क्या अब आपका नंबर है?

एक 21 साला यौवना को तलाश है एक सुयोग्य वर की. आपको बताते चलते हैं कि वह 2000 करोड़ की संपत्ति की मालकिन है. :-)

अब सारा समय ख्वाब देखने में ही मत लगाइए, चलिए मैं आपको उसकी फोटो दिखा देता हूँ. जिसे देखकर आप स्वयं निर्णय ले सकते हैं कि...........

क्या अब आपका नंबर है? ;-)







परेशान क्यों हो रहे हैं? आगे भी बता रहा हूँ! इस युवती का नाम निशिता शाह है और यह फोर्ब्स में नाम पाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला हैं। फोर्ब्स पत्रिका दुनिया के सबसे रईस लोगों की सूची बनाती है। उसने निशिता को आगामी पीढ़ी की एशियाई अरबपतियों की 40 नाम वाली सूची में 19वें नंबर पर रखा है।

निशिता ने बोस्टन अमेरिका से बिजनस एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स पूरा किया है। उसके पास अपना प्लेन भी है और पायलट का लाइसेंस भी। सबसे दिलचस्ब बात यह है कि निशिता शाह को तलाश है मिस्टर राइट की।

निशिता मूलत: गुजरात मूल की है तथा उसका मशहूर "शाह परिवार" इस समय थाईलैंड में बसा है और वहां के सबसे रईस परिवारों में से एक है। इनके जीपी ग्रुप के बिज़नस में 44 विशाल शिप भी हैं। शाह परिवार मूलत: कच्छ का है। 1868 में यह मुंबई आ बसा था। इसके बाद यह परिवार 1918 में बैंकॉक में सेटल हो गया।

तीन संतानों में सबसे बड़ी निशिता कहती हैं कि उसके मां-बाप अब कहने लगे हैं कि वह शादी करके सेटल हो जाए। वहीँ वह सीक्रेट बताती हैं कि "मुझे अभी मेरा मिस्टर राइट नहीं मिला है।"




अर्रर्रर्र!!!!!!!!! थाईलेंड की ओर आराम से भागो यार......... लड़ क्यों रहे हो???????????

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इक रोज़ जब मैंने उसे हँसते हुए देखा


इक रोज़ जब मैंने उसे हँसते हुए देखा,
चेहरे पे कई बिजली चमकते हुए देखा।

महसूस हो रहा था क़यामत है आ गई,
रुखसार से घूँघट जो सरकते हुए देखा।

अनजानी सी ख़ुशी से होंट काँप रहे थे,
आंसू का एक कतरा छलकते हुए देखा।

उसका करीब आना यूँ महसूस हो गया,
हाथों में चूड़ियाँ जो खनकते हुए देखा।

उसने यूँ रख दिया मेरे हाथो पे अपना हाथ
अंगार जैसे कोई दहकते हुए देखा।


- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'





Keywords:
Ghazal, Smyle, अंगार, ख़ुशी, चूड़ियाँ, बिजली, महसूस, हँसते हुए

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इश्क़ की मंजिल



इश्क़ की मंजिल

महबूब नींद, माशूक ख़्वाब और इश्क़ रात की तरह है।
जिस तरह रात में नींद और ख़्वाब का मिलन अक्सर होता है,
उसी तरह आशिक़ और माशूक़ का मिलन भी रातनुमा इश्क़ में होता है।

मगर यह ज़रूरी नहीं कि हर रात की नींद में ख़्वाब आए!
इसी तरह आशिक़ों का मिलन भी हर इक की किस्मत मैं नहीं होता।



- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'

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बाहर मानसून का मौसम है




बाहर मानसून का मौसम है,
लेकिन हरिभूमि पर
हमारा राजनैतिक मानसून
बरस रहा है।

आज का दिन वैसे भी खास है,
बंद का दिन है और हर नेता
इसी मानसून के लिए
तरस रहा है।


मानसून का मूंड है इसलिए
इसकी बरसात हमने
अपने ब्लॉग
प्रेम रस
पर भी कर दी है।

राजनैतिक गर्मी का
मज़ा लेना,
इसे पढ़ कर
यह मत कहना
कि आज सर्दी है!

मेरा व्यंग्य: बहार राजनैतिक मानसून की

- शाहनवाज़ सिद्दीकी "साहिल"

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बहार राजनैतिक मानसून की

मौसम तो मानसून का है लेकिन आजकल राजनैतिक मानसून की बहार है। भय्या चाहे बारिश की बौछारें लोगों पर पड़े ना पड़े लेकिन नेता छाप भाषणों की बौछारें सारे देश को भिगो रहीं है।

मुद्दा चाहे कितना ही गम्भीर हों, लेकिन नेता जी उसमें भी अपना उल्लू सीधा करने का मौका ढूंढ ही निकालते हैं। मज़े की बात तो यह है कि जब विपक्षी नेता सरकार बनाते है तो अपने द्वारा किए गए विरोध को भूलकर खुद भी उन्ही कार्यो में मस्त हो जाते है। गोया विरोध का नाता केवल विपक्ष की कुर्सी से ही है। वैसे यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर हल निकल गया तो नया मुद्दा कहां से मिलेगा? पक्ष हो या प्रतिपक्ष, सबका लक्ष्य जनता को उल्लू बनाना ही तो हैं। वैसे हमें उल्लू बनना भी चाहिए, क्योंकि अगर जनता उल्लू ही नहीं बनेगी तो फिर देश के कर्णधारों के रोज़गार का क्या होगा? जनता चुनाव में एक-दूसरे को लाठी-डंडा तो मार सकती है, लेकिन किसी के रोज़गार पर लात कैसे मार सकती है?

सबसे बड़ी बात तो यह कि भारत की जनता तमाशबीन है तो दिल लगाने के लिए कुछ ना कुछ तमाशा भी तो चाहिए। आप स्वच्छता अभियान चलाईये, अकेले ही झाड़ू हाथ में लिए नज़र आएंगे। उधर सड़क छाप नेताओं का साथ देने के लिए भी हज़ारों की तादाद में भी़ड़ इकट्ठी हो जाएगी।

हम बात कर रहे थे भाषण की, नेताओं को सबसे अधिक शौक इसका ही होता है। चाहे मुद्दा कोई भी हो, एक अदद भाषण अवश्य होना चाहिए। किसी अच्छे से अच्छे काम का भी अगर दूसरे पक्ष ने समर्थन कर दिया तो बस फिर क्या, हो गई कमियां निकलनी शुरू। आजकल हाईटेक ज़माना है, किसी मुद्दे पर विरोध की लाईन ना मिले तो मार्किटिंग कम्पनियां हैं ना? यह किसी भी मुद्दे की कमियां निकालने और नए मुद्दे तलाशने से लेकर इस बात तक का ध्यान रख सकती हैं कि नेता जी कैसे दिखें तथा क्या बोलें। यहां तक कि किससे मिलें, मतलब जिससे नहीं मिलना है उससे छुपकर मिलें। गिरगिट की क्या औकात इनके सामने। वैसे नेतागिरी के फायदे भी हैं, अगर किसी ने पढ़ाई नहीं कि तो उसे यहां आराम से रोज़गार मिल सकता है। चैकिदारी करने के लिए पढ़ाई की आवश्यकता पढती है, देश चलाने के लिए थोड़े ही।

चलते-चलते एक सीन याद आ गया, क्षेत्र में बाढ़ आने से एक नेता जी बहुत खुश होते हैं और सेकेट्री से दो तरह के वक्तव्य तैयार करके करने के लिए कहते हैं। "अगर मुख्यमंत्री क्षेत्र का मुआयना करने हैलिकाप्टर से पहुंचे तो हम वक्तव्य देंगे कि देखो भय्या! यहां जनता परेशान है और मुख्यमंत्री जी लोगों का हाल-चाल जानने की जगह हैलिकाप्टर से ही देखकर चले गए। और अगर वह सड़क मार्ग से जनता के बीच गए तो हमारा वक्तव्य होगा कि अगर मुख्यमंत्री जी हैलिकाप्टर से क्षेत्र का मुआयना करते तो कम से जनता को ऊपर से अन्न तो पहुंचा सकते थे। अब ऐसे में सिवा वादों के और क्या देंगे?"




(हरिभूमि के आज के संस्करण में मेरा व्यंग्य)


-शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords:
Critics, Haribhumi, व्यंग, व्यंग्य, हरिभूमि

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धार्मिक विचारों का विरोध

आजकल धर्म के खिलाफ बोलना फैशन समझा जाने लगा है। चाहे बात तर्कसंगत हो अथवा ना हो, लेकिन ऐसे विचारों के सर्मथन में हज़ारों लोग कूद पढ़ते हैं। ऐसे विचारकों को "सुधारवादी" जैसी उपाधियों से अलंकरित किया जाता है। जिस तरह आस्था के मामले में आमतौर पर तर्क को तरजीह नहीं दी जाती है, वैसे ही इस क्षेत्र में भी सिक्के के केवल एक पहलू को देख कर ही धारणा बना ली जाती है। धर्म के अंधविश्वासी समर्थकों की तरह ही धर्म के खिलाफ सोच रखने वालो के अंदर भी यही धारणा घर कर लेती हैं कि "उनकी सोच ही सत्य है"। इसलिए ऐसे लोग धामिर्क पक्ष में तर्क देने वालों की बात को कुतर्क का दर्जा देकर नकार देते है। अक्सर धार्मिक नियमों के खिलाफ बनी धारणा के मुकाबले कोई और बात सोचना गवारा नहीं किया जाता है। अगर कोई किसी ऐसे विचार अथवा सिद्धांत के खिलाफ तर्कसंगत बात करता भी है तो उसे "दकियानूसी" जैसे उच्चारणों से पुकारा जाता है।

धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ कार्य करना तो समझ में आता है, लेकिन अच्छी बातों के खिलाफ भी आवाज़ उठाना समझ से परे है। हालांकि निजी जीवन में यह तथाकथित नास्तिक स्वयं भी अनेकों धार्मिक कर्मकाण्डों में लिप्त दिखाई देंगे, लेकिन सार्वजनिक जीवन में सेकुलर बनने की कोशिश हृदय में बैठी आस्था की भावना को ज़बरदस्ती दबा देती है। अक्सर ऐसे लोग धर्म के मुकाबले विज्ञान को तरजीह देते हुए ‘ईश्वर के दिखाई ना देने’ अथवा ‘ईश्वर को किसने बनाया’ जैसी बातों पर धर्म का माखौल उड़ते नज़र आते हैं, लेकिन तर्क से निकले प्रश्नों का उत्तर स्वयं उनके पास भी नहीं होता है। यह लोग धर्म पर उत्तर ना होने का तो आरोप लगाते हैं लेकिन स्वयं उत्तर ना होने को भविष्य में होने वाली खोज की संभावना का बहाना देकर टाल देते हैं। या फिर ऐसे कमज़ोर उत्तर देते हैं जिनको कोई भी स्वस्थ मस्तिष्क कुबूल नहीं कर सकता है। इंसानी तर्को पर खुद तो हमेशा पूरा नहीं उतरते हैं लेकिन चाहते हैं कि धार्मिक नियम पूरे उतरें।

हालांकि विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक है, लेकिन हमेशा धर्म को विज्ञान विरोधी घोषित किया जाता है ताकि विज्ञान को पसंद करने वाले लोग नास्तिक बन सकें। यह लोग विज्ञान को अंतिम सत्य मानते हैं और इसी सोच के कारणवश धर्म को महत्त्वहीन करार दे देते हैं। हालांकि विज्ञान को कभी भी अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता है, अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जिनको विज्ञान ने पहले नकारा लेकिन बात में मान लिया। क्योंकि विज्ञान की मान्यताएं खोज और अनुमानों पर आधारित ही होती हैं, इसलिए हर नई खोज के बाद पुरानी मान्यता समाप्त हो जाती है तथा अनुमानों के गलत पाए जाने पर नए अनुमान लगाए जाते हैं। अर्थात अगर किसी एक नियम पर आज सारे वैज्ञानिक एकमत हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि कल भी एकमत होंगे। क्या उस ज्ञान को पूरा कहा जा सकता है जिसकी स्वयं की मान्यताएं कुछ समय के उपरांत बदल जाती हो? यह बात इस ओर इशारा करती है कि कहीं ना कहीं कोई पूर्ण ज्ञान अवश्य है और वही धर्म है।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी


Keywords:
Religion, धार्मिक विचार

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धर्मपत्नी की महिमा

भय्या पत्नी की भी अजीब ही महिमा है। पता है कि आप कार्यालय में हैं, अब रोज़ ही जाते हैं तो वहीं होंगे। लेकिन श्रीमती जी का फोन पर एक ही सवाल होता है ‘कहां हो?’। अब बन्दा परेशान! हम भी चुटकी लेने के लिए बोल देते हैं कि ‘झुमरी तलैय्या में’! तो भड़क जाती हैं, ‘सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि ऑफिस में हो’। अब श्रीमती जी जब पता ही था तो मालूम क्यों कर रही थी? लेकिन इतनी हिम्मत किसकी है कि यह मालूम कर ले?

श्रीमती जी की सबसे पंसदीदा चीज़ होती है शापिंग। अब शापिंग तो शापिंग है, ज़रूरत हो या ना हो लेकिन करनी है तो करनी है। उस पर तुर्रा यह कि इतनी महंगी वस्तु इतनी सस्ती ले आई। दुकानदार से दाम तय करने की भी अलग ही अदा होती है। पता नहीं श्रीमती जी दुकानदार को बेवकूफ बनाती हैं या दुकानदार श्रीमती जी को? लेकिन कटता तो बेचारा पति ही है।

थके हारे घर वापिस आए और आते ही आपके हाथ में चाय की प्याली आ गई तो समझो मामला गड़बड़ है। रोज़ तो चाय के लिए कहते-कहते थक जाते हैं, उस पर ज्यादा आवाज़ लगा ली तो सवाल ‘खुद क्यों नहीं बना लेते, देखते नहीं कितनी व्यस्त हूँ आपके बच्चों में’। ‘मेंरे बच्चे!’ मतलब अब यह बच्चे केवल मेरे हो गए। वैसे पत्नी के साथ छोटा तो कुछ होता ही नहीं है, चप्पल की ऐड़ी भी टूट गई तो समझो बड़ा नुकसान है। रास्ते में श्रीमती जी अपनी चप्पल तुड़वा बैठी, तो हमारे मूंह से निकल गया कि देख कर चल लेती। बस फिर क्या था ‘सस्ती चप्पलें दिलवाओगे तो यही होगा ना? इन्हे तो बस यही पसंद है कि रात-दिन घर में खपते रहो और कुछ मांगो मत। कहा था किसी अच्छे ब्राण्ड की दिलवा दो, लेकिन फर्क किसे पड़ता है? रास्ते में परेशान तो मैं हो रही हूँ ना।’ हम भी तपाक से बोले ‘लेकिन यह तुमने अपनी मर्ज़ी से ही तो खरीदी थी।’ जैसी दुकान पर ले जाओगे तो वैसी ही चप्पले खरीदूंगी ना।’ हमने मालूम किया ’लेकिन तुमने हमसे कब कहा था नई चप्पलों के लिए’? झट से बोली ‘तुम सुनते ही कब हो मेरी बात?

रास्ते में एक लड़की हमें देख रही थी, अब किसी की आंखे तो बंद कर नहीं सकते। परेशानी की बात यह हो गई कि श्रीमती जी ने उसे हमें देखते हुए देख लिया। वैसे अन्दर की बात तो यह है कि आप यमराज को तो मना सकते हैं लेकिन रूठी हुई पत्नी को मनाना नामुमकिन है! बात पत्नी की हो और सास का ज़िक्र ना आए? ‘सास’ नाम सुनते ही पत्नी एकदम से बहु बन जाती है। सास के सामने तो माँ जी, माँ जी, लेकिन पति के सामने बात ‘तुम्हारी माँ जी’ पर आ जाती है। अजीब रिश्ता है भय्या, एक-दूसरे को देखकर तेवर बदलना कोई समझ ही नहीं पाया है।

अंत में बस आपसे यही प्रार्थना है कि यह सब बाते मेंरी पत्नी को मत बताना, वर्ना!

- शाहनवाज़ सिद्दीकी


Keywords:
Critics, Vyang, Wife, धर्मपत्नी, पत्नी

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विरोध का तरीका कैसा होना चाहिए?

विरोध करने के लिए विरोध करना भी आना चाहिए। अगर किसी को लगता है कि कोई बात गलत है, तो हो-हल्ला मचाने से पूर्व सबसे पहले उसके बारें में पूरी जानकारी हासिल करना चाहिए। इससे कई बातें सामने आ सकती हैं। जैसे कि:

1. हो सकता है कि जो हम सोच रहे हैं, वह बात बिलकुल वैसी ही निकले।

2. इस बात की भी पूरी संभावना है कि जो हम सोच रहे हैं, बात वैसी नहीं हो।

3. हर बात के अच्छे और बुरे पहलु हो सकते हैं, क्योंकि समय और समझ के हिसाब से हर बात का अलग महत्त्व होता है।

4. विरोधियों की और समर्थन करने वालो की बातों पर एकदम से पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए. क्योंकि विरोधी अक्सर अच्छी बातों का भी विरोध करते हैं, वहीँ समर्थक बुरी बातों का भी समर्थन करते हैं।

5. बल्कि सही रास्ता तो यही है, कि विरोधियों और समर्थकों की बातों का तथा सम्बंधित विषय का पूरी तरह से अध्यन करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

6. सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है, कि सिक्के का एक ही पहलु देखने की जगह बात अगर किसी से सम्बंधित है तो उसके विचारों का भी अध्यन करना चाहिए।


- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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मौसमी इश्क




मौसमी इश्क़ है, मौसम के बाद क्या होगा,
हर चेहरे पर नया चेहरा चढ़ा होगा।


मौज साहिल से आकर मिलती है,
इसके बाद उसको बिछुड़ना होगा।

हर कहानी कहीं ख़तम होगी,
फिर नया एक फलसफ़ा होगा।

मेरा सातो जनम का साथी वोह,
ग़ैर की बाहों में खड़ा होगा।

हमको कहता है हमसफर जो अभी,
रहज़नी में वही लगा होगा।

जिससे उम्मीद-ए-हिफाज़त की है,
वहीं ताने हुए कमां होगा।

बड़ा माक़ूल समां है सनम के मिलने तक,
बदला-बदला यह फिर जहां होगा।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'



Keywords:
Ghazal, Urdu, Gazal, hindi, poem

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कुछ खुशियाँ बेकरार सी हैं




मायूस शब
ढलने के बाद,
ढेरों आशाएं
समेटे हुए,
नई सहर
इंतज़ार में हैं।


अपने जोश को
समेट कर रखिए,
इस्तक़बाल के लिए
कुछ खुशियाँ
बेकरार सी हैं।

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