अजब सांपला की गज़ब कहानी

यूँ तो हिंदी जगत में ब्लॉगर मिलन अक्सर होते हैं और अक्सर यह चर्चा भी रहती है कि ब्लॉगर मीट सार्थक होती है अथवा नहीं. हालाँकि सार्थकता के मायने हर इक के लिए अलग होते हैं, फिर भी एक सार्थक बात तो हर एक ब्लॉगर मीट में होती ही है और वह है दिलों का मिलना. आज जहाँ हर ओर नफरत के गीत गाए जा रहे हैं ऐसे में मुहब्बत के माहौल में मिलना-मिलाना खुशगवार हवा के झौंको से कम बिलकुल भी नहीं है.

मिलने-मिलाने की आड़ में, 
आपस में दिल मिलते रहे

बस 'प्रेम रस' बढ़ता रहे,
यूँ इश्कियां फूल खिलते रहे.

अगर बात अपनी कहूँ, तो हर एक ब्लॉगर मीट में बहुत कुछ सीखने का मौका मिला है. आभासी दुनिया  से निकल कर असल दुनिया में ब्लॉगर बंधुओं से मिलने पर जिम्मेदारियों का एहसास हुआ. इस बार भी कई साथियों से तकनिकी स्तर पर बहुत सारी सार्थक वार्ताएं हुई. बहुत सी बातें सीखी और बहुत से साथियों को बहुत सारी बातें सिखाने का वादा हुआ. बल्कि मेरे विचार से तो हर एक ब्लॉगर मीट में तकनिकी कार्यशाला का इंतजाम अवश्य होना चाहिए.

चलिए अब चलते 'अजब' सांपला  (के ब्लॉगर मिलन) की 'गज़ब' कहानी की ओर:-



हर एक धांसू कहानी की तरह यहाँ भी, धुरंधर 'अजय कुमार झा' की 'धमाकेदार एंट्री'


डायरेक्शन टीम से अंतर सोहिल तथा  राज भाटिया जी अजय झा को सीन समझाते हुए 


थोड़ी देर बाद ही दूसरी टीम भी लाल कारपेट पर चलने की बेताबी लिए आ पहुंची.



सबसे पहले कैमरों की निगाह  ब्लॉगिंग के रजनीकांत 'महफूज़ अली' पर पड़ी


कैमरों को देखने के बाद इनका 'अंदाज़' देखिये ज़रा


उनके पीछे-पीछे श्रीमती संजू तनेजा तथा मुकेश कुमार सिन्हा भी गर्म जोशी से आते हुए दिखाई दिए


आते ही गलियारों में चर्चा शुरू हो गई, हर कोई महफूज़ भाई की इस बेहतरीन शक्सियत की महफूज़गी  का राज़ जानने को उत्सुक नज़र आ रहा था और 'वह बताने में'!
(बाएँ से) हँसते रहो फेम राजीव तनेजा, श्रीमती राज भाटिया, श्रीमती संजू तनेजा तथा महफूज़ अली.


अंजु चौधरी से बतियाते महफूज़ भाई



कुछ फोटो खींचने में तो खुछ देखने में मशगूल!



और अजय भाई जायज़ा लेने में मशगूल!



हो जाए एक ग्रुप फोटो 




एक और बड़ी सी ग्रुप फोटो!!!



मशहूर चर्चाकार वंदना जी केवल राम से चर्चा करते हुए.


रिश्तों की यह गर्मजोशी तो देखिये



बात और भी आगे बढती हुई...


चेहरों पर मिलने की इतनी ख़ुशी देखने के बाद भी सार्थकता में कुछ कमी रह गयी है क्या?
(जाट देवता के साथ महफूज़)


ब्लॉग्गिंग के गुर सीखते-सीखाते एक छोटी कार्यशाला...


लीजिये नाश्ते का समय हो गया...


हमारे कैमरे की पसंदीदा  डिश 'बिस्कुट्स', हालाँकि हमें तो पकौड़े अधिक पसंद आए.



शायद बताया जा रहा है सौ-सौ टिप्पणियों का राज़ :-)


संजू भाभी राजीव तनेजा को समझा रही है कि ज्यादा खर्चा मत करो, अभी थोड़ी देर पहले तो जेब खर्ची दी थी... क्या सब उड़ा दिया?


और महफूज़ भाई का यहाँ कहना है कि ब्लॉग्गिंग का यही मज़ा है, जितना मर्ज़ी पकौड़े खाओ, सेहत फिर भी तंदुरुस्त रहती है...


यह देखिये, दिखा-दिखा कर खाया जा रहा है.


थोड़ी देर से ही सही खुशदीप भाई की टीम भी आ पहुंची, आते ही उनका स्वागत किया इंतज़ार करते कैमरों के फ्लैश ने. इतने कैमरे चलने लगे कि उनको ऑंखें खोलना भी मुश्किल हो गया है जी...


एक शानदार पोज़ देते हुए... (बाएँ से) खुशदीप सहगल, सर्जना शर्मा जी तथा श्रीमती एवं श्री राकेश कुमार जी


लो जी गन्ना प्रतियोगिता शुरू हो गयी है...


फिर से एक ग्रुप फोटो...


श्रीमती एवं श्री राज भाटिया जी मेहमानों का इस्तक़बाल करते हुए...


परेशान मत होइए, यहाँ कुछ गुस्सम-गुसाई नहीं हो रही है... टिप्पणियों के लेन-देन पर चर्चा भी नहीं हो रही है, बल्कि ब्लोगिंग पर गंभीर चिंतन हो रहा है भय्या!!!


लीजिये हम भी आ गए एक ग्रुप फोटो के लिए...


गर्मजोशी यहाँ भी है...


और यहाँ भी...

यह वाला फोटू तो देखिये ज़रा...



एक ग्रुप बैठ कर भी नज़ारा ले रहा है...




और बाहर गन्ना प्रतियोगिता और फोटो सेशन साथ-साथ


चलिए यहाँ भी चर्चा शुरू हो गयी...


गन्ना प्रतियोगिता चालू है...



गन्ना पकड़ कर ब्लॉग चर्चा कैसे की जा सकती है, यही समझा रही हैं वंदना जी श्रीमती भाटिया जी को...


लीजिये अलबेला खत्री जी भी पहुँच गए. संजय भास्कर स्वागत करते हुए...


और पद्म भाई की पद्मवाली का जायजा लेते हुए अजय भाई...



अब बारी आई अपनी-अपनी बात कहने की...


इंदु जी का प्यार और दुलार देखकर ख़ुशी के आंसू झलकने लगे...


देखिये कैसी तन्मयता से सुना जा रहा है...


दूसरी और का द्रश्य भी देख लीजिये...


ब्लॉगप्रहरी कनिष्क कश्यप अपनी बात रखते हुए....


एक अलग अंदाज़....


यह शायद 'मेरे विचार मेरे ख्याल' ब्लॉग वाले सुशील गुप्ता जी हैं...


और जब खुशदीप भाई बोले तो सब एक सुध होकर सुनते ही रह गए....




राजीव भाई ने कहा..... हँसते रहो



अंजु चौधरी बोल रही है और कई कैमरे उनका पीछा कर रहे हैं...



संजू भाभी ने भी अपनी बात रखी....


वंदना जी के समय लाईट थोड़ी कम हो गयी थी...


सर्जना जी भी ब्लोगिंग और मीडिया के कई राज़ खोले...


केवल और केवल 'केवल' भाई...



और आई अब अजय भाई की बारी....


एक-एक पॉइंट कुछ इस अंदाज़ में बयां हो रहा है...


ज़रा यह अंदाज़ तो देखिये..



लीजिये खाना शुरू हो गया...



महफूज़ भाई की सेहत का राज़ तो लगता है कि बस पापड़ खा कर ही काम चलाने वाले हैं.... :-)



अलबेला जी कह रहे हैं कि 'महफूज़ सिर्फ पापड़ खाने से पेट नहीं भरेगा'



बातें छोडो, खाना खाओ यार...


ब्लॉग-चर्चा


कुंवर जी अकेले ही?



अलबेला-शाह



इतनी गभीरता??? या फिर पोज़ देने में शर्मा रहे हैं?


फोटो खिचवाना हो तो ऐसे खीचवाइए  ना...


या फिर ऐसे....
(व्यंजना शुक्ल के साथ योगेन्द्र मौदगिल)


सिक्योरिटी का भी पूरा इंतजाम था, हर कोने-कोने पर नज़र रखी जा रही थी... ताकि कोई परिंदा भी पर ना मार सके...



विदाई का समय नज़दीक है...


और यह आखीर वाला पोज़...



कीर्ति नगर मेट्रो स्टेशन पर...



अजय भाई अपने कैमरे के फोटो जांचते हुए....


लीजिये मेट्रो आ गयी...



जब इत्ते फोटो झेल ही लिए हैं तो यह अखीर वाला हमारा फोटू भी झेल लो भय्या...

Read More...

रौनकें नई लाया है त्यौहार-ए-नया साल



रौनकें नई लाया है त्यौहार-ए-नया साल।

खुशियों पे आज छाया है ख़ुमार-ए-नया साल।।

हर होंट पे तबस्सुम आज चमचमा रही है।

शौखियों पे यूँ आया है निखार-ए-नया साल।।




नव वर्ष 2012  की ढेरों शुभकामनाएँ!

Read More...

छोटी बात: रौनकें नई लाया है त्यौहार-ए-नया साल





नव वर्ष 2012 की ढेरों शुभकामनाएँ!


छोटी बात पर पढ़िए:-

रौनकें नई लाया है त्यौहार-ए-नया साल

Read More...

खतरनाक आयटम!



मम्मी के हाथों कुछ ही देर पहले पिटा बच्चा पिता के आते ही उनसे बोला- 



"डैडी! क्या आप कभी अफ्रिका गए हो?"


छोटी सी बात है, अगर मेरे ब्लॉग "छोटी बात" पर पूरा पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें...





Read More...

कांग्रेसी नेताओं की अन्ना हज़ारे को धमकी



कांग्रेसी नेताओं ने अन्ना हज़ारे को धमकी दी - 
अन्ना उत्तर प्रदेश आए तो देख लेंगे...
आखिर अपनी रोज़ी छिनना कौन बर्दाश्त करेगा भाई?





वहीँ एक नेता ने कहा कि
अगर अन्ना ने राहुल बाबा को कुछ कहा तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे.

बात भी सही है, अगर युवराज पर इलज़ाम लगेगा तो उसके राज्य की जनता चुप कैसे बैठेगी? फिर हर एक को अपने नंबर बढाने का भी तो हक है...

Read More...

कोलकाता जैसे हादसों के ज़िम्मेदार हम हैं!

कोलकाता के हादसे ने कितने ही लोगो की जान ले ली, बल्कि हमारे देश में तो रोज ही हज़ारों लोग इस तरह की लापरवाही तथा भ्रष्ठ तंत्र के शिकार बनते हैं. 'मेरा काम आसानी से होना चाहिए', और 'यहाँ तो ऐसे ही चलता है' जैसी सोच ही इस लापरवाही और भ्रष्ठ तंत्र की ज़िम्मेदार है.

सरकार अथवा प्रबंधन को कोस कर, कुछ दिन के लिए लोग जागरूक बन जाएँगे. अपने आस-पास की कमियों पर नज़र जाएगी, तब्सरे होंगे, शिकायते होंगी... और उसके कुछ दिन बाद फिर से वही सब पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा, अगले हादसे तक...

क्योंकि 'यहाँ तो ऐसे ही चलता है', दुनिया जाए भाड़ में 'मेरा काम आसानी से होना चाहिए'

Read More...

अलविदा प्यारी बहन तब्बू, बहुत याद आओगी...

पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता बहुत ज्यादा बढ़ी हुई थी, दीपावली के चलते दफ्तर में काम बहुत अधिक था, ऊपर से एम.बी.ए. की परीक्षा चल रही थी। इधर हमारीवाणी के अपने सर्वर पर स्थानांतरण के कारण वहां पर भी टेक्नीकल काम करने थे। लेकिन ना केवल मुझे बल्कि पूरे घर को चिंता थी मेरी छोटी मामाज़ाद बहन 'इरम' की शादी की तैयारियों की, जो कि 20 नवम्बर को तय हुई थी। सारा घर खुशियों से भरा हुआ था और तैयारियों में व्यस्त था, लेकिन मेरी परेशानी यह थी कि उससे केवल दो दिन पहले मेरा एम.बी.ए. का इम्तहान था।

बात 8 नवम्बर की है, शाम को दफ्तर से आते ही मैं पढने की तैयारियों में जुट रहा था, तभी खबर मिली की मेरी प्यारी लाडली बहन 'तबस्सुम' अचानक इस दुनिया से चली गयी। 3 महीने पहले पीलिया हुआ था, ईद से अगले दिन अचानक तबियत खराब हुई, गाँव में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव के कारण शहर ले जाया गया, लेकिन उसकी सांसे रास्ते में ही जवाब दे गयी। उस वक़्त का मंज़र बयान करना नामुमकिन है। 'तबस्सुम' 'इरम' से छोटी थी और मामा साहब की जान थी। वह तबस्सुम को अपना बेटा कहते थे। भाई-बहनों की पढाई से लेकर घर तथा खेती का हिसाब-किताब तक वही संभालती थी।

बड़ी बहन 'इरम' की शादी की सारी की सारी तैयारी तबस्सुम ने खुद ही की थी। हर एक छोटी से छोटी चीज़ वोह खुद ही बड़ी हसरतों से खरीदकर लाई थी और खुद बड़ी बहन की विदाई से पहले ही विदा हो गयी। कहाँ घर में बड़ी बहन के ससुराल जाने की तैयारी चल रही थी और कहाँ हमें उसके 10-12 दिन पहले ही छोटी को विदा करना पड़ा और वह भी हमेशा के लिए...! 

शादी की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी, सारे कार्ड बांटे जा चुके थे,  इसलिए तय किया गया कि 'शादी को तय समय के अनुसार ही किया जाए, जो कि 20 तारिख को अल्हम्दुलिल्लाह मुक़म्मल हो गयी।

तबस्सुम और इरम दोनों ही का बचपन हमारे घर में गुज़रा है इसलिए खासतौर पर इन दोनों से ही जुड़ाव बहुत अधिक रहा, तबस्सुम को मैं प्यार से 'तब्बू' कहा करता था। तब्बू पढने लिखने में बहुत तेज़ थी, बिजनौर से एल.एल.बी की पढाई कर रही थी और बड़ी होकर मजिस्ट्रेट बनना चाहती थी। उसको चित्रकारी के साथ-साथ ना'त, हमद, नज़्म इत्यादि पढने का बहुत शौक था। नीचे उसी की कुछ दिन पहले ही पढ़ी हुई एक नज़्म का लिंक दे रहा हूँ, इस नज़्म को पढ़ते समय जब तब्बू 'जब मेरी रूह निकलेगी, रोएंगे घर वाले' पर पहुंची तो उसका गला भर आया था, जैसे उसे जल्द आने वाले इस मंज़र का इल्म हो गया हो...!!! 

Read More...

जानवरों की कुर्बानी क्या है?

जैसा कि मैं पहले भी अपनी पोस्ट में बता चूका हूँ कि इस्लाम के अनुसार अन्य जानवरों के साथ-साथ पेड़-पौधों में भी जीवन होता है , चाहे जानवर हो या पेड़-पौधे, दोनों को ही दुःख का अहसास होता है, यह अलग बात है की वह अपने दुःख का प्रदर्शन करने में असमर्थ हैं। अन्य जानवरों की ही तरह पेड़-पौधों का साँस लेना, खाना-पीना,  प्रकृति को आगे बढाने के लिए अंडे देना बिलकुल अन्य जीवों की ही तरह होता है और यह केवल इस्लाम ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म तथा विज्ञान का भी मत है। लेकिन हर एक जीव को जीवित रहने के लिए दूसरे को भोजन बनाना प्रकृति का नियम है। ठीक इसी तरह मरने के बाद दफ़नाने के विधि में शरीर ज़मीन के अन्दर रहने वाले दूसरे जीवों के भोजन के काम में आता है।

अगर बात कुर्बानी की करें तो इसमें एक बात तो यह है कि मुसलमान कुर्बानी केवल ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर ही नहीं बल्कि आम जीवन में अक्सर करते रहते हैं। जो कि कई तरह की होती है जैसे इमदाद के लिए जानवर की कुर्बानी, सदके के लिए कुर्बानी और ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर कुर्बानी इत्यादि।
  • इसमें से इमदाद अर्थात मदद करने की नियत से की गई कुर्बानी के द्वारा अपने घर वालों, रिश्तेदारों, पडौसियों और अन्य गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है और इस तरह के भोजन को केवल घरवालो को ही नहीं खिलाया जाता बल्कि गरीब रिश्तेदारों, पडौसियों और अन्य गरीबों को भी भोजन कराया जाता है।
  • दूसरी तरह की कुर्बानी अर्थात सदके के लिए की गई कुर्बानी से बनने वाले भोजन को केवल और केवल गरीब लोगों को खिलाया जाता है, इसमें घरवालों का हिस्सा नहीं होता।
  •  तथा तीसरी तरह की कुर्बानी अर्थात ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) वाली कुर्बानी के लिए अच्छा तरीका यही है कि मांस अथवा पके हुए भोजन के तीन हिस्से किये जाए और उसमें से एक हिस्सा अपने घर वालों के लिए, दूसरा हिस्सा गरीब रिश्तेदारों के लिए तथा तीसरा हिस्सा अन्य गरीब लोगों के लिए निकाला जाए। हालाँकि इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं है, बल्कि जिसकी जैसी आस्था है वह उस हिसाब से भी बंटवारा कर सकता है।

कुर्बानी क्या है?
इसमें बहुत सी अन्य दलीलों के अलावा एक बात यह भी है कि इन तीनो ही तरीकों में कोई भी मर्द / औरत चाहता / चाहती तो उसके द्वारा अपने जानवर अथवा पैसे को खुद अपने काम में प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन उसने अपने अन्दर के लालच को कुर्बान करके अपने घरवालो, गरीब रिश्तेदारों तथा अन्य गरीबों को लिए भोजन की व्यवस्था की।

अगर बात कुर्बानी के तरीके की जाए तो यह जान लेना आवश्यक है कि मुसलमान हर एक धार्मिक कार्य पैगम्बर मुहम्मद (स.) के तरीके पर करते है, जिसे कि सुन्नत अथवा सुन्नाह कहा जाता है। सुन्नत के अनुसार ऊपर के दोनों तरीकों में भोजन के लिए मांसाहार अथवा शाकाहार दोनों में से किसी भी तरीके को अपनाया जा सकता है, लेकिन ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) के मौके पर केवल कुछ जानवरों को ही भोजन के तौर पर प्रयोग करने की इजाज़त है और वह भी कुछ शर्तों के साथ।

साथ ही यह बात भी जान लेना आवश्यक है कि इस्लाम में जानवरों और पेड़-पौधों पर खासतौर पर रहम और मुहब्बत का हुक्म है और भोजन जैसी आवश्यकता को छोड़कर उनका वध करना वर्जित है। यहाँ तक कि इसको बहुत बड़ा गुनाह और नरक में पहुंचाने वाला बताया गया है। बल्कि पेड़ों को पानी डालना तथा प्यासे जानवर को पानी पिलाने जैसे कामों के बदले में बड़े-बड़े गुनाहों को माफ़ करने जैसे ईनाम है।

Read More...

ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) पर ऐतराज़

ईद-उल-ज़ुहा (बकराईद) का मौका आते ही मांसाहार के खिलाफ विवादित लेख लिखे जाने शुरू हो जाते हैं और ऐसा साल-दर-साल चलता आ रहा है। हालाँकि बात अगर तार्किक लिखी गयी हो तो किसी भी तरह के लेख से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हर किसी को शाकाहारी अथवा मांसाहारी होने का हक है और इसी तरह अपने-अपने तर्क रखने का भी हक है। लेकिन किसी भी सभ्य समाज में इसकी आड़ में किसी धर्म को निशाना बनाए जाने का हक किसी को भी नहीं होना चाहिए। जब मैं नया-नया हिंदी ब्लॉग जगत में आया था, तब किसी ना किसी विषय हिन्दू-मुस्लिम वाक्-युद्ध आम बात थी, जिसके कारण दिन-प्रति दिन कडुवाहट बढती जा रही थी। लेकिन कुछ अमन पसंद ब्लॉगर्स के प्रयास से धीरे-धीरे लोग दोनों तरफ से लिखे जाने वाले विवादित लेखों से दूर हटने लगे। हालाँकि इस बीच लगातार इस तरह के लेख लिखकर आग भड़काने की कोशिश की जाती रही। बकराईद के विरोध में लिखे लेखों को भी मैं इसी कड़ी में देखता हूँ।

हर एक धर्म को मानने वाला अलग-अलग परिवेश में बड़ा होता है, उनके खान-पान, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास में भिन्नता होती है, लेकिन हम अक्सर दूसरे धर्म की बातों को अपनी मान्यताओं  और अपनी सोच के पैमाने पर तोलते हैं। और किसी भी बात को गलत पैमाने से जांचे जाने की सोच के साथ हर एक धर्म की हर एक बात पर ऊँगली उठाई जा सकती है और अगर ऐसा होने लगा तो यह समाज के लिए बहुत ही दुखद स्थिति होगी।

जहाँ तक बात ईद-उल-ज़ुहा अर्थात बकराईद पर ऐतराज़ की है, तो सभी तरह के एतराज़ का जवाब पहले ही दिया जा चूका है। ईद-उल-ज़ुहा कुर्बानी का त्यौहार है, क्योंकि मांस अक्सर मुसलमानों के द्वारा भोजन के तौर पर प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस दिन बकरा, भेड़, ऊंट इत्यादि जानवरों का मांस अपने घरवालों, गरीब रिश्तेदारों  तथा अन्य गरीबों में बांटा जाता है। हालाँकि गाय की कुर्बानी की इस्लाम में इजाज़त है, लेकिन भारत में हिन्दू धर्म के अनुयाइयों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मुग़ल साम्राज्य के दिनों से ही गाय की कुर्बानी की मनाही है, दारुल-उलूम-देवबंद जैसे इस्लामिक संगठन भी इसी कारण हर वर्ष मुसलमानों से गाय की कुर्बानी ना करने की अपील करते हैं।

अगर जानवरों की कुर्बानी पर एतराज़ की बात की जाए तो इसमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि इस्लामी मान्यता के अनुसार (बल्कि हिन्दू धर्म की मान्यता और विज्ञान के अनुसार भी) केवल जानवरों में ही नहीं बल्कि हर एक पेड़-पौधे में भी जीवन होता है, वह भी साँस लेते हैं, भोजन करते हैं, बातें करते हैं, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में अहसास भी होता है, वह भी अन्य जीवों की तरह मसहूस कर सकते हैं।  अर्थात किसी पेड़-पौधे और अन्य जीव में अंतर नहीं होता और वह भी जीव ही की श्रेणी में आते हैं। जैसे जानवर अंडे / दूध  देते हैं उसी तरह पेड़-पौधे फल / दलहन / बीज देते हैं, जिससे की उनकी नस्ल आगे बढती रहे।

लेकिन यह सब जानने के बावजूद पढ़े-लिखे, यहाँ तक कि चिकित्सा और अध्यापन जैसे पेशे से जुड़े लोग भी जान-बूझकर ऐसे एतराज़ उठाते हैं जो कि लोगो की भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। बल्कि दिव्या जी तो इससे भी आगे बढ़कर मांसाहार करने वालों को दरिन्दे और आतंकवादियों की श्रेणी में रखती हैं, क्या यह कहीं से भी तर्कसंगत है?

हालाँकि ऐसे भड़काऊ लेख दोनों ही तरफ से लिखे जाते हैं और ज़रूरत ऐसे लेख लिखने वालो को हतोस्ताहित करने की है, लेकिन अक्सर ऐसे लेखों को पढने वालों एवं टिपण्णी करने वालों की संख्या दूसरे लेखों के मुकाबले कहीं अधिक होती है, जो कि लेखक के लिए उर्जा का कार्य करती है।

Read More...
 
Copyright (c) 2010. प्रेमरस All Rights Reserved.