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पर्यावरण की रक्षा पर दिल्ली ने दम दिखलाया है...

पर्यावरण की रक्षा पर
दिल्ली ने दम दिखलाया है।
बदलाव बड़ा लाने हेतु
#OddEven अपनाया है।

गर आज नहीं कोशिश होगी
तो भविष्य तबाह हो जाएगा।
आने वाली पीढ़ी को
यह कर्ज़ा आज चुकाया है।

जो कहते हैं कुछ नहीं होता,
उन्हें दिल्ली राह दिखाएगी।
आओ देखो दुनिया वालो
बदलाव यहाँ पर आया है।

सेहत वाली सांसों का
सपना दिल्ली ने देखा है।
प्रदुषण से बचने का
अब गीत नया यह गाया है।

-शाहनवाज़ सिद्दिक़ी 'साहिल'

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एक शाम ढली, फिर सुबह नई


15 मार्च, अर्थात अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार आज मेरा जन्मदिवस है, हालाँकि भारतीय कैलेंडर के अनुसार तो मेरा जन्मदिवस 'चैत्र मास' की पहली तिथि अर्थात रंगों की होली के दिन पड़ता है... आज सुबह से मूड बहुत अच्छा है, सब कुछ नया-नया सा है... मैंने अपनी भावनाओं को यूँ ही कुछ शब्दों की माला में पिरो दिया है.


एक शाम ढली, फिर सुबह नई,
उम्मीद नई, शुरुआत नई

वोह चमकीला सा ख्वाब नया
जज़्बात नए, हर आस नई

हर आंसू गिर कर सूख गया,
अब खुशियों की हो बात नई

यूँ मद्धम-मद्धम चलती सी
यह खुशियों की बारात नई

फिर जीवन खुलकर झूम उठा,
लम्हा-लम्हा सौगात नई

अब रब की पनाह में है 'साहिल'
हर मौज नई, सादात* नई


- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'



*सादात = बुज़ुर्गी


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गरीबी में लाचार बचपन

गरीबी बचपना आने ही नहीं देती है, बच्चे अपने परिवार का भार उठाने की मज़बूरी में बचपन में ही जवान हो जाते हैं और जवानी से पहले बूढ़े. हालाँकि ध्यान से देखो तो वह बच्चे भी अपने ही लगते हैं, उनमें भी अपने ही बच्चों का अक्स नज़र आता है. कुछ बच्चों के पास सबकुछ है और कुछ के पास है केवल लाचारी...



गरीब बच्चो का
ख्वाब होता है
बचपन

कब पैदा हुए
कब जवान
और कब चल दिये
अनंत यात्रा पर

याद भी नहीं
क्या है ज़िन्दगी

शायद हसरतो का
नाम है,
या फिर उम्मीदों का

हसरतें
कब किसकी पूरी हुई हैं?
और
उम्मीदें तो होती ही
बेवफा हैं


ऊँची इमारतें की
क्या खता है
आखिर ऊँचाइयों से
कब दीखता है
धरातल

'कुछ' कुलबुलाता सा
नज़र आता है
'कीड़ों' की तरह

या कुछ परछाइयाँ
जो अहसास दिलाती हैं
शिखर पर होने का

किसी का बच्चा
कई दिन से भूखा है
तो हुआ करे

ज़िद करके
मेरे बच्चे ने तो
पीज़ा खा लिया है

ठिठुरती ठण्ड को कोई
सहन ना कर पाया
मुझे क्या,
मेरा बच्चा तो
नर्म बिस्तर से रूबरू है

क्यों ना हो,
आखिर 'हम' कमाते
किसके लिए हैं?
'अपने' बच्चो के लिए ही ना!

जब गरीबों की कोई
ज़िन्दगी ही नहीं
तो 'बचपन' कैसा?


Keywords: kavita, bachpan, gareeb, gareebi, garibi, bachche, life



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है आज समय जागने का


















है आज समय जागने का

है आज समय जागने का,
सो रहे हो आज क्यूँ?
गर हौसलों में दम नहीं तो
जी रहे हो आज क्यूँ?

हो रही मुल्क की दुर्गति,
सब कह रहे हैं प्रगति।
है यही अगर प्रर्गति तो
रो रहे हो आज क्यूँ?

धोखाधड़ी में लीन सब,
है लूटना ही दीन अब।
सब उंगलियां है सामने,
खुद किया क्या है आपने?
है लूटना ही दीन तो
बैचेन फिर हो आज क्यूँ?

हर ओर भ्रष्टाचार है,
सबका यही विचार है।
गर हुए गम से त्रस्त हम,
फिर खुद हुए क्यों भ्रष्ट हम।
है गम का यही सबब तो
गम पी रहे हो आज क्यूँ?

जहां दुकानें है धर्म की,
क्या कीमत होगी कर्म की?
यह मर्म ही पता नहीं,
खुश हो रहे हो आज क्यूँ?

है आज समय जागने का...


- शाहनवाज़ 'साहिल'






Keywords:
Hindi poem, kavita, hai aaj samay jagne ka, rashtra, desh bhakti, jago re, हिंदी

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दिल्ली की ब्लॉगर्स मीट, ब्लॉग जगत में छा गई!

दिल्ली की ब्लॉगर्स मीट

ब्लॉगर सम्मलेन की हर बात निराली है,
मैं रात भर ख्वाब में भी वहीं था,
पत्नी बोली......
उठो सुबह होने वाली है.

सुबह कार्यालय जाना था,
वर्ना सम्मलेन में ही खोया रहता,
सम्मलेन का मज़ा लेता,
लोगो को दिखाने के लिए,
मज़े से सोया रहता.

वक्ताओं की भी वहां हर अदा निराली थी,
खाने के लिए भी सबने महफ़िल जमा ली थी,
समौसे, पकौड़े के साथ पीते रहे कोका-कोला.
वहां तो कुछ बोल न पाया,
लेकिन ख्वाबों में खूब बोला.

अविनाश जी से कहते रहे,
आपका प्रयास सफल है.
और झा जी से बोले,
अच्छे सम्मेलनों की
सफलता तो अटल है.

नापसन्दी चटका
अब बंद होना चाहिए,
जिसने टांग ही खींचनी है,
उसे टिप्पिया के कहना चाहिए.

खुशदीप सहगल जी की,
इस बात में बहुत दम था,
लगता है चाय में दूध थोडा ज्यादाह
और पानी कम था.

राजीव जी और माणिक की
मेहमान नवाजी दिल को भा गई,
और दिल्ली की ब्लॉगर्स मीट,
पुरे ब्लॉग जगत में छा गई!

-शाहनवाज़ सिद्दीकी





Keywords:
Hindi Kavita, Delhi Bloggers Meet, हिंदी कविता

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नानी का आंगन


नानी का आंगन


वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,
अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,
वो नानी का पंखा हिला के सुलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,
वो मेंढक पकड़ना, वो किचड़ में चलना,
वो बारिश के पानी में किश्ती चलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो तकियों पे तकिया लगाने की तरकीब,
वो बचपन की थी कुछ अजब सी ही तरतीब,
वो तकियों पर चढ़ना, छलांगे लगाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

उन तकियों की सीढ़ी बनाता था अक्सर,
मैं नानी को अपनी सताता था अक्सर,
यूँ मिट्टी की हांडी से मक्खन चुराना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो मिट्टी के चूल्हे पे खाना बनाना,
वो नानी का खिचड़ी पे मक्खन लगाना,
वो प्यारे से हाथों से मुझको खिलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो मिट्टी की खूशबू, खलियानो की रौनक
वो सरसों के फूलों की मोहिनी सूरत
लगता था जन्नत यहीं है, यहीं है!
उस जन्नत की मस्ती में यूँ डूब जाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords:
Hindi Poem, Hindi Nazm

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