नानी का आंगन
वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,
अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,
वो नानी का पंखा हिला के सुलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,
वो मेंढक पकड़ना, वो किचड़ में चलना,
वो बारिश के पानी में किश्ती चलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो तकियों पे तकिया लगाने की तरकीब,
वो बचपन की थी कुछ अजब सी ही तरतीब,
वो तकियों पर चढ़ना, छलांगे लगाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
उन तकियों की सीढ़ी बनाता था अक्सर,
मैं नानी को अपनी सताता था अक्सर,
यूँ मिट्टी की हांडी से मक्खन चुराना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो मिट्टी के चूल्हे पे खाना बनाना,
वो नानी का खिचड़ी पे मक्खन लगाना,
वो प्यारे से हाथों से मुझको खिलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो मिट्टी की खूशबू, खलियानो की रौनक
वो सरसों के फूलों की मोहिनी सूरत
लगता था जन्नत यहीं है, यहीं है!
उस जन्नत की मस्ती में यूँ डूब जाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
Keywords:
Hindi Poem, Hindi Nazm