कैसा मुख्यमंत्री!

क्या मंत्री / मुख्यमंत्री होने का यह मतलब है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी लाचारी या दूसरों की ज़िम्मेदारी दिखाकर चुप बैठा जाए? या फिर बस प्रेस में यह बयान देकर इतिश्री पा ली जाए कि पुलिस प्रबंधन मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता? पुलिस चाहे किसी के भी अधिकार क्षेत्र में आए, लेकिन अन्य विभागों की तरह उनको भी जनता के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा। और मुख्यमंत्री जनता का प्रतिनिधि होता है, मतलब जनता की आवाज़। प्रदेश की जनता के हित में वोह केवल गदगदी कुर्सी पर दिन और मखमली बिस्तर पर रात बिताने के लिए नहीं बना है।

मानता हूँ कि लोगो को अभी यह बात हज़म नहीं होगी, क्योंकि अभी तक तो हमने आभामंडल से घिरे मंत्री-मुख्यमंत्री ही देखें हैं। रात को सड़कों पर रात गुज़ारने वाला, मुख्यमंत्री देखने पर पेट में हड़बड़ी तो होगी ही, हाज़मा ठीक होने में थोड़ा तो वक़्त लगेगा ही।

बड़े-बड़े लोक-लुभावन वादे बहुत हुए, जनता के द्वारा चुने हुए नेता को लोगो के हक़ के लिए लड़ने वाला ही होना चाहिए, अपने अधिकार क्षेत्र में जनहित के फैसले ले और अधिकार क्षेत्र के बाहर वाले क्षेत्रों में लोगो के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो।

याद रखना अगर हम सुधर गए और वाकई वोट देने लगें तो इन सभी पार्टियों को ऐसा ही बनना पड़ेगा, हर क्षेत्र में जनता का प्रतिनिधि!

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राजनैतिक पार्टियों का मिडिया मैनेजमेंट

क्या इसे मिडिया मैनेजमेंट नहीं कहा जाएगा कि एक तरफ तो नरेन्द्र मोदी के दिल्ली आने पर एयरपोर्ट से ही कवरेज की होड़ लग जाती है और उनकी रैलियों के एक-एक पल को लाइव दिखाया जाता है और फिर ऐसा भी होता है कि उनके दिल्ली में 2 दिन तक रुकने के बावजूद छोटी से भी कवरेज से महरूम रह जाते हैं।

वहीँ दूसरी तरफ राहुल गांधी को कभी तो ज़रूरत से ज्यादा कमज़ोर दिखाया जाता है और फिर अचानक ही महानायक दिखाने की कोशिश की जाती है!

ऐसा क्यों होता है कि अरविन्द केजरीवाल में मसीहा की छवि देखने-दिखाने वाला मिडिया अचानक ही उनमें दुनिया भर की कमियां ढूँढने लगता है।

क्या आज का मिडिया सनसनी फैलाने की ताकत रखने वाले मुद्दों से संचालित हो रहा है या फिर राजनैतिक पार्टियों के उन्हें मैनेज करने की ताकत से? 

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पुरानी स्ट्रेटिजी है भीतरघात

'आप' को इससे भी ज़्यादा भीतरघात के लिए तैयार रहना चाहिए, यह तो किसी को बदनाम करने और उसकी मुहीम को नुक्सान पहुंचाने की सदियों पुरानी स्ट्रेटिजी है। 

मुहम्मद (स.अ.व.) के समय जब कबीले के कबीले उनके साथ आने लगे तो दुश्मनों ने स्ट्रेटिजी बनाई, वह अपने लोगो को भी उनके साथ कर देते और कुछ समय बाद वह लोग उनपर इलज़ाम लगा कर अलग हो जाते, जिससे कि उनके साथ आ चुके या आ रहे लोगो में भ्रम फ़ैल सके। मगर मुहम्मद (स.अ.व.) के आला क़िरदार और सत्य के पथ पर चलने के कारण उनके साथियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

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निकाह की 'हाँ'



हमारे देश के मुस्लिम समुदाय में विशेषकर उत्तर भारत में लड़कों और खासकर लड़कियों से शादी से पहले अकसर उनकी मर्ज़ी तक मालूम नही की जाती है, एक-दुसरे से मिलना या बात करना तो बहुत दूर् की बात है... रिश्ते लड़के-लड़की की पसंद की जगह माँ-बाप या रिश्तेदारों की पसंद से होते हैं. ऐसी स्थिति में निकाह के समय काज़ी के द्वारा 'हाँ' या 'ना' मालूम करने का क्या औचित्य रह जाता है???


शादी के बाद पति-पत्नी विवाह को नियति समझ कर ढोते रहते हैं और हालत से समझौता करके जीवनी चलाते है...

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम‌) ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का प्रस्ताव दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी (स.) ने फरमाया:

 
“तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’
इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

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केजरीवाल जी, यह वक़्त ज़िम्मेदारी निभाने का है

यह वक़्त ज़िम्मेदारी से भागने का नही बल्कि ज़िम्मेदारी निभाने का है. लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और अगले 6 महीने में जनता से जो वादे किए हैं उनकी झलक दिखाई जा सकती है. लोकपाल लागू किया जा सकता है, बिजली के दाम कम किए जा सकते हैं, पानी मुफ्त किया जा सकता है, भ्रष्टाचारियों / काला बाज़ारियो पर लगाम लगाई जा सकती है, और सबसे बढ़कर तो यह कि सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलाई जा सकती है. तो फिर आगे बढ़ते क्यों नही?


क्यों नही 'आप' के नव-निर्वाचित विधायक आज से ही सड़कों पर उतरते हैं, यह देखने के लिए कि कहीं सरकारी अस्पतालों में गरीबों को इलाज से वंचित तो नही किया जा रहा है? कहीं पुलिस थानो में आम आदमी की शिकायतों को अनदेखा तो नही किया जा रहा है? दफ्तरों में रिश्वत का जो निज़ाम चलता है, उससे लोगो को बचाने की कोशिश करनी चाहिए. उनको देखना चाहिए कि कहीं सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस जाम हटाने की जगह आज भी चालान का डर दिखा कर अपनी जेबें तो नही भर रही है? आज भी सड़कों पर अवैध पर्किग के द्वारा जनता को परेशान किया जा रहा है, दुकानदारों के द्वारा सड़कों पर अवैध कब्जा किया जा रहा है, ऐसे में इनका फर्ज़ है कि ध्यान दें कि शिकायत संबंधित विभागों में की जा रही है और एक्शन लिया जा रहा है या नही?

आम आदमी ने आपकी तरफ़ उम्मीद की निगाह से देखा है, उनकी उम्मीद की लौ को बुझने से बचाने के लिए कमर कसिये टीम अरविंद! योजना बनानी शुरू करिये कि कैसे आपके क्षेत्र में ट्रैफिक जाम से छुटकारा दिलाया जा सकता है? कहाँ-कहाँ सड़कों पर गड्डों की एमसीडी में शिकयत तक नही हुई हैं? कहाँ पर बिल्डर पैसा खिला कर गैर-कानूनी कम कर रहे हैं? इन सब या इन जैसी अनेकों परेशानियों से आम आदमी को निजात दिलाने की ईमानदार कोशिश के लिए किसी काँग्रेस या भाजपा से समर्थन की ज़रूरत नही है...

हालाँकि सरकार बनाने के लिए भी किसी दल के समर्थन की आवश्यकता नही है बल्कि आज की स्थिति के अनुसार दूसरे दलों को आपकी सरकार गिरानी पड़ेगी, जो किसी भी दल के लिए कम से कम अगले लोकसभा चुनाव से पहले तो संभव नही है. और यही मौका है यह दिखाने का कि बात केवल वादों, प्रदर्शन की नही थी बल्कि ज़मीन पर उनको हक़ीक़त में बदलने का इरादा था. अगर काँग्रेस या भाजपा आपकी सरकार गिराने की कोशिश करेंगे तो ख़ुद अपनी स्थिति ही खराब करेंगे. और फिर कैसे आप इस मुश्किल समय में राजनैतिक नफ़े-नुकसान को जनता के हित से ऊपर करके देख सकते हैं? अगर ऐसा ही है तो फिर क्या फर्क राह जाएगा आपमें और बाकी राजनैतिक दलों में?

आज जनता ने जो मौका दिया है उसे गँवाए बिना अरविंद केजरीवाल को आगे बढ़कर दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए. उनको दिखाना चाहिए कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले सरकार चला कर दिखा सकते हैं, बद्लाव ला कर दिखा सकते हैं... वरना मायूस जनता उसी ढर्रे पर वपिस लौट जाएगी, उसी सोच के साथ कि 'कुछ नही हो सकता' और 'यहाँ तो ऐसे ही चलता है'!






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परिस्थितियों को आत्म विश्वास से करें काबू



जब आपका मजाक उड़ाया जाता हैं तब इसको नियति ना बनने दें, बल्कि ऐसी परिस्थिति में इस चुनौती को आप अपने दृढ़ विश्वास के द्वारा और भी अधिक आसानी से अपने हित में कर सकते हैं.

मजाक उड़ाना एक नकारात्मक प्रतिक्रिया है, जिसके कारण सकारात्मक प्रवत्ति के लोग दुगने वेग से आपके पक्ष में आएँगे - Shah Nawaz

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क्या टीम अरविन्द को मौका मिलना चाहिए?


मैं अन्ना जी और अरविन्द केजरीवाल दोनों का मुद्दों पर आधारित प्रशंसक हूँ, आज के राजनैतिक परिवेश में मुझे राजनैतिक भ्रष्टाचार दूर करने और देश की व्यवस्था में बदलाव लाने का केवल यही एक रास्ता और मंच नज़र आता है, हालाँकि मैं इनकी किसी भी गलत बात का कभी भी समर्थन नहीं करूँगा, बल्कि खुलकर विरोध करूँगा। क्योंकि मेरा मानना है कि सही बात का समर्थन हो, या ना हो... मगर गलत बात का विरोध हर हाल में होना चाहिए।
इसी आधार पर मैं यह मानता हूँ कि मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद हो सकते हैं और मतभेदों का होना गलत भी नहीं हैं। दोनों की राहें जुदा भी हो जाएं मगर फिलहाल तक मंज़िल एक ही नज़र आती है।
अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने एक कदम आगे बढ़कर जनता के बीच जाने का फैसला किया है, ताकि जनता उन्हें / उनके मुद्दों को / उनके द्वारा मुद्दों को उठाने के तरीके को या फिर उनके द्वारा व्यक्त किए गए समाधान को सीधे चुन सके या नकार सके। उनका यह कदम उन्हें अपने सुझावों को लागु करने का उत्तरदायित्व उठाने वाला दिखाता है।
इसके बावजूद मैं यह भी मानता हूँ कि अधिकतर लोगों ने इन्हे अभी तक मीडिया या व्यक्तिगत तौर पर केवल जाना भर है, पहचाना नहीं है। और मुझे लगता है कि पहचानने के लिए मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि तस्वीर उसके बाद ही साफ़ हो पाएगी।




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घटिया राजनीती - ऊबते लोग


दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...


देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...

और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?

ख़ुदा खैर करे!!!
 
 
(Photo courtesy: Aajtak)

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शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम


यजीद अपनी बदबख्तियों पर दीन की मुहर लगाना चाहता था और इसीलिए वोह चाहता था कि हज़रत मुहम्मद मुस्तफा के प्यारे नवासे हुसैन (र.) उसकी बातों पर मुहर लगाएं, मतलब कि उसके हाथ पर बै'त करें। मगर हुसैन (र.) ने खुद अपने आप और अहल-ओ-अयाल का शहीद हो जाना पसंद किया लेकिन दीन को मिटते देखना गंवारा नहीं किया।

जिन लोगो ने मुहर्रम की दसवीं तारीख मतलब आज ही के दिन हज़रत हुसैन (रज़ी.) और उनके साथियों को इस कदर वहशियाना तरीके से शहीद किया वोह लोग यजीद और यजीदी सोच के पेरुकार थे... और उनका मक़सद किसी भी क़ीमत पर सत्ता पर कब्ज़ा था...

और यह सोच आज भी जिंदा है, चाहे वोह सत्ता मुल्कों की हो या समूहों की... और ऐसी सोच के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना और मज़हब के नाम पर हो रही बदबख्तियों के खिलाफ आवाज़ उठाना ही शहादत-ए-हुसैन का पैग़ाम है।

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इंसानी ग़ैर-बराबरी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें

जिस तरह से मेरा नाम मेरी पहचान है उसी तरह मेरे सरनेम से मेरे खानदान की पहचान जुडी है। इससे मैं किसी से बड़ा या छोटा नहीं होता। कोई भी इंसान बड़ा या छोटा केवल और केवल अपने विचारों और उस पर अमल से होता है। दुनिया में हर इंसान बराबर है। ज़ात/बिरादरी और मज़हब के नाम से जुडी इस छोटे-बड़े की ज़ंजीरों से निजात पाना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

इसके लिए ज़रूरत अपना सरनेम छोड़ने की नहीं बल्कि घटिया विचारों को छोड़ने की है। ऐसी सोच वालों की इस तरह की सोच का खुलकर विरोध कीजिये। जिस तरह मस्जिद में बिना भेदभाव कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होते है, आप ठीक उसी तरह दिलों में सबको बराबरी का भागिदार बनाइये।

उठिए, आवाज़ उठाइये!








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