मायूसियों से अकसर भर जाती है ज़िन्दगी



मायूसियों से अकसर भर जाती है ज़िन्दगी
कभी मौत का डर, कभी डराती है ज़िन्दगी

मौत तो आती है एक बार सताने को
पर रोज़ ही आकर यह सताती है ज़िन्दगी

जो लोग अक्सर खेलते हैं दीन दुनिया से
अंजाम उनका बदतर बनाती है ज़िन्दगी

हर तरफ मायूसियाँ भर जाए ज़िन्दगी में
उस वक़्त तो यह खूब रुलाती है ज़िन्दगी

शिद्दत के साथ इश्क ना कर इस हयात से
पल भर में बेवफा यह हो जाती है ज़िन्दगी

- शाहनवाज़ सिद्दीकी




Keywords: इश्क, ज़िन्दगी, डर, दीन, दुनिया, मायूसियाँ, मौत, हयात

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यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला



यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
कभी वो खफा रहे, तो कभी हम खफा रहे

रहते थे साथ-साथ मगर आज क्या हुआ
कभी वो जुदा रहे, तो कभी हम जुदा रहे

वादा जो कर लिया था हमने साथ देने का
वो बेवफा रहे, तो हम भी बेवफा रहे

लिखती गई जो नगमा-ओ-अश`आर ज़िन्दगी
वहां वो कलम रहे और हम  फलसफा रहे

हर सिम्त ढूँढती रही ज़िन्दगी वही पल
साकी-ऐ-जाम 
थे वो और हम राजदां रहे

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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बाप रे बाप, डॉक्टर!

साल के शुरू में तबियत खराब हुई, पुरे शरीर में दर्द और हल्का बुखार था. पहले भी एक-दो-बार हुआ था, तब फैमिली डॉक्टर को दिखाया था, दवाई ली थी और ठीक हो गए थे. लेकिन इस बार दर्द जा ही नहीं रहा था, यूरिक एसिड का टेस्ट कराया तो वह भी नोर्मल था. एक-दो लोगो से सलाह लेकर एक मशहूर नर्सिंग होम के मशहूर डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने कई टेस्ट कराए जो कि करीब चार-पांच हज़ार रूपये में हुए, लेकिन सभी टेस्ट नोर्मल थे, ऊपर से डॉक्टर की महंगी फीस. इलाज की बीच में ही तबियत ठीक होने लगी. (वैसे भी इतना खर्च देखकर तो अच्छे-अच्छों की तबियत हरी हो जाती है).

छ: महीने तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन पिछले महीने फिर से वही परेशानी! पिछला अनुभव अच्छा नहीं रहा था, इसलिए इस बार फिर वही उलझन कि किस डॉक्टर को दिखाया जाए? कई लोगो से सलाह लेने के बाद हड्डियों के एक मशहूर डॉक्टर को दिखाया गया. डॉक्टर ने कुछ (बड़ी महंगी) दवाइयां लिखी और यूरिक एसिड का टेस्ट करवाने की सलाह दी. हमने फिर से टेस्ट करवाया, लेकिन नतीजा फिर से कुछ नहीं, रिजल्ट 4.1 आया था. हमने डॉक्टर को फोन लगाया तो डॉक्टर साहब ने कहा कि अभी तो दवाइयां लेते हुए 3-4 दिन ही हुए हैं, कम से कम 7-8 दिन दवाइयां लीजिये, उसके बाद मिलना. हम चुपचाप दवाइयां लेते रहे. 8 दिन बाद फिर से डॉक्टर को दिखाया तो रिपोर्ट देखकर बोले, "यूरिक एसिड की प्रोब्लम तो नहीं है" (अब जो रिपोर्ट में लिखा था, वही हमने फोन पर भी बताया था. फिर रिपोर्ट देखकर उन्हें क्या नया पता चला, यह हमारी समझ से बाहर था). खैर! उन्होंने बताया कि कोई अजीब से नाम वाला बुखार है, 10 दिन दवाई लो ठीक हो जाएगा. फिर से नई दवाइयां शुरू (वैसे आजकल दवाइयों की पैकिंग होती बढ़ी खूबसूरत हैं! यह भी है कि इतने तगड़े पैसे लेने के लिए कुछ तो दिखाना पड़ेगा).

नई दवाइयां लेते हुए एक हफ्ता हुआ, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा. इतने में अचानक आठवे दिन ऑफिस वालों ने मुंबई भेज दिया. काम बहुत आवश्यक था इसलिए मना भी नहीं कर सका और तबियत खराब में ही मुंबई जाना पड़ा. जाते-जाते 4 दिन की  दवाई और लेता गया. अब कुल मिलकर 14 दिन हो गए लेकिन तबियत में कोई इजाफा नहीं हुआ, इसलिए फिर से नया डॉक्टर ढूँढना शुरू किया. इस बार का डॉक्टर गोल्ड मेडेलिस्ट है, देखने का अंदाज़ भी ठीक-ठाक लग रहा है. पहली बार तो उसने पहली वाली रिपोर्ट्स देखते ही कहा कि यह टेस्ट क्यों करवाए? (अब डॉक्टर कहेगा तो करवाने तो पड़ेंगे ही ना? हमें क्या पता कि टेस्ट हमारी परेशानी के हैं या नहीं?) फिर जो दवाइयां अभी तक मैं ले रहा था, उन्हें देखकर उसने कहा कि यह दवाइयां तो बहुत तेज़ हैं और इनका तुम्हारी परेशानी से भी कोई लेना-देना भी नहीं है. इनसे तो तुम्हारे गुर्दे में परेशानी हो सकती है, क्यों ले रहे हो यह दवाइयां? (फिर से वही सवाल, भला जब हम डॉक्टर नहीं है, तो हमें कैसे पता चलेगा कि दवाई ठीक है अथवा नहीं?). इतने बड़े-बड़े और डिग्रीधारक डॉक्टर भी बीमारी का पता नहीं लगा पाए, बेकार की और महंगी-महंगी दवाइयां देते रहे. ऊपर से खाने में इतने परहेज़ बता दिए कि कई महीनों से ठीक से खाना भी नहीं खा पाया और हल भी कुछ नहीं निकला! 

अब के टेस्ट में काफी सारे इन्फेक्शन आएं हैं, डॉक्टर कह रहा है कि शायद "हाइपरथायरॉइडिज्म" है. कुछ और टेस्ट करवाए हैं, दवाई चल रही है. पिछले महीने भर की बिमारी के कारण कमजोरी और चिडचिडापन का शिकार हो गया हूँ. हमेशा मुस्कराते रहने वाले की मुस्कराहट थोड़ी फीकी पड़ गई है, उम्मीद है दोबारा लौट आएगी.

-शाहनवाज़ सिद्दीकी



Keywords: Doctor, Fraud, Nursing Home, Uric Acid

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अभिभूत कर दिया प्यार और प्रोत्साहन ने

आप सभी लोगो का इतना प्यार और प्रोत्साहन देख कर अभिभूत हो गया हूँ, सोचा नहीं था मेरे अहसास में इतने लोग शरीक होंगे. इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो कम्प्यूटर से दूर थे, लेकिन मेरी पोस्ट के बारे में सुनकर उन्होंने फ़ौरन फ़ोन किया. कल पुरे दिन मुझे फ़ोन आते रहे, यहाँ तक की रात को 1 बजे तक दोस्तों से फ़ोन पर बात होती रही. सबसे आखिर में महफूज़ भाई का फ़ोन आया और तकरीबन आधा-पौना घंटा बात की, उन्होंने जो बातें मुझे समझाई वह बहुत ही ज़बरदस्त थी. जानता हूँ कि उन्होंने गुस्से में कुछ लिखा, लेकिन मानता हूँ कि उनके लिखने का मकसद नेक है.

व्यक्तिगत आक्षेप से मैं कभी पहले भी नहीं डरा हूँ और ना ही मुझे उसपर कभी गुस्सा आता है. मैं तो हमेशा प्रेम का समर्थक रहा हूँ, पिछले 2 वर्षो से ऑरकुट पर आर्य समाज कम्युनिटी के लोगो से आस्था पर तर्क संगत बातचीत होती रहती है. मैंने उनकी आस्था पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया, मेरी आस्था से सम्बंधित जो उनकी शंकाएँ अथवा प्रश्न थे, केवल उसके ही उत्तर दिए. क्योंकि मेरा मानना है कि अगर कहीं भ्रम की स्थिति के कारण दो समुदायों में कडुवाहट है, तो हमारा फ़र्ज़ है कि अगर हमारे पास जानकारी है तो सही बात से अवगत करा कर भ्रम अथवा शंका का निवारण किया जाए, ताकि कडुवाहट समाप्त हो. उनमे से कई लोगो ने मुझे गलियां भी दी, लेकिन मैंने हमेशा प्रेम से ही बात की. जिसका फल यह हुआ कि उनमे से कई लोगो को एहसास हुआ, उन्होंने कहा भी कि तुम कैसे मुसलमान हो? हम तुम्हे और तुम्हारी आस्था को गलियां देते हैं लेकिन तुम्हे गुस्सा नहीं आता, जबकि और मुसलमानों के साथ ऐसा नहीं है. उनमे से कई लोगों ने मेरी बात को समझा और मैंने उनकी.वहां कई लोगो से मेरी दोस्ती भी हुई, अक्सर उस कम्युनिटी के कुछ लोग मेरे लेख पढ़ते हैं और टिपण्णी भी करते हैं.

पिछले कुछ दिनों से कुछ अधिक ही भावुक हो गया था, यहाँ तक कि कल की पोस्ट लिखने से पहले बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था, लेकिन आज अपने आपको बहुत ताकतवर महसूस कर रहा हूँ. पूरी तरह ब्लोगिंग छोड़ने की बात तो कल भी नहीं की थी, केवल ब्लोगिंग का जो मेरा नोर्मल रूटीन था उसे अलविदा कहा था और उस पर मैं आज भी कायम हूँ. कल लोगो से बात करने पर एक चीज़ मैंने सोची है वह यह कि अब मैं नए लेखकों को प्रोत्साहन और ब्लॉग जगत में लाने का काम करूँगा. मेरा ब्लॉग जगत में आने का मकसद अपनी प्यारी भाषा हिंदी का प्रचार और प्रसार था, आने वाले समय में इस पर ही काम करूँगा.

अपने कल के फैसले पर अब भी कायम हूँ, जहाँ भी मुझे लगेगा कि किसी धर्म अथवा व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखा जा रहा है, वहां मैं नहीं जाऊंगा. लोग अगर मुझसे किसी प्रश्न का उत्तर चाहते हैं तो जहाँ तक संभव हो सकेगा अवश्य दूंगा लेकिन बेकार की और कुतर्कों वाली बहस से बचूंगा. वैसे भी व्यस्तता वाले जीवन में इतना समय कहाँ है किसी के पास? अपने थोड़े से समय में जनहित के कार्यों की थोड़ी सी कोशिश हो जाए और कुछ लोगो के चेहरे पर मुस्कान आ जाए यह मेरा पहले भी मकसद था, अभी भी रहेगा.

आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अता करता हूँ!


- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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राखी तो बहन भाई के रिश्तो की निशानी है


राखी तो बहन-भाई के रिश्तो की निशानी है
फूलों सी महकती हुई प्यारी सी कहानी है

भाई-बहन का प्यार है, कुदरत की एक नज़्म
धारा सी अविकल है, यह गीतों सी रवानी है

ताउम्र यूँ चलता रहे यह प्यार जहाँ में
इंसान की मुराद यह भगवान ने मानी है

भाई-बहन के प्यार से बंध जाता है संसार
रहमान की बख्शी हुई नेमत यह रूहानी है  

- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'




Keywords: Rakhi, Rakshabandhan, Festival, रक्षा बंधन, रक्षा-बंधन, रक्षाबंधन, राखी

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उफ़ यह ब्लागिंग!

यूँ तो ब्लॉग जगत में 2007 में ही आ गया था, सबसे पहले मैंने अपना ब्लॉग 'All Delhi" बनाया था, जो कि अंग्रेजी भाषा में था. इसके द्वारा में दिल्ली के बारे में जानकारियाँ उपलब्ध कराता था, जिसे बाद में http://alldelhi.com/ में बदल दिया. लेकिन मेरे ब्लॉग लेखन में एक दिन क्रांतिकारी परिवर्तन आया, यह वह दिन था जब में पहली बार "ब्लागवाणी" से रु-बरु हुआ था. अपने ब्लोगिंग के सफ़र में ब्लागवाणी का मैं बहुत बड़ा योगदान मानता हूँ, हालाँकि ब्लागवाणी के जाने के बाद की कमी को चिट्ठाजगत ने बखूबी भरा, फिर भी बस यही कहूँगा कि उसकी जगह लेना बहुत मुश्किल है.  मैं उस समय ऑरकुट पर सक्रिय था, ऑरकुट की हिंदी कम्युनिटी के मोडरेटर के रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ था. ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत  पर अनेकों हिंदी ब्लॉग्स पढने के बाद मैंने अपने ब्लॉग 'प्रेम रस' पर लिखना शुरू किया.

'प्रेम रस' पर मेरा  सबसे पहला लेख था "उर्दू और हिंदी अलग-अलग नहीं है!"  इस लेख के बाद से आज तक मैंने जितने भी लेख लिखे उसमें मुझे ब्लॉग जगत के सभी साथियों का भरपूर प्रेम और साथ मिला. धर्म पर लिखने का मुझे शुरू से शौक था और इसी कारण मैं 'हमारी अंजुमन' का सदस्य बना तथा अपने ब्लॉग 'सन्देश' में भी कुछ लेख लिखे. मैं इस्लाम धर्म के खिलाफ फैलाई जा रही भ्रांतियों को मिटाने का हमेशा ही इच्छुक रहा हूँ और इन लेखों के द्वारा मेरा प्रयास भी यही था. चाहे बात मेरे निजी जीवन की हो अथवा लेखन की, आजतक मैंने कभी किसी की आस्था को बुरा अथवा गलत नहीं कहा और दूसरों को यही समझाया भी कि इस्लाम धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता है.

मैंने हमेशा सही को सही और गलत बात को गलत कहा है, चाहे वह बी. एन शर्मा ने कही हो अथवा सलीम खान ने. सुरेश चिपलूनकर हमेशा विषय के साथ पूरा न्याय करते हुए खोजपूर्ण रिपोर्ट लिखते हैं, लेकिन जब भी उन्होंने गलत लिखा मैंने उसे गलत कहा. वहीँ शरीफ खान  साहब को भी बताया कि आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने के नाम पर गलती केवल मिडिया की ही नहीं बल्कि हमारी भी है और उन्होंने इसकी सराहना भी की.

मैंने अपने ब्लॉग 'प्रेम रस' के द्वारा हमेशा सामाजिक मुद्दों को उठाने का प्रयास किया है. ब्लॉग जगत से ही मुझे  अविनाश वाचस्पति जी, अजय झा जी, जय कुमार झा जी, खुशदीप भाई, इरफ़ान 'कार्टूनिस्ट', महफूज़ अली, डॉ. अनवर जमाल, शहरोज़ कमर, सतीश सक्सेना जी, तारकेश्वर गिरी, अलबेला खत्री, डॉ, अयाज़, सलीम खान और महक भवानी जैसे बहुत सारे मित्र और अज़ीज़ मिले (लिस्ट बहुत लम्बी है). इसके साथ-साथ हरीश कुमार तेवतिया, साजिद अली, पवन कुमार, लियाक़त अली तथा वंदना सिंह जैसे कई नए लेखकों को ब्लॉग जगत में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया.

लेकिन आज इस मोड़ पर आकर मेरा मन बहुत विचलित है, कई दिनों के सोच-विचार के बाद भी मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर मैंने कहाँ गलती की? कब किसी की आस्था अथवा व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखा? आखिर क्यों कुछ लोग मुझे जिहादी जैसे शब्दों से पुकार रहे है? (हालाँकि जिहाद एक पवित्र शब्द है, लेकिन ब्लॉग जगत में नफरत के स्वरुप में प्रयोग हो रहा है) क्यों मेरा नाम  ब्लॉग जगत के कुछ तथाकथित गुटों के साथ जोड़ा जाता है?

आज से मैं अपनी रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुकी नोर्मल ब्लागिंग को अलविदा कह रहा हूँ. केवल चुनिन्दा लोगों के ब्लॉग ही पढूंगा और उनपर ही टिपण्णी करूँगा. जिस ब्लॉग में भी किसी धर्म अथवा व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखा जाता है उनको नहीं पढूंगा.

-शाहनवाज़ सिद्दीकी

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ग़ज़ल: जब हम उनसे जुदा हो रहे थे




जब हम उनसे जुदा हो रहे थे
सच पूछो तो फ़ना हो रहे थे

खुशियों की बातें तो क्या कीजियेगा
आंसू भी हमसे जुदा हो रहे थे

लहू के जो क़तरे बचे थे बदन में
वोह जोशे-जिगर से रवां हो रहे थे

कहाँ मिल पाएं है आशिक़ जहाँ में
यह जुमले ज़बानी बयां हो रहे थे

नई वोह कहानी शुरू कर रहे थे
हम गुज़रा हुआ फ़लसफ़ा हो रहे थे

जो मशहूर थे 'बेवफा' इस जहां में
वही आज फिर बेवफा हो रहे थे


- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'





Keywords: Gazal, Ghazal, ग़ज़ल

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विश्व में आतंकवाद का बढ़ता दायरा

(दैनिक हरिभूमि के आज [10 अगस्त] के संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर मेरा लेख)

आज सारे विश्व को आतंकवाद ने घेरा हुआ है। अलग-अलग देशों में हिंसक गतिविधियों के अनेकों कारण हो सकते हैं, परन्तु आमतौर पर यह प्रतिशोध की भावना से शुरू होती है। प्रतिशोध के मुख्यतः दो कारण होते है, पहला कारण किसी वर्ग विशेष अथवा सरकार से अपेक्षित कार्यों का ना होना तथा दूसरा कारण ऐसे कार्यों को होना होता है जिनकी अपेक्षा नहीं की गई थी। मगर आमतौर पर ऐसे प्रतिशोधिक आंदोलन अधिक समय तक नहीं चलते हैं। हाँ शासक वर्ग द्वारा हल की जगह दमनकारी नीतियां अपनाने के कारणवश अवश्य ही यह लम्बे समय तक चल सकते है। ऐसे आंदोलनों में अक्सर अर्थिक हितों की वजह से बाहरी हस्तक्षेप और मदद जुड़ जाती है और यही वजह बनती है प्रतिशोध के आतंकवाद के स्तर तक व्यापक बनने की। इन हितों में राजनैतिक, जातीय, क्षेत्रिए तथा धार्मिक हित शामिल होते हैं। कोई भी हिंसक आंदोलन धन एवं हथियारों की मदद मिले बिना फल-फूल नहीं सकता है। बाहरी शक्तियों के सर्मथन और धन की बदौलत यह आंदोलन आंतकवाद की राह पर चल निकलते हैं और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं। तब ऐसे आंदोलन क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं रह जाते, बल्कि संगठित होकर सशक्त व्यापार की तरह सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाए जाते हैं।

आतंकवाद के व्यापक स्तर पर बढ़ने में बेरोज़गारी भी काफी हद तक सहायक होती है। बेरोज़गार के साथ-साथ विलासिता का जीवन जीने के इच्छुक लोग भी असानी से आतंकवादी संगठनों के शिकार बन जाते हैं। परिवार के भरण-पोषण की चिंता तथा भोग विलास की आशा इन्सान को आसानी से हैवानियत की राह पर ले चलती है। वहीं हवाला का देशी-विदेशी नेटवर्क आसानी से आतंकवादी संगठनों के पैसे की आवश्यकता को पूरा कर देता है। आतंकवाद के पोषकों में एक और अहम कड़ी है 'भ्रष्टाचार', इसके बिना आतंकवाद के नेटवर्क का पूरा होना मुश्किल है। आतंकवाद से लड़ाई में यही वह क्षेत्र जिसमें सबसे अधिक मेहनत की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के कारण ही आतंकवादी संगठन बहुत आराम से सुरक्षा ऐजेंसियों को धौका दे देते हैं। हथियार से लेकर वाहन तक सभी सुविधाएं पैसे के बल पर आसानी से मुहैया हो जाती हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि जिस समुदाय के भी लोग ऐसे मामलों में संलिप्त पाए जाते हैं, उन्हे लगता है कि आरोपी बेकसूर हैं। इस मामले में सुरक्षा ऐजेंसियों तथा सरकार की नियत पर अविश्वास की भावना आग में घी का काम करती है। इसी के चलते समुदायों के नेतागण अन्जाने में ही आतंकवादी संगठनों की मदद कर देते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की लापरवाही तथा इस क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार भी ऐसी धारणाओं के बनने में सहायक होता है। पिछली आतंकवादी घटनाओं पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलता है कि हड़बड़ी में की गई गिरफ्तारियां तथा पूरे सबूत अथवा सही जांच के अभाव में बहुत से आरोपी बरी हुए हैं। इसके अलावा जो गिरफ्तार होते हैं उनके खिलाफ सबूत ना होने की अफवाहें फैला दी जाती हैं। ऐसी घटनाओं के कारणवश लोगों के हृदय में सुरक्षा ऐजेंसियों के विरूद्ध धारणाए घर बना लेती हैं, जिसका फायदा आतंकवादी संगठन बखुबी उठा लेते हैं।

आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हजारों ऐसे आतंकवादी संगठन अपनी दुकाने चला रहे हैं। एक तरफ जहाँ कई संगठन धर्म के नाम पर तो वहीँ दूसरी तरफ नक्सलवादी तथा माओवादी संगठन क्षेत्र, भाषा तथा सामाजिक हित के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं. धर्म के नाम पर पनप रहे आतंकवादी वारदातों में संसद भवन पर हमले का नाम सबसे ऊपर आता है, क्योंकि यह देश की अस्मिता और संप्रभुता पर हमला था। वहीँ दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, अजमेर, जयपुर, मालेगांव, वाराणसी, हैदराबाद जैसे देश के विभिन्न शहरों में अनगिनत हमलों का दंश देश झेलता आ रहा है। इस कड़ी में पाकिस्तानी नागरिकों द्वारा मुंबई में हुए हमले को सबसे हिंसक आतंकवादी घटना के रूप याद किया जाता है। महाराष्ट्र, झारखण्ड तथा वेस्ट बंगाल समेत देश के कई राज्यों में माओवादी हमले भी सरकार का सिरदर्द बन गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते धार्मिक आतंकवाद में कुछ कमी दिखाई दी तो माओवादी देश के लिए बहुत बड़ा खतरा बन कर उभर रहे हैं.

बात जब धर्म का नाम लेकर फैलने वाले आतंकवादी संगठनो की होती है तो गहन विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे संगठन धार्मिक ग्रन्थों का अपने हिसाब से गलत विश्लेषण करके धर्म की सही समझ नहीं रखने वाले लोगों को अपने जाल में फांस लेते हैं। इसलिए धार्मिक संस्थाओ की भूमिका बढ़ जाती है, आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी संस्थाएं धार्मिक ग्रंथो की सही-सही जानकारियों से लोगो को अवगत कराएं। मेरे विचार से यह आतंकवादी संगठनो की जड़ पर प्रहार है।

आंदोलनों चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवादी रूप ले चुके हों, इनको केवल शक्ति बल के द्वारा नहीं दबाया जा सकता है, बल्कि जितना अधिक शक्ति बल का प्रयोग किया जाता है उतनी ही अधिक ताकत से ऐसे आंदालन फल-फूलते हैं। आतंकवादी संगठन बल प्रयोग को लोगो के सामने अपने उपर ज़ुल्म के रूप में आसानी से प्रस्तुत करके और भी अधिक आसानी से लोगों को बेवकूफ बना लेते हैं। आतंकवादी तथा हिंसक आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना ही सबसे बेहतर विकल्प है। वहीं हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि पूरे समाज में आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए। आज ऐसी आतंकवादी सोच के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी




Keywords: corruption, Nexals, Religion, Terrorism, आतंकवाद, धार्मिक ग्रंथ, प्रतिशोध, माओवाद, मुंबई हमला, विश्व

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