर्ज़ी ना होने से सम्बन्ध समाप्त हो सकते हैं। ज़रा सोचिये अगर किसी महिला का पति उस पर ज्यादतियां करता है, यातनाएं देता है और तलाक़ देने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है तो क्या ऐसे में बिना उसकी मर्जी के तलाक़ के प्रावधान का ना होना जायज़ कहलाया जा सकता है?

एक पुरुष और महिला के दिलों का मिलना और साथ-साथ सामाजिक बंधन में बंध कर रहना विवाह है तो रिश्तों में तनाव या अन्य किसी कारण से साथ-साथ ना रह पाने की स्थिति का नाम 'तलाक़' है।



[इस लेख की अगली कड़ी "हलाला" के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें]

क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?






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एक शाम ढली, फिर सुबह नई


15 मार्च, अर्थात अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार आज मेरा जन्मदिवस है, हालाँकि भारतीय कैलेंडर के अनुसार तो मेरा जन्मदिवस 'चैत्र मास' की पहली तिथि अर्थात रंगों की होली के दिन पड़ता है... आज सुबह से मूड बहुत अच्छा है, सब कुछ नया-नया सा है... मैंने अपनी भावनाओं को यूँ ही कुछ शब्दों की माला में पिरो दिया है.


एक शाम ढली, फिर सुबह नई,
उम्मीद नई, शुरुआत नई

वोह चमकीला सा ख्वाब नया
जज़्बात नए, हर आस नई

हर आंसू गिर कर सूख गया,
अब खुशियों की हो बात नई

यूँ मद्धम-मद्धम चलती सी
यह खुशियों की बारात नई

फिर जीवन खुलकर झूम उठा,
लम्हा-लम्हा सौगात नई

अब रब की पनाह में है 'साहिल'
हर मौज नई, सादात* नई


- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'



*सादात = बुज़ुर्गी


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ब्लॉग को वेबसाइट में कैसे बदलें? - ब्लॉग बुलेटिन

आजकल ईमेल तथा ब्लॉग हैकिंग की खबरे आम हैं, इसलिए अक्सर अपने ब्लॉग का बैकअप लेते रहिये. इसके लिए  ब्लॉग सेटिंग ((Settings) में जाना पड़ेगा, डेश बोर्ड से किसी ब्लॉग की सेटिंग सेक्शन में जाने के लिए सबसे पहले ब्लॉग के नाम के नीचे लिखे "सेटिंग्स" (Settings) पर क्लिक करना है।


सेटिंग में पहुँच कर सबसे पहले "Basic" प्रष्ठ खुलता है, इसमें "ब्लॉग उपकरण" (Blog Tools) के अंतर्गत "ब्लॉग आयात करें  (Import blog) - ब्लॉग निर्यात करें (Export blog) - ब्लॉग हटाएँ" (Delete Blog) नामक 'टेब' नज़र आएँगे। हर एक ब्लॉग की सभी पोस्ट और टिप्पणियां एक XML फाइल में सुरक्षित (Save) होती है। अपने ब्लॉग XML फाइल को आप कभी भी अपने कम्प्यूटर में कॉपी (डाउनलोड) कर सकते हैं अथवा अपने कंप्यूटर से अपने ब्लॉग पर अपलोड कर सकते हैं। 

"ब्लॉग आयात करें" (Import Blog): XML फाइल कंप्यूटर से ब्लॉग के सर्वर पर अपलोड करने के लिए तथा 
"ब्लॉग का निर्यात करें" (Export blog): ब्लॉग की XML फाइल कंप्यूटर में Save अर्थात (डाउनलोड) करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इन दो टूल्स के द्वारा आप कभी भी अपनी ब्लॉग पोस्ट तथा टिप्पणियों का बैकअप अपने कंप्यूटर में सहेज कर रख सकते हैं और किसी दुर्घटनावश पोस्ट डिलीट होने पर उसी फाइल से वापस अपने ब्लॉग पर अपलोड कर सकते हैं.

अगर भविष्य में कभी भी ब्लॉग को समाप्त करना चाहेंगे तो इसे "ब्लॉग हटाएँ" (Delete Blog) पर क्लिक करके समाप्त किया जा सकता है।

आज के दौर में अधिकतर ब्लॉगर अपने ब्लॉग को blogspot.com नाम की जगह अपने खुद के डोमेन नेम के साथ खोलना चाहते हैं. इसके लिए बहुत ज्यादा तकनिकी जानकारी की आवश्यकता नहीं है.


स्वयं की ब्लॉग साईट: 
अपनी स्वयं की साईट बनाने के लिए आपको एक डोमेन नेम अर्थात अपने ब्लॉग का नाम खरीदना पड़ेगा, जैसे मेरे ब्लॉग का नाम www.premras.com है, और साथ ही अगर आप अपनी ब्लॉग-पोस्ट को अपने स्पेस में रखना चाहें तो होस्टिंग पैकेज भी खरीद सकते. होस्टिंग के अंतर्गत उपलब्ध जगह (स्पेस) और डाटाबेस के द्वारा ही ब्लॉग-पोस्ट को सेव किया जाता है.  

किसी अच्छी कंपनी से डोमेन नेम खरीदने का तकरीबन 600 रूपये का खर्च आता है. अगर आप केवल डोमेन नेम ही खरीदना चाहते हैं तो अपनी ब्लॉग पोस्ट blogger.com के द्वारा ही प्रकाशित कर सकते हैं. इसके लिए आपको डोमेन नेम खरीदने के बाद उसकी सेटिंग में कुछ बदलाव करने पड़ेंगे तथा blogger.com की सेटिंग में भी कुछ बदलाव करने पड़ेंगे.

इसके लिए उपरोक्त विधि द्वारा सेटिंग में पहुँचने के बाद प्रकाशन (Publishing) पर क्लिक करना है, आइये प्रकाशन टेब को समझते हैं. 

प्रकाशन (Publishing): अगर आप अपने ब्लॉग के पते के साथ blogspot.com को हटाना चाहते हैं तो डोमेन नेम खरीद कर इस टेब के द्वारा बिना होस्टिंग खरीदे अपनी वेबसाइट चला सकते हैं, इसके अतिरिक्त किसी ब्लॉग को नए पते के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अगर डोमेन नेम खरीदना है तो यह गूगल से भी खरीदा जा सकता है अथवा अपनी पसंद की किसी और कंपनी से भी खरीद सकते हैं। इसके लिए "प्रकाशन" (Publishing) पर क्लिक करने के बाद "कस्टम डोमेन" (Custom Domain) पर क्लिक करना है, अगर डोमेन गूगल से खरीदना चाहते है तो यहाँ नाम के उपलब्ध होने की जांच की जा सकती है, किसी और कंपनी से खरीदना चाहते हैं या पहले से खरीदा हुआ है तो "उन्नत सेटिंग्स पर जाएँ" (Switch to advanced settings) पर क्लिक करना है। नए खुलने वाले प्रष्ट पर लिखे "सेटअप निर्देश" (setup instructions) पर क्लिक करके डोमेन की सेटिंग की जानकारी मिल सकती है। 

अगर आप अपने ब्लॉग को टॉप लेवल डोमेन (top-level domain) जैसे कि www.premras.com पर होस्ट करना चाहते हैं तो जिस कंपनी से डोमेन खरीदा है वहां लोगिन करके डोमेन की सी-नेम (CNAME) सेटिंग में www में लिखकर उसके होस्ट नेम में  ghs.google.com लिखना है. 

इसके साथ ही साथ आप चाहें तो 'ए रिकोर्ड्स' (A-records) में भी बदलाव कर सकते हैं. क्योंकि अगर ए रिकोर्ड्स नहीं डाला जाता है तो बिना www के साईट का नाम लिखने पर ब्लॉग नहीं खुलता है.  

इसके लिए ए रिकोर्ड्स (A-records) की सेटिंग में जाकर फॉर्मेट में डोमेन नेम (जैसे कि premras.com) लिखकर 'ए' (A) सेक्शन में गूगल की 4 निम्नलिखित आई.पी. एड्रेस को भरना है.

216.239.32.21
216.239.34.21
216.239.36.21
216.239.38.21


डोमेन सेटिंग पूरी करने के बाद "आपका डोमेन" (Your Domain) के आगे खरीदे गए डोमेन का पता भर कर प्रष्ट के नीचे लिखे तथा पर "yourdomain.com को www. yourdomain.com पर अग्रेषित करें" (Redirect yourdomain.com to www. yourdomain.com)  के आगे बने बॉक्स में क्लिक करके  "सेटिंग्स सहेजें" (Save) पर क्लिक कर दीजिये। अब आपका वही पुराना ब्लॉग आपके खरीदे गए डोमेन नेम पर खुलने लगेगा।

अपनी साईट / ब्लॉग को ब्लॉगर प्रोफाइल से जोड़ें:
इसके अलावा अगर आपने अपना ब्लॉग वर्डप्रेस अथवा किसी और सेटअप पर बनाया हुआ है तब भी आप उसे अपनी ब्लॉगर प्रोफाइल के साथ जोड़ सकते हैं. इसके लिए उपरोक्त सेटिंग में केवल  "आपका डोमेन" (Your Domain) के आगे अपनी साईट अथवा वर्डप्रेस ब्लॉग का पता भरना है और "सेटिंग्स सहेजें" (Save) पर क्लिक करना है. इससे आपकी साईट आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल के साथ जुड़ जाएगी.



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आज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन









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