ईद की ढेरों मुबारकबाद!

खुशियाँ और भाईचारे के त्यौहार 'ईद' पर सभी को बहुत-बहुत मुबारकबाद। यह ईद-उल-फ़ित्र है, इसे रमजान (रमादान) के पवित्र महीने की समाप्ति पर मनाया जाता है। रमजान के महीने में धैर्य, विन्रमता और अनुशासन के साथ ज़िन्दगी जीने का अभ्यास किया जाता है, जिससे कि इन गुणों को आत्मसात किया जा सके...

ब्लॉग जगत के सभी लेखकों, टिप्पणीकारों तथा पाठकों को ईद-उल-फित्र के मौके पर ढेरों मुबारकबाद!





इस मौजूं पर मेरा लेख: 



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जनता फांसे नेताओं को, नेता जनता को फांसे

जनता चाहती हैं  कि भ्रष्टाचारी नेताओं को लोकपाल जैसे सख्त कानून में फांस ले और नेताओं ने व्यवस्था ऐसी बना दी है जिसमें जनता खुद ही भ्रष्टाचारी बन रही है, जिससे वह मौज लेते रहे. 

देखिये कार्टून: 


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धार्मिक ठेकेदारो की दादागीरी

आजकल समाज में धर्म के कुछ ऐसे ठेकेदार घूम रहें हैं जिनका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह लोग समाज पर अपनी दादागिरी दिखाने के लिए ना केवल धर्म का सहारा लेते हैं, बल्कि अपने अनैतिक कार्यों से धर्म को भी बदनाम करते हैं। अभी कुछ दिन पहले शबे-बारात नामक त्यौहार पर कुछ ऐसे ही हुड़दंगियों ने दिल्ली जैसे कई शहरों में कानून को अपनी बपौती समझते हुए रात भर सड़कों पर हंगामा किया। हज़ारों की तादाद में निकले इन युवकों को दंभ था कि पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है, क्योंकि वह यह सब धर्म के नाम पर कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ हो, बल्कि यह सिलसिला साल दर साल चलता आ रहा है।

अक्सर धर्मस्थलों में पूजा-अर्चना के नाम पर सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। बात चाहे मंदिर के बाहर लगने वाली श्रद्धालुओं की लम्बी-लम्बी कतारों की हो या फिर मस्जिदों के बाहर नमाज़ अता करने वालों की, इस कार्य में सभी धर्मों के मानने वाले बराबर के शरीक हैं। कहीं आम जनता को यात्राओं, रैलियों अथवा झांकियों के नाम पर परेशान किया जाता है तो कभी बंद अथवा अनशन के नाम पर पुरे शहर को बंधक बना लिया जाता है। उनको इस बात से कुछ भी परवाह नहीं होती की सड़क पर चलने वाले सामान्य नागरिकों का भी उस सड़क पर उतना ही हक़ है!


अभी कुछ दिन पहले कांवड़ यात्रा के नाम पर दिल्ली और आसपास के इलाके में जमकर हुड़दंग मचाया गया। जहां से यह लोग निकल रहे थे वहां पड़ने वाली सिग्नल लाईट को बंद कर दिया जाता था, अगर कोई राहगीर बीच में आ जाता है तो उसको डंडे से मारकर सड़क से ज़बरदस्ती हटाया जाता है। एक जगह तो एक पुलिस अफसर के उपर डाक कांवड़ के नाम से चल रहे ट्रक पर बैठे हुड़दंगी युवकों ने दिनदहाड़े केवल इसलिए पानी डाल दिया गया क्योंकि वह उनके ट्रक के आने पर चैक से भीड़ को नहीं हटा पाया! जगह-जगह लगने वाले पंडाल के कारण रास्तों के बंद होने से जिन लोगो को ज़बरदस्त परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, क्या वह इस देश के नागरिक नहीं है? क्या उनका इन सड़कों पर चलने और चैराहों पर अपनी बत्ती होने पर पार करने को कोई हक़ नहीं हैं? यहां तक कि हरिद्वार-दिल्ली राजमार्ग को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। हज़ारों-लाखों की तादाद में लोग नौकरी के लिए सहारनपुर, मुज़फ्फर नगर, मेरठ और मोदी नगर जैसी जगहों से गाज़ियाबाद, फरीदाबाद, दिल्ली और गुडगांव जैसे शहरों में आते हैं। क्या इन तथाकथित श्रद्धालुओं और सरकार ने कभी सोचा होगा कि रात को थकहार कर नौकरी से लौट रहे लोगों को घर पहुंचने में किस तरह भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा? आखिर यह कैसा धर्म और हम कैसे धार्मिक हैं जहां नैतिकता का कोई स्थान नहीं है?

किसी भी धर्म का कोई भी अनुष्ठान अनैतिकता को बढ़ावा दे ही नहीं सकता है। ऐसी इबादत / पूजा का कोई अर्थ ही नहीं है जिस के कारण आम जनों को असुविधा हो, उनका हक छीना जाए। धर्म तो हमें समाज में जीने का तरीका बताता है, फिर यह समाज से जीने के हक छीनने का कारण कैसे बन सकता है? आज के युग में लोगों ने धर्म को केवल अपनी महत्त्वकांशाओं को पूरा करने का साधन बना लिया है, आज ऐसे लोगों और उनके कार्यों को पहचानने की आवश्यकत है।


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यह मूल लेख त्रुटिवश डिलीट हो गया था,  जबकि इसके विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ था. गूगल से प्राप्त  टिप्पणियों को नीचे लिखा जा रहा है:

14 comments:

नीरज जाट said...
शाह नवाज भाई, आपकी बातें जायज हैं। मैं खुद पांच बार कांवड ला चुका हूं। अब या तो इस देश के पढे लिखे लोग या सरकार यह कहे कि कांवड लाना ही बन्द कर दो। कोई क्यों नहीं कहता कि कांवड लाना धर्म विरुद्ध है, इससे कांवड ना लाने वाले अन्य लोगों को परेशानी होती है, इसलिये सडक बन्द करने की बजाय इस यात्रा को ही बन्द कर देना चाहिये। ऐसा करने से एक बार दंगा फसाद तो जरूर होगा लेकिन उसके बाद सदा के लिये शान्ति कायम हो जायेगी और सडकें भी बन्द करने की नौबत नहीं आयेगी। अब जब कांवड यात्रा बन्द करने की कोई नहीं कहता तो भईया, सडकें बन्द होनी तय हैं। गिने चुने दोपहिया वाहन या तथाकथित डाक कांवड वाहन भी अत्यधिक भीड के कारण ढंग से नहीं चल पाते तो बसें और ट्रक क्या चलेंगे। कभी कांवडिये यह फरमाइश नहीं रखते कि इस तारीख से इस तारीख तक सडक बन्द होनी चाहिये। वो तो सरकार ही इसे बन्द करती है। हां, मैं बता रहा था कि मैं पांच बार कांवड ला चुका हूं। जहां दस आदमी इकट्ठे होंगे तो उनमें हर तरह के आदमी होंगे फिर यहां तो संख्या लाखों में होती है। इनमें भी हर तरह के आदमी होते हैं। जहां कानून हाथ में लेने वाले लोग होते हैं तो कानून व्यवस्था बनाने वाले लोग भी होते हैं। अब हमें आवाज उठानी चाहिये कि यह यात्रा ही बन्द होनी चाहिये। इस यात्रा का प्रबल हिमायती होने के बावजूद भी मैं यह बात सच्चे मन से कह रहा हूं। तभी यात्रा के कारण होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है। है कोई इस यात्रा को बन्द करने के लिये मेरे साथ आवाज उठाने वाला????
AlbelaKhatri.com said...
सचमुच यह चिन्ता का विषय है और इसका हल निकलना ही चाहिए.......... एक उम्दा पोस्ट और उतनी ही उम्दा नीरज जाट की टिप्पणी........मैं सहमत हूँ आप दोनों से जय हिन्द !
एस.एम.मासूम said...
शाहनवाज़ भाई आपने इस लेख़ को अच्छे मकसद से लिखा है यह मैं जानता हूँ. लेकिन पूर्णतया सहमत नहीं. क्या नेताओं कि यात्राएं इस श्रेणी मैं नहीं आती? ऐसी यात्राओं और सभाओं के लिए नियम है कि पहले से पुलिस स्टेशन मैं खबर करनी होती है और इजाज़त मिलने पे ही निकाली जाती है. यदि कोई सभा या यात्रा सरकारी इजाज़त ले के निकाली जा रही है तो इसमें अनैतिक क्या है? नमाज़ तो वैसे भी बिना इजाज़त किसी कि भी ज़मीन पे पढना चाहे वो सरकारी ही क्यों ना हो मना है.हाँ बिना इजाज़त सड़कों पे कि गयी नमाज़ या किसी भी धर्म का जुलूस सही नहीं और ऐसे जुलूसों मैं ज़रुरत से ज्यादा शोर मचाना, शराब पी के नाचना सही नहीं और इसको सरकार संभाल सकती है .जब बेशर्मी मोर्चे को ४०० पुलिस का प्रोटेक्शन मिल सकता है तो इन यात्राओं और सभाओं को क्यों नहीं? शाहनवाज़ भाई श्रधा के साथ निकले गए किसी भी जुलूस को ,यात्रा को ,जो सरकारी इजाज़त के बाद निकला हो हुडदंगियों का जुलूस कहना सही नहीं.
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
कमजोरी हमारे समाज और राजनैतिक व्यवस्था में है। इस देश में धर्म के नाम पर कोई भी ब्लेकमेल कर सकता है। निश्चित रूप से धर्म का दायरा व्यक्तिगत होना चाहिए। उस के सभी सार्वजनिक प्रदर्शन प्रतिबंधित होना चाहिए।
डॉ टी एस दराल said...
हमारा समाज धर्मभीरु लोगों से भरा पड़ा है भाई । और सबसे आगे होते हैं नेता । अब कौन किसको रोकेगा ?
सतीश सक्सेना said...
अफ़सोसजनक है यह, धर्म के नाम पर नंगा नाच और हम सब बुजदिलों की तरह देखते रह जाते हैं ! प्रशासन और आम पब्लिक किसी को भी इस भीड़चाल में, बोलने की परमीशन नहीं है ! मीडिया चटपटी ख़बरों को और तेज बना कर केवल हाथ सेंकती है ! इस बुजदिल और मूर्खता पूर्ण माहौल में एक ही रास्ता नज़र आता है कि हम लोग भी इस हुडदंग में शामिल हो जाएँ और तालियाँ बजाएं ! बेहद खेदजनक माहौल है ....लोकतंत्र खलने लगा है ! शुभकामनायें आपको !
DR. ANWER JAMAL said...
सदाचार का विपरीत है भ्रष्टाचार। सदाचार होता है धार्मिक और भ्रष्टाचार होता है अधार्मिक। यह एक बारीक अंतर है जिसे धर्म को जानने वाला ही समझ सकता है। धर्म के नाम पर अधर्म करने से वह अधर्म धार्मिक कार्य नहीं हो जाता चाहे दुनिया उसे धार्मिक कार्य मानने लगे। कई बार लोग घबराते हैं अधर्म के कार्यों से और छोड़ बैठते हैं धर्म को। अधर्म प्रायः स्वभाव से ही अप्रिय लगता है जबकि धर्म प्रिय । इस लफ़्ज़ को तत्काल सुधार लिया जाय !
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...
best
Kajal Kumar said...
धर्म एक धंधा हो गया है...
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...
आज धार्मिक आयोजनों में भक्ति कम और दिखावा ज्‍यादा होता है। इनके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए। ------ कम्‍प्‍यूटर से तेज़! इस दर्द की दवा क्‍या है....
Khushdeep Sehgal said...
देखो ओ दीवानों तुम ये काम न करो. धर्म का नाम बदनाम न करो... धर्म कोई भी हो ये इजाज़त कभी नहीं देता कि दूसरों को परेशान किया जाए...सियासत ने इसे ज़रूर अफ़ीम की गोली बनाकर बंटाधार कर दिया... जय हिंद...
Tarkeshwar Giri said...
बहुत ही सुन्दर लेख, और उससे भी सुन्दर टिप्पड़ियाँ. मेरे हिसाब से कुछ हद तक में भईया जाट महोदय से सहमत हूँ. पूरी तरह से ना सही लेकिन डाक कांवड़ और बाइक से कांवड़ लाने वालो को तो जरुर. रोक देना चाहिए. जंहा डाक कांवड़ लाने वाले अपनी दादागिरी दिखाने से पीछे नहीं हट ते वोंही बाइक सवार ईस तरह से बाइक चलाते हैं जैसे वो किसी रेस में भाग ले रहे हों. हरिद्वार प्रशासन पूरी तरह से डाक और बाइक कांवड़ को सम्भालने में लग जाता हैं और जब मौका मिलता हैं तो डाक कांवड़ लाने वालो को दौड़ा- दौड़ा के पीटता भी हैं डाक कांवड़ में इस्तेमाल किये जाने वाले टेम्पो चालक ईस कदर से गाड़ी भागते हैं मानो वो मायावती के काफिले के मंझे हुए चालक हो. .
anshumala said...
राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है वरना इन सब चीजो पर नियंत्रण करना इतने भी मुश्किल नहीं है और राजनीतिक इच्छा शक्ति इसलिए कम है क्योकि यहाँ हर चीज को वोट बैंक के तराजू में तौल कर देखा जाता है धर्म तो सबसे ऊपर है | हा जब सरकार पर आती है तब वो किसी चीज को नहीं देखती है |
चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...
यह दादागिरी त्योहारों के समय अधिक मुखर हो जाती है, शायद सड़क चलने में भी बाधा बने :(

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उसने बख्श दी आँखे - हैवानियत को तमाचा

ईरान में रहने वाली अमीना बहरामी नामक युवती ने कोर्ट के द्वारा अदालत में 7 साल लम्बी जद्दोजहद के बाद इन्साफ मिलने पर मुजरिम माजिद की आँखों में तेज़ाब डालने की सज़ा को बख्श कर उसकी हैवानियत के मुंह पर तमाचा मारा है. हालाँकि माजिद को सामान्य कानून के अनुसार 10 वर्ष की सज़ा भी हुई है. अपने इस फैसले से अमीना ने दिखा दिया कि कमज़ोर दिखने वाली औरत कमज़ोर होती नहीं, बल्कि अपने आप को मज़बूत समझने वाले मर्दों के मुकाबले ज़हनी तौर पर कई गुना मज़बूत होती है.

वर्ष 2004 में माजिद ने अमीना के मुंह पर केवल इसलिए तेज़ाब फेंक दिया था क्योंकि अमीना ने उसके शादी के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था. अमीना ने अपने चेहरे को ठीक करने के लिए दुनिया के कई मुल्कों के चिकित्सकों से संपर्क किया, लेकिन सभी जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी थी. उस एक लम्हे ने अमीना की ज़िन्दगी को नरक बना दिया था, जब वह घर से बाहर निकलती थी तो लोग उसे देखकर डर जाते थे. वह एक-एक लम्हा उसी दुःख के साथ जीने को मजबूर थी, अमीना ने फैसला किया अपने ऊपर हुए ज़ुल्म का बदला लेने का. उसने अदालत से गुहार लगाईं कि जिसने उसे पल-पल मरने पर मजबूर किया उसको वैसे ही सजा दी जाए. ईरान की अदालत ने उसकी बात को मानते हुए माजिद को दोनों आँखों में एक-एक बूँद तेज़ाब डालने का हुक्म दिया तथा इस सज़ा को वहां की सर्वोच्च अदालत ने भी बरकरार रखा. 
 
लेकिन इस फैसले के बाद अमीना ने विरोध करने वालों पर तथा माजिद जैसी हैवानियत वाली मानसिकता रखने वालों पर उसकी सज़ा को बख्श कर ऐसा खामोश तमाचा जड़ दिया, जिसकी गूँज काफी दिनों तक महसूस होती रहेगी. उसने कहा कि बदला लेना उसका मकसद नहीं था और ना ही कभी उसकी मंशा माजिद की आंखे छीनने की रही थी. बल्कि वह चाहती थी कि माजिद को यह सज़ा सुनाई जाए, ताकि उसको भी उस दुःख का एहसास हो जो कि उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है.  
कुछ लोगो ने इस सजा को क्रूरता का दर्जा दिया था, मैं उन लोगो से मालूम करना चाहता हूँ कि आखिर सजा को क्षमा अथवा कम करने का नैतिक हक भुक्त-भोगी के सिवा किसी और को कैसे हो सकता है? क्या भुक्त-भोगी के सिवा कोई और इंसान इस जैसी अनेकों महिलाओं के एक-एक पल को महसूस कर सकता है? इसलिए मेरे विचार से तो अदालत का कार्य ऐसे खौफनाक जुर्म की वैसी ही सज़ा देना होना चाहिए.

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'सामाजिक सुरक्षा' विषय पर रेडियो तेहरान में मेरी बात


 
अभी पिछले दिनों भारत में 'सामाजिक सुरक्षा' के विषय पर एक प्रोग्राम रेडियो तेहरान पर 'ओन एयर' हुआ था, जिसमें ब्लोगर बिरादरी से मेरे अलावा श्री केवल राम और डॉ पवन मिश्रा ने अपनी राय रखी थी।

इस कार्यक्रम में मैंने कहा कि हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा को लेकर जागरूकता नहीं है, साथ ही साथ कानून का डर भी नहीं है। मेरे हिसाब से सामाजिक सुरक्षा दो ही तरीके से आ सकती है, या तो हमारी परवरिश, हमारी शिक्षा ऐसी रही हो कि हम सामाजिक मूल्यों की कद्र करते हो या फिर कानून इतने सख्त हो कि अपराध के नतीजों से डर पैदा हो। मेरा यह मानना है कि जब तक हम स्वयं भ्रष्टाचार से पीछा नहीं छुटाएंगे, तब यह हमें ज़हरीले सांप की तरह डसता ही रहेगा। हम चाहते हैं कि दूसरे ठीक हो जाएँ और हम वैसे ही रहें। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहीम के समर्थन पर सारे लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लिख रहे थे, लेकिन हम चाहते हैं कि संघर्ष, भूख हड़ताल जैसे कार्य दूसरे लोग करें और हम केवल दो शब्द लिख कर इतिश्री पा लें। इससे कुछ होने वाला नहीं है, बल्कि बदलाव अपने अन्दर को बदलने के प्रयास से ही आएगा।


Keywords: radio tehran, samajik suraksha, shahnawaz siddiqui, keval ram, dr. pawan mishra

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एनबीटी: भ्रष्टाचार की जड़

भ्रष्टाचार हमारे बीच में से शुरू होता है, हम अक्सर अपने आस-पास इसे फलते-फूलते हुए देखते हैं। बल्कि अक्सर स्वयं भी किसी ना किसी रूप में इसका हिस्सा होते हैं। लेकिन हमें यह बुरा तब लगता है जब हम इसके शिकार होते हैं। हम भ्रष्ट नेताओं, सरकारी कर्मचारियों / अधिकारीयों को तो बुरा-भला कहते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं की हम स्वयं भी कितने ही झूट और भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं!


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दुश्मनों को कुछ ऐसे डराते हैं हमारे गृहमंत्री!

गृहमंत्री: यह हमला केवल मुंबई पर नहीं, बल्कि पुरे देश पर हमला है। यह भारत की एकता, अखंडता और समृद्धि पर किया गया हमला है। पानी सर से ऊपर जा चुका है, देश ऐसी हरकतों को हरगिज़-हरगिज़ बर्दाश्त नहीं करेगा। देश के दुश्मनों पर कड़े से कड़े कदम उठाए जाएँगे!

मैं देशवासियों से आह्वान करता हूँ कि सरकार का अनुसरण करें, आवेश में ना आएँ, एकजुटता और "संयमता" के हथियार से देश में छुपे अथवा पडौसी देश की गोद में बैठे देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दें!

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माता-पिता हमारी सामाजिक व्यवस्था के स्तंभ हैं

माता-पिता दुनिया की सबसे बड़ी नेमतों में से एक हैं, बहुत खुशनसीब हैं वह जिनकों यह दोनों अथवा इनमें से किसी एक का भी सानिध्य प्राप्त है। हमारे माता-पिता हमारी सामाजिक व्यवस्था के स्तंभ हैं, पर अफ़सोस आज यह स्तंभ गिरते जा रहे हैं।

वह उस समय हमारी हर ज़रूरत का ध्यान रखते हैं, जबकि हमें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, लेकिन जब उनको उसी स्नेह की आवश्यकता होती है तो हमारे हाथ पीछे हट जाते हैं। कहावत है कि दो माता-पिता मिलकर दस बच्चों को भी पाल सकते हैं, लेकिन दस बच्चे मिलकर भी दो माता-पिता को नहीं पाल सकते।

मेरे घर में जब मेरी बिटिया 'ऐना' आई तब मैंने अपनी पत्नी के द्वारा रातों को उसकी देखभाल करते हुए देखकर याद किया कि मेरी माँ ने भी इसी तरह मेरी देखभाल की होगी, वोह भी उस ज़माने में जबकि आज की आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थी। किस तरह जद्दो-जहद करके दिल्ली जैसे शहर में उन्होंने हमारे लिए ना केवल आशियाना बल्कि हर एक सुविधा का इंतजाम किया था, मेरे द्वारा फ़्लैट खरीदने पर माता-पिता की आँखों की ख़ुशी को याद करके आज भी खुश होता हूँ।

लेकिन अफ़सोस आज दिन-प्रतिदिन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढती जा रही है, उनमें भी अधिकतर वही लोग होतें हैं जिनके बेटे-बेटियां जिंदा और अच्छी-खासी माली हालत में होते हैं। अक्सर उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच कर घर के बुज़ुर्ग अपने आप को अलग-थलग महसूस करने लगते हैं। संवेदनहीनता के इस दौर में अपने ही इनकी भावनाओं को समझने में नाकाम होने लगते हैं। मुझे आज भी याद है किस तरह मेरे नाना-नानी का रुआब घर पर था, उनकी हर बात को पूर्णत: महत्त्व मिलता था, लेकिन इस तरह का माहौल आज के दौर में विरले ही देखने को मिलता है। आज बुजुर्गों की बातों को अनुभव भरी सलाह नहीं बल्कि दकियानूसी समझा जाता है। उनकी सलाहों पर उनके साथ सलाह-मशविरे की जगह सिरे से ही नकार दिया जाता है।

एक घटना याद आ गई, बात उस समय की है जब में दक्षिण कोरिया में था, हमें एक शिपमेंट भेजनी थी। उसके लिए जो कंटेनर बुलाया गया था, उसका ड्राइवर काफी उम्र का था। रास्ते में हमने उससे मालूम किया कि क्या आपके पुत्र-पुत्रियाँ नहीं हैं? उसने कहा कि उसके दो बेटे और एक बेटी है। तब मैंने मालूम किया कि फिर आप इस उम्र में इतनी मेहनत का काम क्यों करते हैं? आपके बच्चे आपको रोकते नहीं? तो उसने बताया कि उसके बेटे-बेटी अपने-अपने घर में रहते हैं और वह और उसकी पत्नी अपने घर का खर्च चलाने के लिए काम करते हैं। जब हमने उसे अपने वतन हिन्दुस्तान के बारे में बताया कि वहां पर आज भी बुज़ुर्ग मजबूरी में मेहनत नहीं करते हैं, तो उस बुज़ुर्ग की आँखों में आंसू भर गए। उसने कहा कि आपका समाज कितना अच्छा है, जहाँ बुजुर्गों का ध्यान रखने वाले घर पर मौजूद होते हैं।

लेकिन आज के माहौल और दिन-प्रतिदिन गिरती मानवीय संवेदना को देखकर लगता है कि हमारे वतन में भी वोह दिन दूर नहीं जब बुजुर्गों की सुध लेने वाला कोई नहीं होगा! जबकि हर एक धर्म में बुजुर्गों से मुहब्बत और उनका ध्यान रखने की शिक्षाएं हैं, लेकिन बड़े-बड़े धार्मिक व्यक्ति भी इस ओर अक्सर बेरुखें ही हैं। क्योंकि उन्होंने धर्म को आत्मसात नहीं किया बल्कि केवल दिखावे के लिए ही उसका प्रयोग किया।

धार्मिक बातें चाहे लोगो को उपदेश लगे या किसी की समझ में ना आएं, लेकिन मैं हमेशा उनको दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। क्योंकि मानता हूँ कि अगर इसी तरह बताता रहा तो कम से कम मैं तो अवश्य ही उनपर अमल करने वाला बन जाऊंगा।
एक बार एक शख्स ने मुहम्मद (स.) से कहा कि मैं मैं हज करने के लिए जाना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास इतना सामर्थ्य नहीं है। आप (स.) ने मालूम किया कि क्या तुम्हारे घर में तुम्हारे माता-पिता दोनों अथवा उनमें से कोई एक जिंदा है, उस शख्स ने कहा कि माँ बाहयात हैं। आप (स.) ने फ़रमाया कि उनकी सेवा करो।

वहीँ एक बार फ़रमाया कि अपनी माता अथवा पिता को मुहब्बत की नज़र से देखना ऐसे 'हज' के पुन्य जैसा है जो कि कुबूल हो गया हो।
एक शख्स ने मालूम किया कि किसी के जीवन पर सबसे ज़्यादा मुहब्बत का अधिकार किसका है? आप (स.) ने फ़रमाया कि माँ का, उसने मालूम किया कि उसके बाद, तब आप (स.) ने फिर से फ़रमाया कि उसकी माँ का। उस शख्स ने तीसरी बार मालूम किया तब भी आप (स.) ने फ़रमाया कि उसकी माँ का और बताया कि चौथा नंबर पिता का है तथा उसके बाद अन्य लोगों का नंबर आता है।

वहीँ एक बार फ़रमाया कि अपने माता-पिता के इस दुनिया से जाने के बाद उनसे मुहब्बत यह है कि उनके रिश्तेदार और दोस्तों के साथ भी वैसा ही सुलूक किया जाए जैसी मुहब्बत माता-पिता के साथ है। एक बहुत ही मशहूर वाकिये में आप (स.) ने फ़रमाया था कि माँ के क़दमों तले जन्नत है

इसी प्रण के साथ बात को समाप्त करता हूँ, कि आजतक जितनी भी गलतियाँ, ज्यादतियां माँ-बाप के साथ की, भविष्य में उन गलतियों से दूरियां बनाने की पुरज़ोर कोशिश करूँगा। अगर इस प्रयास में सफल रहा तो अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली समझूंगा, वर्ना दिन तो गुज़र ही जाएँगे और मेरे बच्चे भी बड़े होंगे।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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क्या इतना आत्मविश्वास कभी देखा है?

दुनिया में आपने बहुत-बहुत बड़े आत्मविश्वासी देखें होंगे, लेकिन मैंने अपने जीवन में किसी में इतना आत्मविश्वास कभी नहीं देखा...

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कैसे बनाएं अपना ब्लॉग? - भाग 4

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भाग - 1
भाग - 2
भाग - 3

अभी तक हमने ब्लॉग बनाने के 'ब्लॉगर' तथा 'वर्ड प्रेस' तकनीक को जानने की कोशिश की, अब आगे ब्लॉग अथवा वेबसाइट में प्रयोग होने वाले कुछ तकनीकी शब्दों के बारे में जान लेते हैं।

डोमेन नेम (Domain Name): 

यह किसी वेबसाइट अथवा ब्लॉग के पते के लिए प्रयोग होता है। अगर तकनीकी भाषा में बात करें तो डोमेन नेम किसी एक अथवा एक से अधिक IP Address का प्रतिनिधित्व करता है, अर्थात जब हम किसी वेबसाइट अथवा ब्लॉग को खोलने के लिए उसका पता ब्राउज़र में लिखते हैं तो हम उससे जुड़े IP Address तक पहुंच जाते हैं और वहां मौजूद वेब प्रष्ट हमारे कंप्यूटर में खुल जाता है। इन्टरनेट डोमेन नेम की जगह IP Address के आधार पर कार्य करता है इसलिए डोमेन नेम को IP Address में बदलने के लिए हर वेब सर्वर पर एक DNS (Domain Name System) की आवश्यकता होती है।

डोमेन नेम URL के साथ प्रयोग होता है, उदहारण के लिए URL http://www.example.com में example.com एक डोमेन नेम है। हर डोमेन नेम में एक प्रत्यय (suffix) होता है, जो इंगित करता है कि यह किस TLD (Top Level Domain) से सम्बंधित है। TLD को हम निम्नलिखित उदहारण से समझ सकते हैं:

com - वाणिज्यिक कारोबार (सबसे अधिक प्रचलित)
net - नेटवर्क संगठनों
gov - सरकार एजेंसियों
edu - शैक्षिक संस्थानों
org - संगठन (nonprofit)
mil - सैन्य
mobi - मोबाइल
in - भारत
th - थाईलैंड


वेब प्रष्ट होस्टिंग (Hosting):

वेब होस्टिंग उस सेवा को कहते हैं जिसके अंतर्गत किसी वेब प्रष्ट को संचित (Save) करने के लिए जगह (Space) का आवंटन होता है। वेब प्रष्टों को ऐसे कंप्यूटर सर्वर में संचित किया जाता है जो कि 24 घंटे इन्टरनेट से जुड़े होते हैं, जिससे की कोई भी वेबसाइट 24 घंटे प्रदर्शित होती रहे।

सर्वर बहुत ताकतवर कंप्यूटर होते हैं, इनकी हार्ड ड्राइव बहुत अधिक जगह (space) वाली होती हैं। यह जगह (space) उन्हें किराए पर दी जाती है जो अपनी वेबसाइट को इन्टरनेट पर दिखाना चाहते हैं। हर एक सर्वर की एक अलग सांख्यिक संख्या (IP Address) होती है।

जैसा की हमने पहले भी बताया था की ब्लॉग के लिए कुछ कम्पनियाँ मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं, जिसमें blogger.com तथा Wordpress.com प्रमुख हैं। इनकी सुविधाएं लेने के लिए आपको डोमेन नेम अथवा होस्टिंग पैकेज खरीदने की आवश्यकता नहीं है। 

Tag: 

टेग अथवा कीवर्ड (Keyword) को विषय की संक्षिप्त व्याख्या के रूप में प्रयोग किया हैं, यह वह शब्द होते हैं जिनके द्वारा पाठक सर्च इंजन के द्वारा ब्लॉग अथवा वेबसाईट पर पहुँचते हैं। अगर पोस्ट के विषय से सम्बंधित कुछ शब्द पोस्ट के विषय में लिखने से छूट गए हैं तो उन्हें टेग में लिखा जा सकता है। लेकिन अगर वह शब्द पोस्ट के विषय में मौजूद है तो उन्हें टेग के रूप में नहीं लिखना चाहिए, क्योंकि इससे कोई फायदा नहीं होगा। टेग में इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग भी एक अच्छा तरीका हो सकता है, क्योंकि सर्च इंजन पर अक्सर पाठक इंग्लिश के शब्दों के द्वारा विषय सामग्री को ढूंढते हैं।

ब्लॉग संकलक: 

ब्लॉग संकलक जिसे फीड रीडर, न्यूज़ रीडर या एग्रीगेटर कहा जाता है, सामान्यत: ऐसी वेबसाईट होती हैं जहाँ विभिन्न  ब्लॉग्स का संकलन किया जाता है। इसके साथ-साथ एग्रीगेटर एक डेस्कटॉप कम्प्यूटर भी हो सकता है। सर्च इंजन के साथ-साथ पाठक ब्लॉग संकलक के द्वारा भी ब्लॉग-पोस्ट को पढ़ते हैं। ब्लॉग संकलक फीड के द्वारा ब्लॉग-पोस्ट को अपने प्रष्ट में प्रकाशित करते हैं, ब्लॉग पोस्ट को टेग के द्वारा श्रेणीबद्ध भी किया जा सकता है। जहाँ सर्च इंजन से पुरानी पोस्ट ही अधिक पढ़ी जाती है वहीँ ब्लॉग संकलकों के माध्यम से ताज़ा पोस्ट तक पाठक आसानी से पहुँच जाते हैं।

वेब फीड: 

वेब फ़ीड (Web Feed) या समाचार फ़ीड एक डेटा प्रारूप होता है जिसके द्वारा पाठकों / उपयोगकर्ताओं के लिए ब्लॉग की अद्यतित सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। वेब फीड को सामान्यत: आर.एस.एस (RSS) अथवा एटम (ATOM) के रूप में जाना जाता है।




[नोट: टिप्पणियों का विकल्प पोस्ट के विषय से सम्बंधित विचार-विमर्श के लिए ही खुला हुआ है, विषय से अलग टिप्पणियों को आप मेरे ईमेल-पते shnawaz(at)gmail.com पर भेज सकते हैं]

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