ग़ज़ल: कश्मीर


दुनिया का हुस्न था कभी और प्यार की बस्ती,
कुम्हला गई है आज यहा फूलों की मस्ती।

कुछ लोग मर रहे हैं, कुछ लोगों की खातिर,
कुछ रूहें फिर रहीं है यहां राह भटकती।

कोई शहर छोड़ गया है, कोई ज़िंदगी ‘साहिल’,
कुछ रह गई हैं आंखे यहां राह को तकती।

जन्नत का बाग़ नाम था कश्मीर का कभी,
अपनो ने ही मिटा ली आज अपनी ही हस्ती।

कई तीर चले कमां छोड़, सीना तान के,
रुक-रुक के गिर रहीं है कई लाशे तड़पती।

तकदीर की तो क्या कहें, तदबीर ही सिमट गई,
हर दिल में घर किए हैं कई आंहे सहमती।

जीने के लिए आते थे बीमार यहां पर,
अब मौत हो गई है यहां देखो तो सस्ती।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी "साहिल"



Keywords:
Ghazal, Kashmir, poem, hindi

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इश्क़-ऐ-हकीकी


इश्क़-ऐ-हकीकी

है चाहत इश्क़, यह प्यारा है इश्क़
सबब जीने का हमारा है इश्क़

मेरी हस्ती में यह वाबस्ता है मेरी हर शय का नज़ारा है इश्क़

दिलों में बसता है ढ़ूंढने से क्या हासिल
इस गोल सी दुनिया का किनारा है इश्क़

डूबते को तिनका भी नज़र आए साहिल
अंधेरी रात में जलता हुआ तारा है इश्क़

दिल तो खोया हुआ है कब से इसके पहलू में
हमने इस दिल में जबसे उतारा है इश्क़
तेरा बोला हुआ एक लफ्ज़ कयामत ला दे
और चाहत भरा पैगाम तुम्हारा है इश्क़

सिर्फ एहसास है पाकीज़ा खयालातों का
ये जाँ देकर भी जानेजाना गवांरा है इश्क़

कदम तो बढ़ते हैं सदा मंजिल के पाने को
कभी जीता कभी तक़दीर का मारा है इश्क़
हम तो जाना इसे होटो से ही पढ़ लेते हैं
तेरे रूख्सार पर लिखा हुआ सारा है इश्क़

इसे बनाने में ज़रूर खुदा की मर्ज़ी है
अपने ईनाम से उसने ही सवांरा है इश्क़

ये एक पल नहीं सदियों में बनाया होगा
किसी अवतार ने फुर्सत से उतारा है इश्क़

- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords:
Gazal, Hindi, Poem, Love, इश्क़

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धार्मिक नियमों पर अंधविश्वास

अक्सर ही कहा जाता है कि धार्मिक नियमों को दिमाग की कसौटी पर कसे बिना आँख मूंद कर विश्वास कर लेना मानसिक गुलामी का प्रतीक है। क्योंकि यह विषय मनुष्य के विश्वास से संबधित है इसलिए इस पर कोई भी राय बनाने से पहले इसको मनोवैज्ञानिक कसौटी पर जाँचना आवश्यक है। मेरा यह मानना है कि हर कार्य के गूढ़ में जाना हर एक व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता है। कयोंकि मनुष्य का स्वाभाव ही ऐसा बनाया गया है कि वह हमेशा पहले से बनी धारणा के हिसाब से ही कार्य को करता है और यह बात व्यवहारिक भी है। कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हे समझने के लिए उसका विशेषज्ञ होना आवश्यक होता है। मनुष्य के मस्तिष्क का कार्य करने का तरीका यह है कि वह हर कार्य क्षेत्र के हिसाब से अपना आदर्श ढूंढता है और उसके लिए अपने दिमाग और तर्जुबे के साथ-साथ अन्य लोगों की राय को भी महत्त्व देता है। अब अगर वह किसी को भी उक्त कार्य क्षेत्र का आदर्श मान लेता है तो फिर उसके हिसाब से काम करता है। हाँ यह अवश्य है कि अगर किसी बात पर उसे संदेह होता है तो वह उसे संबधित व्यक्ति से मालूम कर लेता है।

इस बात को समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं: हम जब भी अस्वस्थ होते हैं तो डॉक्टर से दवाई लेते हैं, लेकिन कभी भी दवाई के बारे में पूर्ण जानकारी लेना उचित नहीं समझते हैं, क्योंकि ऐसा करना हर एक के लिए आसान नहीं होता है। इसके लिए उक्त विषय के विशेषज्ञ की सलाह ही सबसे उचित मानी जाती है। क्योंकि उसने विषय को समझने के लिए उचित शिक्षा ग्रहण की होती है, जिसे ग्रहण करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि हम रोज़मर्रा के जीवन में हज़ारों कार्य करते हैं और हर कार्य के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ होता है। इसलिए मनुष्य हमेशा ही उस विषय को परखने की जगह उसके विशेषज्ञ को परखता है। हज़ारों डॉक्टरों में से किसी एक पर ही उसका विश्वास जमता है, जब विश्वास जम जाता है तो उसके कथनुसार ही वह दवाईयां लेता है। हालांकि जब विश्वास डगमगाता है तब दूसरे डॉक्टर के पास जाया जाता है, लेकिन इस स्थिति में भी स्वयं डॉक्टर बनने की कोशिश नहीं की जाती है। यह उदाहरण जीवन की हर परिस्थिति पर पूर्णतः सही उतरता है।

ज़रा सोचिए अगर हर कार्य की पूरी जानकारी लेकर ही कार्य करने का नियम अपना लिया जाए तो क्या होगा? सुबह जब कार्यालय के लिए निकलेंगे तो वाहन को चलाने से पहले उसकी जानकारी लेनी पड़ेगी। मतलब कौन सा पेंच कहां लगा है? ब्रेक कैसे लग रहे हैं? स्टीयरिंग कैसे घूम रहा है? अथवा पहिए कैसे चल रहे है? इत्यादि। क्या हर एक को कार की पूरी इंजिनियरिंग की जानकारी होना आवश्यक है अथवा कार बनाने वाली कंपनी और उसके उत्पाद पर विशेषज्ञों की सलाह को महत्व देकर या अपने तर्जुबे के अनुसार कार खरीद लेना ही अधिक समझदारी का कार्य है? इसी तरह कम्यूटर, मोबाईल जैसे रोज़मर्रा में काम आने वाले उपकरणों को खरीदते अथवा ठीक कराते समय या इसी तरह अन्य कार्यों को करते समय भी उनकी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना व्यावहारिक ही नहीं है।

ठीक यही बात धार्मिक नियमों पर भी लागू होती है, हर एक नियम का विश्लेषण करना तथा मस्तिष्क की कसौटी पर कसना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं है। इस क्षेत्र में भी मनुष्य दूसरें क्षेत्रों की तरह अपने मस्तिष्क का प्रयोग करके किसी एक विशेषज्ञ को अपने आदर्श के रूप में  स्थापित करता है और उसके अनुसार अपने धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करता है। हाँ अगर किसी कारणवश उक्त आदर्श से विश्वास डगमगाता है, तब फिर से अपने मस्तिष्क का प्रयोग करके सही आदर्श को चुनना चाहिए। इसी तरह अगर आस्था पर कोई प्रश्न सामने आए तो अवश्य ही उसका उत्तर खोजने की कोशिश करनी चाहिए।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords:
Religion, Rules, धार्मिक नियम

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नानी का आंगन


नानी का आंगन


वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,
अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,
वो नानी का पंखा हिला के सुलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,
वो मेंढक पकड़ना, वो किचड़ में चलना,
वो बारिश के पानी में किश्ती चलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

वो तकियों पे तकिया लगाने की तरकीब,
वो बचपन की थी कुछ अजब सी ही तरतीब,
वो तकियों पर चढ़ना, छलांगे लगाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।

उन तकियों की सीढ़ी बनाता था अक्सर,
मैं नानी को अपनी सताता था अक्सर,
यूँ मिट्टी की हांडी से मक्खन चुराना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो मिट्टी के चूल्हे पे खाना बनाना,
वो नानी का खिचड़ी पे मक्खन लगाना,
वो प्यारे से हाथों से मुझको खिलाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो मिट्टी की खूशबू, खलियानो की रौनक
वो सरसों के फूलों की मोहिनी सूरत
लगता था जन्नत यहीं है, यहीं है!
उस जन्नत की मस्ती में यूँ डूब जाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


वो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,
कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।


- शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords:
Hindi Poem, Hindi Nazm

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दिल्ली का ट्रैफिक!

घर से अपना चेतक स्कूटर लेकर हम दिल्ली के लिए निकल पड़े। माताजी ने बहुत समझाया कि बेटा बस से चला जा, लेकिन हमने सोचा कि स्कूटर से जाएंगे तो ज़रा रौब पड़ेगा। जैसे-तैसे बार्डर पहुंच गए, परन्तु जैसे ही प्रवेश करने की कोशिश की यातायात पुलिस निरीक्षक ने रोक लिया। सारे पेपर चेक करने के बाद भी जब कुछ नहीं मिला तो लाईट चैक करने लगे। "क्या पहली बार दिल्ली आए हो?" मैंने कहा "नहीं जी आता रहता हूँ"। "फिर भी बिना लाईट की गाड़ी चला रहे हो।" मैंने कहा "अभी तो दिन है, लाईट की क्या आवश्यकता है? घर पहुंच कर ठीक करवा लूंगा"। वह बोले "बेटा रास्ते में रात हो गई तो? मैं क्या वहां पर लाईट चैक करने आउंगा?" फिर बोले कि "पेड़ के पास जो पानी वाला खड़ा है उसे एक हरी पत्ती देकर आ जाओ।" समझ में तो कुछ आया नहीं, सोचा चलो पानी वाले से ही मालूम कर लेता हूं। पानी वाले ने बताया कि भैया हरी पत्ती का मतलब 100 रू वर्ना स्कूटर ज़ब्त। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया और भगवान का नाम लेकर आगे चल दिया।

कुछ दूर चलने पर चैक पर लाल बत्ती मिली, हम भी खड़े हो गए। जैसे ही बत्ती हरी हुई, हमने भी चलने के लिए अपने स्कूटर में किक मारी और चलने लगे। मगर यह क्या सामने से एक बाईक धनधनाती हुई हमारे स्कूटर को ज़मीदौज़ करते हुए निकल गई। शायद उस भले आदमी को अपनी लाल बत्ती दिखाई नहीं दी। बड़ी मुश्किल से अपनी चोटों पर करहाते हुए हम भी उठे, अपने प्यारे स्कूटर का हैंडल सीधा किया। अपनी शर्म को छुपाते हुए स्कूटर को किसी तरह स्टार्ट किया और आगे चल दिए।

अभी थोड़ी दूर ही चला था कि एक कैब ड्राइवर हमारे बाएं हाथ की तरफ से हमें ओवर-टेक करते हुए और हमें गालियां देते हुए बड़ी तेज़ी से निकला। "गाड़ी चलानी नहीं आती, तो फिर दिल्ली में आते ही क्यों हों"। हमने बड़ी मुश्किल से अपने स्कूटर को संभाला, लेकिन हज़ार बार सोचने पर भी समझ में नहीं आया कि आखिर हमारी गलती क्या थी। सोचा कि शायद उसने हौर्न दिया होगा और हमें सुनाई ना दिया हो। फिर बेचारा मजबूरी में उलटे हाथ की तरफ से निकलनें के लिए मजबूर हुआ हो! मगर ताऊ तो कहतें हैं कि "तेरे कान बहुत तेज़ हैं, चींटी की आवाज़ भी सुन लेते हैं"। जब समझ के कुएं से पानी नहीं निकला तो हमने आगे चलने में ही भलाई समझी।

अल्ला-अल्ला करते हुए आईटीओ पहुंचे, तभी देखा कि एक कार सवार अपनी कार की रफ्तार के नशे में साईकिल सवार को नहीं देख पाया। वैसे भी गरीबों को देखता कौन है, उसने ही नहीं देखा तो क्या गुनाह किया? बेचारा सड़क पर पड़ा हुआ था और उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था। मैंने लोगो से गुहार लगाई कि इसको किसी गाडी या रिक्शा में डालकर अस्पताल ले चलो। तभी एक चिल्लाया "अबे पागल हो गया है क्या? पुलिस के सवालों के जवाब कौन देगा? उलटे हम पर ही केस चल जाएगा।" मैंने कहा कि "भाई हम एक मरते हुए की जान बचा रहें है तो इसमें पुलिस क्यों सवाल करेगी?" एक व्यक्ति ने फिर वही सवाल किया जो दिल्ली में आने के बाद कई बार सुन चुका था, " यार! दिल्ली में नया आया है क्या?" मैंने सोचा कि "इसे कैसे पता चला?" फिर अपनी झेंप मिटाने के इरादे से कहा कि "नहीं भाई आता रहता हूँ" तभी एक तपाक से बोला "तब भी बेवकूफी की बातें कर रहे हो?" वह बेचारा पड़ा हुआ तड़प रहा था। तभी वहां से एक पुलिस की वैन गुज़री, भीड़ देखकर रूक गई। मुझे लगा कि शायद यह ही उसको अस्पताल पहुंचा देंगे। थोड़ी गुहार लगाने पर वह तैयार हो गए। जब पुलिस उसे लेकर चली गई तो मेरी सांस में सांस आई और मैने सोचा कि आगे चला जाए।

सड़क पर भीड़ कुछ जयादा ही थी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई इनके पीछे पड़ा है या फिर सब के सब जल्द-से-जल्द कहीं दूर भाग जाना चाहते हैं। हर कोई, हर तरफ से गाडी ओवरटेक कर रहा था और मेरे लिया गाड़ी चलाना दूभर होता जा रहा था। सोचा कि दिल्ली जैसे बड़े शहर के शिक्षित लोग भी आखिर क्यों अशिक्षितों की तरह व्यवहार करते हैं? कुछ पलों की जल्दी के चक्कर में अपनी तथा औरों की जान को खतरे में डाल देते हैं। आज केवल दिल्ली में ही सड़क हादसों की वजह से हर साल हजारों लोग अपनी जान गवां देते हैं और कितने ही अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंगो से हाथ गवां बैठते हैं। आखिर दिल्ली में बिला वजह ओवर टेकिंग समाप्त क्यों नहीं होती है? आखिर क्यों गाड़ी चलाने वाले अपनी लेन में नहीं चलते हैं? और सबसे बड़ी बात कि आखिर गाड़ी इतनी जल्दी में और गुस्से में क्यों चलाते हैं? दो मिनट की देर में मारने-मरने पर तैयार हो जाते हैं? क्या शहरों में मौत इतनी सस्ती हो गई है?

इन सवालों के साथ आखिर हम अपनी मंज़िल पर पहंच गए। लेकिन कितने लोग रोज़ाना अपनी मंज़िल को पहुंचते होंगे, कभी किसी ने सोचा है?


- शाहनवाज़ सिद्दीकी


Keywords:
accident, Delhi, Traffic, Hindi Critics

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चूहें की महिमा और मुख्यमंत्री जी

सुबह आँख खुली और हमने टीवी का बटन ऑन कर दिया। सामने एक खबरिया चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी कि ‘मुख्यमंत्री जी को चूहें ने काटा’। देखिये कैसा कलयुग आ गया है, अब तक तो सिर्फ इन्सान ही बड़े लोगों को एहमियत देते हैं। परंतु अब तो चूहें जैसे तुच्छ प्राणी भी! हाँ नहीं तो। वैसे मैं मज़ाक कर रहा हूँ, चुहा तो महान प्राणी है। और आज कल तो इस प्राणी के महान अवतार ‘माउस’ के बिना कोई कम्यूटर भी नहीं चलता है। अगर चूहां ना होता, अररररर! मेंरा मतलब ‘माउस ना हो तो हम जैसे ब्लॉग छाप लिखइयों का कार्य कैसे चलता? हमारी रोज़ी-रोटी कैसे चलती? फिर खामाखां लक्ष्मी जी को कष्ट करना पड़ता!

हम डेली अपने पैर खुले छोड़ कर लेटते हैं, कभी-कभी तो चुहों के बिल में ही अपना पैर घुसा कर सोते हैं। और वहां बड़े लोग ऐसी रूम में मखमली बिस्तर पर और शानदार कम्बल में लिपट कर सोते हैं। इधर हम चूहें को खुली दावत देते हुए सोते हैं और उधर बड़े लोग उनके खिलाफ पूरा बंदोबस्त करके। फिर भी चूहें महाराज के द्वारा उन्हें ही एहमियत। मुझे तो इसमें किसी साजिश की बू आ रही है।

हम पर तो अब तक गणेश जी के सबसे करीबी की हम पर नज़र नहीं पड़ी। वो भी पहुँच गए पहुंच गए बड़े लोगों के पास। आखिर मुझ जैसे फक्कड़ के घर में उन्हे खाने को क्या मिलता? अब बड़े लोगों की तो बात ही अलग है, बड़े लोग हैं तो उनके लिए खाना भी बड़ा अच्छा। हमारे यहां तो उन्हे बची हुई सूखी रोटी ही मिलती होगी और वह भी कभी-कभी, क्योंकि अक्सर तो वह हमें ही नहीं मिलती। हाँ उनके यहां अवश्य ही देसी घी के लड्डू मिल जाते होंगे। फिर वहां हिसाब रखने वाला भी कौन होगा कि लड्डू गायब कैसे हो गए, हमें तो पता रहता है कि हमने दो रोटी बनाई थी और उसमें से आधी बचा दी थी कि सुबह उठ कर खा लेंगे। परंतु जब सुबह वह रोटी नहीं मिलती है तो उसके लिए खोजबीन शुरू कर देते हैं। आखिर इतनी मुश्किल से रोटी कमाई जाती है। अब अखबार के लिखईया तो हैं नहीं कि डेली लेख अखबारों की शान बनें। ब्लॉग में ही तो लिखते हैं, कौन छापता है इसे अपने अखबार में? फिर यहां कोई एड-वैड भी नहीं मिलता। कभी-कभार हॉट लिस्ट में आ जाता है हमारा लेख, लेकिन अक्सर ही हमारे दुश्मन (हमसे जलने वाले दुसरे धुरंधर लेखक गण), हमारे लेख के छपते ही ताड़ लेतें हैं। और कहीं दूसरे ना पढ़ लें इसलिए धड़ा-धड़ नापंसद के चटके लगा देते हैं। बस फिर क्या लेख एग्रीगेटर से गायाब! बस यही कहानी है हमारी। कभी-कभार एक-आध कवि सम्मेलन में कोई बुला लेता है तो कुछ दान-दक्षिणा मिल जाती है, उसी से हम अपनी जीविका चला लेते हैं। भला हम जैसे फक्कड़ों के यहां क्यों कोई चूहां, मच्छर, छिपकली जैसे जंतु घूमेंगे?

अब जब खाते कम हैं तो पक्का है कि शरीर में खून भी कम ही होगा ना। बड़े लोगों की तरह थोड़े ही कि बदन में खून लबा-लब भरा रहे और महाशय अस्पताल में खून की कमीं के बहाने से मुफ्त में अपना ईलाज कराने के बहाने आराम करते रहें, चाहे अदालतें उनका कितना ही इंतज़ार करती रहे। और जब हमें कभी अस्पताल की ज़रूरत पड़ जाए तो जनरल बैड भी खाली नही मिल सकते। उसमें भी ले-दे कर काम चलाना पड़ता है।

खैर चूहा तो चूहा है, मनमौजी है! जब जी चाहेगा, जहाँ जी चाहेगा, वहीं जाएगा।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

(यह व्यंग्य "हरिभूमि" समाचार पत्र में दिनांक 12 जून 2010 को "चूहा तो महज़ प्राणी है" नमक शीर्षक के साथ छपा है.)


Keywords:
Mouse, Rate, चुहाँ, मुख्यमंत्री, Hindi critics

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आतंकवाद और हम

आज सारे विश्व को आतंकवाद नामक दानव ने घेरा हुआ है। आमतौर पर आतंकवाद किसी वर्ग अथवा सरकार से उपजी प्रतिशोध की भावना से शुरू होता है। इसके मुख्यतः दो कारण होते है, पहला यह कि किसी वर्ग से जो अपेक्षित कार्य होते हैं उसके द्वारा उनको ना करना तथा दूसरा कारण ऐसे कार्यों को होना जिनकी अपेक्षा नहीं की गई है। मगर आमतौर पर ऐसे प्रतिशोधिक आंदोलन अधिक समय तक नहीं चलते हैं। हाँ शासक वर्ग द्वारा हल की जगह दमनकारी नीतियां अपनाने के कारणवश अवश्य ही यह लम्बे समय तक चल सकते है। ऐसे आंदोलनों में अक्सर अर्थिक हितों की वजह से बाहरी हस्तक्षेप और मदद जुड़ जाती है और यही वजह बनती है प्रतिशोध के आतंकवाद के स्तर तक व्यापक बनने की। कोई भी हिंसक आंदोलन धन एवं हथियारों की मदद मिले बिना फल-फूल नहीं सकता है। इन हितों में राजनैतिक, जातीय, क्षेत्रिए तथा धार्मिक हित शामिल होते हैं। बाहरी शक्तियों के सर्मथन और धन की बदौलत यह आंदोलन आंतकवाद की राह पर चल निकलते हैं और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं। तब ऐसे आंदोलन क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं रह जाते, बल्कि संगठित होकर सशक्त व्यापार की तरह सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाए जाते हैं।

जब बात धार्मिक हितों की होती है तो ऐसे संगठन धार्मिक ग्रन्थों का अपने हिसाब से विश्लेषण करके धर्म की सही समझ नहीं रखने वाले लोगों को अपने जाल में फांस लेते हैं। जैसा कि अक्सर सुनने में आता है कि आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटरों में यह समझाया जाता है कि ईश्वर (अल्लाह) ने काफिरों को कत्ल करने का हुक्म दिया है। ज़रा सी समझ रखने वाला यह समझ सकता है कि अगर ईश्वर काफिरों को कत्ल करने का हुक्म देता तो वह उनको पैदा ही क्यों करता? बल्कि ईश्वर कुरआन में फरमाता है कि वह अपने बन्दों से एक माँ से भी कई गुणा अधिक प्रेम करता है, चाहे वह उसे ईश्वर माने अथवा ना माने और अपने गुमराह बन्दे का भी अंतिम सांस तक वापिस सही राह पर लौट कर आने का इंतज़ार करता है।

कारून नामक खलनायाक इतिहास में एक बहुत बड़े धर्म विरोधी के रूप में जाना जाता है। एक बार उसने लोगों को इकटठा किया और मुसा (अ.) से सबके सामने मालूम किया कि ज़िना (बलात्कार) के गुनाह पर आपका कानून क्या कहता है? उनके जवाब पर उसने एक औरत के द्वारा मुसा (अ.) पर अस्मिता लूटने का इल्ज़ाम लगावाया, इस इल्ज़ाम पर मुसा (अ.) को बहुत गुस्सा आया। मुसा (अ.) का गुस्सा देख कर उस महिला ने सारा सच साफ-साफ उगल दिया। जब उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की तो ईश्वर ने कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "हमने धरती को तुम्हारे अधीन कर दिया है, तुम उसे जैसा चाहे हुक्म दे सकते हो।" मुसा (अ.) ने धरती को हुक्म दिया की वह कारून को अपने अन्दर समा ले, इस पर धरती ने उसके बदन का कुछ हिस्सा अपने अंदर समा लिया। यह देख कर कारून ने मुसा (अ.) से अपना जूर्म कुबूल करते हुए माफी मांगी। लेकिन वह बहुत अधिक गुस्से में थे, वह धरती को हुक्म देते गए और कारून माफी मांगता गया। आखिर में कारून पूरा का पूरा धरती में समा गया, इस पर स्वंय ईश्वर ने मुसा (अ.) से कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "मेंरा बन्दा तुझ से माफी मांगता रहा और तुने उसे माफ नही किया? मेरे जलाल की कसम अगर वह एक बार भी मुझसे माफी मांगता तो मैं अवश्य ही उसे माफ कर देता।" उपरोक्त बात से पता चलता है कि मेरा अल्लाह (ईश्वर) अपने बन्दों को कैसा प्यार करने वाला और कैसा माफ करने वाला है कि कारून को भी अपना बन्दा कह रहा है और उस जैसे गुनाहगार को भी माफ करने के लिए फौरन तैयार है जिसने स्वयं को ईश्वर घोषित किया हुआ था।

आतंकवादी संगठन अक्सर ही उन आयतों (श्लोक) का गलत विश्लेषण करते हैं जिनमें ईश्वर युद्ध के समय ईमान रखने वालों को उनके विरूद्ध युद्ध का ऐलान करने वालों से डर कर भागने की जगह जम कर युद्ध करने का आह्वान करता है। यह बिलकुल ऐसा ही है, जैसे अपने देश के वीर जवानों को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है तथा कमांडर उनमें जोश भरते हैं. अक्सर इस्लाम विरोधी भी आतंकवादियों की ही तरह  इन आयतों को सही संदर्भ में समझने की कोशिश नहीं करते हैं और इस्लाम के विरोध में उतर आते हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो इस सतह पर दोनो एक ही तरह का कार्य रहें हैं।

इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, डराने की, आतंकित करने, उसकी संपत्ति गबन करने की, उसके सामान के अधिकार से उसे वंचित करने की, उसके ऊपर अविश्वास करने की, उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की (जबकि उनका माल खरीदा जाए) या (अगर साझेदारी में व्यापार है तो) उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

अगर ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि इस्लाम केवल उन ग़ैर मुस्लिमों से युद्ध करने की अनुमति देता है जो कि मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करें तथा उनको उनके घरों से बेदखल कर दें अथवा इस तरह के कार्य करने वालों का साथ दें। ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.

 [2:190] और अल्लाह के मार्ग मं उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती ना करो। निसन्देःह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।

किसी भी बेगुनाह को कत्ल करने के खिलाफ ईश्वर स्वयं कुरआन में फरमाता हैः

इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]



इस बारे में अल्लाह (ईष्वर) के अंतिम संदेषवाहक मुहम्मद (स.) का हुक्म है किः



"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)

"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)


"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)


"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).

हिंसक आंदोलनों चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवाद का रूप ले चुके हों, इनको केवल शक्ति बल के द्वारा समाप्त नहीं जा सकता है, बल्कि जितना अधिक शक्ति बल का प्रयोग किया जाता है उतने ही अधिक ताकत से ऐसे आंदालन फल-फूलते हैं। इनसे जुड़े संगठन बल प्रयोग को लोगो के सामने अपने उपर ज़ुल्म के रूप में प्रस्तुत करते हैं तथा और भी अधिक आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं। ऐसे में आतंकवादी आंदोलन से संबधित पूरे के पूरे वर्ग को ही घृणा और संदेह की निगाह से देखा जाना मुश्किल को और भी बढ़ा देता है। बल्कि ऐसे आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना चाहिए। वहीं हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि पूरे समाज में हिंसा / आतंक के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए।

आज ऐसी आतंकवादी सोच के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है। इसके लिए सबसे पहला और बुनियादी कार्य आपसी भाईचारे को बढ़ाना तथा भ्रष्टाचार को समाप्त करना है।

आईये मिलकर इस मुहिम को आगे बढ़ाएं।

-शाहनवाज़ सिद्दीकी


Keywords: Terrorism, आतंकवाद, relegion, terror, naxal, maovad

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एक बेहोश व्यक्ति की जीवन के लिए जद्दोजहद

इसे समय की मार कहें या ज़माने का सितम जिसने एक बेहोश व्यक्ति को अस्पताल-दर-अस्पताल ठोकरे खाने पर विवश कर दिया है। बात इकराम गनी नामक व्यक्ति की है, जिनके बारे में मैने अपने लेख "आखिर संवेदनशीलता क्यों समाप्त हो रही है" में पहले बताया था। उनका एक्सिडेंट 8 अप्रेल को मुरादाबाद, उ. प्र. में एक न्यायधीश साहिबा की कार से हो गया था, जिससे उनके सिर में गम्भीर चोट लगी थी और एक पैर की हड्डी पूरी तरह टूट गई थी। मुरादाबाद के डाक्टरों के जवाब देने पर उनको दिल्ली लाया गया था, दिल्ली के किसी सरकारी अस्पताल में दाखिला ना मिलने की वजह से उनको बत्तरा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। धीरे-धीरे वहां भी दिन बीतते गए परंतु हालात में कोई सुधार नहीं आया। इधर इनके परिजनों के पास पैसे भी समाप्त होते गए हालात यहां तक आए की रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाने पड़े। जिन लोगो के आड़े-हाथों में मदद की थी उनसे मदद तो मिली परंतु वह बहुत कम थी और इलाज और दवाईयों का खर्चा उठाने में नाकाफी थी। फिर फैसला किया गया कि उनको आल इंडिया मेडिकल अथवा पंत जैसे किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए।

इसके बाद शुरू हुआ अस्पताल-दर-अस्पताल भटकने और ठोकरे खाने का सिलसिला, लेकिन इकराम गनी को किसी भी अस्पताल ने दाखिल नहीं किया। तर्क था आईसीयू में बैड उपलब्ध ना होना। क्या ऐसा हो सकता है कि आल इंडिया मेडिकल, राम मनोहर लोहिया और पंत जैसे कितने ही बड़े अस्पताल में किसी एक गरीब और बेहोश व्याक्ति के लिए बैड खाली ना हो? या फिर उपर तक पहुंच ना होने के कारण उनको मना कर दिया गया? क्या यही है सरकार की ‘आम आदमी के साथ’ वाले नारे की हकीकत? क्या सरकार की नींद कभी खुलेगी? जानता हुँ कि इस भ्रष्ट व्यवस्था में कुछ भी कहना नक्कारखाने में तुती बजाने जैसा ही है।

इकराम गनी के परीजनों ने थक-हार कर और सीने पर पत्थर रख कर उनको दरिया गंज के एक छोटे से नर्सिंग होम खदीजा नेशनल अस्पताल में भर्ती कराना पडा है।

अच्छा है कि इकराम की आप सो रहे हो वर्ना नंगी आँखो से यह सब देखते तो जीते-जी मर जाते!

नोटः अगर कोई भी इकराम गनी के अच्छे इलाज की व्यवस्था करावाने में अपना योगदान देना चाहें अथवा उनका हाल-चाल पता करना चाहे तो दरियागंज के खदीजा नेशनल अस्पताल से संपर्क कर सकते हैं या फिर मुझसे उनके परिजनों के बारे में पता कर सकते है। मेरा ई-पता है: shnawaz@gmail.com


- शाहनवाज़ सिद्दीकी


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Accident, Government, Ikram Ghani, News, संवेदनहीनता

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आलोचनाओं में व्यतीत होता समय

आजकल ब्लाग जगत से जुड़े हिन्दी लेखकों का अधिकतर समय एक-दूसरे के धर्म, आस्था अथवा लेखों की आलोचना करने में ही व्यतीत होता है। हालांकि लेखन जगत में आलोचना हमेशा से ही शक्ति का स्रोत होती रही है। लेकिन आजकल ना तो आलोचना का वह स्तर दिखाई देता है और ना ही लेखकों में आलोचना सहने और सुझावों को आत्मसात करने की ललक। यह जानते हुए भी कि मैं गलत हूँ, फिर भी अपनी बात पर अड़े रहने की ज़िद हर जगह मौजूद है। सबसे अधिक चिंतनीय और सरदर्द करने वाली बात तो एक-दूसरे के विरोध में लिखे जाने वाले लेखों की कड़ी का अंत ना होना है। अगर कोई एक लेख लिखता है तो उसके विरोध में दुसरा लेख, फिर उसके विरोध में तीसरा, चौथा तथा पांचवा लेख लिखा जाता है और यह प्रक्रिया निरंतर चलती जा रही है। आज अगर साहित्य जगत की यह तस्वीर है तो आमजनों की हालत का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।


दरअसल यह कशमकश कुछ ऐसे आरम्भ होती हैः
जब भी कोई लेखक कुछ लिखता है तो उस पर प्रश्न होने स्वाभाविक है और सभ्य लोग इससे विचलित भी नहीं होते हैं। सामान्य प्रक्रिया तो यही है कि अगर आलोचक उस पर प्रश्न करें तो लेखक उक्त लेख के साथ न्याय करते हुए, लेख से सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर दे। अगर लेखक के पास लेख से सबंधित प्रश्नों के उत्तर ही नहीं है, तब इसका अर्थ है कि लेखक का स्वयं लेख पर नियंत्रण नहीं है अर्थात वह लेख के साथ पूर्णतः न्याय नहीं कर सकता है। और जो लेखक अपने लेख के साथ न्याय नहीं कर सकता उसे उक्त विषय पर लिखने का हक़ भी नहीं होना चाहिए।

जब लेखक के पास उत्तर नहीं होते हैं तो वह इधर-उधर की बातें करता है अथवा कुंठाग्रस्त होकर उलटा-सीधा या ध्यान भटकाने वाला लेख लिखता है।

हमें किसी भी लेख को अतिउत्साहित होकर अथवा पूर्ण जानकारी के बिना नहीं लिखना चाहिए। और किसी भी विषय पर प्रश्न उठाने की जगह उसका हल प्रस्तुत करना अधिक अच्छा है। याद रखें कि अगर हम किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो चार उंगली हमारी ओर उठना स्वाभाविक है।


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Battle of thought, Religion, आलोचना

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आखिर संवेदनशीलता क्यों समाप्त हो रही है?

आज समाज में धीरे-धीरे संवेदनशीलता का अंत होता जा रहा है. लोग सड़क हादसों में पड़े-पड़े दम तोड़ देते हैं और कोई हाथ मदद के लिए नहीं उठता है. अक्सर देखने में आया है कि गरीब लोग तो फिर भी मदद करने के लिए आ जाते हैं, परन्तु अमीर तथा बड़े ओहदों पर बैठे लोग स्वयं अपनी मोटर गाड़ियों से दुर्घटना करने की बावजूद लोगो को तड़पते हुए छोड़ देते हैं. और इसकी ताज़ा मिसाल मुझे स्वयं देखने को मिली. एक इंसान बैंक से पैसे निकाल कर अपने घर की तरफ जा रहा था,  परन्तु रास्ते में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पद पर बैठी हुई एक महिला न्यायधीश ने कानून और मर्यादा को तार-तार करते हुए उसे मौत के मुंह में धकेल दिया. किसी आम इंसान से तो फिर भी ऐसी उम्मीद की जा सकती है, कि वह कानून का पालन ना करे, परन्तु संविधान की रक्षा करने वाले तथा लोगो को कानून का पाठ पढ़ने वाले स्वयं ही कानून का मजाक बनाकर किसी को मौत के मुंह में धकेल दें तो इसे आप क्या कहेंगे?

बात 8 अप्रैल, दोपहर 4 बजे के आस-पास, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश की है जहाँ दिल्ली से तबादला हो कर आई एक न्यायाधीश साहिबा की सेंट्रो कार से बैंक से पैसे निकाल कर आ रहे इकराम गनी बुरी तरह घायल हो गए. इसे माननीय न्यायधीश की लापरवाही कहे या फिर अपने रुतबे के दंभ में कानून को ठेंगा दिखने की बड़े लोगो की फितरत, जिसके चलते न्यायधीश साहिबा जिसका नाम शशी वालिया बताया जा रहा है, जिसने बिना यह देखे की कोई मोटर साईकिल सवार भी बराबर से गुज़र रहा है अपनी सेंट्रो कार को सड़क के बीच में रोका और कार का दरवाज़ा खोल दिया. जिससे टकराकर इकराम गनी बीच सड़क में गिरकर बुरी तरह घायल हो गए. उसके एक पैर की हड्डी बुरी तरह टूट गई और सर की हड्डी मस्तिष्क में जा घुसी. इतना होने पर जब लोगो की भीड़ इकट्ठी हो गई और कानून की तथाकथित रक्षक को लगा की बात बिगड़ सकती है, तो आनन-फानन में उसे पास के सरकारी अस्पताल में भरती करा कर चलती बनी. हालांकी मोटर साईकिल सवार की हालत इतनी गंभीर थी और उसे जल्द से जल्द मस्तिष्क के ऑपरेशन की आवश्यकता थी. परन्तु उस इन्साफ की देवी ने उसके बाद मुड कर भी नहीं देखा की उसके कानून को ठेंगा दिखाने के कारण जो इंसान मौत और ज़िन्दगी की जंग लड़ रहा है उसकी हालत कैसी है? 

जब दुर्घटना की खबर मिलने पर इकराम के घर वाले अस्पताल पहुंचे तो देखा की वह बुरी तरह घायल है. जब चिकित्सकों ने बताया की बचने की उम्मीद बहुत क्षीण है और अस्पताल में उसके इलाज के साधन ही नहीं हैं, तब इकराम के घरवालों ने चिकित्सकों से गुहार लगाई की उसको डिस्चार्ज कर दें ताकि वह पास के ही निजी अस्पताल "साईं अस्पताल" में ले जा सकें तो डिस्चार्ज करने में ही अस्पताल के लापरवाह कर्मचारियों ने डेड़ घंटा लगा दिया.

किसी तरह घर वाले इकराम को लेकर साईं अस्पताल पहुंचे तो रास्ते में पता चला की उसकी जेब में बैंक की रसीद तो है, लेकिन पैसे और बटुआ गायब है. कितने क्रूर होते हैं वह लोग जो ऐसी हालत में भी ऐसी घिनौनी और अमानुषी हरकत करते हैं.

खबर है की आज चार दिन के बाद उसे होश नहीं आया है, और जब मुरादाबाद के सबसे मशहूर अस्पताल के चिकत्सकों ने अपने हाथ खड़े कर दिए तो उसे दिल्ली लाया गया है.

माननीय न्यायधीश साहिबा ने यह भी देखने की ज़रूरत नहीं समझी की रोज़ अपनी रोटी का जुगाड़ करने वाले उक्त मोटर साईकिल सवार के घर वाले आखिर कैसे इतने महंगे इलाज के लिए पैसे का जुगाड़ कर रहे हैं?

वही चश्मदीदो के मुताबिक न्यायधीश साहिबा ने हादसे और अस्पताल के बीच में ही फ़ोन पर अपने ताल्लुक वालो को कॉल करके हादसे की जानकारी और स्थिति को सँभालने की ज़िम्मेदारी दे दी थी और शायद इसी के चलते मुरादाबाद की पुलिस ने अभी तक कोई भी खास कदम नहीं उठाया है. शायद वह मामले को रफा-दफा करने की फ़िराक में है.
वैसे भी इस देश में गरीबों की सुनता कौन है? कितने ही भूखे-नंगे, सड़क पर सोने वाले गरीब लोग रात को शराब पी कर गाडी चलाने वाले रईस जादो की कार की रफ़्तार नमक हवस का शिकार हो जाते हैं और लोग यूँ ही मुंह देखते रह जाते हैं.

क्या कभी इस देश में गरीबों की सुनवाई नहीं होगी?


- शाहनवाज़ सिद्दीकी


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