सहनशीलता की ताकत: मौलाना वहीदुद्दीन - 2

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  • Shah Nawaz
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  • सहनशीलता और असहनशीलता को हर जगह लागु किया जा सकता है, बात चाहे वृहत परिप्रेक्ष में हो अथवा घर की। अक्सर तलाक के कारण घर टूट जाते हैं, हालाँकि अल्लाह (ईश्वर) ने तलाक को एक बदतरीन कार्य बताया है और इसलिए इसका उपयोग आखिरी हल के तौर पर करना चाहिए। यह नहीं कि अगर पति-पत्नी में झगडा हो जाए तो फ़ौरन 3 बार तलाक दे दिया जाए। गुस्सा तो इस्लाम में हाराम करार दिया गया है, क्योंकि यह प्राकृतिक प्रक्रिया को पूरा नहीं होने देता। इसलिए एक-एक महिना करके 3 महीने मैं 3 बार तलाक दिया जाना उत्तम विधि है। जब हम गुस्से होने के बाद सो जाते हैं तो सुबह तक प्रकृति स्थिति को सामान्य बना देती है। अगर इस विधि को अपनाया जाए तो तलाक होगी ही नहीं।

    सहनशीलता सारी कामयाबियों की कुंजी है, जब कोई व्यक्ति सहनशीलता धारण करता है तो सारी प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायता करना शुरू कर देती है। वहीँ असहनशीलता अर्थात बेसब्री स्थिति को सामान्य करने की प्राकृतिक प्रक्रिया को समाप्त कर देती है।

    इसको समझने के लिए कुछ उदहारण लेते हैं। पहला उदहारण 610 AD का है जब मुहम्मद (स.) को खुदा (ईश्वर) की तरफ से ईशदूत बनाया गया, तो उन्होंने समझाया कि अगर कहीं आस्था में विरोधाभास के चलते उत्पन्न विरोधाभास में भी सहनशीलता का दामन थामे रखना चाहिए। एक ईश्वर की आराधना के लिए ईशदूत अब्राहम (अ.) द्वारा बनाया गए 'काबा शरीफ' में समय के साथ बदलाव आने से लोगो ने 360 मूर्तियाँ रख दी थी। लेकिन इस पर रसूल अल्लाह (मुहम्मद स.) भड़के नहीं बल्कि उन्होंने सब्र से काम लिया, दूसरी तरफ 1949 में बाबरी मस्जिद में 3 मूर्तियाँ रखे जाने से मुसलमान भड़क गए, पूरी दुनिया में हंगामा किया। कुरआन में आयत (श्लोक) उतरी कि (अर्थ की व्याख्या) "अपने आप को पाक करो", कुरआन ने यह नहीं कहा कि काबा को पाक करो, बल्कि कहा गया कि अपने आप को पाक करो। अब दोनों स्थितियों को तुलना करके देखिये, हमारे देश के मुसलमानों के हंगामे का परिणाम यह निकला कि आपस में ज़िद्द, तनाव, टकराव इतना बढ़ा, ज़िद्द की ऐसी राजनिति हुई कि बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी। रसूल अल्लाह ने मूर्तियों को कुछ भी नहीं किया, तो एक समय आया कि काबा शरीफ को लोगो ने स्वयं ही एक ईश्वर की उपासना के लिए पाक कर दिया। सब्र और बेसब्री का फर्क आप स्वयं देख सकते हैं।

    जब दूसरा विश्व युद्ध हुआ तो 1945 में अमेरिका ने जापान पर एटम बम गिरा दिया तो जापान को झुकना पड़ा। वहां एक जज़ीरा है ओकिनावा जो कि 1200 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है, उस पर अमेरिका ने कब्ज़ा कर लिया। अब जापान के दो लक्ष थे, एक था जापान का पुन:निर्माण और ओकिनावा की आजादी। इस पर उन्होंने सहनशीलता दिखाई, और शिक्षा के द्वारा अपने आप को मज़बूत करने के लिए 30 साल की शिक्षा की योजना बनाई और ओकिनावा को वैसे ही छोड़ दिया। 30 साल में जापान दुनिया की आर्थिक ताकत बन गया और अमेरिका ने स्वयं 1972 में ओकिनावा को वापिस जापान को दे दिया।

    सद्दाम हुसैन ने असहनशीलता दिखाते हुए कुवैत पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया तब सारे मुस्लिम जगत ने उसका समर्थन किया, हालाँकि इस्लाम के एतबार से यह एक गलत कदम था। इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप अमेरिका सहित बहुत से देशो ने उस पर हमला कर दिया और अंत में सद्दाम हुसैन से मांग की गई की वह अपनी गद्दी छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीके से इराक की सरकार बनने दे। हालात के मुताबिक सद्दाम हुसैन को सहनशीलता दिखाते हुए अमेरिका की मांग को मान लेना चाहिए था। उसके पास 8 बड़े महल थे, अगर वह अपने महलों में बड़े-बड़े शिक्षण संसथान खोल देता तो वहां की जनता को कितना फायदा होता। साथ ही साथ उसके इस तरह के प्रयास के कारण लोग उसे चुनकर दोबारा इराक की सत्ता सौंप देते। लेकिन असहनशीलता दिखने का नुक्सान यह हुआ कि उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा, बाद में उसे फंसी की सजा हुई तथा इराक को भी कितना भरी नुक्सान उठाना पड़ा।

    मौलाना वहीदुद्दीन के व्याख्यान को ऑनलाइन सुनने के लिए http://www.cpsglobal.org/content/6th-june’2010-sunday-urdu-060510-1105pm पर चटका लगा कर सुनिए।


    - शाहनवाज सिद्दीकी


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    Power of Patience, Maulana Vahiduddin Khan

    13 comments:

    1. Pure Hindustan main aise hi vicharo ki jarurat hai.

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    2. पदम भूषण मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान साहब के पुराने मुद्दों पर अलग तरह के विचार पढ के बहुत अच्‍छा लगा वाकई ऐसा हुआ होता तो कितना अच्‍छा होता,

      सहनशीलता पर शायद ऐसी मिसालें शायद मैंने पहले कभी न पढीं, बहुत बढिया, लाजवाब, धन्‍यवाद

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    3. इस मजलिस में हमारे साथ भाई तारकेश्वर गिरी, डा. अयाज़, मास्टर अनवार और भाई शाहनवाज़ भी थे। सभी को एक बिल्कुल रूहानी अहसास हो रहा था। कश्मीर के मसले को भी मुसलमानों ने ही बिगाड़ा है। सन् 1949 में वल्र्ड वॉर सेकंड में जापान ने ओकिनावा जज़ीरे पर क़ब्ज़ा कर लिया। जापान के रिकन्सट्रक्शन के लिए वहां के रहनुमा ने 30 का एक प्रोग्राम बनाया। उसने ओकिनावा को वैसे ही छोड़ दिया। जापान इकॉनॉमिक सुपर पॉवर बनकर उभरा और 1972 में अमेरिका को वहां से अपना क़ब्ज़ा हटा लिया। इसे ‘डीलिंकिंग पॉलिसी‘ कहा जाता है। पाकिस्तान को बिज़नेस की अपॉरचुनिटी पर ध्यान देना चाहिये और कश्मीर के मसले बातचीत के लिए मेज़ पर छोड़ देना चाहिये। You have to delink problem to opportunities .
      जापान ने सब्र किया और इकॉनॉमिक सुपर पॉवर बन गया और पाकिस्तान ने बेसब्री दिखायी और आज वह एक फ़ेल्ड स्टेट बनकर रह गया है। वह आज अमेरिका की मदद से चल रहा है।
      यही हाल सददाम हुसैन का हुआ। 57 मुस्लिम देश हैं। सब जगह इस्राईल को सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है। मैं कहता हूं कि अरब देश अपनी ग़लत पॉलिसियों की क़ीमत अदा कर रहे हैं।

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    4. बहुत ही उम्दा प्रस्तुती ,दरअसल अच्छे विचारों की वैसे तो हर किसी को हमेशा जरूरत रहती है क्योकि सबका कल्याण इसी में निहित है और आज तो इनसानियत को अच्छे विचारों की उतनी ही जरूरत है जितना जनआंदोलनों की |

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    5. मौलाना बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात कह रहे थे और मैं सोच रहा था कि यह सब आज एक सपना हो चुका है। आज जितने भी वाद हैं वे दरअस्ल विवाद हैं न कि विवादों का समाधान । सारे मसलों का हल सच को जानना और मानना है।

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    6. गिरी जी और अनवर जी आप दोनों ने बिलकुल सही कहा.

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    7. वहीउद्दीन साहब की बातों को ज़रा ठिठक कर सोचना पड़ता है..कभी लगता है कि थोडा अतिरंजना में है ..लेकिन उनकी सदाशयता पर किंचित शक नहीं किया जा सकता.लेकिन क्या क्या पलायन कर जाना मसले का हल होता है.उनकी और उनके साहबजादे साहब की बातों में इतना विरोधाभास क्यों दिखलाई देता है.क्या ये अपनी अपनी दूकान का मामला है!!

      खिअर ये अवांतर प्रसंग होगा शाहनवाज़ भाई की नियत साफ़ है और उनकी मेहनात की हम सभी सराहना करते हैं..अल्लाह करे आप हमेशा अच्छी चीज़ों से हमें रूबरू कराते रहे,आमीन!

      पसंद का छठा चटका मेरी जानिब से!

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    8. फुर्सत मिले तो हमज़बान पर शाया रंजना जी की कविताओं पर नज़र सानी की जाए.

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    9. बहुत ही उम्दा प्रस्तुती,शाहनवाज़ भाई इतनी अच्छी पोस्ट और उदहारण पूरी निष्पक्षता से देने के लिए आपको बहुत-२ धन्यवाद , गिरी जी ने भी सही कहा की आज पुरे हिंदुस्तान में ऐसे ही विचारों की जरुरत है .

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    10. धन्यवाद इस पोस्ट के लिए .............
      अगर पढ़ती होगी भारत माँ भी ब्लॉग कहीं
      हर वीक ढूंढती होगी उनकी आखें पोस्ट सही
      इस बार की तलाश उनकी होगी पूरी यहीं

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    11. शाहनवाज़ साहब आपने मौलाना की बात को बहुत ही अच्छे अंदाज़ में पेश किया है
      सब्र की अपनी अहमियत है और सब्र विषय को सब्र के साथ अच्छे तरीके से पेश करने वाला भी मुबारकबाद का हक़दार . हमारी और से आपको मुबारकबाद.
      .......और हाँ एक गुज़ारिश भी आगे भी इस सिलसिले को बनाए रखें.

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    12. मौलाना की बातोँ मेँ अतिरंजना और मुबालग़ा है लेकिन वे सिरे से ग़लत नहीँ हैँ । अल्लाह के दूत मुहम्मद स. की क़ुरबानियोँ से लोगोँ को वाक़िफ़ कराना सच्चा जिहाद है न कि पलायन । इसके लिये सब्र दरकार है ।

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