Aadhaar में बड़े बदलाव - जानिए नए नियम

तो दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं Aadhaar Card के उन नए नियमों के बारे में जो UIDAI 1 नवम्बर से लागू करने जा रहा हैं — और जो हर भारतीय के लिए जानना बहुत ज़रूरी है।




अगर आपके पास Aadhaar Card है — तो ये वीडियो आपके लिए बहुत काम की है


दोस्तों, Aadhaar Card आज सिर्फ़ एक पहचान पत्र नहीं है —
ये बैंकिंग, सिम कार्ड, सरकारी योजनाओं, और कई तरह की ऑनलाइन वेरिफिकेशन के लिए सबसे ज़रूरी डॉक्युमेंट बन चुका है।

इसलिए जब भी इसमें कोई नया नियम या अपडेट आता है, वो सीधे करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है।

तो आइए जानते हैं Aadhaar Card के बड़े बदलाव 👇

1. अब आधार कार्ड ऑनलाइन ही अपडेट हो जाया करेगा, आपको आधार कार्ड में नाम, पता, जन्मतिथि या मोबाइल नंबर जैसी जानकारी अपडेट करने के लिए आधार सेवा केंद्र जाने की जरूरत नहीं होगी. UIDAI ने एक नया डिजिटल सिस्टम तैयार किया है जिसके तहत आप ये सब कुछ ऑनलाइन ही घर बैठे कर सकेंगे. आपके द्वारा दी गई जानकारी सरकारी डेटाबेस जैसे PAN कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड से अपने आप वेरिफाई हो जाएगी. इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुरक्षा दोनों बढ़ेंगी.

2. आधार-पैन लिंकिंग अब जरूरी हो गया है.
UIDAI ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हर पैन कार्ड धारक को 31 दिसंबर 2025 तक अपने पैन को आधार से लिंक करना अनिवार्य है. अगर आपने यह काम समय पर नहीं किया, तो 1 जनवरी 2026 से आपका पैन इनएक्टिव हो जाएगा. इसका मतलब यह है कि आप न तो आयकर रिटर्न फाइल कर पाएंगे और न ही किसी वित्तीय लेनदेन में पैन का उपयोग कर सकेंगे. सरकार ने यह कदम फर्जीवाड़े और टैक्स चोरी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए उठाया है.

3. KYC प्रोसेस को भी अब आसान कर दिया गया है
UIDAI ने KYC प्रक्रिया को भी आसान और पूरी तरह डिजिटल बना दिया है. अब बैंक, म्यूचुअल फंड या किसी अन्य वित्तीय संस्था में KYC कराने के लिए आपको कागज़ी दस्तावेजों की जरूरत नहीं होगी.

अब आप तीन तरीकों से KYC पूरा कर सकेंगे- Aadhaar OTP वेरिफिकेशन से, वीडियो KYC के जरिए, फेस-टू-फेस वेरिफिकेशन के माध्यम से. यह पूरी प्रक्रिया अब पेपरलेस और समय बचाने वाली होगी. इससे आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ बैंकिंग सेक्टर को भी सुविधा मिलेगी. 

UIDAI के ये नए नियम डिजिटल इंडिया मिशन को और आगे बढ़ाएंगे. अब आधार अपडेट, KYC और दस्तावेज वेरिफिकेशन पूरी तरह डिजिटल और सुरक्षित होंगे. जो लोग समय पर अपने डॉक्यूमेंट्स अपडेट नहीं करेंगे या आधार-पैन लिंकिंग नहीं करेंगे, उन्हें भविष्य में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

1 नवंबर से लागू होने वाले ये बदलाव न केवल प्रक्रियाओं को सरल बनाएंगे, बल्कि डिजिटल पहचान प्रणाली को और भी मजबूत करेंगे जिससे नागरिकों को पारदर्शी और आधुनिक सुविधा मिलेगी

इसके अलावा UIDAI ने घोषणा की है कि

  • हर 10 साल में Aadhaar biometric अनिवार्य रूप से अपडेट करना होगा।इसका मक़सद है — आपकी पहचान हमेशा accurate और fraud-free रहे।
  • 2025 से UIDAI कई सरकारी और निजी सेवाओं में Face Authentication System शुरू कर रहा है। यानी अब सिर्फ़ OTP या fingerprint नहीं — Face Scan से भी Aadhaar verify किया जा सकेगा।
  • UIDAI एक official Aadhaar Wallet App लाने की तैयारी में है — जहां आप अपने Aadhaar को offline QR code या NFC से इस्तेमाल कर पाएंगे, बिना इंटरनेट के।
  • अब Aadhaar में Address Update करना आसान होगा — आपको अब सिर्फ़ self-declaration + online verification की जरूरत होगी, किसी document upload की नहीं।

अगर हम बात बाल आधार की करें तो बच्चों के Aadhaar में अब automatic photo & biometric reminder system होगा,

ताकि हर 5 साल में update time पर आपको notification मिल सके।

ये सारे बदलाव इसीलिए लाए जा रहे हैं ताकि Aadhaar system सुरक्षिततेज़, और भरोसेमंद बने। 

इससे identity theft कम होगी और fraud cases पर रोक लगेगी।

और हाँ — ये सभी अपडेट्स UIDAI की official announcements पर आधारित हैं,


आपके पास यह जानकारी होना ज़रूरी है।

👉 अपना Mobile number और Email Aadhaar से लिंक्ड रखें।

👉 हर कुछ साल में Photo और Address update करते रहें।

👉 और जैसे ही नया UIDAI app लॉन्च हो, उसे ज़रूर download करें —

ताकि आपकी पहचान 100% safe और future-ready रहे।


दोस्तों, अगर आपको ये जानकारी useful लगी,  अपने दोस्तों और परिवार के साथ share करें

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छात्रों पर मार्क्स लाने का प्रेशर और परिणाम

बहुत सारे स्टूडेंट अच्छे मार्क्स से पास हो रहे हैं, खूब दिल लगाकर पढ़ाई करना और इम्तेहान में अच्छे मार्क्स से पास होना ज़रूरी तो है, पर जिस तरह से अच्छी सरकारी शिक्षण संस्थाओं में कमी आयी है, या यह कहा जाए कि जिस तरह से माध्यम और गरीब वर्ग के बच्चे अब शिक्षा का महत्व समझकर पढ़ाई कर रहे हैं, उसके मुक़ाबले सरकारी शिक्षण सास्थाएँ बहुत कम बनाई गई हैं। जिसकी वजह से उच्च शिक्षण संस्थानों में एडमिशन लेने के लिए स्टूडेंट्स के ऊपर ज़्यादा से ज़्यादा मार्क्स लाना मजबूरी बन गया है।

यही वजह ही कि मुझे ज़्यादा मार्क्स लाने वाले स्टूडेंट्स के साथ ख़ुशी से ज़्यादा सहानुभूति होने लगी है।
स्टूडेंट्स पढ़ाई में मेहनत सीखने की जगह ज़्यादा मार्क्स लाने के लिये करते हैं, चैप्टर्स को समझने और रिसर्च करने की जगह रट्टा मारा जाता है, जिससे कि बस फ़ौरी तौर पर अच्छे से अच्छे मार्क्स लाकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए एडमिशन मिल सके।
यह कंपीटिशन बच्चों के अंदर ऐसा प्रेशर भरता है कि वो अंदर से कमज़ोर होते चले जाते हैं। अक्सर बच्चे इस प्रेशर को सहन नहीं कर पाते हैं और बीच में ही जीवन से हार जाते हैं और बाक़ी स्टूडेंट्स उस मानसिक कमज़ोरी को ज़िंदगी भर झेलते रहते हैं।
माध्यम और गरीब वर्ग के पैरेंट्स के लिए तो अपने बच्चों को कमज़ोर आर्थिक स्थिति से बाहर निकलने का यही रास्ता बचता है, क्योंकि वो अपने बच्चों का एडमिशन प्राइवेट संस्थाओं मे करा ही नहीं सकते हैं।
हमारे देश में सरकारें अच्छे सरकारी शिक्षण संस्थान इसलिए नहीं बना रही हैं कि अगर माध्यम और गरीब वर्ग के बच्चे भी पढ़ लिख गये तो फिर अमीर वर्ग के बच्चों का क्या होगा? क्योंकि फिर उच्च स्तरीय नौकरियों पर बड़ी तादाद में पास हुए गरीब तबके के बच्चे अपना दावा पेश करेंगे।
हर साल 20 लाख से ज़्यादा बच्चे NEET की परीक्षा में बैठते हैं और मात्र 50 हज़ार के आसपास ही MBBS की सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। यही हाल JEE जैसी दूसरी परीक्षाओं का भी है।
पर सब राजनैतिक पार्टियाँ मस्त हैं, क्योंकि उन्हें वोट धार्मिक नफ़रत की राजनीति और इस राजनीति का विरोध करने से मिल ही रहे हैं। वोट डालने वालों को अपने बच्चों के मुस्तक़बिल की कोई परवाह ही नहीं है तो किसी और को भी क्यों ही हो?

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सही नीयत, अच्छी सोच, सही योजना और अधिकार के बावजूद लागू न करना

कई बार हमारा मक़सद भी अच्छा होता है, हमारी सोच भी सही होती है, हमारी प्लानिंग भी परफ़ेक्ट होती है, हमारे पास करने के अधिकार भी पूरे होते हैं, फिर भी हम वो नहीं कर पाते जिसे करना ज़रूरी होता है… 


क्योंकि अगर हम अपनी सोच के हिसाब से ही सबकुछ करने लग जाएँगे तो उनकी ज़िंदगी के कोई मायने नहीं रह जाएँगे जो कि हमारे फ़ैसले से प्रभावित हो रहे होंगे। भले ही हमारी कोशिश उन्हीं की ज़िंदगी सुधारने की ही क्यों ना हो… 


इस बात को एक उदाहरण से समझने कि कोशिश करते हैं, अपनी ज़िंदगी में हम अगर घर के बेटे के तौर पर देखते हैं कि हमारी मां और हमारी पत्नी हमारी सोच के ख़िलाफ़ चल रही होती है। हमें लगता है कि माँ इस तरह चले और पत्नी उस तरह चले तो घर का माहौल ख़ुशगवार हो जाएगा। आपसी खींचतान ख़त्म हो जाएगी। 


यहाँ हमारा मक़सद भी सही होता है, पर अगर हम अपनी सोच उनके ऊपर ज़बरदस्ती थोपते हैं, तो उनकी ज़िंदगी के मायने ख़त्म हो जाते हैं। उन दोनों का अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से जीने का हक़ ख़त्म हो जाता है। हमारे ज़बरदस्ती कंट्रोल करने से झगड़े या फिर खींचतान तो ख़त्म हो सकती है, पर ज़िंदगी में जो लुत्फ़ आना चाहिए वो खो जाता है। क्योंकि इसके लिए उन दोनों को अपनी पर्सनेलिटी को ख़त्म करना पड़ता है। इंसान को फ़ितरत ही ऊपर वाले ने ऐसी बनाई है।



हालाँकि ऐसे में आप कुछ और भी कर सकते हैं, जैसे कि किचकिच से तंग आकर संयुक्त परिवार से विद्रोह करके अलग रह सकते हैं, पर इसमें भी आप एक ही पक्ष को खुश रख पाते हैं और दूसरे के साथ अन्याय करते हैं। और यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम उनके साथ न्याय करें, जिनका हमारे ऊपर हक़ है!

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ला इलाहा और इल्लल्लाह का तात्पर्य

कलमा की शुरुआत 'ला इलाहा' से होती है, मतलब कि नहीं है कोई उपास्य (जिसकी उपासना की जा सकती हो), जो कि किसी नास्तिक का भी कलमा होता है। फिर दूसरा पार्ट है 'इल्लल्लाह', जिसका मतलब है सिवाए अल्लाह/रब/ईश्वर/गॉड के... यह मेसेज दुनिया के हर दौर में, अलग-अलग भाषाओं, अलग-अलग देश/क्षेत्र में आए ईश दूतों ने इंसानों को दिया है। 


इस कलमा/कथन का तात्पर्य ही यह है कि किसी नास्तिक या फिर आस्तिक के पुत्र/पुत्री तब तक धार्मिक नहीं है जब तक कि उसे अपने रब यानी creater में आस्था पैदा नहीं होती है। मतलब मुस्लिम के बच्चे मुस्लिम, हिंदू के बच्चे हिंदू, सिख के बच्चे सिख, ईसाई के बच्चे ईसाई, यहूदी के बच्चे यहूदी हरगिज़ नहीं हो सकते हैं जब तक कि उनके अंदर कलमें के पहले पार्ट के बाद वाली उत्सुकता पैदा नहीं हो और वो दूसरे पार्ट की खोजकर करके उसके ऊपर आस्था ना ले आए!


मतलब उसे रिसर्च करनी चाहिए कि क्या उसका कोई रब है या नहीं और जब दिल इस बात पर विश्वास कर ले कि हां कोई उसका रब/creater है तब उसे अपने रब को खोजना चाहिए और जब उसकी खोज पूरी हो जाए तो अपनी जिंदगी उसकी मर्ज़ी से गुज़ारनी चाहिए।


विश्वास कीजिए कि जिसने भी इस प्रोसेस को अपनाया उसकी मौत इससे पहले आ ही नहीं सकती है जब तक कि उसके रब की हकीकत साफ़ साफ़ उसके सामने ज़ाहिर नहीं हो जाए, क्योंकि फिर ज़िम्मेदारी आपकी नहीं आपके रब की है!


पर यह प्रोसेस कोई धर्म का दुकानदार हमें नहीं बताएगा, क्योंकि फिर आपसी दुश्मनियां और धर्म की लड़ाइयां खत्म हो जाएंगी, मतलब उनकी दुकानदारी खत्म हो जाएगी। जिसके ज़रिए वो अपना पेट भरते हैं या फिर सत्ता चलाते हैं। वैसे सत्ता सिर्फ देश/राज्य की ही नहीं होती है, बल्कि घर की, मौहल्ले की, एरिया की, किसी ग्रुप की या फिर कौम की भी होती है।

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प्रेशर में काम करने के दुष्परिणाम

हम आमतौर पर अपने बच्चों पर प्रेशर डालकर काम करवाना चाहते हैं, जैसे कि पिटाई का डर दिखाकर, नाकामयाबी का डर दिखाकर, गरीबी का डर दिखाकर... जबकि इंसान प्रेशर में जबरदस्ती काम तो कर लेता है, पर उसका दिमाग प्रेशर को बहुत देर तक झेल नहीं पाता है।


कुछ बच्चों का दिमाग इतना मजबूत नहीं होता है और धीरे-धीरे उनकी प्रेशर झेलने की क्षमता खत्म होती चली जाती है। ऐसे ही बच्चे, बचपन में या फिर बड़े होने के बाद भी नाकामयाबी के डर से ख़ुद को नुकसान तक पहुंचा देते हैं। 


आजकल की कंपनियां भी अपनी एम्पलाईज को मोटिवेट करने की जगह प्रेशर में झोंक कर काम करवाती हैं, खासतौर पर सेल्स टारगेट वाली कंपनियां तो इंसानी जिंदगी के लिए नासूर की तरह हैं!


जबकि होना यह चाहिए कि जो हम करवाना चाहते हैं, हर बार उन्हें वो करने के लिए मोटिवेट करें, लॉजिक से समझाएं, कि फलां काम क्यों ज़रूरी है और उसके होने या नहीं होने के क्या फायदे और क्या नुकसान हैं। उन्हें नाकामयाबी से डराएं नहीं, बल्कि सिर्फ मार्गदर्शन करके उनके ऊपर छोड़ दें, उन्हें खुद से फेल या पास होने दें। और फेल होने पर समझाएं कि यही ज़िंदगी है, फेल होने का भी लुत्फ उठाओ और जिन वजहों फेल हुए हो, उनके ऊपर गौर करो। 


वो अगर बार-बार भी फेल होते हैं, तब भी उन्हें मोटिवेट करना हैं। क्योंकि इससे उनके अंदर जो समझ पैदा होगी, हार का डर खत्म होगा, वो उन्हें स्थाई तौर पर मज़बूत और कामयाब बनाएगा। 



यही काम सफलता पर भी करना है, सफलता इंसान को अपनी कमियों को देखने से रोकती है, जो कि लॉन्ग टर्म पर और भी ज़्यादा नुकसानदेह है।


मतलब फेलियर और सफलता दोनों इंसान के लिए उसके रब की तरफ से अवसर हैं!

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भावनात्मक रूप से मूर्ख लोग

इमोशनली बेवकूफ लोग चलते फिरते बारूद की तरह हैं, कोई भी कभी भी इनके ज़रिए किसी का भी कत्ल करवा सकता है, दंगा भड़का सकता है।


हमारे देश में ऐसे लोगों गोमांस या फिर धर्मविरोध के नाम पर मॉब लिंचिंग करते पाए जाते हैं। ठीक ऐसे ही पाकिस्तान में भी गली गली में ऐसे बारूद के ढेर घूम रहे हैं। बस उन्हे यह कहकर इमोशनल बेवकूफ बनाना होता है कि फलां ने अल्लाह या फिर अल्लाह के रसूल (स.) की शान में गुस्ताखी की है। 


फिर इमोशंस भड़कने पर शैतान बने यह लोग ना तो कोई फैक्ट्स चेक करते हैं, ना उन्हे किसी प्रूफ की ज़रूरत होती है और ना ही किसी अदालत में जुर्म साबित करना होता है। सज़ा भी थोड़ी बहुत नहीं, बल्कि शैतानों की भीड़ खुद ही सज़ा देते हुए सीधे लिंचिग कर देती है। 


पिछले दिनों पाकिस्तान से ऐसी ही एक दिल दुखाने वाली खबर आई थी, उमेरकोट के रहने वाले डॉ शाहनवाज खानबर के फेसबुक अकाउंट से एक पोस्ट हुई, जिसमे उनके ऊपर पैगंबर मुहम्मद (स.) की बेहुरमती करने का आरोप लगा। भीड़ इनके घर पहुंच गई, वह उस समय शहर में भी नही थे। इन्होंने कहा कि उनका फोन हैक हुआ है, पुलिस जांच कर ले, मैं जांच के लिए तैयार हूं। 

पर ख़ुद पुलिस ने ही उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार डाला और इसके बाद वहां के कट्टर मज़हबी पार्टी वालो ने उनकी लाश तक को जला डाला।


यह सिर्फ एक उदाहरण है, पर ऐसा वहां भी आए दिन होता रहता है। पाकिस्तान की आर्थिक और दिमागी बदहाली की ज़िम्मेदारी इन इमोशनल बेवकूफ कट्टरपंथियों पर भी आती है। 


उनकी इस बदहाली के बावजूद इस तरफ वाले इमोशनल बेवकूफ उनसे खूब रेस लगा रहे हैं!

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औरंगज़ेब सिर्फ एक शासक था

औरंगज़ेब भी दूसरे राजाओं की तरह एक शासक ही था, जिसके अंदर बहुत सारी खूबियाँ थीं और ऐसे ही बहुत सारी कमियाँ भी थीं, पर उन खूबियों और कमियों का देश के मुसलमानों से कोई ताल्लुक़ नहीं है। भले ही उसने किताबें लिखकर और रस्सियां बुनकर अपना खर्च चलाने जैसा बेहतरीन काम होगा, पर सत्ता की लड़ाई में अपने सगे भाइयों की हत्या करने वाला, अपने भाई दारा शिकोह की हत्या के बाद उसके पार्थिव शरीर को शहर में घुमाकर नुमाइश करने वाला और उसके सिर को तश्तरी में सजाकर अपने पिता के सामने पेश करने वाले से हमारा सम्बन्ध तो हरगिज़ नहीं हो सकता है। 


कुछ कट्टरपंथी जरूर उसका महिमामंडन करते हो, पर आम मुसलमान उसे अपना आदर्श नहीं मानते हैं, किसी भी बच्चों का नाम औरंगज़ेब नहीं रखा जाता है। उसे सिर्फ एक ऐसे शासक के तौर पर याद किया जाता है, जो कि शासन में क्रूर होने के बावजूद जनता के पैसे की बर्बादी नहीं करता था। अपना खर्च अपनी मेहनत कमाई से चलाता था, जबकि नार्मल परसेप्शन है कि शासक वर्ग जनता को शोषित करके सत्ता सुख भोगते हैं। 

हालाँकि राजनैतिक फ़ायदे के लिये अगर कोई नफ़रत फैलाने के मक़सद से झूठ गढ़ता है तो उसका विरोध करना और सही फैक्ट्स सामने रखना भी बिलकुल सही और ज़रूरी है। जैसे कि कहा जाता है कि "औरंगज़ेब रोज़ 40 मन जनेऊ जलाता था"। जबकि एक जनेऊ लगभग 50 ग्राम का होता है, तो 40 मन जनेऊ जलाने का मतलब हुआ प्रतिदिन 1600 किलो, अर्थात 32000 ब्राह्मणों की हत्या होना। और इस हिसाब से एक साल में मारे गए ब्राह्मणों की संख्या 1,16,48,000 हुई, मतलब पूरे शासन काल में 5,82,40,000 यानी लगभग 58 करोड़ ब्राह्मण मारे गए, जो कि असंभव फिगर है। हक़ीक़त यह है कि औरंगज़ेब के समय देश की जनसंख्या सिर्फ 15 करोड़ थी, इसमें वयस्क लगभग 8 करोड़ ही रहे होंगे जिसमें ब्राह्मण समुदाय की जनसँख्या लगभग 1 करोड़ ही होगी और उसमें से भी पुरुष 50-60 लाख ही रहे होंगे। यह बात ऐतिहासिक साक्ष्यों के तो विरुद्ध है ही, तर्क के भी पैमानों पर झूठी साबित होती है! 

हालाँकि ऐतेहासिक साक्ष्यों के हिसाब से किसी भी शासक ने जो ग़लतियाँ की उन ग़लतियों की बुराई करना और जो अच्छे कदम उठाए उन कदमों की सराहना करने का भी सभी को अधिकार है। हर दौर के शासकों ने अपने राज्य को बढ़ाने के लिए आज के दौर के पैमाने के एतबार से अच्छे और बुरे काम किये हैं, ऐसे ही औरंगज़ेब ने भी कुछ क्रूर कदम भी उठाए और कुछ जनहितकारी और दूरदर्शिता वाले काम भी किये। औरंगज़ेब ने कुछ हिन्दू समुदाय के हित में तो कुछ विरोध में काम किये, ऐसे ही मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए, तो कुछ विरोध में काम किये। विभिन्न शासकों के इतिहास में दर्ज अच्छे और बुरे कामों का मक़सद अपने शासन को मज़बूत और बड़ा बनाने के सिवा मुझे कुछ और नज़र नहीं आता है। 

हालाँकि मैं शासकों को कभी कोई ख़ास विरोध नहीं करता हूँ और ना ही उन्हें रोल मॉडल या हीरो समझता हूँ। यक़ीन कीजिए कि जिस चंगेज़ ख़ान को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है, जिसने करोड़ों मुसलमानों का क़त्ल किया, मैं उससे भी कभी नफ़रत नहीं करता हूँ। 

इसकी एक वजह यह भी है कि शासकों के बारे में इतिहास में जो लिखा है वो भी ज़रूरी नहीं है कि शब्द दर शब्द सच ही हो। उस वक़्त की परिस्थितियों को आज के वक़्त समझना वैसे भी बेहद मुश्किल काम है और जो लिखा गया है उनकी सच्चाई को परखना मेरे जैसों के लिए असंभव सा है। जैसे कि आज गोदी मीडिया है वैसे भी तब भी किताबें चाटुकारों अथवा विरोधियों ने लिखी होंगी। जिसमें सच का कितना अंश होगा यह पता लगाना नामुमकिन जैसा ही है। हालाँकि हमारे पास उस समय को जानने के एकमात्र साधन ऐतिहासिक साक्ष्य ही हैं, इसलिए हम उनके ऊपर विश्वास करके चलते हैं। पर हमें इतिहास को इतिहास ही समझना चाहिए, उसे किसी धर्मग्रन्थ की तरह 100% सही समझ कर नहीं चलना चाहिए। 

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साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और इसका नुक़सान


मैं अपने बचपन से चुनावों में सांप्रदायिक नफरत का चक्रव्यूह देखता आ रहा हूं। चुनाव करीब आते ही बीजेपी तुरंत हिन्दू मुस्लिम पर और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां जनता के कामों पर सवाल करने या हिसाब-किताब देने की जगह बीजेपी के चक्रव्यूह में फंसकर उसके एजेंडे पर बात करती नज़र आती हैं। 

यह दोनों तरफ़ की पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता पर लड़ा जाए। क्योंकि इससे दोनों तरफ के लोगों को किसी एक पार्टी को वोट देना मजबूरी बन जाता है। फिर चुनाव में लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके काम हुए या नहीं हुए, देश या राज्य तरक़्क़ी की राह पर जा रहा है या नहीं।

हालांकि कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जब नफरतें चरम पर होती हैं, तो फिर चाहे सेकुलर माइंडसेट वाले हिंदू हों या फिर मुसलमान, दोनों ही कम्युनल एजेंडे पर वोट देने को मजबूर हो जाते हैं और इनकी हार की यही वजह है!

देश के लोगों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि चुनाव इमोशनल इशुज़ की जगह सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता के कामों पर होने चाहिए। मतलब क्या काम किए, क्या नाकामी रही और आगे का क्या एजेंडा है, लोकतंत्र इसी का नाम है कि चुनाव के वक्त जनता अपने कामों के हिसाब से वोट दे! 

साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के नाम से होने वाली राजनीति को हाशिए पर लाने का मेरी नज़र में सिर्फ यही एक हल है।

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मेरी कोच्चि और कुमारकोम यात्रा


किस की तलाश है हमें, किस के असर में हैं।
जब से चले हैं घर से, मुसलसल सफ़र में हैं।

तो दोस्तों, आज हम निकल पड़े हैं एक नए सफ़र पर। मंज़िल है केरल का खूबसूरत शहर कोच्चि, जिसे बहुत से लोग कोचीन के नाम से भी जानते हैं। इस सफ़र में हम आपको दिखाएंगे कोच्चि की कुछ बेहतरीन जगहें, वहां तक पहुंचने के तरीके और उन नज़ारों की झलक, जिनकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां खिंचे चले आते हैं।

सुबह के तीन बजे हैं। बैग पैक हो चुका है, कैमरा तैयार है और दिल में एक नई मंज़िल को देखने का उत्साह। चलिए फिर, शुरू करते हैं यह खूबसूरत सफ़र।

मैंने इंडिगो की फ्लाइट ली, हवाई सफर में टेक ऑफ और लैंडिंग का नज़ारा मुझे हमेशा रोमांचित करता आया है और इसीलिए मैं हमेशा विंडो सीट लेता हूं। हालांकि Aisle Seat लेने पर फ्लाइट में टहलने और वाशरूम वगैरह जाने में आसानी रहती है, पर विंडो सीट का अपना ही मज़ा है। सफर अगर लंबा है तो मैं विंडो पर सर टिका कर सो भी जाता हूं।


सुबह एकदम निकलने को है, IGI एयरपोर्ट के ऊपर से आगे जाते हुए नज़ारा बहुत ही दिलकश है। मैने 10 दिन पहले ही टिकट बुक करा लिया था इसलिए मुझे नई दिल्ली से कोचीन के लिए इकोनॉमी क्लास का एयर टिकट लगभग 8 हज़ार का पड़ा है, बिजनेस क्लास में 16 के करीब का ऑप्शन था। बाई एयर दिल्ली से कोच्चि लगभग 3 घंटे का सफर है।


अगर आप ट्रेन से जाना चाहते हैं तो नई दिल्ली से केरल एक्सप्रेस से सफर कर सकते हैं जो कि एर्नाकुलम टाउन तक की सबसे तेज़ ट्रेन है और लगभग 44 घंटे 45 मिनट में 2811 किलोमीटर की दूरी तय करती है। जिसमें सेकंड एसी का किराया लगभग 3500 और थर्ड AC का किराया 2500 रुपए के करीब आता है।


कोच्चि लक्षद्वीप सागर के तट पर बसा हुआ एक बड़ा बंदरगाह शहर है। कोच्चि को एर्नाकुलम भी कहा जाता है, जिसका मतलब शहर का मुख्यभूमि भाग यानी Main land part है। कोच्चि नगर निगम तकरीबन 95 स्क्वायर किलोमीटर के एरिया में फैला हुआ है। कोच्चि केरला स्टेट का दूसरा सबसे ज्यादा पॉपुलेशन वाला शहर है, हालांकि शहरी आबादी के हिसाब से यह केरल का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। साल 2024 के अंत तक यहां के मेट्रो क्षेत्र की आबादी 35 लाख होने का अनुमान है।


कोच्चि 14वीं शताब्दी से ही भारत की पश्चिमी तटरेखा का मसालों के व्यापार का सेंटर रहा है, अरब सागर की रानी' के नाम से मशहूर कोच्चि टॉप रेटेड इंटरनेशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशंस में से एक है जहाँ छुट्टियां मनाने आने वालों को प्री हिस्टोरिक, ऐतिहासिक और आधुनिक युग की झलक बेहद करीब से देखने के लिए मिलती है। 


कोच्चि असल में केरल का दिल है। यह शहर की फाइनेंशियल कैपिटल है जहाँ आईटी सहित कई अन्य कारोबार फल-फूल रहे हैं क्योंकि यह देश के प्रमुख बंदरगाह शहरों में से एक है। इस Metropolitan City में वह सब कुछ है जो किसी भी मौसम में आपंका मन लुभा सकता है जैसे कि मेट्रो शहर की सुविधाएँ, कुदरत की खूबसूरती और यहां का अमेजिंग कल्चर। अगर आप रोमांचक यात्रा करना चाहते हैं या फिर सुकून भरी छुट्टी का लुत्फ उठाना चाहते हैं, यकीन मानिए यहां आपको निराश हाथ नहीं लगेगी।


कोची इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिलकश सी जगह है, जो कि अपने रख रखाव में किसी भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से मुकाबला कर सकता है। बेहद खूबसूरत कोच्चि एयरपोर्ट से चेराई बीच की दूरी 27 किलोमीटर है, अगर आप टैक्सी से जाते हैं तो तकरीबन एक घंटा वहां पहुंचने में लगेगा। चेराई बीच कोच्चि में सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली जगहों में से एक है। चेराई बीच कोच्चि लोगों को शहर की भीड़-भाड़ से दूर आराम करने का मौक़ा देता है । शाम के समय चेराई बीच पर जाने का सबसे अच्छा वक्त होता है, जहां आप खूबसूरत सूर्यास्त यानी सन सेट देख सकते हैं।

आप यहां से वाइपिन द्वीप भी जा सकते हैं, वाइपिन द्वीप कोच्चि का बहुत मशहूर पर्यटन स्थल है. यह एक अवरोधक द्वीप यानी barrier islands बनाता है जो पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में पेरियार नदी की सहायक नदियों से घिरा हुआ है. यह आइलैंड लगभग 27 किलोमीटर लंबा है और अपनी कुदरती खूबसूरती, प्राचीन समुद्र तटों और मछली पकड़ने वाले गांवों के लिए मशहूर है. वाइपिन द्वीप पर कई पर्यटन स्थल हैं, जैसे कि चेराई बीच भी यहीं पड़ता है, जिसके बारे में मैने ऊपर बताया।


यहां आप Munambam Fishing Harbour भी घूम सकते हैं जो कि कोच्चि का सबसे बड़ा मछली पकड़ने वाला बंदरगाह है। इसके अलावा आप यहां एलमकुन्नापुझा सुब्रह्मण्य मंदिर, चेराई मंदिर, पालथनकुलंगरा देवी मंदिर, अजीकल वराहमूर्ति मंदिर, पुथुवाइप स्थित लाइटहाउस, सहोदरन अय्यप्पन स्मारकम, क्रूज़ मिलग्रेस चर्च, कुझुप्पिली बीच और पल्लीपुरम किला घूम सकते हैं।


इसके अलावा डच पैलेस और बोलघट्टी द्वीप भी घूमने के लिए बेहतरीन जगह हैं। इनके साथ साथ शानदार बैकवाटर से घिरा तथा मानव निर्मित विलिंगडन द्वीप भी बेहद खूबसूरत है। इस द्वीप का नाम भारत के भूतपूर्व ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड वेलिंगडन के नाम पर रखा गया था। यहाँ फोर्ट कोच्चि बीच भी बहुत मशहूर है, साथ ही साथ आप कोडानाड एलिफेंट ट्रेनिंग सेंटर भी जा सकते हैं। केरल कुदरती खूबसूरती के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है, अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं तो कोच्चि मंगलवनम बर्ड सेंचुरी ज़रूर जाइए। और अगर आप कोच्चि आए और मरीन ड्राइव नहीं गए तो फिर क्या ही किया… जल्दी हीं सभी पर्यटन स्थलों पर अलग अलग डीटेल वीडियो बनकर आपके साथ शेयर करूंगा।


कोची इंटरनेशन एयरपोर्ट से हमारे डेस्टिनेशन द जूरी कुमारकोम केरला स्पा एंड रिजॉर्ट की दूरी लगभग 73 किलोमीटर दूर है। अगर आप रेलमार्ग या फिर बस से सफर करना चाहते हैं निकटतम टर्मिनल कोट्टायम में है। 


The Zuri Kumarakom Kerala Spa & Resort पहुंचने पर हमारा स्वागत पारंपरिक नगाड़ों के साथ हुआ। माथे पर तिलक लगाया गया और बेहद लजीज़ नारियल पानी सर्व किया गया। वेम्बनाड झील के शानदार तट पर बसा यह 5-सितारा लग्जरी हेरिटेज रिसॉर्ट केरल में भारत के सबसे शानदार हॉलिडे डेस्टिनेशन में से एक है। यहां का शांत बैकवाटर और हरियाली से भरे नज़ारे आँखों को सुकून देते हैं। यहां खूबसूरती से सजे और करीने से डिज़ाइन किए गएआलीशान कमरे, विला और कॉटेजेस का कलेक्शन है। 


यहां हमारे बजट के एतबार से शानदार लैगून के सामने वाले कमरे या फिर निजी पूल वाले आलीशान विला के ऑप्शन मौजूद हैं। बात करने पर पता चला कि यहां 18 जूरी रूम्स, 16 डीलक्स रूम्स, 28 कॉटेज और 10 प्रेसिडेंशियल पूल विला हैं, यानी कुल मिलाकर 72 रूम्स हैं।


मैंने जूरी रूम लिया था, जिसमें कमरे के साथ आने वाले खूबसूरत निजी बरामदे से ब्लू लैगून के शांत पानी में सुनहरे सूर्योदय को देखते हुए सुगंधित चाय के कप का मज़ा लेना ऐसे यादगार पल में से एक हैं जो कि हमेशा ज़हन में रहने वाले हैं। रिसोर्ट में स्थित माया स्पा में अपने मन, शरीर और आत्मा को तरोताज़ा किया जा सकता है! मानसिक स्वास्थ्य से लेकर एंटी-एजिंग और रेजूवेनेशन तक के लिए आयुर्वेद ट्रीटमेंट का फायदा उठा सकते हैं।


यहां ऐसी कुदरती खूबसूरती बिखरी पड़ी है जो आपका मन मोह लेगी। ऐसे नज़ारों के लिए शारिक़ बल्यावी कहते हैं कि 

हर तरफ़ दावत-ए-नज़ारा है
चश्म-ए-हैरां किधर-किधर देखे


और शकील बदायूंनी कहते हैं कि 

कोई दिलकश नज़ारा हो, कोई दिलचस्प मंज़र हो
तबीअत ख़ुद बहल जाती है, बहलाई नहीं जाती


ब्लू लगून के शांत पानी और कुदरती हरियाली का मिलन ही वो करिश्मा पैदा करता है कि पूरी दुनिया से लोग यहां खींचे चले आते हैं। इस कुदरती खूबसूरती पर दा जूरी के लगजुरियस इंतजाम चार चांद लगा देते हैं। आपको अहसास ही नहीं होता है कि आप वाकई अपनी आंखों से यह चमत्कार देख रहे हैं या फिर कोई ख्वाब देख रहे हैं।


शाम को यहां क्लासिकल प्रोग्राम्स का भी इंतजाम रहता है। यकीन मानिए, इसकी भव्यता और लाइटिंग का कॉम्बिनेशन आपको एक अलग ही अहसास कराएगा। हालांकि हमने अपने ग्रुप के साथ डिनर से पहले चल करने के लिए ऑर्केस्ट्रा के साथ डांस का इंतजाम करवाया था। 


रात के अंधेरे में झील के किनारे की गई लाइटिंग को निहारते हुए इवनिंग वॉक करना भी बेहद अद्भुत है। यहां आए हैं तो हर पल को जीना है, हर मौके का लुत्फ उठाना है, यह सबक अगर सीख लिया तभी आप अपने सफर को कामयाब कर पाएंगे। क्योंकि पता नहीं प्रकृति से यह सीधा साक्षात्कार यानी नेचर से यूं रूबरू होना फिर दुबारा कब मयस्सर हो, इसलिए किसी भी पल को गंवाना नहीं है, हर एक मौके को अपने स्मृति पटल यानि मेमोरी बोर्ड पर कैद करते रहिए। 


सुबह उठने पर देखा कि तो बाहर हल्की हल्की बारिश हो रही है, मैने थोड़ी देर अपने कमरे से बाहर के नज़ारों का लुत्फ उठाया और फिर दरवाज़ा खोलकर बाहर आकर बैठ गया। यहां की शाम जितनी रंगीन थी, सुबह भी उतनी ही दिलकश है। सामने ब्लू लगून वेम्बनाड झील को निहारना बेहद सुकून देता है, यहां पर घंटों बैठा जा सकता है। पर हमने बोटिंग के लिए जाना था, जिसके लिए रिसेप्शन से फोन आ गया। हम रिसेप्शन पर पहुंचे हैं तो फिर से हमारा स्वागत केरल के ट्रेडिशनल ड्रम के साथ किया गया, हमारी टीम के साथी भी उसकी धुनों पर नाचने लगे।


यहां हाउस बोट का भी इंतजाम है, पर हमने रोमांचक स्पीड बोट को चुना है। सबसे पहले हम फिशिंग पॉइंट पर गए और उसके बाद कोकोनट ट्री से तोड़ी तोड़ते हुए देखने का प्लान बनाया गया। यहां स्थानीय मछुआरे फिशिंग के लिए नीचे झील के पानी के अंदर जाते हैं, यह मछली पकड़ने का यहां का ट्रेडिशनल तरीका है।


राइस फील्ड: इस मैन मेड झील के बीच में बचे हिस्से पर चावल की खेती की जाती है, इस हिस्से के दोनों तरफ झील का पानी भरा पड़ा है, इसलिए यहां राइस फार्मिंग बेहद फायदे का सौदा है।


तोड़ी: फिर हम तोड़ी के प्रोसेस को देखने के लिए गए, नारियल के गुच्छों को काटकर निकाले गए तोड़ी के रस को दो तरह से यूज़ किया जा सकता है। तोड़ी के नाम से मशहूर इसका अल्कोहलिक वर्जन हल्का नशीला होता है। जबकि नॉन अल्कोहलिक वर्जन को नीरा कहते हैं, जो कि नारियल से निकलने वाला अन फर्मेंटेड रस है जिसे अक्सर स्वीट तोड़ी भी कहा जाता है। यह नारियल के एमेच्योर इन-फ्लो-रेसेंस से मिलता है। हालांकि इसकी शेल्फ लाइफ 4 या 5 घंटा ही होती है। इसके बाद यह फर्मेंटेड होना शुरू हो जाता है।


तोड़ी निकालने वाले नारियल के पेड़ पर रस्सी बांधकर उसे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। तोड़ी के फूल की बंद कलियों को हल्का सा काटा जाता है, मतलब 95% को पेड़ पर ही छोड़ दिया जाता है। इसके बाद कली को फूलने के लिए हथौड़े से पीटा जाता है और रस को इकट्ठा करने के लिए मिट्टी के बर्तन लगाए जाते हैं, जिसमें यह दूधिया रस इकट्ठा होता रहता है। जिसे बाद में नीचे उतार लिया जाता है। जिस रस से तोड़ी बनानी है उसे हल्का सा Fermented होने के लिए छोड़ दिया जाता है। जितना ज़्यादा देर तक यह Fermented होता है, उतनी ही ज्यादा उसमें अल्कोहल बनती जाती है। इसके बाद तोड़ी को कांच की बोतलों में पैक करके लाइसेंस वाली दुकानों में बेचा जाता है। तोड़ी में लगभग 8% अल्कोहल होती है और इसे केरल में प्राकृतिक शराब और हेल्थी ड्रिंक माना जाता है।


यहां से हम वापिस जा जाते हुए रास्ते में एक जगह रुककर हमने लंच किया और फिर वहां से वापिस रिजॉर्ट के लिए निकल गए। बोट से उतरने पर ट्रेडिशनल ड्रम के साथ टीम तैयार थी, पर इस बार हमारे ग्रुप ने जिनसे ड्रम लेकर अपने हाथ अज़माना शुरू कर दिया। काफी थक गए थे, इसलिए रूम पर जाकर आराम करने का प्लान बनाया गया, शाम का प्लान स्नेक बोट में जाने का था, पर अब वो कल सुबह घर वापिसी से पहले का प्लान बनाया गया है।


स्नेक बोट: ओणम फेस्टिवल पर होने वाली स्नेक बोट रेस के बारे में आपने ज़रूर सुना होगा, सुबह-सुबह  सेंक बोट रेस में हिस्सा लिया और उसके बाद फिर वापिस दिल्ली के निकल गए।

केरल अपने मसालों के लिए बहुत मशहूर है, अगर आप केरल घूमने आए हैं तो वापसी में यहां के शुद्ध और ताज़ा मसाले साथ के जाना नहीं भूलें और यह भी याद रखना है कि मसालों के चेक इन बैगेज में ही पैक करें, बहुत से मसालों को हैंड केरी में ले जाना अलाउड नहीं होता है।

तो आज के लिए इतना ही, एक नए सफर के साथ जल्द ही मिलते हैं!



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आप कारोबार में जितना ज़्यादा मेहनत करते हैं उतना ही कम कमाते हैं

जब आप अपने कारोबार में ज़्यादा मेहनत करते हैं तो उसके दो नुकसान होते हैं, एक तो कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी नेटवर्क को बनाने के साथ-साथ बाकी कारोबार में इन्वेस्ट करने का टाइम नहीं निकल पाते हैं और दूसरा ख़ुद को और परिवार को टाइम कम देने की वजह से क्वालिटी ऑफ लाइफ नहीं जी पाते हैं। अगर जिंदगी में लुत्फ नहीं है तो इसका मतलब अपने रब (बनाने वाले) के शुक्रगुजार नहीं हैं, जिसका असर मेंटल लेवल पर पड़ता है और फिर इसकी वजह से आपकी प्रोफेशनल लाइफ की ग्रोथ  इस स्पीड से नहीं हो पाती है, जितनी ज़रूरत होती है।

इसलिए वक्त के साथ साथ बैलेंस बनाते हुए कारोबार में ख़ुद की मेहनत को कम करते जाइए और कारोबार चलाने और बढ़ाने के लिए ज़रूरी नेटवर्क को मज़बूत करते जाइए... 

खुद अधिक मेहनत करने की जगह टीम बनाने उसे मैनेज करना सीखिए। मेरे एक मित्र का पारिवारिक कारोबार अच्छा चलता था, मैंने उसे समझाया कि आप लोग स्वयं मेहनत में लगे रहते हैं, इसकी जगह आपको काम करने वाले कारीगर लगाने चाहिए। इससे जो समय बचेगा उसे आप व्यसाय बढ़ाने में लगा सकते हैं। पर उसके पिता को यह बात समझ नहीं आई, उन्होंने कहा कि हम हाथ के कारीगर है फिर हम खुद काम करना छोड़कर दूसरों को इस काम पर क्यों लगाए? पर कुछ साल बाद उनका व्यवासय पिछड़ने लगा, क्योंकि उसके क्षेत्र में नए व्यवसायी आने लगे थे, जिन्होंने इन्वेस्टमेंट करके बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं। काम बढ़ने के साथ-साथ उन्होंने ज़्यादा कारीगरों को हायर किया। जिससे वो कम्पटीशन में उनसे कम कीमत पर अच्छी क्वालिटी उपलब्ध कराने लगे। और इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे धीरे उनका कारोबार ठप्प हो गया।   

वैसे भी उसूल यह कहता है कि किसी कारोबार में रात-दिन मेहनत करके आप ज़िंदगी अच्छी तरह से चलाने का इंतजाम तो कर सकते हैं पर अमीर नहीं बन सकते हैं!

अमीर हालांकि अरबी का लफ्ज़ है, जिसका मतलब लीडर होता है, पर अगर पैसे वाले अमीर की बात की जाए तो वो वही व्यक्ति बनता है जो कारोबार को कम से कम मेहनत से मैनेज करना सीख लेता है। जब एक कारोबार कुछ चल जाए तो खर्च निकालने के बाद बचे मुनाफे से बाकी के कारोबारों की तरफ रुख करना ही अमीर बनने का सीधा रास्ता है। एक कमाई से कभी कोई अमीर नहीं बनता है!

और जो यह कहते कि अमीर गलत धंधे करके ही बनते हैं, वो आपको सिर्फ झूठ का सहारा लेकर बेवकूफ ही नहीं बना रहा होता है, बल्कि आपको डिमोटिवेट करके बहुत बड़ा गुनाह भी कर रहे होते हैं। याद रखिए कि पैसे कमाना शैतानी काम नहीं है बल्कि यह एक धार्मिक और समाज का भला करने वाला काम है, बशर्ते सही उसूलों से किया जाए!

इसलिए अमीर या फिर बिलिनियर बनने का लक्ष्य रखिए, खूब सारा पैसा कमाना बेहद ज़रूरी है और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि ईश्वर जो हमें सामाजिक नेटवर्क के ज़रिए दे रहा है उसे समाज को वापिस भी किया जाए। यानी कौम, समाज, देश और इंसानियत के फायदे के लिए अपनी कमाई में से परिवार पर खर्च करने के बाद बचे पैसे का आधा हिस्सा खर्च किया जाए। यह पैसा आप शिक्षा, रिसर्च, भोजन, इलाज और लोगों को कारोबार कराने की व्यवस्था के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

विश्वास कीजिए, आप जितना इंसानियत को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च करेंगे आपका रब उसका कई गुना आपको वापिस करेगा। मतलब यह भी एक तरह से ईश्वर के साथ कारोबार हो गया... 😊

और वो बेहतरीन नफा देने वाला है!

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