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आतंक के समर्थक भी आतंकी हैं


सैकडों मासूम लोगो को मौत के घाट उतार देने वाले राक्षसों के समर्थक कैसे यह सोच लेते हैं कि इससे उनका ख़ुदा खुश होगा? जहाँ एक माँ की आह भर से कोई पनप नहीं सकता, वहाँ सैकड़ों माँओं की आहें इन्हें बर्बाद होने से कैसे बचा सकती हैं?


सोचिए ज़रा उन सैकड़ों /हजारों  बहनों के दुलार, बाप की आस, छोटे-छोटे बच्चों के साए और पत्नियों की ज़िन्दगी के कातिलों से खुदा खुश हो सकता है भला? इतनी सारी आह तो किसी की भी बर्बादी के लिए काफ़ी है. और जान लो यह सब राजनैतिक फायदे के लिए होता है और हमें बेवकूफ बनाने के लिए इन कुकर्मों को धार्मिक उन्माद के लबादे से ढका जाता है...
बंद करो इनका समर्थन.... दंगई / आतंकवादी सब समाप्त हो जाएँगे!!! वर्ना जान लो आप भी उतने ही ज़ालिम हो, कहर आप पर भी पड़ कर रहेगा।

और जब अपने ईश के सामने हाज़िर होगे तो अपने आप को गुनाहगारों की फेहरिस्त में खड़े पाओगे!





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अलगाववाद को हवा दे रहा है मिडिया?

यह तो पता नहीं कि ओपरेशन ब्लू-स्टार में विदेशी ताकतों का हाथ था या नहीं, लेकिन मिडिया खालिस्थान के जिन्न को बोतल से बाहर निकालने को आतुर लगता है... 84 दंगे और ओपरेशन ब्लू स्टार पर जो कवरेज और राजनीति चल रही है, वोह देश के लिए हानिकारक है... ऐसे प्रयासों को फ़ौरन बंद किए जाने की ज़रुरत है!


दंगो के नाम पर अलगाववाद को हवा दिया जाना देश विरोधी ताकतों के लिए आक्सीज़न की तरह है। अगर ओपरेशन ब्लू स्टार के बिना केवल 84 के दंगो का हिसाब माँगा जाता है तो यह सही है, क्योंकि मासूमों की हत्या हुई और उनको इन्साफ मिलना ही चाहिए। 84 के दंगो का राजनैतिक और भावनात्मक पहलु था, लेकिन इसका सीधा-सीधा सम्बन्ध देश में अलगाववाद से नहीं था... इन दंगो पर बात करते समय पूरी तरह सचेत रहना पड़ेगा। अलगाववाद और देशहित पर कुठाराघात करने वाले मुद्दों पर किसी भी तरह का समझौता कभी भी नहीं होना चाहिए।

इस मुद्दे पर मिडिया कवरेज से जाने-अनजाने अलगाववाद को हवा मिल रही है। हमें यह समझना होगा कि इस विषय पर जितना रायता फैलाया जाएगा, देश विरोधी ताकतों को उतना ही बल मिलेगा।






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पश्चिम जगत अब उन्ही आतंकवादियो का समर्थक क्यों है?


जिन आतंकवादी संगठनों की हरक़तों के कारण पश्चिम जगत दुनिया के सारे मुसलमानों को आतंकवादी ठहराने पर तुला हुआ था, आज वही संगठन उनके लिए सीरिया में मुजाहिदीन हो गए? अब उन पर ड्रोन हमले नहीं बल्कि हथियार पहुंचाएं जा रहे हैं... आम फौजियों की तरह सैलिरी, हथियार और अन्य सुविधा मुहैय्या करवाई जा रही हैं?

और जब सारे हित साध लिए जाएँगे तो फिर से उनकी नज़र में सारे मुसलमान आतंकवादी हो जाएँ।

बंदर लडवा रहें हैं और बिल्लियाँ लड़ रही हैं और दूर बैठी बाकी बिल्लियाँ अपनी-अपनी पसंद की बिल्लीयोँ का समर्थन कर रहीं है।

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हिंसा के कुतर्क


"लोकतंत्र कमज़ोर है, वोट खरीदे जाते है, बूथ कैप्चर किये जाते है, मतगणना मे धांधली करवाई जाती है, विधायक और सांसद खरीदे जाते है, पूंजीवादी व्यवस्था है, भ्रष्टाचार फैला हुआ है" इत्यादि-इत्यादि.... यह सब हिंसा के समर्थन की कमज़ोर दलीलें बनी हुई हैं। जब लोग हिंसा के समर्थक होते हैं तो इसी तरह की कमज़ोर दलीलों को हथियार बना लेते हैं, उन्हें अपने से इतर विचार रखने वालों का खून बहना आसान तथा बदलाव के अहिंसक प्रयास असंभव लगते हैं। ऐसे लोग खास तौर पर लोकतंत्र के विरोधी होते हैं, क्योंकि उनकी नज़रों में उनके विचार ही अहमियत रखते हैं। इसी कारण  वह बाकी दुनिया के विचारों को रद्दी की टोकरी के लायक समझते हैं और उन विचारों को ज़बरदस्ती  कुचल देना चाहते हैं। और इसीलिए वह हिंसा का सहारा लेते हैं, जबकि हिंसा को किसी भी हालत में समाधान नहीं कहा जा सकता है... अगर सिस्टम ठीक नहीं है तो फिर सिस्टम को ठीक करने के प्रयास होने चाहिए।

ऐसा नहीं हैं कि हिन्दुस्तान में एक सीट पर भी लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव नहीं जीता जाता और सारी की सारी भारतीय जनता ही भ्रष्ट हैं। फिर अगर एक सीट भी जीती जा सकती है तो प्रयास से बाकी जगहों पर भी बदलाव लाया जा सकता है।

हमें यह समझना पड़ेगा कि अगर वोट खरीदे जाते हैं तो बिकने वाले वोटर आम जनता ही होती है। जितना खून-पसीना और पैसा हिंसा करने में बहाया जाता है अगर उतनी मेहनत लोगो में जागरूकता फ़ैलाने में लगाईं जाए तो बदलाव जाया जा सकता है। और अगर फिर भी लोगो में बदलाव नहीं आता तो समझ लीजिये लोग बदलना ही नहीं चाहते... फिर इतना खून-खराबा किसके लिए???





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नक्सलवाद या आतंकवाद


बेगुनाहों को क़त्ल करने का किसी को भी कोई हक़ नहीं है बल्कि गुनाहगारों को भी क़त्ल करने का हक़ किसी इंसान को नहीं होना चाहिए। गुनाहगारों को सज़ा हर हाल में कानून के दायरे में ही होनी चाहिए। और अगर किसी गुनाहगार को उसका गुनाह साबित किये बिना ही सज़ा होती है तो मेरी नज़र में वह बेगुनाह ही है।


हिंसा किसी भी हालत में जायज़ नहीं हो सकती है, अगर व्यवस्था गलत है तो व्यवस्था बदलो... अगर सरकार गलत है तो सरकारें बादलों... अगर कानून गलत हैं तो कानून बदलो... मगर बेगुनाहों को क़त्ल करने और क़ातिलों की कैसी भी दलील से समर्थन करने का हक़ किसी को भी नहीं है।

आखिर इतनी विभत्स तरीके से आतंक फ़ैलाने वाले नक्सलियों को क्यों आतंकवादी नहीं कहा जाता? आखिर क्यों नहीं यहाँ भी कश्मीरी आतंकवादियों को खत्म करने के तरीके की तरह लाखों की तादाद में फौजी भेजे जाते?

और सबसे अजीब बात यह है की अन्य आतंकवादी घटनाओं पर खौलने वाला खून आज ठंडा क्यों पड़ा है???






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नफरत की सौदागरी


उफ्फ! चारो तरफ नफरत... धमाकों पर धमाकें, देख लो नफरत की सौदागरी का नतीजा! सड़कों पर फैलता गर्म खून, चारो और बिखरे हुए गोश्त के लोथड़े, खुनी रंग से सरोबार होते धार्मिक स्थल, खौफ से सजते बाज़ार, दर्द से चिल्लाते मासूम, अपनों को गंवाने के गम में सिसकती आहें... और क्या-क्या साज़-ओ-सामान चाहिए अय्याशी के लिए इन शैतानो को? और कितनी बलि चाहिए इन्हें अपने देवता को खुश करने के लिए।

जब तक लोगों में ज़हर घोल जाता रहेगा, तब तक इंसानियत शर्मसार होती रहेगी। इस तरह की सोच का फल देखने के बाद भी इन जैसों का समर्थन करने वालों की ऑंखें ना खुलें और अपनी सोच पर विचार ना करें तो फिर बर्बादी से कौन बचा सकता है?

आज हर तरफ नफरतों के गीत गाए जा रहे हैं, नफरत फैलाने वालों की तारीफों में खुले-आम कसीदे पढ़े जा रहे हैं। उन्हें और ताकतवर बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। शायद शैतानो की तारीफ करने वाले लोगो के लिए भी दूसरों की लाशें सुकून देने वाली ही हैं! उन्हें संतोष हैं कि हमने तो बस लाशों के बदले लाशें बिछाई हैं और गर्व है कि गालियों का बदला लिया है। फिर भूल जाते हैं कि दूसरे भी बस बदला ही तो लेना चाहते हैं। और इस अदला-बदली में इंसानियत ख़त्म होती जा रही है।

पता नहीं यह मौत के बाज़ार कब तक सजेंगे? बदलों का यह दौर कब तक चलेगा?





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आतकवाद क्यों और कब तक?

सबसे पहली ज़रूरत आंतकवाद के खात्मे की नियत की है, अभी तो हमारे देश के हुक्मरानों ने इसकी नियत ही नहीं की है, नताईज तो बहुत बाद की बात है। अभी तो सरकार इस रंग, उस रंग, अपना-पराया में ही अटकी हुई है। आतंकवादियों को बिना रंग भेद किये, अपना-पराया सोचे न्याय की ज़द में लाने, जल्द से जल्द और सख्त से सख्त सजाएं देने की ज़रूरत है।

जिस तरह से जल्दबाजी में जाँच और मिडिया ट्रायल का सिलसिला चलता है, यह बेहद खतरनाक है। कभी इस समुदाय को कभी उस समुदाय को निशाना बनाया जाता है। अगर किसी समुदाय में से कोई गुनाहगार निकलता है तो पुरे समुदाय को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाने लगता है। आज यह विचार करना पड़ेगा आखिर क्या वजह है कि जिस संदिग्ध को पकड़ा गया है, उससे सम्बंधित समुदाय के 90-95 प्रतिशत लोग उसे बेक़सूर समझते हैं? मेरी नज़र में इसके पीछे एक बड़ी वजह आतंकवाद जैसे संगीन अपराध में पकडे गए मुलजिमों का लम्बी अदालती कार्यवाहियों से गुज़रना और अक्सर का बाद में बेक़सूर निकलना हैं।



सरकारे अपनी लाज बचाने के लिए असंवेदनशीलता बरतती है। आखिर क्यों हमारी जाँच एजेंसियां ऐसे मामलों में शुरुआत से ही लीपापोती की जगह ठोस जाँच नहीं करती? क्यों सारा ठीकरा केवल दूसरे देश में बैठे आकाओं पर फोड़ कर इतिश्री पा ली जाती है? सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर जाँच के नाम पर ऐसा कब तक चलता रहेगा? क्या सरकार इस कारण नौजवानों में बढ़ते हुए आक्रोश को नहीं पहचान पा रही है? या फिर जान बूझ कर ऑंखें बंद किये बैठी है?

एक-दूसरे पर इलज़ाम लगाने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है। मासूमों का क़त्ल करने वाले आतंकवादी हैं, चाहे किसी धर्म से, किसी समाज से या किसी भी मुल्क से ताल्लुक रखते हो। आतंकवाद का ना ही कोई धर्म हो सकता है और ना ही कोई मुल्क। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि अगर वह किसी भी धर्म पर चलते तो आतंकवादी होते ही नहीं। आतंकवादी धर्म की चादर ही इसलिए ओढते हैं, जिससे कि उन्हें धर्मांध लोगो की सहानुभूति एवं मदद मिल जाए। हालाँकि उनका मकसद धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक है।
हमें हर हाल में इन कातिलों का विरोध करना ही पड़ेगा, चाहे ऐसी हरकत सगा भाई ही क्यों ना करे। जो मासूमों का क़त्ल करता है, वह इंसान ही कहलाने के लायक नहीं है, भाई / रिश्तेदार / दोस्त / मुसलमान / हिन्दू / पडौसी कहलाने की तो बात ही क्या।

इस परिस्थिति के लिए समाज में आ रही दरार भी कहीं ना कहीं ज़िम्मेदार है। दुनिया में इंसानियत के जज्बे को बचाए रखने की ज़रूरत है और इसके लिए हर उस धर्मान्ध का विरोध करना पड़ेगा जो खुद की सोच से अलग सोच रखने वालों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं, अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, उन्हें समाप्त कर देना चाहते हैं। नफरत के सौदागरों की समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए और असल बात यह है कि कानून को इनसे बड़ा बनना पड़ेगा।





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मेरी वसीयत - कर्नल गद्दाफी


"यह मेरी वसीयत है. मैं मोहम्मद बिन अब्दुल्लस्सलाम बिन हुमायद बिन अबू मानयर बिन हुमायद बिन नयिल अल फुह़शी गद्दाफ़ी, कसम खाकर कहता हूँ कि दुनिया में अल्लाह़ के अलावा कोई खुदा नहीं, और मोहम्मद ही उस अल्लाह के पैगंबर हैं. उनके नाम पर अमन कायम हो. मैं कसम खता हूँ कि मैं एक सच्चे मुसलमान की तरह मरुंगा.

अगर मैं मारा गया तो जिन कपड़ों में मेरी मौत हो उन्हीं कपड़ों में, मेरी लाश को बिना नहलाए, सिर्त में अपने परिवार और रिश्तेदारों की कब्र के पास, मुस्लिम रस्मो-रिवाज़ के मुताबिक दफ़नाया जाना चाहूँगा.

मैं चाहूँगा कि मेरी मौत के बाद मेरे परिवार, खास तौर पर औरतों और बच्चों के साथ अच्छा सलूक किया जाए.

लीबियाई जनता को चाहिए की वे अपनी पहचान, अपनी कामयाबियां,अपना इतिहास तथा अपने पुरखों और वीर नायकों की गौरव-गाथा की हिफाजत करें. लीबियाई जनता को अपने आज़ाद और बेहतरीन लोगों की कुर्बानियों को कभी भूलना नहीं चाहिए.

मैं अपने समर्थकों का आह्वान करता हूँ कि वे प्रतिरोध-संघर्ष चलाते रहें और विदेशी हमलावरों के खिलाफ आज, कल हमेशा-हमेशा के लिए अपनी लड़ाई जरी रखें.

दुनिया की आज़ाद जनता को हम यह बताना चाहेंगे कि अगर हम चाहते तो अपनी निजी हिफाजत और सुकूनभरी जिंदगी के बदले अपने पवित्र उद्देश्यके साथ समझौता करके उसे बेच सकते थे. हमें इसके लिए कई प्रस्ताव मिले लेकिन हमने अपने कर्तव्य और सम्मानपूर्ण पद के अनुरूप इस लड़ाई के हरावल दस्ते में रहना पसंद किया.
अगर हम तुरंत जीत हासिल न कर पायें तो भी, आने वाली पीढ़ियों को यह सीख दे जाएँगे कि अपने कौम की हिफाजत करने के बजाय उसे नीलाम कर देना इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी है, जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा, भले ही दूसरे लोग इसकी कोई दूसरी ही कहानी गढते और सुनाते रहें.

टिप्पणी: इस्लाम में शहीद की लाश को बिना नहलाए ही दफनाया जाता है, उसी तरह जैसे मक्का की सेना के साथ अहद की लड़ाई में शहीद होने वाले मुहम्मद साहब के अनुयाइयों की लाश को दफनाया गया था.

(मुअम्मर गद्दाफी लीबियाई क्रान्ति के नेता ओर नीति निर्माता थे. वे अपने देश की स्वतंत्रता ओर संप्रभुता की पवित्र उद्देश्य के लिए बलिदान हुए. 20 अक्टूबर 2011 साम्राज्यवादी सैनिक गठबंधन नाटो की चाकरी करने वाले अपने ही देश की गद्दारों के हाथों उनकी राजनीतिक ह्त्या कर दी गयी. उनकी यह वसीहत मंथली रिव्यू से लेकर अनूदित है.)



[फेसबुक से प्राप्त]
keywords: gaddafi, tripoli, nato, libya

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कब तक लड़ेंगे अपनी-अपनी लड़ाई?

अक्सर गुजरात दंगों की बात गोधरा काण्ड पर आकर रुक जाती है और यह दलील दी जाती है कि गुजरात दंगे गोधरा काण्ड की क्रिया की प्रतिक्रिया थे। या फिर यह मालूम किया जाता है कि आप गुजरात पर तो बोल रहे हैं, पर गोधरा कांड पर आपके क्या विचार हैं? बात चाहे गोधरा काण्ड, गुजरात दंगे, या फिर भारत अथवा विश्व की किसी भी घटना की हो, किसी भी हत्या की वारदात का बदला हत्यारों से लेना ही इन्साफ है। बेगुनाहों का कत्लों-आम या आतंकित करने को किसी भी कारण से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है।
किसी एक समुदाय से सम्बंधित गुनाहगारों का बदला पूरे समुदाय से लिए जाने की सोच समाज में आम है और लोग इसे जायज़ ठहराते हुए आसानी से नज़र आ जाएँगे। वहीँ अक्सर लोग आरोपी को खुद सजा देने के फ़िल्मी तरीके को भी सही ठहराते देखे जा सकते हैं और यही सोच आतंकवादी मानसिकता के फलने-फूलने में भी सहायक होती हैं। इसमें किसी की भी दो राय नहीं हो सकती है कि सज़ा देने का हक केवल नयायालय को होता है और वह भी पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद।
अगर कोई भी मुसलमान इस बात का विरोध करता है तो उसे इस्लामिक उसूल पता ही नहीं है, वह खामखा ही अपने आप को मुसलमान समझने का गुमान रखे हुए है, यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि 'इंसाफ' इस्लाम की रूह है।

अगर न्यायिक प्रक्रिया में दोष है तो ख़ुद न्याय देने की कोशिश की जगह न्यायिक प्रक्रिया को बदलने की कवायद होनी चहिए, और लोग अगर जागरूक हो जाएँ तो लोकतंत्र में ऐसा करना बहुत मुश्किल भी नही है!

लेकिन इंसाफ का मतलब ऐसा इंसाफ नहीं जो कि मुझे या आपको पसंद हो! कुछ चाहते हैं कि जिन पर आरोप लगे हैं उनको सजा मिले, वहीँ कुछ चाहते हैं जिन पर आरोप लगे हैं वह बेक़सूर निकले। यह दोनों सिर्फ चाहत हैं और कुछ भी नहीं। जबकि इंसाफ का मतलब है जिसने गुनाह किया उन्हें सजा मिले, चाहे आपको बुरा लगे या मुझे बुरा लगे। हालाँकि अदालतों के काम करने का तरीका सबसे सही है, फिर भी यह ज़रूरी नहीं कि हर अदालत में इन्साफ ही हो! क्योंकि अदालते सत्य पर नहीं बल्कि सबूतों पर चलती हैं और यह ज़रूरी नहीं हुआ करता कि हर बात का सबूत मौजूद हो। इसलिए अगर किसी अदालात ने फैसला दिया है तो उसके ऊपर की अदालत में केस चलाया जाता है। अक्सर निचली अदालतों के गुनाहगार उपरी अदालतों से बरी हो जाते हैं। कई बार उन्हें साजिशन फंसाया जाता है और कई बार अलग-अलग कारणों से पूरा इन्साफ नहीं हो पाता है। इसके उल्टा भी होता है, जो बच गए थे, उन्हें उपर की अदालत सजा देती है।
जब भी गुजरात दंगो में इन्साफ की बात की जाती है तो सवाल होता है कि गोधरा दंगो में इन्साफ की बात क्यों नहीं की जाती। या फिर गोधरा कांड के आरोपियों को सज़ा मिलने पर सवाल उठता है कि गुजरात दंगों के आरोपियों को सज़ा कब मिलेगी? लोग अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक होने के नाते इंसाफ ना मिलने की बात करते हैं, हर इक अपने-अपने इंसाफ के लिए आवाज़ बुलंद करता दिखाई देता है।
हिन्दू समुदाय के लोग गोधरा के लिए लड़ते हैं और मुसलमान समुदाय गुजरात दंगो के लिए, इसके अलवा और भी कई अलग-अलग लड़ाईयाँ चल रही हैं। सवाल यह है कि आखिर यह लड़ाई इन्साफ के लिए कब लड़ी जाएगी? कब हम सब कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर एक भारत वासी के दुःख को अपना दुःख समझेंगे?




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विश्व में आतंकवाद का बढ़ता दायरा

(दैनिक हरिभूमि के आज [10 अगस्त] के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा लेख)

आज सारे विश्व को आतंकवाद ने घेरा हुआ है। अलग-अलग देशों में हिंसक गतिविधियों के अनेकों कारण हो सकते हैं, परन्तु आमतौर पर यह प्रतिशोध की भावना से शुरू होती है। प्रतिशोध के मुख्यतः दो कारण होते है, पहला कारण किसी वर्ग विशेष अथवा सरकार से अपेक्षित कार्यों का ना होना तथा दूसरा कारण ऐसे कार्यों को होना होता है जिनकी अपेक्षा नहीं की गई थी। मगर आमतौर पर ऐसे प्रतिशोधिक आंदोलन अधिक समय तक नहीं चलते हैं। हाँ शासक वर्ग द्वारा हल की जगह दमनकारी नीतियां अपनाने के कारणवश अवश्य ही यह लम्बे समय तक चल सकते है। ऐसे आंदोलनों में अक्सर अर्थिक हितों की वजह से बाहरी हस्तक्षेप और मदद जुड़ जाती है और यही वजह बनती है प्रतिशोध के आतंकवाद के स्तर तक व्यापक बनने की। इन हितों में राजनैतिक, जातीय, क्षेत्रिए तथा धार्मिक हित शामिल होते हैं। कोई भी हिंसक आंदोलन धन एवं हथियारों की मदद मिले बिना फल-फूल नहीं सकता है। बाहरी शक्तियों के सर्मथन और धन की बदौलत यह आंदोलन आंतकवाद की राह पर चल निकलते हैं और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं। तब ऐसे आंदोलन क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं रह जाते, बल्कि संगठित होकर सशक्त व्यापार की तरह सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाए जाते हैं।

आतंकवाद के व्यापक स्तर पर बढ़ने में बेरोज़गारी भी काफी हद तक सहायक होती है। बेरोज़गार के साथ-साथ विलासिता का जीवन जीने के इच्छुक लोग भी असानी से आतंकवादी संगठनों के शिकार बन जाते हैं। परिवार के भरण-पोषण की चिंता तथा भोग विलास की आशा इन्सान को आसानी से हैवानियत की राह पर ले चलती है। वहीं हवाला का देशी-विदेशी नेटवर्क आसानी से आतंकवादी संगठनों के पैसे की आवश्यकता को पूरा कर देता है। आतंकवाद के पोषकों में एक और अहम कड़ी है 'भ्रष्टाचार', इसके बिना आतंकवाद के नेटवर्क का पूरा होना मुश्किल है। आतंकवाद से लड़ाई में यही वह क्षेत्र जिसमें सबसे अधिक मेहनत की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के कारण ही आतंकवादी संगठन बहुत आराम से सुरक्षा ऐजेंसियों को धौका दे देते हैं। हथियार से लेकर वाहन तक सभी सुविधाएं पैसे के बल पर आसानी से मुहैया हो जाती हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि जिस समुदाय के भी लोग ऐसे मामलों में संलिप्त पाए जाते हैं, उन्हे लगता है कि आरोपी बेकसूर हैं। इस मामले में सुरक्षा ऐजेंसियों तथा सरकार की नियत पर अविश्वास की भावना आग में घी का काम करती है। इसी के चलते समुदायों के नेतागण अन्जाने में ही आतंकवादी संगठनों की मदद कर देते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की लापरवाही तथा इस क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार भी ऐसी धारणाओं के बनने में सहायक होता है। पिछली आतंकवादी घटनाओं पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलता है कि हड़बड़ी में की गई गिरफ्तारियां तथा पूरे सबूत अथवा सही जांच के अभाव में बहुत से आरोपी बरी हुए हैं। इसके अलावा जो गिरफ्तार होते हैं उनके खिलाफ सबूत ना होने की अफवाहें फैला दी जाती हैं। ऐसी घटनाओं के कारणवश लोगों के हृदय में सुरक्षा ऐजेंसियों के विरूद्ध धारणाए घर बना लेती हैं, जिसका फायदा आतंकवादी संगठन बखुबी उठा लेते हैं।

आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हजारों ऐसे आतंकवादी संगठन अपनी दुकाने चला रहे हैं। एक तरफ जहाँ कई संगठन धर्म के नाम पर तो वहीँ दूसरी तरफ नक्सलवादी तथा माओवादी संगठन क्षेत्र, भाषा तथा सामाजिक हित के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं. धर्म के नाम पर पनप रहे आतंकवादी वारदातों में संसद भवन पर हमले का नाम सबसे ऊपर आता है, क्योंकि यह देश की अस्मिता और संप्रभुता पर हमला था। वहीँ दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, अजमेर, जयपुर, मालेगांव, वाराणसी, हैदराबाद जैसे देश के विभिन्न शहरों में अनगिनत हमलों का दंश देश झेलता आ रहा है। इस कड़ी में पाकिस्तानी नागरिकों द्वारा मुंबई में हुए हमले को सबसे हिंसक आतंकवादी घटना के रूप याद किया जाता है। महाराष्ट्र, झारखण्ड तथा वेस्ट बंगाल समेत देश के कई राज्यों में माओवादी हमले भी सरकार का सिरदर्द बन गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते धार्मिक आतंकवाद में कुछ कमी दिखाई दी तो माओवादी देश के लिए बहुत बड़ा खतरा बन कर उभर रहे हैं.

बात जब धर्म का नाम लेकर फैलने वाले आतंकवादी संगठनो की होती है तो गहन विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे संगठन धार्मिक ग्रन्थों का अपने हिसाब से गलत विश्लेषण करके धर्म की सही समझ नहीं रखने वाले लोगों को अपने जाल में फांस लेते हैं। इसलिए धार्मिक संस्थाओ की भूमिका बढ़ जाती है, आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी संस्थाएं धार्मिक ग्रंथो की सही-सही जानकारियों से लोगो को अवगत कराएं। मेरे विचार से यह आतंकवादी संगठनो की जड़ पर प्रहार है।

आंदोलनों चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवादी रूप ले चुके हों, इनको केवल शक्ति बल के द्वारा नहीं दबाया जा सकता है, बल्कि जितना अधिक शक्ति बल का प्रयोग किया जाता है उतनी ही अधिक ताकत से ऐसे आंदालन फल-फूलते हैं। आतंकवादी संगठन बल प्रयोग को लोगो के सामने अपने उपर ज़ुल्म के रूप में आसानी से प्रस्तुत करके और भी अधिक आसानी से लोगों को बेवकूफ बना लेते हैं। आतंकवादी तथा हिंसक आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना ही सबसे बेहतर विकल्प है। वहीं हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि पूरे समाज में आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए। आज ऐसी आतंकवादी सोच के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी




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आतंकवाद और हम

आज सारे विश्व को आतंकवाद नामक दानव ने घेरा हुआ है। आमतौर पर आतंकवाद किसी वर्ग अथवा सरकार से उपजी प्रतिशोध की भावना से शुरू होता है। इसके मुख्यतः दो कारण होते है, पहला यह कि किसी वर्ग से जो अपेक्षित कार्य होते हैं उसके द्वारा उनको ना करना तथा दूसरा कारण ऐसे कार्यों को होना जिनकी अपेक्षा नहीं की गई है। मगर आमतौर पर ऐसे प्रतिशोधिक आंदोलन अधिक समय तक नहीं चलते हैं। हाँ शासक वर्ग द्वारा हल की जगह दमनकारी नीतियां अपनाने के कारणवश अवश्य ही यह लम्बे समय तक चल सकते है। ऐसे आंदोलनों में अक्सर अर्थिक हितों की वजह से बाहरी हस्तक्षेप और मदद जुड़ जाती है और यही वजह बनती है प्रतिशोध के आतंकवाद के स्तर तक व्यापक बनने की। कोई भी हिंसक आंदोलन धन एवं हथियारों की मदद मिले बिना फल-फूल नहीं सकता है। इन हितों में राजनैतिक, जातीय, क्षेत्रिए तथा धार्मिक हित शामिल होते हैं। बाहरी शक्तियों के सर्मथन और धन की बदौलत यह आंदोलन आंतकवाद की राह पर चल निकलते हैं और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं। तब ऐसे आंदोलन क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं रह जाते, बल्कि संगठित होकर सशक्त व्यापार की तरह सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाए जाते हैं।

जब बात धार्मिक हितों की होती है तो ऐसे संगठन धार्मिक ग्रन्थों का अपने हिसाब से विश्लेषण करके धर्म की सही समझ नहीं रखने वाले लोगों को अपने जाल में फांस लेते हैं। जैसा कि अक्सर सुनने में आता है कि आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटरों में यह समझाया जाता है कि ईश्वर (अल्लाह) ने काफिरों को कत्ल करने का हुक्म दिया है। ज़रा सी समझ रखने वाला यह समझ सकता है कि अगर ईश्वर काफिरों को कत्ल करने का हुक्म देता तो वह उनको पैदा ही क्यों करता? बल्कि ईश्वर कुरआन में फरमाता है कि वह अपने बन्दों से एक माँ से भी कई गुणा अधिक प्रेम करता है, चाहे वह उसे ईश्वर माने अथवा ना माने और अपने गुमराह बन्दे का भी अंतिम सांस तक वापिस सही राह पर लौट कर आने का इंतज़ार करता है।

कारून नामक खलनायाक इतिहास में एक बहुत बड़े धर्म विरोधी के रूप में जाना जाता है। एक बार उसने लोगों को इकटठा किया और मुसा (अ.) से सबके सामने मालूम किया कि ज़िना (बलात्कार) के गुनाह पर आपका कानून क्या कहता है? उनके जवाब पर उसने एक औरत के द्वारा मुसा (अ.) पर अस्मिता लूटने का इल्ज़ाम लगावाया, इस इल्ज़ाम पर मुसा (अ.) को बहुत गुस्सा आया। मुसा (अ.) का गुस्सा देख कर उस महिला ने सारा सच साफ-साफ उगल दिया। जब उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की तो ईश्वर ने कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "हमने धरती को तुम्हारे अधीन कर दिया है, तुम उसे जैसा चाहे हुक्म दे सकते हो।" मुसा (अ.) ने धरती को हुक्म दिया की वह कारून को अपने अन्दर समा ले, इस पर धरती ने उसके बदन का कुछ हिस्सा अपने अंदर समा लिया। यह देख कर कारून ने मुसा (अ.) से अपना जूर्म कुबूल करते हुए माफी मांगी। लेकिन वह बहुत अधिक गुस्से में थे, वह धरती को हुक्म देते गए और कारून माफी मांगता गया। आखिर में कारून पूरा का पूरा धरती में समा गया, इस पर स्वंय ईश्वर ने मुसा (अ.) से कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "मेंरा बन्दा तुझ से माफी मांगता रहा और तुने उसे माफ नही किया? मेरे जलाल की कसम अगर वह एक बार भी मुझसे माफी मांगता तो मैं अवश्य ही उसे माफ कर देता।" उपरोक्त बात से पता चलता है कि मेरा अल्लाह (ईश्वर) अपने बन्दों को कैसा प्यार करने वाला और कैसा माफ करने वाला है कि कारून को भी अपना बन्दा कह रहा है और उस जैसे गुनाहगार को भी माफ करने के लिए फौरन तैयार है जिसने स्वयं को ईश्वर घोषित किया हुआ था।

आतंकवादी संगठन अक्सर ही उन आयतों (श्लोक) का गलत विश्लेषण करते हैं जिनमें ईश्वर युद्ध के समय ईमान रखने वालों को उनके विरूद्ध युद्ध का ऐलान करने वालों से डर कर भागने की जगह जम कर युद्ध करने का आह्वान करता है। यह बिलकुल ऐसा ही है, जैसे अपने देश के वीर जवानों को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है तथा कमांडर उनमें जोश भरते हैं. अक्सर इस्लाम विरोधी भी आतंकवादियों की ही तरह  इन आयतों को सही संदर्भ में समझने की कोशिश नहीं करते हैं और इस्लाम के विरोध में उतर आते हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो इस सतह पर दोनो एक ही तरह का कार्य रहें हैं।

इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, डराने की, आतंकित करने, उसकी संपत्ति गबन करने की, उसके सामान के अधिकार से उसे वंचित करने की, उसके ऊपर अविश्वास करने की, उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की (जबकि उनका माल खरीदा जाए) या (अगर साझेदारी में व्यापार है तो) उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

अगर ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि इस्लाम केवल उन ग़ैर मुस्लिमों से युद्ध करने की अनुमति देता है जो कि मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करें तथा उनको उनके घरों से बेदखल कर दें अथवा इस तरह के कार्य करने वालों का साथ दें। ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.

 [2:190] और अल्लाह के मार्ग मं उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती ना करो। निसन्देःह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।

किसी भी बेगुनाह को कत्ल करने के खिलाफ ईश्वर स्वयं कुरआन में फरमाता हैः

इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]



इस बारे में अल्लाह (ईष्वर) के अंतिम संदेषवाहक मुहम्मद (स.) का हुक्म है किः



"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)

"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)


"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)


"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).

हिंसक आंदोलनों चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवाद का रूप ले चुके हों, इनको केवल शक्ति बल के द्वारा समाप्त नहीं जा सकता है, बल्कि जितना अधिक शक्ति बल का प्रयोग किया जाता है उतने ही अधिक ताकत से ऐसे आंदालन फल-फूलते हैं। इनसे जुड़े संगठन बल प्रयोग को लोगो के सामने अपने उपर ज़ुल्म के रूप में प्रस्तुत करते हैं तथा और भी अधिक आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं। ऐसे में आतंकवादी आंदोलन से संबधित पूरे के पूरे वर्ग को ही घृणा और संदेह की निगाह से देखा जाना मुश्किल को और भी बढ़ा देता है। बल्कि ऐसे आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना चाहिए। वहीं हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि पूरे समाज में हिंसा / आतंक के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए।

आज ऐसी आतंकवादी सोच के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है। इसके लिए सबसे पहला और बुनियादी कार्य आपसी भाईचारे को बढ़ाना तथा भ्रष्टाचार को समाप्त करना है।

आईये मिलकर इस मुहिम को आगे बढ़ाएं।

-शाहनवाज़ सिद्दीकी


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